गाँव का मास्टर जी
उस सुबह जब पहली किरण अभी पीपल के पत्तों को छू भी नहीं पाई थी, मास्टर जी पहले ही विद्यालय पहुँच चुके थे। उनका विद्यालय कोई भव्य इमारत नहीं था – चार कच्ची दीवारें, खपरैल की छत और फर्श पर बिछी चटाइयाँ। लेकिन मास्टर जी के लिए यह ताजमहल से कम नहीं था।
मास्टर जी – यानी राधेश्याम शर्मा। गाँव के एकमात्र प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक। पैंतीस साल से वह इसी विद्यालय में पढ़ा रहे थे। उनके हाथों से सैकड़ों बच्चे पढ़कर निकले थे – कुछ डॉक्टर बने, कुछ इंजीनियर, कुछ शहर में नौकरी करने लगे, और कुछ अपने पैतृक व्यवसाय में लग गए। लेकिन मास्टर जी वहीं रह गए – गाँव में, इसी विद्यालय में।
मास्टर जी ने अपना थैला रखा जिसमें किताबें, कॉपियाँ और वह प्रसिद्ध लाल स्याही वाला पेन था जो उनकी पहचान था। उन्होंने सबसे पहले झाड़ू उठाई और कक्षा की सफाई की। फिर तख्ती को साफ किया और उस पर आज की तारीख लिखी – “15 मार्च 2023, बुधवार”।
धीरे-धीरे बच्चे आने लगे। पहले आया रामू – सबसे छोटा, सबसे शरारती, लेकिन मास्टर जी का सबसे चहेता। फिर आई सीता, जो हमेशा समय पर आती थी। और फिर एक के बाद एक सभी चालीस बच्चे आ गए।
“सुप्रभात बच्चों!” मास्टर जी ने कहा।
“सुप्रभात मास्टर जी!” चालीस स्वर एक साथ गूंजे।
प्रार्थना के बाद पढ़ाई शुरू हुई। आज तीसरी कक्षा के लिए हिंदी का पाठ था – “सच्चा दोस्त”। मास्टर जी ने जब पढ़ाना शुरू किया तो उनका पूरा व्यक्तित्व बदल गया। आवाज़ में एक लय आ गई, हावभाव में एक नाटकीयता। वह सिर्फ पाठ नहीं पढ़ा रहे थे, वह एक कहानी सुना रहे थे।
दोपहर के भोजन के समय, जब बच्चे अपना-अपना टिफिन खा रहे थे, मास्टर जी ने देखा कि रामू एक कोने में बैठा है और कुछ नहीं खा रहा।
“क्या हुआ रामू? टिफिन नहीं लाया?” मास्टर जी ने पूछा।
रामू ने सिर हिलाया। “माँ बीमार हैं, इसलिए…”
मास्टर जी ने कुछ नहीं कहा। वह अपने कमरे में गए और अपना टिफिन लेकर आए। उसमें दो रोटियाँ और आलू की सब्जी थी। उन्होंने आधा रामू को दे दिया।
“लेकिन मास्टर जी, आप…” रामू ने आपत्ति करनी चाही।
“मैं बड़ा हूँ, मुझे कम चाहिए,” मास्टर जी मुस्कुराए।
यह कोई पहली बार नहीं था। मास्टर जी हमेशा से ऐसे ही थे। उनके थैले में हमेशा एक अतिरिक्त टिफिन होता था – किसी जरूरतमंद बच्चे के लिए।
मास्टर जी को याद आया जब वह खुद इसी विद्यालय में पढ़ते थे। उस समय मास्टर जी थे पंडित चंद्रशेखर जोशी – एक दृढ़ निश्चयी, अनुशासनप्रिय अध्यापक जिनकी छड़ी की आवाज से सभी बच्चे कांप उठते थे। लेकिन उनके हृदय में बच्चों के लिए अथाह प्रेम था।
राधेश्याम उन दिनों एक मेधावी छात्र थे। गरीबी के बावजूद उन्होंने पढ़ाई में हमेशा अव्वल स्थान प्राप्त किया। पंडित जोशी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया।
“बेटा राधेश्याम, तुम्हारे अंदर शिक्षक बनने की योग्यता है,” पंडित जोशी ने एक दिन कहा था। “शिक्षा सबसे बड़ा दान है। एक शिक्षक सैकड़ों जीवन बदल सकता है।”
और राधेश्याम ने यही रास्ता चुना। प्रशिक्षण के बाद जब उनकी पहली नियुक्ति हुई तो उन्होंने इसी गाँव के विद्यालय में आने का निवेदन किया। सभी हैरान थे – एक प्रतिभाशाली युवक बड़े शहर की नौकरी छोड़कर गाँव क्यों आना चाहेगा? लेकिन राधेश्याम जानते थे कि उन्हें कहाँ जाना है।
शुरुआत के दिन आसान नहीं थे। विद्यालय की दशा दयनीय थी। छत लीक करती थी, फर्नीचर टूटा हुआ था, और सबसे बड़ी समस्या थी बच्चों का नियमित रूप से विद्यालय न आना। अधिकतर बच्चे खेती के काम में लग जाते थे।
