दो मित्र और भालू: एक शिक्षाप्रद कहानी

अध्याय 1: गाँव के दो अभिन्न मित्र

रमेश और सुरेश की मित्रता

एक छोटे से गाँव में रमेश और सुरेश नाम के दो मित्र रहते थे। दोनों की मित्रता पूरे गाँव के लिए मिसाल थी। बचपन से साथ खेले, साथ पढ़े और अब युवावस्था में भी वे अभिन्न मित्र थे। रमेश थोड़ा भारी-भरकम और डरपोक स्वभाव का था, जबकि सुरेश फुर्तीला और साहसी था।

दोनों का परिवार गरीब था। रमेश के पिता किसान थे और सुरेश के पिता मजदूर। दोनों मित्र गाँव के स्कूल में पढ़ते थे और शाम को एक साथ जंगल से लकड़ियाँ इकट्ठा करने जाते थे। लकड़ियाँ बेचकर जो पैसे मिलते, उससे वे अपने परिवार की मदद करते और कभी-कभी अपनी पढ़ाई का सामान भी खरीद लेते।

एक महत्वपूर्ण दिन

एक दिन स्कूल के मास्टर जी ने घोषणा की, “अगले महीने जिला स्तरीय परीक्षा है। इस परीक्षा में प्रथम आने वाले छात्र को शहर के बड़े स्कूल में मुफ्त शिक्षा का अवसर मिलेगा।”

रमेश और सुरेश दोनों होशियार छात्र थे। दोनों ने ठान लिया कि इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देंगे। रोज सुबह चार बजे उठकर पढ़ाई शुरू कर देते। शाम को लकड़ियाँ इकट्ठा करने के बाद भी वे एक साथ बैठकर पढ़ते।

सुरेश ने एक दिन कहा, “रमेश, हमें और ज्यादा मेहनत करनी होगी। इस गाँव से कभी कोई इस परीक्षा में प्रथम नहीं आया।”

रमेश ने हाँ में सिर हिलाया, “तुम सही कह रहे हो सुरेश। लेकिन हम दोनों में से कोई एक ही तो प्रथम आ सकता है।”

दोनों के बीच यह बातचीत हुई, लेकिन मित्रता में कोई कमी नहीं आई। वे दोनों मिलकर पढ़ते, एक-दूसरे की मदद करते।

अध्याय 2: जंगल की यात्रा

लकड़ियों की कमी

परीक्षा नजदीक आ रही थी। दोनों मित्र और ज्यादा समय पढ़ाई में लगाने लगे। लकड़ियाँ इकट्ठा करने का काम थोड़ा कम हो गया। एक दिन रमेश के पिता ने कहा, “बेटा, घर में खाना बनाने के लिए लकड़ियाँ खत्म हो रही हैं। कल तुम्हें जंगल से लकड़ियाँ लानी होंगी।”

रमेश ने सुरेश से बात की। सुरेश ने कहा, “चलो कल सुबह जल्दी चलते हैं। दोपहर तक लौट आएंगे और फिर पढ़ाई करेंगे।”

अगले दिन सुबह पाँच बजे, दोनों मित्र कुल्हाड़ी और रस्सी लेकर जंगल के लिए निकल पड़े। सूरज उग रहा था और पक्षियों का कलरव वातावरण को मधुर बना रहा था।

रमेश ने कहा, “सुरेश, आज हमें ज्यादा लकड़ियाँ लेनी हैं। कल मेरी माँ ने कहा था कि लकड़ियाँ न होने से खाना ठीक से नहीं बन पा रहा।”

सुरेश ने मुस्कुराते हुए कहा, “चिंता मत करो। आज हम गहरे जंगल में चलते हैं। वहाँ अच्छी लकड़ियाँ मिलेंगी।”

गहरे जंगल में प्रवेश

दोनों मित्र जंगल की और गहराई में बढ़ने लगे। जहाँ तक वे आमतौर पर जाते थे, वहाँ लकड़ियाँ कम मिल रही थीं। सुरेश ने सुझाव दिया, “चलो उस पहाड़ी के पार चलते हैं। वहाँ बहुत सारे सूखे पेड़ हैं।”

