अरुण बीस साल बाद अपने पैतृक गाँव लौटा था। उस पुराने हवेली के सामने खड़े होकर उसे अपना बचपन याद आ रहा था। लेकिन यह यादें मीठी नहीं थीं।
हवेली का मुख्य दरवाज़ा जर्जर हो चुका था। अरुण ने चाबी घुमाई – वही पुरानी चाबी जो उसके पिता ने मरने से पहले दी थी। दरवाज़ा चरचराता हुआ खुला।
अंदर की हवा भारी और स्थिर थी, जैसे समय यहीं रुक गया हो। धूल के मोटे परतों के नीचे पुराने फर्नीचर दिख रहे थे। अरुण ने अपना सूटकेस नीचे रखा और लिविंग रूम की ओर बढ़ा।
तभी उसे एक आवाज़ सुनाई दी।
“अरुण… वापस आ गया?”
आवाज़ परिचित थी। बिल्कुल उसकी माँ की आवाज़ जैसी।
अरुण पीछे मुड़ा। कोरिडोर खाली था। “शायद मेरा दिमाग खेल रहा है,” उसने खुद से कहा।
वह रसोई में गया। यहाँ सब कुछ वैसा ही था जैसा बीस साल पहले छोड़ा था। बस एक अंतर था – रसोई की मेज़ पर दो कप चाय से उठती हुई भाप।
अरुण ने कप को छुआ। गर्म था।
तभी पीछे से फिर वही आवाज़, “तुम्हारी चाय ठंडी हो जाएगी।”
अरुण तेज़ी से मुड़ा। दरवाज़े पर एक धुंधली सी आकृति खड़ी थी। रूप स्पष्ट नहीं था, लेकिन अरुण पहचान गया – उसकी माँ।
“माँ?” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“आ जाओ बेटा, बैठो,” आवाज़ ने कहा, और आकृति गायब हो गई।
अरुण काँपते हाथों से कप उठाने लगा, तभी उसे एक और आवाज़ सुनाई दी – पुरुष की आवाज़।
“यहाँ क्या कर रहे हो?”
यह आवाज़ भी परिचित थी। उसके पिता की।
रात होते-होते अरुण को एहसास हो गया कि वह अकेला नहीं था। हवेली में उसके माता-पिता की आत्माएँ रहती थीं। लेकिन वे सामान्य भूत नहीं थे।
वे रोज़मर्रा के काम करते थे। सुबह माँ की आवाज़ रसोई से आती, “नाश्ता तैयार है।” दोपहर को पिता की आवाज़ स्टडी रूम से, “अखबार कहाँ है?”
लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि वे अरुण से बात करते थे। असली बातचीत। पूछते थे कि उसकी नौकरी कैसी चल रही है, शहर का जीवन कैसा है।
तीसरी रात, अरुण ने उनसे पूछ ही लिया, “आप लोग… आप लोग यहाँ क्यों हैं?”
माँ की आवाज़ आई, “हम तो हमेशा यहाँ रहे हैं बेटा। तुम्हारे जाने के बाद भी।”
“लेकिन आपकी मृत्यु तो हो गई थी,” अरुण ने कहा।
पिता की आवाज़ गूंजी, “मृत्यु रिश्तों को खत्म नहीं करती अरुण। सिर्फ उन्हें… बदल देती है।”
अरुण अपने पुराने कमरे में गया। यहाँ सब कुछ वैसा ही था जैसा उसने छोड़ा था। उसकी किताबें, खिलौने, स्कूल की यूनिफॉर्म।
रात को वह इसी कमरे में सोया। आधी रात को उसे झूले की आवाज़ सुनाई दी। वह उठ बैठा। कमरे के कोने में, उसका पुराना झूला हिल रहा था, जैसे कोई बैठा हो।
“कौन है?” अरुण ने पूछा।
एक बच्चे की हँसी सुनाई दी। फिर एक आवाज़ – अपनी ही आवाज़, लेकिन छोटे बच्चे की।
“मैं हूँ… तुम ही हो।”
अरुण ने देखा – झूले पर एक धुंधली सी आकृति बैठी थी। दस साल का अरुण।
“तुम… तुम कैसे?” अरुण हकलाया।
बच्चे की आवाज़ में जवाब आया, “हर व्यक्ति के अंदर कई लोग रहते हैं। बचपन का व्यक्ति, जवानी का व्यक्ति… मौत के बाद, वे सब अलग हो जाते हैं।”
पाँचवें दिन, अरुण ने डाइनिंग टेबल पर तीन प्लेटें लगाई देखीं। उसकी माँ की आवाज़ आई, “आज रात हम साथ खाना खाएँगे।”
अरुण टेबल पर बैठ गया। वह देख सकता था कि कुर्सियाँ हिल रही थीं, जैसे कोई उन पर बैठ रहा हो। लेकिन कोई दिख नहीं रहा था।
“तुमने कभी शादी क्यों नहीं की?” पिता की आवाज़ ने पूछा।
“मैं… मैं तैयार नहीं था,” अरुण ने जवाब दिया।
“तुम डरते थे,” बच्चे अरुण की आवाज़ आई, जो अब भी झूले पर बैठा था, “डरते थे कि तुम्हारा परिवार भी हम जैसा हो जाएगा।”
