पोखरे के किनारे

गाँव का वो पुराना पोखरा

गर्मियों की एक शाम थी। सूरज ढलने को था और आसमान में नारंगी और बैंगनी रंगों का मेल जैसे किसी चित्रकार की पैलेट पर बिखर गया हो। गाँव के पश्चिमी छोर पर स्थित पोखरे के किनारे बैठी मीनाक्षी की नजरें पानी की सतह पर तैरते कमल के पत्तों पर टिकी हुई थीं। यह पोखरा गाँव की जान था – सदियों पुराना, विशाल और रहस्यों से भरा हुआ।

पोखरे के किनारे

पोखरे के चारों ओर पुराने पीपल और बरगद के पेड़ थे जिनकी जड़ें पानी में डूबी रहती थीं। कहा जाता था कि यह पोखरा मुगल काल में खुदवाया गया था और तब से गाँव वालों की प्यास बुझा रहा था। पर आजकल पोखरे का पानी घटता जा रहा था और गाँव के लोग भी धीरे-धीरे शहरों की ओर पलायन कर रहे थे।

मीनाक्षी ने एक पत्थर उठाया और पोखरे में फेंका। पानी में उठती लहरों ने शाम की शांति तोड़ दी। वह अकेली थी, पर उसकी अकेलापन उसे भारी नहीं लगता था। इस पोखरे के साथ उसका एक खास रिश्ता था – वह यहाँ आकर अपने सारे दुख-सुख बाँट लेती थी।

बाबा की कहानियाँ

मीनाक्षी को अपने दादा बाबा की याद आ गई, जो अब इस दुनिया में नहीं थे। बाबा ही उसे इस पोखरे की कहानियाँ सुनाया करते थे। वे कहते थे कि इस पोखरे में एक विशाल कछुआ रहता है जो सैकड़ों साल पुराना है। कुछ लोगों ने उसे देखा भी था, पर बाबा का दावा था कि वह कछुआ केवल उन लोगों को दिखाई देता है जो सच्चे दिल से इस पोखरे से जुड़े होते हैं।

“बेटी मीनू,” बाबा कहते थे, “यह पोखरा केवल पानी का संग्रह नहीं है। यह हमारे गाँव की स्मृतियों का संग्रह है। इसकी हर बूंद में हमारे पूर्वजों का पसीना और आँसू मिला हुआ है।”

बाबा की कहानियों में राजा-रानी, युद्ध, प्रेम और विरह सभी कुछ था। पर मीनाक्षी की पसंदीदा कहानी थी ‘अमर प्रेम की कहानी’ – लीलावती और वीरेन्द्र की कथा। बाबा बताते थे कि कैसे लीलावती, जो इसी गाँव की रहने वाली थी, और वीरेन्द्र, जो पड़ोस के गाँव का था, इसी पोखरे के किनारे मिलते थे। उनका प्रेम इतना गहरा था कि जब वीरेन्द्र युद्ध में मारा गया, तो लीलावती इसी पोखरे में कूदकर अपनी जान दे दी थी।

“और तब से,” बाबा गमगीन आवाज में कहते, “पूर्णिमा की रात को कोई भी इस पोखरे के पास नहीं जाता। कहते हैं लीलावती की आत्मा अभी भी वीरेन्द्र का इंतजार करती हुई यहाँ घूमती है।”

परिवर्तन की बयार

मीनाक्षी ने गहरी सांस ली। बाबा के जाने के बाद से गाँव बदल गया था। नई पीढ़ी के लोगों को पुरानी कहानियों और परंपराओं में कोई दिलचस्पी नहीं थी। शहरों में नौकरी की तलाश में युवा गाँव छोड़ रहे थे। पोखरे की देखभाल करने वाला कोई नहीं था। गाँव के सरपंच ने तो यहाँ एक होटल बनाने की योजना भी बना ली थी।