रमेश थोड़ा डर गया। “लेकिन सुरेश, बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि उस पहाड़ी के पार खतरनाक जानवर रहते हैं।”

सुरेश हँसा, “अरे यार, दिन के उजाले में कौन सा जानवर आएगा? चलो, हम जल्दी करेंगे।”

दोनों पहाड़ी पर चढ़ने लगे। पहाड़ी काफी ऊँची थी, लेकिन दोनों युवा और ऊर्जावान थे। करीब एक घंटे में वे पहाड़ी के शिखर पर पहुँच गए।

शिखर से नीचे देखने पर उन्हें एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया। घने पेड़ों के बीच एक छोटी सी झील थी और उसके आसपास बहुत सारे सूखे पेड़ पड़े थे।

रमेश खुश होकर बोला, “वाह! यहाँ तो लकड़ियों का भंडार पड़ा है।”

अध्याय 3: भालू का सामना

अचानक मुसीबत

दोनों मित्र तेजी से नीचे उतरने लगे। वे लकड़ियाँ इकट्ठा करने में इतने मग्न हो गए कि समय का ध्यान ही न रहा। दोनों ने ढेर सारी लकड़ियाँ इकट्ठा कर लीं और उन्हें बाँधना शुरू किया।

तभी अचानक रमेश की नजर एक बड़ी सी छाया पर पड़ी। वह चौंककर पीछे मुड़ा तो देखा कि एक विशाल भालू उनकी तरफ आ रहा था।

“सुरेश! भालू!” रमेश चिल्लाया।

सुरेश ने मुड़कर देखा तो उसका खून सूख गया। भालू उनसे मात्र पचास गज की दूरी पर था और तेजी से उनकी तरफ बढ़ रहा था।

सुरेश ने तुरंत रमेश से कहा, “भागो! तेजी से भागो!”

दोनों मित्र अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे। लेकिन भालू उनके पीछे था। भालू इंसानों से ज्यादा तेज दौड़ सकता था, यह बात दोनों जानते थे।

मित्रता की परीक्षा

भागते-भागते रमेश का पैर फिसल गया और वह गिर पड़ा। उसके घुटने में चोट लगी और वह तेजी से उठ नहीं पा रहा था।

सुरेश कुछ दूर भाग चुका था। जब उसने देखा कि रमेश गिर गया है, तो वह रुक गया। उसके सामने एक कठिन निर्णय था – या तो वह अपनी जान बचाकर भाग जाए या फिर अपने मित्र की मदद करे।

रमेश ने देखा कि सुरेश रुक गया है। वह चिल्लाया, “सुरेश, भाग जाओ! तुम बच जाओगे।”

लेकिन सुरेश ने भागने का निर्णय नहीं लिया। वह तुरंत वापस लौटा और रमेश को उठाने की कोशिश करने लगा। भालू अब और नजदीक आ चुका था।

तभी सुरेश को एक विचार आया। उसने रमेश से कहा, “जल्दी से उस पेड़ पर चढ़ो!”

रमेश ने कहा, “मैं चढ़ नहीं सकता, मेरे घुटने में चोट लगी है।”

सुरेश ने तुरंत रमेश को सहारा दिया और उसे पेड़ पर चढ़ने में मदद की। रमेश दर्द के बावजूद पेड़ की एक डाली तक पहुँच गया।

लेकिन अब सुरेश के लिए खुद पेड़ पर चढ़ने का समय नहीं था। भालू बहुत नजदीक आ चुका था।

अध्याय 4: सुरेश की चतुराई

भालू से बचने की युक्ति

सुरेश ने तुरंत एक पुरानी कहावत याद की जो उसके दादाजी ने सुनाई थी – “भालू मृत शरीर को नहीं खाते।” यह एक लोकप्रिय धारणा थी, लेकिन सुरेश के पास और कोई विकल्प नहीं था।

