प्रतीक ने बड़ी मुश्किल से उस पुराने बंगले का किराया तय किया था। शहर से दूर, जंगल के किनारे, तीन मंजिला यह इमारत सस्ती थी क्योंकि कोई इसे किराए पर लेना नहीं चाहता था।
मकान मालिक ने चाबी देते हुए कहा था, “रात को ऊपर की मंजिल पर मत जाना।”
“क्यों?” प्रतीक ने पूछा था।
“बस मत जाना,” मकान मालिक ने बिना कारण बताए कहा और चला गया।
पहली रात शांत बीती। दूसरी रात, आधी रात के करीब, प्रतीक को ऊपर से आवाज सुनाई दी। टप… टप… टप…
जैसे कोई सीढ़ियों से धीरे-धीरे उतर रहा हो।
तीसरी रात फिर वही आवाज। प्रतीक उठ बैठा। उसने टॉर्च उठाई और कमरे से बाहर निकला। बाहर का कोरिडोर सुनसान था, लेकिन सीढ़ियों वाले हिस्से से अभी भी वह आवाज आ रही थी।
वह सीढ़ियों के पास गया। टॉर्च की रोशनी में सीढ़ियाँ खाली दिख रही थीं, लेकिन आवाज बंद नहीं हुई। टप… टप… टप…
ऐसा लग रहा था जैसे कोई अदृश्य व्यक्ति धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर रहा हो।
प्रतीक वापस अपने कमरे में आ गया और दरवाजा बंद कर लिया। आवाजें फिर भी आती रहीं, करीब एक घंटे तक, फिर अचानक बंद हो गईं।
अगले दिन प्रतीक ने पास के गाँव में एक दुकानदार से पूछा, “उस बंगले के बारे में कुछ जानते हो?”
दुकानदार ने डरते हुए कहा, “वहाँ पचास साल पहले एक परिवार रहता था। एक रात, बूढ़े पिता सीढ़ियों से गिर गए और उनकी मौत हो गई। उस दिन के बाद से, हर रात सीढ़ियों पर कदमों की आवाज आती है।”
“क्या किसी ने कोशिश नहीं की?” प्रतीक ने पूछा।
“कई लोगों ने की, लेकिन आवाज कभी बंद नहीं हुई। कहते हैं बूढ़े आदमी की आत्मा अभी भी उन सीढ़ियों पर चल रही है, नीचे आने की कोशिश कर रही है।”
प्रतीक ने तय किया कि वह इस रहस्य का पता लगाएगा। उसने अपने कमरे में एक वॉयस रिकॉर्डर रखा और पूरी रात रिकॉर्डिंग की।
सुबह जब उसने रिकॉर्डिंग सुनी, तो उसके रोंगटे खड़े हो गए। साफ सुनाई दे रहा था – सीढ़ियों पर कदमों की आवाज, लेकिन उससे भी ज्यादा डरावनी एक दूसरी आवाज थी।
हर कदम के साथ एक हल्की सी सांस लेने की आवाज, और कभी-कभी एक बूढ़ी आवाज में फुसफुसाहट: “मदद… मुझे नीचे उतारो…”
प्रतीक ने मकान मालिक को फोन किया और उसे सब कुछ बताया।
मकान मालिक ने एक गहरी सांस लेकर कहा, “मैं तुम्हें सच बताता हूँ। वह बूढ़ा आदमी सीढ़ियों से नहीं गिरा था। उसके बेटे ने उसे ऊपर की मंजिल पर कैद कर रखा था। बूढ़ा हर रात सीढ़ियों से उतरने की कोशिश करता, लेकिन डर के मारे नहीं उतर पाता। एक रात कोशिश करते हुए उसकी मौत हो गई।”
प्रतीक ने एक बार फिर रात को आवाज सुनी। इस बार उसने देखा कि आवाज सिर्फ सीढ़ियों तक ही सीमित नहीं थी। धीरे-धीरे वह आवाज उसके कमरे के दरवाजे तक आने लगी।
टप… टप… टप…
दरवाजे के बाहर।
प्रतीक ने हिम्मत जुटाई और दरवाजा खोला।
बाहर कोई नहीं था। लेकिन सीढ़ियों पर कदमों की आवाज एक बार फिर शुरू हो गई। इस बार नीचे की ओर आती हुई।
प्रतीक ने अपना टॉर्च जलाया और सीढ़ियों की ओर देखा।
तभी उसे एक झलक दिखाई दी – एक बूढ़े आदमी की धुंधली सी छवि, हाथ में एक छड़ी थामे, धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर रहा था।
बूढ़े ने मुड़कर देखा। उसकी आँखों में डर था, दर्द था।
“मैं अब जा रहा हूँ,” बूढ़े ने फुसफुसाया।
और फिर वह गायब हो गया।
उस रात के बाद से सीढ़ियों की आवाज आनी बंद हो गई। प्रतीक ने महसूस किया कि बूढ़े की आत्मा को शायद अब वह डर नहीं रहा था जो उसे सीढ़ियों से उतरने से रोक रहा था।
लेकिन कभी-कभी, खासकर बरसात की रातों में, जब हवा चलती है और पेड़ों की टहनियाँ खिड़कियों से टकराती हैं, प्रतीक को लगता है जैसे उसे दूर से, बहुत दूर से, सीढ़ियों पर चलने की हल्की सी आवाज सुनाई देती है।
शायद कोई और है जो सीढ़ियों से उतरने की कोशिश कर रहा है। या शायद यह सिर्फ हवा का खेल है।
प्रतीक कभी पता नहीं कर पाया। लेकिन अब वह डरता नहीं है। वह जानता है कि कभी-कभी आवाजें सिर्फ आवाज नहीं होतीं, बल्कि वे कहानियाँ होती हैं जो कभी पूरी तरह खत्म नहीं होतीं।
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