शिमला की ठंडी हवाओं में जब मेहक सिंह ने उस विज्ञापन को देखा, तो वह अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पाया। “वॉचमैन चाहिए – ग्लेनव्यू हवेली, शिमला। रात की शिफ्ट। अच्छा वेतन। डरपोक लोग न आएँ।”
वेतन इतना अच्छा था कि मेहक सिंह ने तुरंत संपर्क किया। उसे पिछले महीने ही अपनी फैक्टरी की नौकरी से निकाला गया था, और तीन बच्चों व पत्नी का पेट पालना मुश्किल हो रहा था।
दूसरे दिन, वह हवेली के सामने खड़ा था। ग्लेनव्यू हवेली एक विशाल, पुरानी इमारत थी जो पहाड़ी की चोटी पर बनी हुई थी। विक्टोरियन वास्तुकला, लकड़ी की नक्काशीदार बालकनियाँ, और ऊँची-ऊँची खिड़कियाँ जिनमें से कुछ टूटी हुई थीं। हवेली के मालिक श्री अरुण खन्ना एक बुजुर्ग व्यक्ति थे जो विदेश में रहते थे।
“हवेली को बचाए रखने के लिए कोई न कोई चाहिए,” श्री खन्ना ने फोन पर कहा था। “पर कुछ… नियम हैं। रात में कभी भी मुख्य हॉल में न जाएँ। हमेशा अपने कमरे में रहें। और अगर कुछ… अजीब दिखे, तो अनदेखा करें। समझे?”
मेहक सिंह ने हाँ कह दी। नौकरी चाहिए थी, और भूत-प्रेत की कहानियों पर उसका विश्वास नहीं था।
पहली रात को मेहक सिंह अपने कमरे में बैठा था जो हवेली के पिछले हिस्से में था। करीब ग्यारह बजे थे जब उसे आवाज़ सुनाई दी – पहले घंटी की आवाज, फिर पैरों की आहट।
वह बाहर झाँका। लंबे कॉरिडोर में एक भी बल्ब जलता नहीं था, पर दूर से एक हल्की सी रोशनी आ रही थी। वह धीरे से कॉरिडोर में निकला। रोशनी मुख्य हॉल से आ रही थी।
श्री खन्ना के नियम याद आए – मुख्य हॉल में न जाना। पर जिज्ञासा बलवती हो रही थी। वह दरवाजे के पीछे छिपकर हॉल में झाँकने लगा।
वह जो देखा, उससे उसका खून जम गया।
हॉल में पुराने जमाने के कपड़े पहने तीन नौकर काम कर रहे थे। एक बुजुर्ग मुखिया जो मेज पर चाँदी के बर्तन साफ कर रहा था। एक युवक जो फर्नीचर पर पॉलिश लगा रहा था। और एक बुजुर्ग महिला जो फूलदान में ताजे फूल लगा रही थी।
पर सबसे डरावनी बात यह थी कि वे आपस में बात नहीं कर रहे थे। कोई आवाज नहीं। सब कुछ खामोशी से हो रहा था, मानो एक साइलेंट फिल्म चल रही हो।
मेहक सिंह ने देखा कि वे पारदर्शी थे। उनके शरीर से होकर दीवारें दिखाई दे रही थीं। पर उनकी हरकतें इतनी प्राकृतिक थीं कि लग रहा था जैसे वे असल में जीवित हों।
तभी बुजुर्ग मुखिया ने सिर उठाया, और सीधे मेहक सिंह की तरफ देखा।
मेहक सिंह की साँसें रुक गईं। वह भागा। अपने कमरे में घुसा, दरवाजा बंद किया, और कुर्सी से लगा दिया। पूरी रात वह जागता रहा, अपनी धड़कनों के शोर के सिवा कुछ नहीं सुनाई दे रहा था।
सुबह होते ही वह हवेली छोड़कर भागना चाहता था। पर फिर अपने बच्चों की याद आई, घर का किराया, बीमार पत्नी का इलाज। उसने फैसला किया कि वह एक और रात रुकेगा।
दिन में हवेली सामान्य लग रही थी। धूल, सीलन, और खामोशी। उसने श्री खन्ना को फोन करने की कोशिश की, पर फोन जवाब नहीं दे रहा था।
दोपहर में वह शहर में उतरा, और एक चाय की दुकान पर बैठ गया।
चायवाले ने जब उसकी नौकरी के बारे में सुना, तो उसकी आँखें फैल गईं। “तुम ग्लेनव्यू हवेली में काम करते हो? भैया, वहाँ तो सालों से कोई नहीं रहता!”