उसने तुरंत जमीन पर लेटने का निर्णय लिया। वह सीधा जमीन पर लेट गया और सांस रोक ली। उसने अपने आप को मृत की तरह प्रस्तुत किया।

भालू नजदीक आया। उसने सुरेश के चारों ओर घूमना शुरू किया। भालू ने सुरेश को सूंघा, उसे अपने पंजे से धकेला। सुरेश बिल्कुल भी हिला-डुला नहीं। वह मृतवत पड़ा रहा।

कुछ मिनट तक भालू सुरेश के आसपास घूमता रहा। फिर, जैसा कि दादाजी ने कहा था, भालू ने सुरेश को छोड़ दिया और चला गया।

पेड़ पर बैठा रमेश यह सब देख रहा था। वह डर से काँप रहा था। जब भालू चला गया, तो उसने नीचे देखा। सुरेश अभी भी जमीन पर पड़ा हुआ था।

रमेश ने धीरे से पुकारा, “सुरेश! सुरेश! क्या तुम ठीक हो?”

मित्र की चिंता

सुरेश ने कोई जवाब नहीं दिया। रमेश को डर लगने लगा कि कहीं भालू ने सुरेश को चोट तो नहीं पहुँचाई। वह धीरे-धीरे पेड़ से नीचे उतरा। उसका घुटना दर्द कर रहा था, लेकिन वह सुरेश की चिंता में उतर आया।

जब रमेश सुरेश के पास पहुँचा, तो सुरेश अचानक हँसते हुए बोला, “बूढ़ों की बातें सच होती हैं न!”

रमेश हैरान रह गया। “तुम ठीक हो सुरेश? मुझे लगा कि तुम्हें चोट लगी है।”

सुरेश उठकर बैठ गया। “नहीं यार, मैं तो बस भालू को धोखा दे रहा था। दादाजी हमेशा कहते थे कि भालू मुर्दे को नहीं खाते। मैंने यही तरकीब आजमाई।”

रमेश ने सुरेश को गले लगा लिया। उसकी आँखों में आँसू थे। “तुमने मेरी जान बचाई सुरेश। तुम मेरे सच्चे मित्र हो।”

सुरेश मुस्कुराया। “अरे यार, मित्र ही तो हैं एक-दूसरे के लिए। चलो, अब जल्दी से लकड़ियाँ लेकर घर चलते हैं।”

अध्याय 5: वापसी की कठिन यात्रा

घायल मित्र की मदद

रमेश का घुटना अब और सूज गया था। वह ठीक से चल नहीं पा रहा था। सुरेश ने कहा, “तुम मेरे कंधे पर हाथ रखकर चलो। मैं तुम्हें सहारा दूंगा।”

दोनों मित्र धीरे-धीरे चलने लगे। लकड़ियों का बंडल सुरेश ने अपने सिर पर उठा लिया था। रमेश को सहारा देकर वह पहाड़ी पर चढ़ने लगा।

पहाड़ी चढ़ना मुश्किल था, खासकर रमेश की चोट के साथ। सुरेश ने हिम्मत नहीं हारी। वह बार-बार रमेश को प्रोत्साहित करता, “थोड़ी और कोशिश, हम शिखर पर पहुँच जाएंगे।”

करीब दो घंटे की कठिन परिश्रम के बाद वे पहाड़ी के शिखर पर पहुँचे। वहाँ से उन्हें अपना गाँव दिखाई दे रहा था। लेकिन अभी भी उन्हें काफी दूरी तय करनी थी।

सुरेश ने देखा कि रमेश का चेहरा पीला पड़ रहा है। उसने कहा, “चलो यहाँ थोड़ा आराम करते हैं।”

दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए। सुरेश ने अपनी बोतल से पानी निकाला और रमेश को पिलाया। फिर उसने अपने कपड़े का एक टुकड़ा फाड़ा और रमेश के घुटने पर बाँध दिया।