मीनाक्षी का दिल टूट गया जब उसने सुना कि पोखरे को भरकर उस जमीन पर एक रिसॉर्ट बनाया जाएगा। “यह तो हमारी विरासत है,” उसने अपने पिता से कहा था, “हम इसे इस तरह नष्ट नहीं होने दे सकते।”

पर पिता ने हाथ खड़े कर दिए। “बेटी, जमाना बदल गया है। गाँव में रहकर कोई भविष्य नहीं बनाया जा सकता। तुम्हें भी शहर जाकर पढ़ाई करनी चाहिए।”

मीनाक्षी ने पोखरे की ओर देखा। पानी में उसकी परछाईं झिलमिला रही थी। उसे लगा जैसे पोखरा उसे कुछ कहना चाहता है, कोई रहस्य बताना चाहता है।

रहस्य का सफर

पुरानी डायरी

अगले दिन, मीनाक्षी अपने घर के अटारी में कुछ पुराने सामान की तलाश कर रही थी जब उसे बाबा की एक पुरानी डायरी मिली। डायरी का चमड़े का कवर जर्जर हो चुका था और कागज पीले पड़ गए थे। मीनाक्षी ने उसे धीरे से खोला। पहले पन्ने पर लिखा था: “पोखरे का रहस्य – केवल विश्वास वालों के लिए।”

उत्सुकता से भरी मीनाक्षी ने डायरी पढ़ना शुरू किया। बाबा ने विस्तार से पोखरे के इतिहास के बारे में लिखा था। उन्होंने लिखा था कि पोखरे के नीचे एक गुप्त सुरंग है जो पुराने किले तक जाती है। मुगल काल में जब आक्रमणकारी गाँव पर हमला करते थे, तो गाँव वाले इसी सुरंग से भागकर किले में शरण लेते थे।

डायरी के अंतिम पन्नों में बाबा ने लिखा था: “पोखरे के बीचोंबीच एक विशेष पत्थर है। जब पानी का स्तर कम होता है, तो वह पत्थर दिखाई देता है। उस पत्थर के नीचे सुरंग का प्रवेश द्वार है। पर सावधान! सुरंग में प्रवेश करने से पहले पोखरे के देवता से अनुमति लेना आवश्यक है।”

मीनाक्षी की धड़कने तेज हो गईं। क्या यह सच हो सकता है? क्या पोखरे के नीचे वाकई कोई सुरंग थी?

अनजान साथी

मीनाक्षी ने फैसला किया कि वह इस रहस्य की तह तक जाएगी। पर उसे एक साथी की जरूरत थी। उसने अपने बचपन के दोस्त अरुण को फोन किया, जो अब शहर में पढ़ाई कर रहा था। अरुण हमेशा रहस्यों और रोमांच में दिलचस्पी रखता था।

“अरुण, मुझे तुम्हारी मदद चाहिए,” मीनाक्षी ने फोन पर कहा।

“क्या हुआ मीनू? सब ठीक तो है?” अरुण की चिंतित आवाज सुनाई दी।

मीनाक्षी ने डायरी और पोखरे के रहस्य के बारे में बताया। शुरू में अरुण ने इसे मजाक समझा, पर मीनाक्षी के गंभीर स्वर को सुनकर वह भी रुचि लेने लगा।

“ठीक है, मैं कल गाँव आ रहा हूँ,” अरुण ने कहा, “लेकिन याद रहे, अगर यह सब मजाक निकला तो मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूँगा।”

अगले दिन अरुण गाँव पहुँचा। दोनों पोखरे के किनारे मिले। अरुण ने पोखरे को देखकर सीटी बजाई, “वाह! यह तो बहुत बड़ा है। पर क्या तुम्हें वाकई लगता है कि इसके नीचे कोई सुरंग है?”

