तीन बजे का आईना
अरुण की ज़िंदगी एक सुव्यवस्थित मेट्रोनोम की तरह चलती थी। सुबह छह बजे की अलार्म घड़ी, बिना किसी बहाने के दस मिनट के भीतर बिस्तर छोड़ना, रोज़ाना पाँच किलोमीटर की दौड़, नौ बजे तक ऑफिस की कुर्सी पर बैठना, और रात दस बजे फिर से बिस्तर। सात साल से यही दिनचर्या। वह अपने इस अनुशासन पर गर्व करता था। कहते हैं न, इंसान को आदतों का पुतला बनने में छह हफ़्ते लगते हैं, अरुण तो सात साल से एक ही धुन में जी रहा था।
वह शुक्रवार का दिन भी सामान्य था। ऑफिस से थोड़ी देर रात आठ बजे निकला, घर आकर हल्का-फुल्का खाना खाया, कुछ देर न्यूज़ देखी, और दस बजे सोने के कमरे में चला गया। बेडरूम का वातावरण भी उसकी दिनचर्या जितना ही व्यवस्थित था – बाईं तरफ बेडसाइड टेबल पर अलार्म घड़ी और पानी का गिलास, दाईं तरफ खिड़की जिसके पर्दे बिल्कुल बराबर खिंचे रहते, सामने की दीवार पर एक बड़ा सा शीशा लगा था, जिसके सामने वह रोज़ सुबह तैयार होता। उस रात भी, उसने बिस्तर पर लेटते ही आँखें मूँद लीं और अगले पल गहरी नींद में समा गया।
नींद इतनी गहरी और अविच्छिन्न थी कि जब आँख खुली, तो लगा जैसे किसी ने उसकी नींद के बीच के कुछ पन्ने फाड़कर अलग कर दिए हों। उसकी बेडसाइड घड़ी में सुबह के नौ बज रहे थे। पहले तो उसे लगा घड़ी गलत होगी। उसने अपना फोन उठाया – 9:07 AM। सूरज की रोशनी पर्दों के किनारों से फिसलकर कमरे में आ रही थी, जो सामान्य से कहीं अधिक तेज़ और ऊँची लग रही थी। उसका दिल एक अजीब सी गति से धड़कने लगा। वह रात दस बजे सोया था। ग्यारह घंटे की नींद? यह उसके शरीर और दिमाग के लिए असंभव था। फिर भी, उसने अपने आप को समझाया – शायद शुक्रवार की थकान थी, शायद शरीर को आराम की ज़रूरत थी।
लेकिन जैसे ही वह बिस्तर से उठा, उसके पैर नीचे कुछ ठंडा और गीला लगा। उसने नीचे देखा – पानी का गिलास उलटा पड़ा था, और पानी का एक छोटा सा गड्ढा कारपेट पर सोखा जा रहा था। अजीब बात थी कि गिलास बेडसाइड टेबल पर नहीं, बल्कि बिस्तर से दो फ़ुट दूर ज़मीन पर था। उसने कंधे उचकाए, शायद नींद में ही गिलास गिर गया होगा। पर उसके मन के एक कोने में एक सुई सी चुभनी शुरू हो गई थी।
मोड़
नहाने और तैयार होने के बाद भी वह बेचैन था। वह जानता था कि उसके स्मार्टवॉच में स्लीप ट्रैकर का फीचर है, जो हर रात उसकी नींद के पैटर्न, गहरी नींद के घंटे, हल्की नींद और REM स्लीप को रिकॉर्ड करता है। उसने वॉच को चार्जर से उतारा और अपने फोन पर एप खोला। ग्राफ़ सामने आया। रात दस बजे से सुबह छह बजे तक का डाटा स्पष्ट दिख रहा था – लेकिन वहीं पर, रात ढाई बजे से लेकर सुबह पाँच बजे तक… कुछ नहीं। सीधी, खाली रेखा। ऐसा लग रहा था जैसे उस तीन घंटे के दौरान वॉच ने काम करना बंद कर दिया हो, या फिर उसका शरीर ही… गायब हो गया हो।
एक ठंडी लहर उसकी रीढ़ से होकर गुज़री। उसने वॉच को दोबारा चेक किया – बैटरी पूरी थी। सेंसर साफ थे। तो फिर यह खालीपन क्यों? उसने उन तीन घंटों के बारे में सोचने की कोशिश की, लेकिन दिमाग में एक गहरा, काला पर्दा सा लटका हुआ था। कोई याद नहीं। बिल्कुल भी नहीं।
