धौलाधार की पहाड़ियों के पास एक छोटे से गाँव में रहने वाला वीरू दस साल का जिज्ञासी लड़का था। उसके गाँव के लोग एक अजीब पर्वत के बारे में कहानियाँ सुनाते थे जिसे वे “गरम पहाड़” कहते थे।
“उस पहाड़ के अंदर देवताओं की अग्नि रहती है,” दादी कहतीं। “वह कभी-कभी गुस्से में आ जाती है और धुआँ उगलने लगती है।”
वीरू के पिता, जो गाँव के शिक्षक थे, ने समझाया, “बेटा, यह एक सुप्त ज्वालामुखी है। इसमें अंदर से पिघली चट्टानें हैं जो कभी-कभी बाहर निकल आती हैं।”
एक दिन, जब वीरू जंगल में लकड़ी इकट्ठा कर रहा था, उसने देखा कि गरम पहाड़ से हल्का धुआँ उठ रहा है। उसकी जिज्ञासा और बढ़ गई। वह जानना चाहता था कि आखिर इस पहाड़ के अंदर क्या है।
अगले दिन, वीरू गाँव के पुस्तकालय गया जो एक छोटी सी कोठरी में था। वहाँ उसे एक धूल भरी पुस्तक मिली – “हमारे पहाड़ों के रहस्य”। पुस्तक के अंत में एक हस्तनिर्मित नक्शा था जो गरम पहाड़ के आंतरिक मार्ग दिखा रहा था।
पुस्तकालय की रखवाली करने वाले बूढ़े शेखर चाचा ने कहा, “यह नक्शा मेरे दादाजी ने बनाया था। वे एक साहसी खोजकर्ता थे। उन्होंने इस ज्वालामुखी के अंदर जाने की कोशिश की थी।”
“क्या वे अंदर गए थे?” वीरू ने उत्सुकता से पूछा।
शेखर चाचा ने सिर हिलाया। “हाँ, पर वे कुछ रहस्यमय बातें कहते थे जिन पर लोग विश्वास नहीं करते थे। उनका कहना था कि ज्वालामुखी के अंदर केवल विनाश नहीं, बल्कि सृजन का रहस्य भी है।”
वीरू ने अपने सबसे अच्छे दोस्त रोहित और मीरा को नक्शा दिखाया। तीनों ने मिलकर गरम पहाड़ के रहस्य को जानने का निश्चय किया।
“पर हमें सावधान रहना होगा,” मीरा ने कहा जो तीनों में सबसे समझदार थी। “मेरे पिताजी कहते हैं कि ज्वालामुखी खतरनाक हो सकते हैं।”
उन्होंने अपनी तैयारी शुरू की:
वीरू के पिता ने उन्हें ज्वालामुखी के बारे में कुछ बुनियादी बातें सिखाईं: “याद रखो, ज्वालामुखी केवल विनाश नहीं लाते। उनकी राख जमीन को उपजाऊ बनाती है और नई जमीन बनाती है।”
एक सुबह सूर्योदय से पहले, तीनों दोस्त गरम पहाड़ की ओर निकल पड़े। नक्शे के अनुसार, प्रवेश द्वार पहाड़ की उत्तरी ओर एक संकरे रास्ते से था।
रास्ता कठिन था। पत्थर फिसलन भरे थे और कहीं-कहीं गर्म भाप निकल रही थी। वीरू ने ध्यान दिया कि पहाड़ के इस हिस्से में पेड़-पौधे अलग थे – हरे और फलने-फूलने वाले।
“अजीब है,” मीरा ने कहा। “यहाँ की मिट्टी इतनी उपजाऊ लग रही है।”
रोहित ने एक पत्थर उठाया। “देखो, यह पत्थर गर्म है! जैसे अभी तवे से उतरा हो।”
तीन घंटे की चढ़ाई के बाद, उन्हें प्रवेश द्वार मिला – एक संकरी दरार जो एक बड़ी गुफा में खुलती थी।
गुफा के अंदर का नज़ारा अद्भुत था। दीवारें विभिन्न रंगों की चमकदार चट्टानों से बनी थीं – लाल, पीली, नारंगी। ऊपर से लटके पत्थर नीचे से उगे पत्थरों से मिलते प्रतीत होते थे।
“ये स्टैलेक्टाइट और स्टैलेग्माइट हैं,” वीरू ने कहा। “पिताजी ने बताया था। ये पानी में घुले खनिजों से हज़ारों साल में बनते हैं।”
गुफा के अंदर हल्की गर्मी थी और हवा में गंधक जैसी गंध थी। तभी उन्होंने एक अजीब आवाज़ सुनी – जैसे कोई गुनगुना रहा हो।
आवाज़ का पीछा करते हुए वे गुफा के एक बड़े हॉल में पहुँचे जहाँ एक वृद्ध व्यक्ति आग के सामने बैठा था। आश्चर्य की बात यह थी कि आग जमीन से निकल रही थी!