मीनाक्षी ने डायरी अरुण को दिखाई। बाबा की लिखावट देखकर अरुण गंभीर हो गया। “तुम्हारे बाबा कभी झूठ नहीं बोलते थे। अगर उन्होंने लिखा है तो जरूर कुछ सच्चाई होगी।”

पहला संकेत

दोनों ने फैसला किया कि वे पोखरे के बीच वाले पत्थर को ढूँढेंगे। पर समस्या यह थी कि पोखरा काफी गहरा था और पानी गंदा होने के कारण नीचे कुछ दिखाई नहीं देता था।

“हमें गोताखोर की जरूरत होगी,” अरुण ने कहा।

“पर गाँव में कोई गोताखोर नहीं है,” मीनाक्षी ने निराश स्वर में कहा।

तभी उनकी नजर पोखरे के उस पार बैठे बूढ़े काशीनाथ पर पड़ी। काशीनाथ गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति थे और पोखरे के बारे में बाबा से भी ज्यादा जानते थे।

दोनों काशीनाथ के पास गए। बूढ़े व्यक्ति की आँखें धुँधली थीं, पर जब मीनाक्षी ने बाबा की डायरी का जिक्र किया, तो उनकी आँखों में चमक आ गई।

“तुम्हारे बाबा ने सच लिखा है बेटा,” काशीनाथ ने कर्कश आवाज में कहा, “पर सुरंग खोजना इतना आसान नहीं है। पोखरा अपना रहस्य आसानी से नहीं बताता।”

“क्या आप हमारी मदद कर सकते हैं?” अरुण ने पूछा।

काशीनाथ कुछ पल चुप रहे, फिर बोले, “पहली बारिश के बाद आना। जब पोखरा लबालब भर जाएगा, तब मैं तुम्हें रास्ता दिखाऊँगा।”

मीनाक्षी और अरुण ने एक-दूसरे की ओर देखा। मानसून अभी एक महीने दूर था। उन्हें इंतजार करना होगा।

हिस्सा 3: प्रतीक्षा और तैयारी

गाँव का विरोध

जब गाँव के लोगों को पता चला कि मीनाक्षी और अरुण पोखरे के रहस्य की खोज कर रहे हैं, तो विभिन्न प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। कुछ बुजुर्गों ने उनका समर्थन किया, तो कुछ ने चेतावनी दी।

“यह पोखरा शांतिप्रिय है,” गाँव की एक बुजुर्ग महिला ने कहा, “उसकी शांति भंग मत करो।”

पर सबसे बड़ी समस्या सरपंच की ओर से आई। सरपंच को डर था कि अगर पोखरे के नीचे कोई ऐतिहासिक सुरंग मिली, तो उसकी रिसॉर्ट की योजना धरी की धरी रह जाएगी।

“यह सब बकवास है,” सरपंच ने गाँव वालों को समझाया, “ये दोनों बच्चे फिल्मी बातें कर रहे हैं। पोखरे के नीचे कुछ नहीं है।”

पर मीनाक्षी हार मानने वाली नहीं थी। उसने और अरुण ने गाँव के युवाओं को इकट्ठा किया और उन्हें पोखरे के ऐतिहासिक महत्व के बारे में बताया।

“अगर हम सुरंग ढूंढ लेते हैं,” मीनाक्षी ने उत्साहित स्वर में कहा, “तो यह पोखरा और हमारा गाँव पर्यटन का केंद्र बन सकता है। लोग रोजगार के लिए शहर नहीं जाएँगे।”

युवाओं में उत्साह जगा और कई लोग उनकी मदद के लिए तैयार हो गए।

बारिश का इंतजार

आखिरकार मानसून आ गया। काले बादल छा गए और बारिश की बूंदों ने गाँव को सराबोर कर दिया। पोखरा कुछ ही दिनों में लबालब भर गया। पानी का स्तर बढ़ने से पोखरे का सौंदर्य दोगुना हो गया। हरियाली चारों ओर फैल गई।

बारिश रुकते ही मीनाक्षी और अरुण काशीनाथ के पास पहुँचे। बूढ़ा व्यक्ति पोखरे के किनारे बैठा हुआ था, जैसे वह उनके आने का इंतजार कर रहा हो।

“आ गए बच्चे?” काशीनाथ ने मुस्कुराते हुए कहा, “चलो, आज मैं तुम्हें वह पत्थर दिखाऊँगा।”