“पर मैंने तो कल रात…” मेहक सिंह ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी।
चायवाला उसके पास बैठ गया। “सुनो यार, वह हवेली शापित है। 1920 के दशक में, वहाँ एक अंग्रेज अफसर रहता था – कर्नल एडवर्ड मैकफर्सन। उसके पास तीन नौकर थे – एक मुखिया राम सिंह, एक युवक गोपाल, और एक बुजुर्ग आया मीरा।”
“क्या हुआ उनके साथ?” मेहक सिंह ने पूछा।
“एक रात, चोर हवेली में घुस आए। उन्होंने कर्नल का सारा खजाना लूट लिया, और तीनों नौकरों को मार डाला क्योंकि उन्होंने चोरों का विरोध किया था। कर्नल उस रात शहर में था।”
“और फिर?”
“कहते हैं कि उन तीनों नौकरों की आत्माएँ हवेली से मुक्त नहीं हो पाईं क्योंकि उनकी मौत अधूरे काम के साथ हुई थी। राम सिंह चाँदी के बर्तन साफ नहीं कर पाया था। गोपाल फर्नीचर की पॉलिश पूरी नहीं कर पाया था। और मीरा फूलदान में फूल नहीं लगा पाई थी। इसलिए वे हर रात अपना काम पूरा करने आते हैं।”
मेहक सिंह सोच में पड़ गया। अब उसे डर के बजाय दया आ रही थी। वे नौकर अपनी मौत के बाद भी अपना कर्तव्य निभा रहे थे।
उस रात, उसने हिम्मत जुटाई। वह अपने कमरे से निकला, और सीधे हॉल में गया।
तीनों नौकर वहीं थे, वैसे ही काम में लगे हुए। इस बार मेहक सिंह डरा नहीं। वह आगे बढ़ा।
“राम सिंह जी,” उसने धीरे से कहा।
बुजुर्ग मुखिया ने सिर उठाया। उसकी आँखों में कोई भाव नहीं था, पर वह सुन रहा था।
“आपका काम पूरा हो गया है। आप आराम कर सकते हैं।”
राम सिंह ने चाँदी का एक कटोरा देखा जो वह साफ कर रहा था। उसने उसे ध्यान से रख दिया। फिर वह धीरे-धीरे फीका पड़ने लगा, और गायब हो गया।
मेहक सिंह गोपाल की तरफ मुड़ा। युवक फर्नीचर पर पॉलिश लगा रहा था, एक ही जगह बार-बार।
“गोपाल, तुम्हारा काम भी पूरा हो गया है। जाओ, आराम करो।”
गोपाल ने पॉलिश का कपड़ा रख दिया। उसने मेहक सिंह की तरफ देखा, मानो धन्यवाद दे रहा हो। फिर वह भी गायब हो गया।
अब सिर्फ मीरा बची थी। बुजुर्ग महिला फूलदान में फूल लगा रही थी, पर फूल गिरते जा रहे थे।
“मीरा देवी,” मेहक सिंह ने कहा। “आपने अपना कर्तव्य निभा दिया है। अब जाने का समय आ गया है।”
मीरा ने आखिरी फूल लगाया। उसने मुस्कुराने की कोशिश की, और फिर वह भी गायब हो गई।
पर कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जब तीनों आत्माएँ गायब हुईं, तो हॉल के बीच में फर्श पर एक चिन्ह दिखाई दिया। मेहक सिंह ने उस जगह को खोजा, और एक तहखाने का दरवाजा मिला।
अंदर एक छोटा सा कमरा था। उसमें एक पुराना संदूक रखा हुआ था। संदूक में कुछ पुराने सिक्के, गहने, और एक डायरी थी।
डायरी कर्नल मैकफर्सन की थी। उसमें लिखा था: “मैं जानता हूँ कि मेरे नौकर मारे गए हैं। पर मैं यह खजाना पुलिस को नहीं दूँगा। यह उन नौकरों के परिवारों के लिए है, जो मेरी सेवा करते रहे। अगर कभी कोई इस डायरी को पढ़े, तो कृपया यह खजाना उनके वंशजों को देना।”