“मैं जानता था कि तुम आओगे,” वृद्ध ने कहा बिना मुड़े। “मैं अग्निपुत्र हूँ, इस ज्वालामुखी का रक्षक।”
तीनों दोस्त हैरान रह गए। अग्निपुत्र के चेहरे पर झुर्रियाँ थीं पर आँखें चमकदार थीं। उनके हाथ में एक अजीब सा पत्थर था जो अपने आप चमक रहा था।
“क्या आप वास्तव में इस ज्वालामुखी के अंदर रहते हैं?” रोहित ने पूछा।
अग्निपुत्र मुस्कुराए। “मैं तो बस इसकी देखभाल करता हूँ। यह ज्वालामुखी तुम्हारी तरह जीवित है। इसका अपना दिल धड़कता है, अपनी साँस चलती है।”
अग्निपुत्र ने उन्हें गुफा के और अंदर ले जाने का प्रस्ताव दिया। “मैं तुम्हें अग्नि का असली जादू दिखाऊँगा।”
वे एक ऐसी जगह पहुँचे जहाँ जमीन से गर्म पानी के झरने निकल रहे थे। पानी इतना गर्म था कि उससे भाप उठ रही थी।
“ये गर्म झरने हैं,” अग्निपुत्र ने बताया। “इनमें ऐसे खनिज हैं जो त्वचा के लिए अच्छे होते हैं। हमारे पूर्वज इन्हें औषधि मानते थे।”
फिर उन्होंने एक और कक्ष देखा जहाँ विभिन्न रंगों की चमकदार चट्टानें थीं। “ये हैं ज्वालामुखीय क्रिस्टल। ये हज़ारों साल में बनते हैं। हर क्रिस्टल में पृथ्वी की एक कहानी छिपी है।”
अग्निपुत्र ने उन्हें ज्वालामुखी की “भाषा” सिखाना शुरू किया।
“ज्वालामुखी बोलता नहीं, पर संकेत देता है,” उन्होंने समझाया। “जब यह हल्का धुआँ छोड़ता है, तो कहता है ‘मैं जाग रहा हूँ’। जब हल्का कंपन होता है, तो कहता है ‘मैं साँस ले रहा हूँ’।”
मीरा ने पूछा, “पर जब यह फटता है, तो क्या कहता है?”