सूर्यास्त का डर

सूरज अब ढलने लगा था। सुरेश ने कहा, “हमें जल्दी करनी होगी। रात होने से पहले गाँव पहुँच जाना चाहिए। रात में जंगल और भी खतरनाक हो जाता है।”

रमेश ने दर्द से कराहते हुए कहा, “सुरेश, तुम मुझे यहाँ छोड़कर चले जाओ। गाँव पहुँचकर लोगों को लेकर आना। मैं तुम्हारे बिना तेजी से नहीं चल सकता।”

सुरेश ने सख्ती से कहा, “नहीं रमेश, मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा। रात में यहाँ अकेले रहना खतरनाक है। हम साथ ही चलेंगे।”

सुरेश ने रमेश को फिर से उठाया और दोनों चल पड़े। सुरेश ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। वह जानता था कि रात होने से पहले उन्हें गाँव पहुँचना ही होगा।

थोड़ी दूर चलने के बाद सुरेश ने एक छोटा सा रास्ता देखा जो सीधे गाँव की तरफ जाता था। यह रास्ता थोड़ा लंबा था, लेकिन आसान था। उसने उसी रास्ते को चुना।

अध्याय 6: गाँव वापसी

लोगों की चिंता

गाँव में रमेश और सुरेश के परिवार चिंतित थे। दोनों सुबह गए थे और अब शाम हो रही थी। आमतौर पर वे दोपहर तक लौट आते थे।

रमेश के पिता ने सुरेश के पिता से कहा, “कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई? हमें कुछ लोगों को ढूँढने भेजना चाहिए।”

सुरेश के पिता ने कहा, “अभी कुछ देर और रुकते हैं। हो सकता है आज वे गहरे जंगल में गए हों।”

लेकिन सूरज डूबने के साथ ही दोनों परिवारों की चिंता बढ़ने लगी। गाँव के मुखिया को सूचित किया गया। मुखिया ने कुछ युवकों को जंगल की तरफ भेजने का निर्णय लिया।

ठीक उसी समय, गाँव के बाहरी छोर पर सुरेश और रमेश दिखाई दिए। सुरेश रमेश को सहारा देकर ला रहा था। दोनों थके हुए और क्षीण दिख रहे थे।

गाँव के लोग उनकी तरफ दौड़े। रमेश के पिता ने रमेश को गोद में उठा लिया। “क्या हुआ बेटा? तुम्हें क्या हो गया?”

सुरेश ने थकी हुई आवाज में कहा, “चाचा, रमेश के घुटने में चोट लग गई है। जल्दी से वैद्य जी को बुलाइए।”

अध्याय 7: पूरी कहानी का खुलासा

वैद्य जी का इलाज

रमेश को घर ले जाया गया। गाँव के वैद्य जी ने उसके घुटने का इलाज किया। घुटने में मोच आई थी, लेकिन कोई हड्डी नहीं टूटी थी। वैद्य जी ने कहा, “कुछ दिन आराम करने से ठीक हो जाएगा।”

इस बीच, सुरेश ने अपने परिवार को बताया कि क्या हुआ था। सुरेश के पिता ने उसे गले लगा लिया। “तुमने बहुत बहादुरी दिखाई बेटा। तुम सच्चे मित्र साबित हुए।”

अगले दिन, पूरे गाँव में रमेश और सुरेश की कहानी फैल गई। लोग सुरेश की बहादुरी और चतुराई की प्रशंसा कर रहे थे।

रमेश के पिता सुरेश के घर गए। उन्होंने सुरेश के हाथ थामे और कहा, “बेटा, तुमने मेरे रमेश की जान बचाई। मैं तुम्हारा आभारी रहूंगा।”

सुरेश ने विनम्रता से कहा, “चाचा, रमेश मेरा मित्र है। मित्र का कर्तव्य ही है एक-दूसरे की मदद करना।”