काशीनाथ ने एक छड़ी उठाई और पोखरे के किनारे-किनारे चलना शुरू किया। मीनाक्षी और अरुण उनके पीछे-पीछे चले। कुछ दूर जाकर काशीनाथ रुके और छड़ी से पानी की ओर इशारा किया।

“देखो, वहाँ तीन पेड़ हैं – एक पीपल, एक बरगद और एक नीम। इन तीनों की रेखा जहाँ मिलती है, वहीं वह पत्थर है।”

मीनाक्षी ने देखा – सचमुच, तीन पेड़ एक काल्पनिक त्रिभुज बना रहे थे। उस त्रिभुज के केंद्र में पानी की सतह पर कुछ उभार दिखाई दे रहा था।

“पर पानी अभी भी गहरा है,” अरुण ने कहा, “हम वहाँ तक कैसे पहुँचेंगे?”

“बारिश रुक गई है,” काशीनाथ ने कहा, “अगले कुछ दिनों में पानी का स्तर कम हो जाएगा। तब तुम आसानी से पत्थर तक पहुँच सकोगे।”

सुरंग का द्वार

तीन दिन बाद, पानी का स्तर काफी कम हो गया। मीनाक्षी, अरुण और गाँव के कुछ युवा पोखरे में उतरे। पानी उनके कमर तक था। वे धीरे-धीरे उस पत्थर की ओर बढ़े जिसके बारे में काशीनाथ ने बताया था।

पत्थर बड़ा और चिकना था। उस पर कुछ अजीब निशान बने हुए थे जो समय के साथ धुंधले पड़ गए थे।

“ये निशान क्या हैं?” अरुण ने पूछा।

मीनाक्षी ने पत्थर को हाथ से साफ किया। निशान स्पष्ट होने लगे। वे कुछ प्राचीन लिपि में लिखे हुए थे।

“मुझे लगता है ये संस्कृत हैं,” मीनाक्षी ने कहा।

तभी गाँव के एक युवा ने चिल्लाकर कहा, “देखो! पत्थर हिल रहा है!”

सचमुच, जब मीनाक्षी ने पत्थर के केंद्र में बने एक विशेष निशान पर हाथ रखा, तो पत्थर हल्का सा हिला। सभी हैरान रह गए।

“इसे दबाओ!” अरुण ने कहा।

मीनाक्षी ने पूरी ताकत से उस निशान को दबाया। कुछ सेकंड के लिए कुछ नहीं हुआ, फिर अचानक एक जोरदार आवाज हुई और पत्थर एक तरफ सरक गया। पत्थर के नीचे सीढ़ियाँ दिखाई दीं जो अंधेरे में गुम हो रही थीं।

सभी की सांसें रुक गईं। बाबा की बात सच थी! पोखरे के नीचे वाकई एक सुरंग थी।

हिस्सा 4: सुरंग में प्रवेश

अंधेरे का सफर

सुरंग का प्रवेश द्वार खुला देखकर सभी उत्साहित थे, पर साथ ही डरे भी हुए थे। अंधेरी सुरंग में क्या छिपा था? क्या वहाँ खतरनाक जानवर थे? या फिर कोई और रहस्य?

मीनाक्षी ने टॉर्च जलाई और सीढ़ियों पर पहला कदम रखा। “मैं आगे जाती हूँ।”

“नहीं, मैं तुम्हारे साथ आऊँगा,” अरुण ने कहा और उसके पीछे हो लिया।

दोनों धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरे। सीढ़ियाँ पुरानी और घिसी हुई थीं, पर मजबूत थीं। लगभग बीस सीढ़ियाँ उतरने के बाद वे एक बड़े हॉल में पहुँचे।

टॉर्च की रोशनी में उन्होंने देखा कि हॉल की दीवारों पर प्राचीन चित्रकारी थी। चित्रों में राजा-रानी, युद्ध के दृश्य और दैनिक जीवन के चित्र थे।