मास्टर जी ने घर-घर जाकर अभिभावकों से मिलना शुरू किया। उन्हें समझाया कि शिक्षा क्यों जरूरी है। कुछ ने सुना, कुछ ने उन्हें धक्के मारकर बाहर निकाल दिया।
एक दिन की बात है। रमेश नाम का एक बच्चा तीन दिन से स्कूल नहीं आया था। मास्टर जी उसके घर पहुँचे। पिता ने गुस्से में कहा, “हम गरीब लोग हैं सर। बच्चे को पढ़ाने से रोटी नहीं मिलेगी। उसे बकरियाँ चरानी हैं।”
मास्टर जी ने धैर्य से कहा, “भैया, अगर तुम्हारा बच्चा पढ़-लिख जाएगा तो वह सरकारी नौकरी पा सकता है। फिर तुम्हें कभी बकरियाँ नहीं चरानी पड़ेंगी।”
“लेकिन अभी तो मदद चाहिए,” पिता बोले।
मास्टर जी ने एक प्रस्ताव रखा। “रमेश सुबह स्कूल आएगा, और दोपहर के बाद मैं खुद उसे बकरियाँ चराने में मदद करूँगा।”
यह सुनकर रमेश के पिता हैरान रह गए। एक मास्टर जी बकरियाँ चराएँगे? लेकिन मास्टर जी ने वादा निभाया। दो महीने तक वह हर दिन दोपहर बाद रमेश के साथ बकरियाँ चराने जाते। और इस दौरान वह रमेश को पढ़ाते भी रहे।
धीरे-धीरे परिवर्तन आने लगा। रमेश ने पढ़ाई में रुचि ली और अन्य बच्चों के अभिभावक भी प्रभावित हुए।
मास्टर जी सिर्फ पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं थे। उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ किताबी ज्ञान देना नहीं है, बल्कि बच्चों को जीवन के लिए तैयार करना है।
वह बच्चों को पेड़-पौधों के नाम सिखाते, पक्षियों की पहचान कराते, प्रकृति के बारे में बताते। साप्ताहिक रूप से वह नैतिक शिक्षा का कक्षा आयोजित करते जिसमें ईमानदारी, सच्चाई, और परिश्रम के मूल्य सिखाए जाते।
एक बार की बात है। विद्यालय में चोरी हो गई – मास्टर जी की मेज से पांच रुपये गायब थे। सभी बच्चे एक-दूसरे पर संदेह करने लगे। मास्टर जी ने कक्षा में एक कहानी सुनाई – एक राजा और एक ईमानदार गरीब बच्चे की कहानी।
अगले दिन, एक लिफाफा मास्टर जी की मेज पर मिला। उसमें पांच रुपये और एक चिट्ठी थी: “माफ़ कीजिए मास्टर जी, मैंने पैसे चुराए थे। मुझे अपनी बहन के लिए दवाई खरीदनी थी।”
मास्टर जी ने कभी नहीं पूछा कि चिट्ठी किसने लिखी है। उन्होंने बस कक्षा में कहा, “जिसने भी पैसे वापस किए हैं, वह बहुत बहादुर है। गलती करना मनुष्य का स्वभाव है, लेकिन उसे स्वीकार करना वीरता है।”
समय बदला। सरकारी योजनाओं के तहत विद्यालय का भवन बना, कम्प्यूटर आए, पुस्तकालय स्थापित हुआ। लेकिन मास्टर जी के सिद्धांत नहीं बदले।
जब पहली बार कम्प्यूटर आया तो बच्चे तो उत्साहित थे, लेकिन मास्टर जी के लिए यह एक चुनौती थी। पचपन साल की उम्र में नई तकनीक सीखना आसान नहीं था।
लेकिन मास्टर जी ने हार नहीं मानी। उन्होंने रितेश से मदद माँगी – एक पुराना छात्र जो अब कम्प्यूटर इंजीनियर था। रितेश ने हर रविवार को आकर मास्टर जी को कम्प्यूटर सिखाया।
और कुछ ही महीनों में मास्टर जी न केवल कम्प्यूटर चलाना सीख गए, बल्कि बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेजेंटेशन भी बनाने लगे।
मास्टर जी का व्यक्तिगत जीवन सरल था, लेकिन बलिदानों से भरा हुआ। उनकी पत्नी का देहांत दस साल पहले ही हो गया था। उनकी एक बेटी थी जो शहर में रहती थी और बार-बार उन्हें वहाँ बुलाती थी।
“पापा, आप अब रिटायर हो चुके हैं। यहाँ आ जाइए, आराम कीजिए,” बेटी ने कहा था।
लेकिन मास्टर जी ने इनकार कर दिया। “बेटी, यह विद्यालय और ये बच्चे मेरे परिवार हैं। मैं इन्हें अकेला कैसे छोड़ सकता हूँ?”
