बिहार के एक दूरस्थ गाँव, जहाँ बिजली एक विलासिता थी और पक्की सड़क एक सपना, वहाँ एक छोटा सा कच्चा मकान था। इस मकान में अनिल अपने माता-पिता और तीन भाई-बहनों के साथ रहता था। उसके पिता, रामकुमार, एक छोटे से खेत में मजदूरी करते थे, जिसकी आय से परिवार का गुज़ारा मुश्किल से हो पाता था।
अनिल की दिनचर्या सुबह चार बजे शुरू होती थी। वह गाय के गोबर से लीपे हुए आँगन में केरोसिन लैंप की रोशनी में पढ़ता। उसके पास किताबें नहीं थीं – वह अपने बड़े भाई की पुरानी किताबों से पढ़ता, या फिर स्कूल के पुस्तकालय से किताबें उधार लेता।
एक दिन, जब अनिल आठवीं कक्षा में था, गाँव में एक नए सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट का आगमन हुआ। उनकी गाड़ी देखकर गाँव के सभी बच्चे हैरान थे। अनिल ने जब उन्हें देखा, तो उसकी माँ से पूछा, “माँ, यह साहब कौन हैं?”
“बेटा, यह IAS अफसर हैं। यह पूरे जिले का प्रबंधन करते हैं,” माँ ने जवाब दिया।
उस दिन अनिल ने ठान लिया – वह भी IAS अधिकारी बनेगा।
अनिल के गाँव में केवल प्राथमिक विद्यालय था। आगे की पढ़ाई के लिए उसे पास के कस्बे में जाना पड़ता था, जो पैदल आठ किलोमीटर दूर था। हर दिन सोलह किलोमीटर पैदल चलना – यह अनिल की दिनचर्या का हिस्सा बन गया।
मानसून के दिनों में जब सड़कें कीचड़ से भर जातीं, अनिल अपनी किताबों को प्लास्टिक में लपेटकर सिर पर रख लेता और चल पड़ता। कई बार उसके जूते फट जाते, तो वह नंगे पैर ही चलता।
एक बार की बात है, अनिल को तेज़ बुखार था, पर उस दिन स्कूल में एक महत्वपूर्ण टेस्ट था। उसकी माँ ने उसे न जाने के लिए कहा, पर अनिल ने कहा, “माँ, अगर आज मैं नहीं गया, तो एक दिन पीछे रह जाऊँगा।”
वह बुखार से तपते हुए भी स्कूल गया और टेस्ट दिया। शाम को जब वह लौटा, तो बेहोश हो गया। डॉक्टर ने कहा कि उसे कम से कम एक हफ्ते आराम की जरूरत है। पर तीसरे दिन ही अनिल फिर से पढ़ने बैठ गया।
दसवीं की परीक्षा में अनिल ने गाँव के स्कूल में प्रथम स्थान प्राप्त किया। उसकी सफलता पर गाँव के सरपंच ने उसे 500 रुपये का इनाम दिया। अनिल ने यह पैसे अपने पिता को दे दिए।
“पिताजी, इन पैसों से आप कुछ जरूरत का सामान खरीद लो,” अनिल ने कहा।
पिता की आँखों में आँसू आ गए, “नहीं बेटा, यह पैसे तुम्हारी आगे की पढ़ाई के काम आएँगे।”
ग्यारहवीं कक्षा में अनिल को आर्ट्स विषय लेना पड़ा, क्योंकि गाँव के स्कूल में साइंस की सुविधा नहीं थी। पर अनिल का सपना IAS बनने का था, और उसने ठान लिया कि वह आर्ट्स से ही IAS की तैयारी करेगा।
उसने दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से ग्रेजुएशन शुरू की और साथ ही एक ट्यूशन सेंटर में पढ़ाना शुरू किया ताकि घर की आर्थिक मदद कर सके। सुबह चार बजे से रात ग्यारह बजे तक – यह अनिल का दिनचर्या बन गया।
ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद, अनिल ने IAS की तैयारी के लिए दिल्ली जाने का फैसला किया। परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे उसे दिल्ली भेज सकें। गाँव के लोगों ने चंदा इकट्ठा किया और अनिल को दिल्ली भेजा।
दिल्ली आकर अनिल के सामने नई चुनौतियाँ थीं। उसे एक छोटे से कमरे में रहना पड़ा जहाँ बारह लोग रहते थे। उसने एक दुकान पर काम करना शुरू किया ताकि अपना खर्च चला सके।
कोचिंग की फीस भरना असंभव था, इसलिए अनिल ने खुद से पढ़ने का फैसला किया। वह दिल्ली विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में जाता और वहाँ पूरा दिन पढ़ता। शाम को दुकान पर काम करता और रात को फिर पढ़ता।
एक बार की बात है, अनिल को तीन दिन तक भूखा रहना पड़ा क्योंकि उसके पास पैसे नहीं थे और दुकान के मालिक ने उसकी तनख्वाह देर से दी। पर उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने पुस्तकालय के पानी से अपना पेट भरा और पढ़ाई जारी रखी।