“तब यह कहता है ‘मैं बदल रहा हूँ’,” अग्निपुत्र ने जवाब दिया। “हर विस्फोट विनाश नहीं, बल्कि परिवर्तन लाता है। नई जमीन बनती है, नई मिट्टी बनती है, नया जीवन शुरू होता है।”
वीरू ने महसूस किया कि ज्वालामुखी उसकी कल्पना से कहीं अधिक जटिल और आश्चर्यजनक था।
अग्निपुत्र ने उन्हें एक विशेष कक्ष में ले जाया जहाँ दीवार पर प्राचीन चित्रकारी थी।
“ये चित्र हमारे पूर्वजों ने बनाए थे,” उन्होंने बताया। “ये दिखाते हैं कि कैसे ज्वालामुखी ने हमारे गाँव की मदद की।”
एक चित्र में लोग ज्वालामुखी से निकले पत्थरों से औजार बना रहे थे। दूसरे में वे गर्म झरनों का इलाज के लिए उपयोग कर रहे थे। तीसरे में वे ज्वालामुखी की राख से खेत उपजाऊ बना रहे थे।
“तुम देखो,” अग्निपुत्र ने कहा। “अग्नि केवल जलाती नहीं, बनाती भी है। यह नष्ट करती है तो सृजन भी करती है।”
अचानक, गुफा में हल्का कंपन शुरू हुआ। दीवारों से छोटे-छोटे पत्थर गिरने लगे।
अग्निपुत्र का चेहरा गंभीर हो गया। “ज्वालामुखी परेशान है। कुछ गलत हो रहा है।”
वीरू ने पूछा, “क्या यह फटने वाला है?”
“नहीं, ऐसा नहीं लगता,” अग्निपुत्र ने कहा। “पर यह संकेत दे रहा है कि कोई इसके संतुलन को बिगाड़ रहा है।”
वे तुरंत बाहर की ओर चल पड़े। बाहर आकर उन्होंने देखा कि गाँव के कुछ लोग पहाड़ की तलहटी में बड़े-बड़े उपकरण लगा रहे थे।
वीरू ने पहचाना कि वे गाँव के ही लोग थे। उनके नेता थे कैलाश चाचा जो हमेशा तेजी से विकास की बात करते थे।
“कैलाश चाचा, आप यहाँ क्या कर रहे हैं?” वीरू ने पूछा।
कैलाश चाचा ने उत्साह से कहा, “हमें यहाँ कीमती खनिज मिले हैं! हम यहाँ खनन शुरू कर रहे हैं। इससे गाँव की किस्मत बदल जाएगी।”
अग्निपुत्र आगे बढ़े। “तुम इस पहाड़ का संतुलन बिगाड़ रहे हो। यह केवल पत्थरों का ढेर नहीं है। यह एक जीवित प्रणाली है।”
“बकवास!” कैलाश चाचा ने कहा। “यह तो बस एक पहाड़ है। हमें यहाँ से पैसा कमाने का अधिकार है।”
अग्निपुत्र ने शांति से कहा, “मुझे तुम्हें एक प्रयोग दिखाने दो।”
उन्होंने जमीन से तीन पत्थर उठाए। एक साधारण पत्थर, एक ज्वालामुखीय पत्थर, और एक चमकदार क्रिस्टल।
“इन तीनों को देखो,” उन्होंने कहा। “पहला पत्थर – मरा हुआ। दूसरा – जीवंत, क्योंकि इसमें अग्नि का स्पर्श है। तीसरा – जीवंत और ज्ञान से भरा, क्योंकि इसमें समय और अग्नि दोनों का स्पर्श है।”
फिर उन्होंने तीन बीज लिए और तीन अलग-अलग मिट्टी में बोए – साधारण मिट्टी, ज्वालामुखीय राख वाली मिट्टी, और ज्वालामुखीय मिट्टी में मिली राख।
“एक सप्ताह बाद देखना,” अग्निपुत्र ने कहा।
एक सप्ताह बाद, सभी गाँव वाले इकट्ठे हुए। तीनों गमलों में अंतर स्पष्ट था:
अग्निपुत्र ने समझाया, “ज्वालामुखी की राख में ऐसे खनिज होते हैं जो पौधों के लिए अमृत हैं। यही कारण है कि हमारे गाँव के खेत इतने उपजाऊ हैं।”
कैलाश चाचा अभी भी संशय में थे। “पर खनिजों से हमें तुरंत पैसा मिलेगा।”
तभी वीरू के पिता बोले, “कैलाश भाई, अगर हम पहाड़ को नुकसान पहुँचाएँगे, तो यह फट सकता है। फिर न तो खेत रहेंगे, न घर, न पैसा।”
गाँव की पंचायत बुलाई गई। अग्निपुत्र ने एक नई योजना प्रस्तावित की।
“हम ज्वालामुखी का उपयोग कर सकते हैं बिना नुकसान पहुँचाए,” उन्होंने कहा।
उनकी योजना में था:
कैलाश चाचा ने पूछा, “पर इससे क्या फायदा होगा?”