रिटायरमेंट की उम्र होने के बावजूद मास्टर जी ने विशेष अनुमति लेकर पढ़ाना जारी रखा। उनका कहना था, “जब तक शरीर में प्राण हैं, और मस्तिष्क में विचार, मैं पढ़ाता रहूँगा।”
एक दिन, जिला शिक्षा अधिकारी ने विद्यालय का निरीक्षण करने आना था। सभी अध्यापकों में खलबली मच गई। लेकिन मास्टर जी शांत थे।
जब अधिकारी आए तो मास्टर जी सामान्य रूप से पढ़ा रहे थे। अधिकारी ने कक्षा में प्रवेश किया और पीछे बैठ गए।
मास्टर जी ने बीच में नहीं रुककर पढ़ाना जारी रखा। वह भूगोल पढ़ा रहे थे – भारत के नदियों के बारे में। उनका तरीका इतना रोचक था कि अधिकारी भी मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे।
कक्षा समाप्त होने के बाद अधिकारी ने मास्टर जी से पूछा, “आप कितने साल से पढ़ा रहे हैं?”
“पैंतीस साल, सर,” मास्टर जी ने विनम्रता से उत्तर दिया।
अधिकारी ने देखा कि कैसे बच्चे मास्टर जी से लिपटे रहते हैं, कैसे वह हर बच्चे के नाम से जानते हैं, उनकी रुचियों और कठिनाइयों से परिचित हैं।
निरीक्षण समाप्त होने पर अधिकारी ने कहा, “मास्टर जी, आप जैसे शिक्षक हमारी शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं। मैं आपके समर्पण के लिए आभारी हूँ।”
मास्टर जी के कार्यकाल में उनके विद्यालय ने कई उपलब्धियाँ हासिल कीं। सौ प्रतिशत उपस्थिति का रिकॉर्ड, जिला स्तर पर शैक्षणिक प्रतियोगिताओं में पुरस्कार, और सबसे बड़ी उपलब्धि – पिछले पंद्रह सालों से कोई भी बच्चा स्कूल नहीं छोड़ा था।
मास्टर जी ने विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए भी काम किया। धीरज नाम का एक बच्चा जिसे सुनने में कठिनाई थी, मास्टर जी ने उसके लिए विशेष तरीके विकसित किए। वह उसे अलग बैठाते, चेहरे के सामने रहकर बोलते ताकि वह होंठ पढ़ सके।
आज धीरज एक सफल टेलर है और अपना काम कर रहा है। वह अक्सर कहता है, “अगर मास्टर जी न होते तो मैं कभी पढ़-लिख नहीं पाता।”
गाँव में मास्टर जी का विशेष सम्मान था। उन्हें केवल एक अध्यापक के रूप में नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक, सलाहकार और कभी-कभी न्यायाधीश के रूप में भी देखा जाता था।
झगड़े होते तो लोग मास्टर जी के पास आते। शादी-विवाह के मुहूर्त के लिए उनसे सलाह ली जाती। बच्चों के नामकरण में उनकी राय महत्वपूर्ण होती।
एक बार दो परिवारों के बीच जमीन के विवाद में झगड़ा हो गया था। दोनों पक्ष मास्टर जी के पास आए। मास्टर जी ने कहानी सुनी और फिर एक किताब निकाली।
“यह है हमारे गाँव का इतिहास,” मास्टर जी ने कहा। “इसमें लिखा है कि तुम्हारे दादाजी अच्छे दोस्त थे। एक बार अकाल पड़ा तो एक ने दूसरे को अनाज दिया था। क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारी दोस्ती की यह कहानी एक झगड़े की कहानी में बदल जाए?”