गाँव की सभा

गाँव के मुखिया ने एक सभा बुलाई। सभी गाँव वाले इकट्ठा हुए। मुखिया ने कहा, “आज हम यहाँ दो वीर युवकों को सम्मानित करने के लिए इकट्ठा हुए हैं। सुरेश ने न केवल अपनी बुद्धिमत्ता से भालू से अपनी जान बचाई, बल्कि अपने घायल मित्र की भी मदद की।”

मुखिया ने आगे कहा, “इस घटना से हमें दो शिक्षाएँ मिलती हैं। पहली, मित्रता की सच्ची परिभाषा संकट के समय सामने आती है। दूसरी, बुद्धिमत्ता और शांत दिमाग से किसी भी संकट का सामना किया जा सकता है।”

सभा में सुरेश को सम्मानित किया गया। लेकिन सुरेश ने कहा, “यह सम्मान मेरा अकेले का नहीं है। रमेश ने भी हिम्मत दिखाई। उसने मुझे भाग जाने को कहा, लेकिन जब मैं नहीं गया तो उसने भी हार नहीं मानी।”

रमेश, जो बैठने में असमर्थ था, ने कहा, “सच्चा मित्र वही है जो संकट के समय साथ दे। सुरेश ने साबित किया कि वह सच्चा मित्र है।”

अध्याय 8: परीक्षा की तैयारी

चोट के बावजूद पढ़ाई

रमेश की चोट के कारण वह ठीक से पढ़ नहीं पा रहा था। परीक्षा नजदीक आ रही थी। सुरेश ने निर्णय लिया कि वह रमेश की पढ़ाई में मदद करेगा।

हर दिन स्कूल के बाद, सुरेश रमेश के घर जाता और उसे पढ़ाता। वह अपनी नोट्स साझा करता, उसे महत्वपूर्ण प्रश्न समझाता।

एक दिन रमेश ने कहा, “सुरेश, तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। मेरी वजह से तुम्हारी तैयारी प्रभावित न हो।”

सुरेश ने मुस्कुराते हुए कहा, “चिंता मत करो। तुम्हें पढ़ाते-पढ़ाते मेरी भी तैयारी हो जाती है। और फिर, मित्र ही तो हैं एक-दूसरे की मदद के लिए।”

दोनों मित्र मिलकर पढ़ते। सुरेश ने रमेश के लिए एक विशेष टेबल बनाई जिस पर बैठकर वह आराम से पढ़ सके। रमेश की माँ ने दोनों के लिए अच्छा खाना बनाया ताकि उनकी सेहत बनी रहे।

शिक्षक की मदद

स्कूल के मास्टर जी को जब इस बारे में पता चला, तो वे भी मदद के लिए आगे आए। वे रोज शाम को रमेश के घर आते और दोनों को पढ़ाते।

मास्टर जी ने कहा, “तुम दोनों की मित्रता और लगन देखकर मुझे बहुत खुशी होती है। मुझे विश्वास है कि तुम दोनों परीक्षा में अच्छा करोगे।”

रमेश की चोट धीरे-धीरे ठीक होने लगी। दस दिन बाद वह चलने-फिरने लगा, लेकिन अभी भी उसे दर्द होता था। परीक्षा से एक सप्ताह पहले, वह स्कूल जाने लगा।

अध्याय 9: परीक्षा का दिन

महत्वपूर्ण दिन

परीक्षा का दिन आ गया। परीक्षा केंद्र शहर में था। गाँव से शहर की दूरी दस किलोमीटर थी। रमेश अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था, लेकिन वह परीक्षा देना चाहता था।

सुरेश ने कहा, “चिंता मत करो रमेश। मैं तुम्हें साइकिल पर बिठाकर ले जाऊंगा।”

सुरेश के पिता ने अपनी साइकिल दी। दोनों मित्र सुबह पाँच बजे ही निकल पड़े। रास्ता कठिन था, लेकिन सुरेश ने हिम्मत नहीं हारी।

शहर पहुँचकर उन्होंने परीक्षा केंद्र ढूँढा। परीक्षा तीन घंटे की थी। दोनों ने अच्छी तैयारी की थी, इसलिए वे आश्वस्त थे।

परीक्षा समाप्त होने के बाद, दोनों बाहर आए। रमेश ने कहा, “पेपर तो अच्छा हुआ। तुम्हारा कैसा रहा सुरेश?”