“यह तो अद्भुत है!” अरुण ने आश्चर्य से कहा, “यहाँ का इतिहास संरक्षित है।”

हॉल के दूसरे छोर पर तीन सुरंगें थीं। मीनाक्षी ने बाबा की डायरी निकाली। डायरी में एक रेखाचित्र था जिसमें तीन सुरंगें दिखाई गई थीं और बीच वाली सुरंग पर एक विशेष निशान बना हुआ था।

“हमें बीच वाली सुरंग से जाना चाहिए,” मीनाक्षी ने कहा।

प्राचीन कलाकृतियाँ

बीच वाली सुरंग से आगे बढ़ने पर वे एक छोटे कमरे में पहुँचे। कमरे में मिट्टी के बर्तन, पुराने सिक्के और कुछ हथियार रखे हुए थे।

“ये तो संग्रहालय जैसा है,” अरुण ने कहा।

मीनाक्षी ने एक मिट्टी का घड़ा उठाया। उस पर सुन्दर नक्काशी थी। “ये सब चीजें ऐतिहासिक महत्व की हैं। हमें इन्हें सावधानी से छूना चाहिए।”

आगे बढ़ने पर उन्हें एक और हॉल मिला जिसके बीचोंबीच एक सुन्दर फव्वारा था। हैरानी की बात यह थी कि फव्वारे से अभी भी पानी की पतली धारा निकल रही थी।

“यह कैसे संभव है?” अरुण ने आश्चर्य से पूछा, “सैकड़ों साल बाद भी यह फव्वारा चल रहा है?”

मीनाक्षी ने फव्वारे के पास जाकर देखा। फव्वारे के आधार पर एक शिलालेख था। “यहाँ लिखा है – ‘जल है तो जीवन है। यह स्रोत अनंत काल तक बहता रहेगा।'”

फव्वारे का पानी स्वच्छ और ठंडा था। मीनाक्षी ने हाथ में पानी लिया और चखा। पानी मीठा और ताजा था।

अप्रत्याशित मुकाम

सुरंग में आगे बढ़ते हुए वे एक बड़े दरवाजे के सामने पहुँचे। दरवाजा लकड़ी का बना हुआ था और उस पर जटिल नक्काशी थी। दरवाजा बंद था।

“अब क्या करें?” अरुण ने पूछा।

मीनाक्षी ने दरवाजे को धक्का दिया, पर वह नहीं खुला। फिर उसने दरवाजे पर बने निशानों को ध्यान से देखा। निशान वैसे ही थे जैसे पोखरे में उस पत्थर पर थे।

मीनाक्षी ने उसी तरह केंद्रीय निशान को दबाया। कुछ क्षणों के लिए कुछ नहीं हुआ, फिर एक जोरदार चरचराहट की आवाज हुई और दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया।

दरवाजे के पार का नज़ारा देखकर दोनों की आँखें फटी की फटी रह गईं। वहाँ एक विशाल हॉल था जिसकी छत से सुन्दर झाड़फानूस लटक रहे थे। हॉल के चारों ओर सोने और चाँदी की मूर्तियाँ थीं और बीच में एक सिंहासन था।

“यह तो राजसभा जैसा है,” अरुण ने फुसफुसाते हुए कहा।

मीनाक्षी ने हॉल के चारों ओर देखा। दीवारों पर राजा के दरबार के चित्र थे। एक चित्र में राजा पोखरे के किनारे बैठे हुए थे और उनके सामने कुछ विद्वान बैठे हुए थे।

“शायद यह वही राजा हैं जिन्होंने यह पोखरा बनवाया था,” मीनाक्षी ने कहा।

तभी उनकी नजर सिंहासन के पीछे लगे एक शिलालेख पर पड़ी। शिलालेख पर लिखा था: “जो भी इस स्थान तक पहुँचेगा, वह इस गाँव का संरक्षक बनेगा। उसका कर्तव्य होगा इस पोखरे और इसकी विरासत की रक्षा करना।”