वह नीचे लिविंग रूम में गया। घर सुनसान था। उसकी नज़र ड्राइंग रूम में लगे बड़े वॉल माउंटेड शीशे पर पड़ी, जिसमें पूरा कमरा दिख रहा था। उसने अपना चेहरा देखा – थका हुआ, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे। लेकिन कुछ और था… एक असहज महसूस हो रहा था, जैसे कोई उसे देख रहा हो। उसने कमरे में चारों तरफ देखा – कोई नहीं था। फिर भी वह भावना दूर नहीं हुई।
दोपहर बारह बजे तक, वह इस अजीब घटना को भूलने की कोशिश कर रहा था। लेकिन जैसे-जैसे दिन ढलने लगा, एक अजीब सी बेचैनी उसके अंदर घर करने लगी। शाम को वह अपने कमरे में वापस आया, तो उसकी नज़र ड्रेसिंग टेबल के उस बड़े शीशे पर गई, जिसके सामने वह रोज़ सुबह शेव करता था। शीशा… वैसा नहीं था। वह थोड़ा सा टेढ़ा लटक रहा था, जैसे किसी ने उसे हिलाकर रख दिया हो। और उसके निचले दाएँ कोने पर, एक छोटा सा लाल-भूरा दाग था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई उंगली वहाँ रखी गई हो, और फिर खिसक कर नीचे की तरफ एक हल्की सी लकीर छोड़ गई हो।
अरुण के मुँह सूख गया। वह धीरे-धीरे शीशे के पास गया। दाग ताज़ा नहीं लग रहा था, सूखा हुआ था। उसने उसे छूने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन रुक गया। तभी, एक धुंधली सी छवि उसके दिमाग में कौंधी – आधी रात का अँधेरा, और यही शीशा। शीशे में उसकी अपनी परछाई नहीं, बल्कि कोई और… कोई धुंधला सा चेहरा, जो उसे देख रहा है। और उसके हाथ में कुछ चमक रहा है…
वह पीछे हट गया। उसका दिल जोरों से धड़क रहा था। उसने फैसला किया कि वह इस दाग को साफ करेगा, इसे मिटा देगा, और इस पूरे मामले को भूल जाएगा। उसने बाथरूम से एक गीला कपड़ा लिया और वापस आया। जैसे ही उसने दाग को रगड़ना शुरू किया, उसकी नज़र शीशे में अपनी परछाई पर टिक गई। उसकी अपनी आँखों में डर साफ झलक रहा था। और फिर… धीरे-धीरे, उसकी परछाई के पीछे, कमरे के कोने में, कुछ हिला।
उसने तेजी से पलटकर देखा। कोना खाली था। सिर्फ उसका अपना कोट स्टैंड वहाँ खड़ा था, जिस पर उसका एक पुराना कोट टँगा हुआ था। साँस छोड़ते हुए उसने खुद को समझाया – नसों का खेल है। लेकिन जैसे ही वह वापस शीशे की तरफ मुड़ा, उसका खून जम सा गया।
शीशे में, अब भी उसकी परछाई थी, लेकिन उसके ठीक पीछे, कोट स्टैंड के पास, एक और आकृति खड़ी थी। पतली, लंबी, एक इंसान से कहीं ज़्यादा ऊँची। उसका सिर छत को छू रहा था। और उसका चेहरा… कोई चेहरा नहीं था। सिर्फ एक धुंधली, सफेद सतह, जिस पर दो गहरे, काले खाली गड्ढे थे, जैसे आँखें। और वह आकृति हिल नहीं रही थी, बस सीधी खड़ी थी, उसकी तरफ ‘देख’ रही थी।
अरुण का दम घुटने लगा। उसने धीरे-धीरे, बिना कोई अचानक हरकत किए, फिर से पीछे मुड़कर देखने का फैसला किया। वह गिना – एक… दो… तीन – और तेजी से पलटा।
कमरा खाली था। कोट स्टैंड वहीं था। कोई लंबी आकृति नहीं।
वह हँसने की कोशिश करता हुआ, खुद को बताने लगा कि यह सब उसकी कल्पना है, थकान है, तनाव है। लेकिन उसका शरीर झूठ नहीं बोल रहा था। उसकी टाँगें काँप रही थीं, हथेलियों से पसीना बह रहा था।
और तभी, अचानक, एक और याद, तेज और स्पष्ट, उसके दिमाग में विस्फोट की तरह फूट पड़ी।