सुरेश मुस्कुराया, “मेरा भी ठीक ही हुआ। अब चलो घर चलते हैं।”

वापसी की यात्रा

वापसी की यात्रा और भी कठिन थी क्योंकि अब दोनों थके हुए थे। सुरेश साइकिल चला रहा था और रमेश पीछे बैठा था। रास्ते में एक जगह साइकिल का टायर पंक्चर हो गया।

अब उनके सामने समस्या थी। न तो उनके पास ट्यूब बदलने का सामान था और न ही आसपास कोई मरम्मत की दुकान थी। शाम होने वाली थी।

सुरेश ने कहा, “कोई बात नहीं। हम साइकिल को धक्का देकर ले चलते हैं।”

रमेश ने विरोध किया, “नहीं सुरेश, तुम इतनी दूर साइकिल धक्का नहीं दे सकते। मैं भी तुम्हारी मदद करूंगा।”

दोनों मित्र साइकिल को धक्का देकर ले चलने लगे। यह बहुत मुश्किल काम था, लेकिन दोनों ने हिम्मत नहीं हारी। वे बारी-बारी से साइकिल धक्का देते।

करीब तीन घंटे की कठिन परिश्रम के बाद वे गाँव पहुँचे। दोनों थककर चूर हो चुके थे, लेकिन उनके चेहरे पर संतोष था कि उन्होंने परीक्षा दी है और सुरेश ने एक बार फिर मित्रता का परिचय दिया है।

अध्याय 10: परिणाम और निष्कर्ष

परीक्षा परिणाम

परीक्षा परिणाम आने में एक महीने का समय था। इस बीच, रमेश पूरी तरह ठीक हो गया। दोनों मित्र फिर से साथ लकड़ियाँ इकट्ठा करने जाने लगे, लेकिन अब वे गहरे जंगल में नहीं जाते थे।

एक महीने बाद परीक्षा परिणाम आया। पूरे गाँव में उत्साह था। मास्टर जी परिणाम लेकर आए।

गाँव के चौपाल पर सभा बुलाई गई। मास्टर जी ने घोषणा की, “इस बार की परीक्षा में हमारे गाँव के दो छात्रों ने अद्भुत सफलता प्राप्त की है।”

सभी लोग उत्सुकता से सुन रहे थे। मास्टर जी ने आगे कहा, “पूरे जिले में प्रथम स्थान रमेश ने प्राप्त किया है और द्वितीय स्थान सुरेश ने प्राप्त किया है!”

पूरे गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई। रमेश और सुरेश एक-दूसरे को गले लगा लिए। दोनों की आँखों में खुशी के आँसू थे।

मास्टर जी ने कहा, “रमेश को शहर के बड़े स्कूल में मुफ्त शिक्षा का अवसर मिलेगा। लेकिन मैंने स्कूल प्रबंधन से बात की है और उन्होंने सुरेश के लिए भी छात्रवृत्ति की व्यवस्था की है। दोनों साथ पढ़ेंगे।”

मित्रता की सच्ची परिभाषा

रमेश और सुरेश की इस कहानी से हमें कई महत्वपूर्ण शिक्षाएँ मिलती हैं:

  1. सच्ची मित्रता की पहचान: सच्चा मित्र संकट के समय साथ देता है। सुरेश ने भालू के आक्रमण के समय रमेश को अकेला छोड़ने के बजाय उसकी मदद की।
  2. बुद्धिमत्ता का महत्व: सुरेश ने बुद्धिमत्ता से काम लेते हुए भालू से अपनी जान बचाई। उसने पुरानी कहावत को याद किया और उसे व्यवहार में लाया।
  3. सहयोग की भावना: दोनों मित्रों ने हर कदम पर एक-दूसरे का सहयोग किया – चाहे वह जंगल से वापस आना हो या परीक्षा की त

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