पहले प्रयास में अनिल प्रीलिम्स भी पास नहीं कर सका। यह उसके लिए एक बड़ा झटका था। उसे लगा कि वह अपने परिवार और गाँव वालों को निराश कर दिया है।
उस रात अनिल ने अपने पिता को फोन किया और रोते हुए कहा, “पिताजी, मैं फेल हो गया। मैं आपका सपना पूरा नहीं कर पाया।”
पिता ने जवाब दिया, “बेटा, सफलता और विफलता जीवन के दो पहलू हैं। तुमने पहली बार में हार मान ली तो कभी सफल नहीं हो पाओगे। उठो और फिर कोशिश करो।”
इस बात ने अनिल में नई ऊर्जा भर दी। उसने अपनी गलतियों का विश्लेषण किया और नई रणनीति बनाई। उसने देखा कि उसकी अंग्रेजी कमजोर है और करंट अफेयर्स पर उसकी पकड़ नहीं है।
अनिल ने अगले छह महीने सिर्फ अंग्रेजी सीखने में लगाए। वह अखबार पढ़ता, अंग्रेजी समाचार सुनता, और दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के छात्रों से बातचीत करता।
करंट अफेयर्स के लिए उसने एक अनूठा तरीका अपनाया। वह हर दिन समाचार पत्र पढ़ता और महत्वपूर्ण बिंदुओं को एक डायरी में नोट करता। शाम को वह इन बिंदुओं को याद करता और अपने शब्दों में लिखता।
दूसरे प्रयास में अनिल ने प्रीलिम्स पास कर लिया। पर मेन्स की तैयारी के लिए उसे और अधिक मेहनत की जरूरत थी। उसने अपनी नौकरी छोड़ दी और पूरे समय पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित किया।
इस दौरान उसके पास खाने के पैसे तक नहीं थे। दिल्ली के एक गुरुद्वारे में लंगर चलता था, वहाँ अनिल खाना खाता। कई बार तो वह एक ही समय का खाना दो बार में खाता – आधा दोपहर में और आधा रात में।
दूसरे प्रयास में अनिल ने मेन्स भी पास कर लिया। अब इंटरव्यू की तैयारी बाकी थी। अनिल की सबसे बड़ी कमजोरी थी आत्मविश्वास की कमी। वह गाँव से आया था और शहरी बच्चों के सामने खुद को कमतर समझता था।
उसने इस समस्या का समाधान निकाला। वह दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के बाहर जाकर वहाँ आने-जाने वाले लोगों से बातचीत करता। शुरुआत में वह घबराता था, पर धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा।
इंटरव्यू के दिन, जब अनिल यूपीएससी भवन पहुँचा, तो उसने देखा कि वहाँ अधिकतर उम्मीदवार अच्छे कपड़ों में हैं और अंग्रेजी में बात कर रहे हैं। अनिल के पास अच्छे कपड़े नहीं थे – उसने एक साधारण सी शर्ट-पैंट पहनी थी जो उसके पिता ने उसे भेजी थी।
पर जब अनिल इंटरव्यू कक्ष में गया, तो उसने सबको हैरान कर दिया। उसने स्पष्टता से अपने विचार रखे, गाँव की समस्याओं का विस्तृत विवरण दिया, और प्रशासनिक समाधान सुझाए।
परिणाम आने के दिन, अनिल इंटरनेट कैफे में बैठा अपना रोल नंबर डालने की प्रतीक्षा कर रहा था। जब उसने देखा कि उसका नाम 48वीं रैंक के साथ सूची में है, तो वह स्तब्ध रह गया।
उसने तुरंत अपने पिता को फोन किया। फोन के दूसरी ओर से आवाज आई – पूरा गाँव जश्न मना रहा था। पिता की आवाज भर्राई हुई थी, “बेटा, तूने कर दिखाया। आज मेरा सारा संघर्ष सार्थक हो गया।”
अखबारों ने अनिल की कहानी छापी। ‘गाँव के लड़के ने रचा इतिहास’, ‘मिट्टी के घर से सिविल सेवा तक’ – ऐसे शीर्षकों के साथ अनिल की कहानी पूरे देश में फैल गई।
मसूरी के लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी में प्रवेश लेते हुए अनिल को अपने गाँव की याद आ रही थी। जब उसने पहली बार अपनी वर्दी पहनी, तो उसकी आँखें नम हो गईं। उसे याद आया कि कैसे वह नंगे पैर स्कूल जाता था, और आज वह देश के सबसे प्रतिष्ठित पदों में से एक के लिए प्रशिक्षण ले रहा था।
प्रशिक्षण के दौरान अनिल ने हमेशा अपने गाँव और गरीबों की बात की। उसके सहपाठी उसकी गहरी समझ और जमीन से जुड़ाव से प्रभावित थे।
एक बार एक सेमिनार में, जब शहरी विकास पर चर्चा हो रही थी, अनिल ने कहा, “हम शहरों को विकसित करने में इतने व्यस्त हैं कि गाँवों को भूल गए हैं। असली भारत गाँवों में बसता है, और जब तक हम गाँवों का विकास नहीं करेंगे, तब तक देश का वास्तविक विकास नहीं हो सकता।”