अरुण चुप रहा। यह सच था। अपने माता-पिता के टूटे रिश्ते को देखकर, उसने कभी शादी नहीं करने का फैसला किया था।
“हम तुम्हें डराते हैं?” माँ की आवाज़ में दुख था।
“नहीं… हाँ… मुझे नहीं पता,” अरुण ने कहा।
सातवीं रात, अरुण ने अपने पिता के पुराने स्टडी रूम में एक डायरी ढूँढ़ी। इसे पढ़ते हुए उसे सच्चाई पता चली।
उसके माता-पिता की मृत्यु दुर्घटना से नहीं हुई थी। उन्होंने आपसी समझौते से आत्महत्या की थी। क्योंकि वे जीवित रहते हुए एक-दूसरे को छोड़ नहीं सकते थे, लेकिन साथ रहते हुए दुखी थे।
डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था: “कभी-कभी रिश्ते इतने मजबूत होते हैं कि मौत भी उन्हें तोड़ नहीं पाती। शायद मरने के बाद हम सीख लें कि साथ कैसे रहना है।”
तभी दोनों की आवाज़ें एक साथ गूंजीं।
“हमें माफ कर दो बेटा,” माँ की आवाज़ रोती हुई सी लगी।
“हमने तुम्हारा बचपन छीन लिया,” पिता ने कहा।
अरुण ने फैसला किया कि वह हवेली में ही रहेगा। लेकिन एक शर्त पर।
“मैं यहाँ रहूँगा,” उसने कहा, “लेकिन आप लोगों को जाना होगा।”
“हम जा नहीं सकते,” माँ की आवाज़ आई, “हम इस घर से बंधे हैं।”
“नहीं, आप इस घर से नहीं, एक-दूसरे से बंधे हैं,” अरुण ने कहा, “और मैं… मैं अपने बचपन से बंधा हूँ।”
उसने एक रात्रिभोज का आयोजन किया। आखिरी रात्रिभोज। टेबल पर चार कुर्सियाँ थीं – माँ, पिता, बचपन का अरुण और वर्तमान का अरुण।
खाना खाते-खाते अरुण ने कहा, “मैं आप लोगों को माफ करता हूँ। और मैं खुद को भी माफ करता हूँ।”
उस क्षण, कमरे की हवा हल्की हो गई। आवाज़ें धीमी पड़ने लगीं।
“शुक्रिया बेटा,” माँ की आवाज़ आखिरी बार गूंजी।
“हमें आज़ाद कर दिया,” पिता बोले।
बचपन के अरुण ने कहा, “अब मैं भी जा सकता हूँ।”
अगली सुबह, हवेली में एक अजीब सी शांति थी। आवाज़ें गायब थीं। लेकिन अरुण को अकेलापन महसूस नहीं हुआ।
उसने हवेली की सफाई शुरू की। हर कमरे से पुराने रिश्तों के भूतों को साफ किया। नहीं, वे भूत अभी भी थे, लेकिन अब वे डरावने नहीं थे। वे सिर्फ यादें थीं।
एक महीने बाद, अरुण ने गाँव की एक लड़की से मुलाकात की। पहली मुलाकात में ही उसने उसे अपनी कहानी सुनाई – हवेली की, अपने माता-पिता की, अपने बचपन की।
लड़की ने पूछा, “तुम्हें नहीं लगता कि यह सब बताना जल्दबाज़ी थी?”
अरुण मुस्कुराया, “नहीं। मैंने सीख लिया है कि रिश्तों के भूत तभी डरावने होते हैं जब तुम उन्हें छुपाते हो।”
एक साल बाद, अरुण उसी हवेली में अपनी नवविवाहित पत्नी के साथ रह रहा था। कभी-कभी रात को उसे लगता कि उसे हल्की सी आवाज़ें सुनाई दे रही हैं। लेकिन अब वह डरता नहीं था।
एक रात, उसकी पत्नी ने पूछा, “क्या तुम्हें लगता है कि वे अभी भी यहाँ हैं?”
अरुण ने खिड़की से बाहर तारों की ओर देखते हुए कहा, “हाँ, लेकिन अब वे भूत नहीं हैं। वे सिर्फ… परिवार हैं।”
तभी उन्हें रसोई से चाय के कप रखने की हल्की सी आवाज़ सुनाई दी। फिर एक मधुर सी हँसी।
अरुण की पत्नी ने डरते हुए पूछा, “क्या वह…?”
“हाँ,” अरुण ने मुस्कुराते हुए कहा, “मेरी माँ हमारे लिए चाय बना रही हैं। चलो, चाय ठंडी हो जाएगी।”
वे दोनों रसोई की ओर चल दिए। टेबल पर दो कप गर्म चाय रखी थी, और तीसरा कप अधूरा, जैसे कोई अभी-अभी यहाँ बैठकर चाय पी रहा हो।
अरुण ने तीसरे कप को उठाया, आसमान की ओर करके कहा, “शुक्रिया माँ।”
और उसे लगा जैसे हवा में एक गर्मजोशी भरी मुस्कान तैर गई।
~ समाप्त ~
क्योंकि कुछ रिश्ते मौत से भी मजबूत होते हैं, और कुछ भूत डराने के लिए नहीं, बल्कि प्यार देने के लिए होते हैं।
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