मेहक सिंह ने श्री खन्ना को सब कुछ बताया। श्री खन्ना आश्चर्यचकित रह गए। “मेरे दादा ने ही यह हवेली खरीदी थी,” उन्होंने बताया। “पर उन्हें भी नहीं पता था कि तहखाने में क्या है।”
उन्होंने मिलकर तीनों नौकरों के वंशजों को ढूँढना शुरू किया। राम सिंह का परिवार शिमला के पास एक गाँव में मिला। गोपाल के वंशज कुल्लू में रहते थे। और मीरा की पोती अभी भी जीवित थी, वह शिमला में ही एक वृद्धाश्रम में रहती थी।
खजाने को बराबर तीन हिस्सों में बाँटा गया। जब मीरा की पोती को उसका हिस्सा मिला, तो वह रो पड़ी। “मेरी दादी हमेशा कहती थी कि उसका मालिक उसे कभी नहीं भूला। वह सच कहती थी।”
श्री खन्ना ने हवेली को दान करने का फैसला किया। उसे एक संग्रहालय में बदला गया, जहाँ कर्नल मैकफर्सन और उनके नौकरों की कहानी बताई जाती है।
मेहक सिंह उस संग्रहालय का केयरटेकर बन गया। उसकी नौकरी स्थायी हो गई, और उसका परिवार अब सुखी है।
एक बार फिर, ग्लेनव्यू हवेली में जीवन लौट आया। पर अब वहाँ डरावनी आत्माएँ नहीं, बल्कि आगंतुक आते हैं जो उस ऐतिहासिक कहानी को सुनते हैं।
कहानी के अंत में, एक दिलचस्प बात हुई। संग्रहालय खोलने के दिन, एक बुजुर्ग फोटोग्राफर ने हवेली की तस्वीरें खींचीं। जब तस्वीरें प्रिंट हुईं, तो एक तस्वीर में कुछ अजीब था।
मुख्य हॉल की खिड़की के पास, तीन धुंधली सी आकृतियाँ दिख रही थीं – एक बुजुर्ग आदमी, एक युवक, और एक बुजुर्ग महिला। वे मुस्कुरा रहे थे।
फोटोग्राफर ने सोचा कि यह कोई टेक्निकल गड़बड़ी है। पर मेहक सिंह जानता था कि यह क्या था।
राम सिंह, गोपाल और मीरा – एक आखिरी बार अपनी हवेली को देखने आए थे, और इस बार शांति से।
आज ग्लेनव्यू हवेली शिमला के प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है। लोग वहाँ नौकरों की वफादारी की कहानी सुनने आते हैं।
मेहक सिंह अक्सर आगंतुकों से कहता है: “यह कहानी डरावनी नहीं, बल्कि प्रेरणादायक है। यह हमें सिखाती है कि कर्तव्य, निष्ठा और वफादारी इतनी ताकतवर होती है कि मौत के बाद भी जीवित रहती है।”
और कभी-कभी, जब रात गहरी होती है और हवा में ठंडक बढ़ जाती है, तो लोग कहते हैं कि हवेली की खिड़कियों से एक हल्की सी मुस्कान झलकती है – तीन नौकरों की मुस्कान, जिन्होंने अंततः शांति पा ली।
~ कहानी समाप्त ~
Berlin, Germany – In a major coup for the Berlin International Film Festival, the world…
The Chief Minister of Goa, Pramod Sawant, has stated that the state government is considering…
TARRANT COUNTY, Texas — In a political race that has captivated local voters and drawn…
MADRID, SPAIN – In a capital derby that proved more challenging than many anticipated, league…
In an era where political spouses are expected to be both accessible and relatable, Melania…
In today’s fast-evolving tech landscape, AI agents are becoming essential tools for automating complex tasks,…
This website uses cookies.