अनिल की पहली पोस्टिंग उसके अपने जिले के पास के एक जिले में सहायक कलेक्टर के रूप में हुई। यह जानकर अनिल बहुत खुश हुआ कि वह अपने क्षेत्र के लोगों की सेवा कर पाएगा।
पहले दिन ही अनिल ने एक अनूठा फैसला किया। उसने अपना दफ्तर गाँवों में लगाना शुरू किया। हर सप्ताह वह दो दिन गाँवों में जाता और वहीं बैठकर लोगों की समस्याएँ सुनता।
एक बार एक गाँव में, अनिल ने देखा कि लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल रहा है। उसने तुरंत अधिकारियों को बुलाया और आदेश दिया कि एक सप्ताह के भीतर हैण्डपम्प लगाए जाएँ।
“सर, इतनी जल्दी कैसे होगा?” एक अधिकारी ने कहा।
अनिल ने जवाब दिया, “जब लोग पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं, तो हमारे पास समय की कमी का बहाना नहीं हो सकता।”
सात दिनों में हैण्डपम्प लग गया। गाँव वालों ने अनिल के पैर छुए, पर अनिल ने उन्हें रोका, “नहीं, मैं आपका सेवक हूँ। मेरा काम आपकी सेवा करना है।”
अनिल ने देखा कि गाँव के स्कूलों की हालत बहुत खराब है। कई स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, कई में भवन नहीं हैं। उसने ‘शिक्षा संवार’ अभियान शुरू किया।
इस अभियान के तहत उसने:
एक वर्ष में, जिले के स्कूलों में छात्रों की संख्या 40% बढ़ गई। अनिल की इस सफलता ने उसे राज्य स्तर पर पहचान दिलाई।
अनिल ने केवल शासन तक ही अपने काम को सीमित नहीं रखा। उसने सामाजिक बदलाव के लिए भी काम किया। उसने देखा कि गाँवों में लड़कियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
उसने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान को नई गति दी। उसने लड़कियों की शिक्षा के लिए विशेष छात्रवृत्ति योजना शुरू की और साइकिल वितरण कार्यक्रम चलाया।
एक गाँव में, जहाँ लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाता था, अनिल ने खुद जाकर माता-पिता से बात की। उसने उन्हें समझाया कि शिक्षा लड़कियों के लिए भी उतनी ही जरूरी है जितनी लड़कों के लिए।
आज उस गाँव की सभी लड़कियाँ स्कूल जाती हैं, और उनमें से एक ने तो इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा पास की है।
अनिल आज भी सीख रहा है। वह हर दिन नई चीजें सीखता है, नए लोगों से मिलता है, और नई समस्याओं का समाधान ढूँढता है। उसका मानना है कि एक अच्छा प्रशासक वही है जो जमीन से जुड़ा रहे और लोगों की भाषा समझे।
वह अक्सर कहता है, “मेरी सफलता का श्रेय मेरे माता-पिता, मेरे गुरुजनों और उन सभी लोगों को जाता है जिन्होंने मेरी मदद की। मैं केवल एक माध्यम हूँ जिसके द्वारा उनकी आशाओं और सपनों को पूरा किया जा रहा है।”
आज अनिल हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वह अक्सर स्कूलों और कॉलेजों में जाता है और छात्रों से बात करता है।
“सपने देखना कोई अपराध नहीं है,” वह कहता है, “बस सपने को पूरा करने के लिए मेहनत करने का साहस चाहिए। संसाधनों की कमी सफलता में बाधा नहीं है, बल्कि संसाधनों का अभाव सफलता की कुंजी है क्योंकि यह आपको रचनात्मक बनाता है।”
अनिल की कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है। बस जरूरत है एक लक्ष्य निर्धारित करने की, उसके लिए संघर्ष करने की, और कभी हार न मानने की।
वह आज भी उसी सादगी से जीवन जीता है। उसका घर साधारण है, उसकी जीवनशैली सरल है। उसका एक ही लक्ष्य है – लोगों की सेवा करना।
अनिल की यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है। वह आगे बढ़ रहा है, नई ऊँचाइयों को छू रहा है, पर अपनी जड़ों से कभी दूर नहीं हुआ है। वह आज भी वही अनिल है जो गाँव की मिट्टी में खेलता था और सपने देखता था – बस अब उसके सपने साकार हो रहे हैं, और वह दूसरों के सपनों को साकार करने में मदद कर रहा है।
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