वह सर्दी की रात थी। राजस्थान के थार रेगिस्तान में चाँदनी इतनी तेज थी कि रेत के टीलों पर छायाएँ साफ दिख रही थीं। स्थानीय गाइड मोहन सिंह अपने पर्यटक समूह को कह रहा था: “आधी रात के बाद कैंप से बाहर मत निकलना। यहाँ रेत में कुछ ऐसा है जो मनुष्य की समझ से परे है।”
युवा फोटोग्राफर आदित्य मुस्कुराया। “ये सब अंधविश्वास हैं। मैं तो चाँदनी रात की तस्वीरें लेने ही जा रहा हूँ।”
“नहीं जाना चाहिए, साहब,” मोहन ने आँखें फैलाकर कहा। “वो आती है… ऊँट पर सवार।”
आदित्य ने उसकी बात अनसुनी कर दी और अपना कैमरा लेकर निकल पड़ा।
आधे घंटे बाद, आदित्य एक बड़े रेत के टीले पर चढ़कर तारों की तस्वीरें ले रहा था। तभी उसे दूर से एक आवाज सुनाई दी – ठक-ठक-ठक।
शुरू में उसने सोचा कि शायद उसके दिल की धड़कन है, लेकिन आवाज नियमित और तेज होती गई। ऊँट के पैरों की आवाज थी। आदित्य ने देखने के लिए अपने कैमरे का जूम बढ़ाया।
दूर, चाँदनी में, एक ऊँट धीरे-धीरे चल रहा था। उस पर एक महिला सवार थी, जिसके लंबे काले बाल हवा में लहरा रहे थे। उसने एक पारंपरिक राजस्थानी घाघरा पहन रखा था, जो चाँदनी में सफेद दिख रहा था।
आदित्य ने कैमरा उठाया और शटर दबा दिया। फ़्लैश की रोशनी में, वह महिला एकदम से मुड़ी और सीधे उसकी ओर देखने लगी।
आदित्य की साँसें रुक गईं। उस महिला के चेहरे पर आँखें नहीं थीं – सिर्फ गहरे, खाली गड्ढे थे जिनमें से अंधेरा टपक रहा था। उसके होंठ काले और सूखे थे, और जब वह मुस्कुराई, तो उसके दांत लंबे और पीले दिखे।
ऊँट अचानक तेजी से दौड़ने लगा – सीधे आदित्य की ओर। रेत उड़ने लगी, हवा में एक अजीब सी सिसकारी जैसी आवाज भर गई।
आदित्य भागा। पीछे से ऊँट के पैरों की आवाज नज़दीक आती जा रही थी। वह चिल्लाया, लेकिन उसकी आवाज रेगिस्तान की हवा में खो गई।
“तुमने मुझे बुलाया… तुमने मेरी तस्वीर ली…” एक कर्कश, टूटी आवाज उसके कानों में गूंजी।
कैंप के पास पहुँचकर आदित्य ने पीछे मुड़कर देखा। वह महिला और ऊँट रुक गए थे। उसने अपनी बाँह उठाई और एक काले रंग का कपड़ा गिरा दिया जो हवा में उड़ता हुआ आदित्य के पैरों के पास आ गिरा।
उस पर पुरानी हिंदी में लिखा था: “मैं भटकती रहूँगी जब तक मेरा प्रेमी मुझे नहीं ढूंढ लेता। १८७९।”
अगली सुबह, कांपता हुआ आदित्य मोहन सिंह को सब कुछ बताने लगा। मोहन ने गंभीर होकर कहा: “वो रूपकंवर है। एक ऐसी युवती जिसका प्रेमी व्यापार के लिए सीमा पार गया और कभी वापस नहीं आया। वह हर रात उसकी प्रतीक्षा में ऊँट पर सवार होकर भटकती है। जो कोई उसे देख लेता है, वो उसे अपने साथ ले जाने की कोशिश करती है।”
“लेकिन यह कपड़ा?” आदित्य ने पूछा।
“यह उसकी चुनरी का टुकड़ा है। अब तुम उसके श्राप में फंस गए हो। अगले पूर्णिमा की रात, वो फिर आएगी… और इस बार तुम्हें छोड़ेगी नहीं।”
अगले पंद्रह दिन आदित्य के लिए नरक बन गए। हर रात उसे ऊँट के पैरों की आवाज सुनाई देती। कभी-कभी खिड़की से वह उसे दूर खड़ी देखता – उन खाली आँखों से उसकी ओर देखती।
आखिरकार पूर्णिमा की रात आ गई। मोहन सिंह ने एक बुजुर्ग साधु को बुलाया। उन्होंने कहा: “रूपकंवर को मुक्ति तभी मिलेगी जब कोई उसके प्रेमी का अंतिम पत्र उसे सौंपे। वह पत्र एक पुराने कुएं में है जो अब रेत में दब गया है।”
आधी रात को, जब चुड़ैल फिर प्रकट हुई, आदित्य और मोहन उस कुएं की खोज में निकले। रेत खोदते-खोदते उन्हें एक पीतल की पेटी मिली। उसमें एक पुराना, पीला पत्र था।
जैसे ही आदित्य ने पत्र निकाला, रूपकंवर का ऊँट उनके पास आकर रुक गया। उसकी खाली आँखों से अब आँसू बह रहे थे।
आदित्य ने कांपते हाथों से पत्र उसकी ओर बढ़ाया। “यह तुम्हारे प्रेमी का अंतिम संदेश है। वह तुमसे मिलने नहीं आ सका क्योंकि सीमा पर युद्ध में उसकी मृत्यु हो गई।”
चुड़ैल ने पत्र लिया। उसके हाथों के स्पर्श से ही पत्र रेत में बदल गया। तभी एक अजीब घटना हुई – रूपकंवर का चेहरा धीरे-धीरे सामान्य होने लगा। उसकी आँखें वापस आ गईं, होंठों पर मुस्कान खिल उठी।
“धन्यवाद,” उसकी मधुर आवाज हवा में गूंजी। “अब मैं आराम कर सकती हूँ।”
वह और उसका ऊँट धीरे-धीरे पारदर्शी होते गए और अंततः गायब हो गए।
मोहन सिंह ने आदित्य की ओर देखा: “अब तुम सुरक्षित हो। लेकिन याद रखना, राजस्थान का रेगिस्तान अपने सीने में ऐसे कई राज दबाए है। कभी किसी अकेली औरत को ऊँट पर सवार देखो, तो उसकी तस्वीर मत खींचना। कौन जाने, वह किस अधूरे इंतज़ार में भटक रही हो।”
और आज भी, पूर्णिमा की रातों में, कभी-कभी रेत के टीलों पर ऊँट के पैरों की आवाज सुनाई देती है… शायद कोई और खोया हुआ प्रेमी, अपने इंतज़ार को अमर बनाए हुए।
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