मीनाक्षी ने अरुण की ओर देखा। दोनों समझ गए कि उन पर कितनी बड़ी जिम्मेदारी आ गई है।

हिस्सा 5: संरक्षण की शपथ

गाँव को सच्चाई बताना

सुरंग से बाहर आकर मीनाक्षी और अरुण ने गाँव वालों को सब कुछ बताया। शुरू में लोगों को विश्वास नहीं हुआ, पर जब कुछ लोगों ने खुद सुरंग देखी, तो सभी हैरान रह गए।

सरपंच भी वहाँ पहुँचे। सुरंग देखकर उनका चेहरा उतर गया। उनकी रिसॉर्ट की योजना अब धरी की धरी रह जाएगी।

“यह सब झूठ है!” सरपंच ने चिल्लाकर कहा, “ये बच्चे कुछ भी बना रहे हैं।”

पर तभी काशीनाथ आगे आए। “सरपंच, सच्चाई स्वीकार करो। यह पोखरा हमारी विरासत है। इसे बचाना हम सबका कर्तव्य है।”

गाँव वालों ने काशीनाथ की बात का समर्थन किया। सभी ने तय किया कि वे पोखरे और सुरंग की रक्षा करेंगे।

संग्रहालय का निर्माण

मीनाक्षी और अरुण ने गाँव के युवाओं के साथ मिलकर एक योजना बनाई। उन्होंने सुरंग में मिली कलाकृतियों को संरक्षित करने का फैसला किया। गाँव के एक पुराने मकान को संग्रहालय में बदलने का काम शुरू हुआ।

साथ ही, उन्होंने पोखरे की सफाई का अभियान चलाया। गाँव के सभी लोगों ने हाथ बंटाया। पोखरे से कचरा साफ किया गया, किनारों पर पेड़ लगाए गए और एक छोटा पार्क बनाया गया।

मीडिया को जब इस खोज के बारे में पता चला, तो गाँव में पत्रकारों का ताँता लग गया। पोखरे और सुरंग की खबर अखबारों और टीवी चैनलों पर छा गई। लोग दूर-दूर से इस ऐतिहासिक स्थल को देखने आने लगे।

नई शुरुआत

कुछ महीनों में गाँव की तस्वीर बदल गई। पोखरा अब गाँव की शान बन गया था। संग्रहालय में सुरंग से मिली कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गईं। गाँव के युवाओं को गाइड के रूप में प्रशिक्षित किया गया।

मीनाक्षी ने गाँव में ही रहकर पोखरे के इतिहास पर शोध करने का फैसला किया। अरुण ने भी शहर की नौकरी छोड़कर गाँव में पर्यटन व्यवसाय शुरू किया।

एक दिन, पोखरे के किनारे बैठे हुए मीनाक्षी ने अरुण से कहा, “क्या तुम्हें लगता है कि बाबा हमें देख रहे हैं?”

अरुण ने मुस्कुराते हुए कहा, “बिल्कुल। वे तुम पर बहुत गर्व कर रहे होंगे। तुमने न सिर्फ पोखरे को बचाया, बल्कि पूरे गाँव को नई दिशा दी।”

मीनाक्षी ने पोखरे की ओर देखा। पानी में चाँद की रोशनी झिलमिला रही थी। उसे लगा जैसे पोखरा उसे धन्यवाद दे रहा हो।

विरासत की रक्षा

आज गाँव पूरी तरह बदल चुका है। पोखरा पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है। गाँव के लोगों को रोजगार मिला है और युवा अब शहर जाने के बजाय गाँव में ही काम कर रहे हैं।

मीनाक्षी ने पोखरे के इतिहास पर एक किताब लिखी है और अरुण ने एक छोटा होटल खोला है। दोनों ने शादी कर ली है और उनका बेटा अक्सर पोखरे के किनारे खेलता है।

एक शाम, जब मीनाक्षी अपने बेटे को पोखरे की कहानियाँ सुना रही थी, तो उसने अचानक

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