दोनों पक्ष शर्मिंदा हो गए और मामला सुलझ गया।
समय के साथ नई चुनौतियाँ आईं। मोबाइल फोन, इंटरनेट, और सोशल मीडिया ने बच्चों की दुनिया बदल दी थी। अब बच्चे किताबों की जगह स्क्रीन देखने में अधिक रुचि रखते थे।
मास्टर जी ने इसे एक चुनौती के बजाय एक अवसर के रूप में लिया। उन्होंने शैक्षणिक ऐप्स का उपयोग करना सीखा, वीडियो के माध्यम से पढ़ाना शुरू किया। लेकिन साथ ही, उन्होंने बच्चों को प्रकृति से जोड़े रखने पर जोर दिया।
हर शनिवार को वह बच्चों को लेकर प्रकृति भ्रमण पर जाते। पेड़ों के नाम सिखाते, पक्षियों की आवाज़ें पहचानना सिखाते, और पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में बताते।
सबसे यादगार घटना थी मास्टर जी के सेवानिवृत्ति समारोह की। गाँव वालों ने एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया। पुराने छात्र दूर-दूर से आए।
कार्यक्रम में रमेश भी आया – वही रमेश जिसकी बकरियाँ मास्टर जी चराते थे। आज वह एक बैंक मैनेजर था।
“मास्टर जी,” रमेश ने भावुक होकर कहा, “अगर आप उस दिन मेरे घर न आते, और मेरे साथ बकरियाँ न चराते, तो आज मैं यहाँ न होता। आपने न सिर्फ मुझे पढ़ाया, बल्कि मेरे पिता को भी समझाया कि शिक्षा क्यों जरूरी है।”
एक-एक करके पुराने छात्र आए और अपने अनुभव साझा किए। डॉक्टर बने राजेश ने कहा, “मास्टर जी ने मुझे पहली बार मानव शरीर की संरचना के बारे में बताया था। उनकी वह कक्षा ही मेरे लिए प्रेरणा बनी।”
शिक्षिका बनीं सीता ने कहा, “मास्टर जी ने हमें सिखाया कि शिक्षण सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि एक समर्पण है। आज जो कुछ भी मैं हूँ, उनकी वजह से हूँ।”
मास्टर जी आधिकारिक रूप से रिटायर हो चुके थे, लेकिन वह विद्यालय आना जारी रखते। अब वह स्वयंसेवक के रूप में पढ़ाते। नया अध्यापक युवा था, आधुनिक विचारों वाला, लेकिन वह मास्टर जी का गहरा सम्मान करता था।
एक दिन नए अध्यापक ने पूछा, “मास्टर जी, आपकी सफलता का रहस्य क्या है?”
मास्टर जी मुस्कुराए। “बेटे, सफलता कोई मंजिल नहीं है, यह तो सफर है। और इस सफर में तीन चीजें जरूरी हैं – प्रेम, धैर्य और समर्पण। बच्चों से प्रेम करो, उनके सीखने में धैर्य रखो, और शिक्षा के प्रति समर्पित रहो।”
आज मास्टर जी अस्सी वर्ष के हो चुके हैं। उनकी चाल धीमी हो गई है, आँखों पर चश्मा है, लेकिन उनका उत्साह वैसा ही है। वह अब भी विद्यालय आते हैं, अब भी बच्चों को कहानियाँ सुनाते हैं।
उनके पुराने छात्रों ने मिलकर विद्यालय में एक पुस्तकालय बनवाया है जिसका नाम है – “मास्टर राधेश्याम शर्मा ज्ञानपीठ”। इसमें हजारों किताबें हैं, और एक विशेष खंड है जिसमें मास्टर जी के हाथ से लिखे नोट्स और पाठ योजनाएँ रखी गई हैं।
मास्टर जी का सबसे बड़ा योगदान यह नहीं है कि उन्होंने कितने बच्चों को पढ़ाया, बल्कि यह है कि उन्होंने शिक्षा के प्रति एक समग्र दृष्टिकोण विकसित किया। उन्होंने सिखाया कि शिक्षा सिर्फ नौकरी पाने का साधन नहीं है, बल्कि चरित्र निर्माण का माध्यम है।
गाँव का मास्टर जी अब केवल एक व्यक्ति नहीं, एक संस्था बन चुका है। उनकी कहानी हर उस शिक्षक की कहानी है जो गुमनामी में रहकर भी समाज की नींव मजबूत करते हैं।
आज जब वह सुबह विद्यालय की ओर चलते हैं, तो हर कोई उन्हें नमन करता है। बच्चे दौड़कर आते हैं और उनके हाथ छूते हैं। बुजुर्ग उनसे आशीर्वाद लेते हैं।
मास्टर जी की कक्षा में आज भी वही पुराना तख्ता है, वही लाल स्याही वाला पेन है, और वही प्रेम और समर्पण है। और शायद यही है एक सच्चे शिक्षक की पहचान – जो स्वयं नहीं बदलता, लेकिन सैकड़ों जीवन बदल देता है।
जब सूरज की किरणें उस पुराने विद्यालय की खिड़कियों से होकर कक्षा में प्रवेश करती हैं, तो वह मास्टर जी के चेहरे को रोशन करती हैं। और उस रोशनी में पूरा गाँव दिखाई देता है – एक ऐसा गाँव जिसकी नींव में मास्टर जी जैसे शिक्षकों का समर्पण, प्रेम और अथक परिश्रम है।
गाँव का मास्टर जी – न सिर्फ एक शिक्षक, बल्कि एक संस्कार, एक परंपरा, और एक जीवंत विरासत।
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