“लंबे समय का फायदा,” अग्निपुत्र ने जवाब दिया। “टिकाऊ विकास। गाँव का सम्मान। प्रकृति का संरक्षण।”
गाँव वालों ने अग्निपुत्र की योजना स्वीकार की। कैलाश चाचा भी मान गए जब उन्हें एहसास हुआ कि पर्यटन से भी अच्छा पैसा कमाया जा सकता है।
पहला कदम था ज्वालामुखी के आसपास एक सुरक्षित पर्यटन मार्ग बनाना। बच्चों ने मिलकर साफ-सफाई की। बड़ों ने मार्ग में सुरक्षा के उपाय किए।
अग्निपुत्र गाइड बने। वे पर्यटकों को ज्वालामुखी के रहस्य समझाते, उन्हें गर्म झरने दिखाते, और ज्वालामुखीय पत्थरों के बारे में बताते।
वीरू, रोहित और मीरा ने एक “युवा विज्ञानी दल” बनाया जो पर्यटकों के बच्चों को ज्वालामुखी के बारे में सिखाता।
एक साल बाद, गाँव में पहला “अग्नि उत्सव” मनाया गया। इस उत्सव में ज्वालामुखी के प्रति आभार प्रकट किया गया।
उत्सव के दिन, गाँव वालों ने:
अग्निपुत्र ने सभी को आशीर्वाद दिया। “आज तुमने सीख लिया है कि अग्नि केवल जलाती नहीं, गर्माहट भी देती है। विनाश नहीं, सृजन भी करती है।”
कई साल बीत गए। वीरू अब एक भूविज्ञानी बन चुका था। वह देश के विभिन्न ज्वालामुखियों का अध्ययन करता था।
रोहित एक पर्यावरण इंजीनियर बना और मीरा एक विज्ञान शिक्षिका।
तीनों ने मिलकर अपने गाँव में एक “ज्वालामुखी शिक्षा केंद्र” स्थापित किया जहाँ बच्चे भूविज्ञान सीखते थे।
अग्निपुत्र अब नहीं थे, पर उनकी शिक्षाएँ जीवित थीं। गाँव के लोग अब ज्वालामुखी को “अग्नि देवता” नहीं, बल्कि “अग्नि शिक्षक” कहते थे।
वीरू अपने बेटे को गरम पहाड़ दिखाने ले गया। “यह केवल एक पहाड़ नहीं है,” उसने कहा। “यह एक जीवन पाठशाला है।”
“पापा, क्या अग्नि सचमुच जादुई है?” बेटे ने पूछा।
वीरू मुस्कुराया। “हाँ, पर उसका जादू हमारी समझ में है। जब हम समझते हैं, तो डर खत्म हो जाता है। और जब डर खत्म होता है, तो सम्मान जन्म लेता है।”
कहानी का सार: यह कहानी हमें सिखाती है कि प्रकृति की शक्तियाँ न तो अच्छी हैं न बुरी। वे सिर्फ हैं। ज्वालामुखी विनाश ला सकता है, पर नई जमीन और नया जीवन भी दे सकता है। सच्चा जादू भय में नहीं, बल्कि समझ में है। जब हम प्रकृति को समझते हैं, तो हम उसके साथ सामंजस्य से रहना सीखते हैं। अग्नि केवल जलाती नहीं, रोशनी भी देती है – रोशनी ज्ञान की, समझ की, और नए सृजन की।
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