वह उठ रहा है बिस्तर से… लेकिन यह वह नहीं है जो उठ रहा है। यह कोई और है, जो उसके शरीर के अंदर है। वह बिस्तर से उतरता है, पैर ज़मीन पर ठंडे फर्श को महसूस करते हैं, लेकिन संवेदना दूर से, धुंधली सी आ रही है। वह ड्रेसिंग टेबल के पास जाता है और शीशे के सामने खड़ा हो जाता है। शीशे में परछाई है, लेकिन वह परछाई अरुण की नहीं है। वह एक तिरछी, विकृत छवि है। फिर, वह अपना दायाँ हाथ उठाता है। हाथ में कुछ चमक रहा है – एक पुराना सा रेज़र ब्लेड, जो अरुण को याद नहीं कि उसके पास कहाँ से आया। वह ब्लेड को अपनी बाईं हथेली के ऊपर रखता है, और धीरे से, बिना किसी उतावली के, दबाता है। कोई दर्द नहीं होता। सिर्फ एक गहरा, ठंडा एहसास। लाल रंग की एक पतली धार फूटती है और शीशे पर गिरती है। वह ब्लेड को नीचे खिसकाता है, एक सीधी, गहरी रेखा बनाता हुआ। फिर वह अपनी खून से लथपथ हथेली को उठाता है, और शीशे के उस हिस्से पर दबाता है, जहाँ आमतौर पर उसका चेहरा दिखता है। एक हथेली का निशान बनता है। खून शीशे पर बहता है। वह मुड़ता है, और कमरे से बाहर चला जाता है, अंधेरे में खो जाता है…
चरमोत्कर्ष
अरुण चीखने लगा, लेकिन आवाज़ उसके गले में ही अटक गई। वह अपनी बाईं हथेली की तरफ देखने के लिए मजबूर हो गया। वहाँ… कुछ नहीं था। कोई कट नहीं, कोई निशान नहीं। सिर्फ साफ, बेदाग त्वचा। लेकिन याद इतनी वास्तविक थी कि उसे उस जगह पर एक झुनझुनी सी महसूस होने लगी।
वह पागलों की तरह शीशे के पास लपका और उस दाग को जोर-जोर से रगड़ने लगा। “यह सच नहीं है, यह सच नहीं है,” वह बड़बड़ा रहा था। कपड़ा लाल रंग से भर गया, लेकिन दाग मिट नहीं रहा था, बल्कि और गहरा होता जा रहा था, जैसे शीशे के भीतर से आ रहा हो।
और फिर शीशे में वह आकृति वापस आ गई। इस बार वह कोने में नहीं, बल्कि सीधे उसके पीछे, कमरे के बीचों-बीच खड़ी थी। और वह अब और स्पष्ट थी। उसकी लंबी, पतली बाहें उसके शरीर के बगल में लटक रही थीं, और उसकी उंगलियों के सिरों से एक गाढ़ा, लाल तरल टपक रहा था, जो ज़मीन पर गिरते ही गायब हो जाता था। उस ‘चेहरे’ के काले गड्ढों से एक ठंडी, निर्जीव चमक आ रही थी।
अरुण की हिम्मत नहीं हुई कि पीछे मुड़कर देखे। वह शीशे में ही उस आकृति को देखता रहा, जड़वत खड़ा रहा। आकृति ने धीरे-धीरे अपना दायाँ हाथ उठाया, और उसकी लंबी, पतली उंगली शीशे की सतह की तरफ इशारा करने लगी। उंगली शीशे को छूती है… और छूती रहती है। शीशे की सतह पानी की तरह हिलने लगी, जैसे कोई पत्थर तालाब में गिरा हो। छल्ले बनने लगे।
अरुण की साँस थम सी गई। आकृति का हाथ शीशे में घुस गया। उसकी उंगलियाँ, लंबी और हड्डी जैसी, अब शीशे के इस पार, कमरे की हवा में निकल आई थीं। वह धीरे-धीरे बाहर आ रही थी।
भय के आवेग में, अरुण ने आसपास देखा और ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी एक भारी किताब उठा ली। उसने पूरी ताकत से शीशे पर वार किया। एक तेज, चीख़ जैसी आवाज़ हुई – शीशा नहीं, बल्कि कोई जानवर चीख़ रहा हो, ऐसा लगा। शीशा चटखता हुआ, दरारों से भर गया, लेकिन टूटा नहीं। और उन दरारों के पीछे, वह आकृति अभी भी खड़ी थी, उसका हाथ अभी भी बाहर निकल रहा था।
अरुण पीछे भागा, कमरे का दरवाज़ा खोला और सीढ़ियों की तरफ दौड़ा। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह सीधा लिविंग रूम में गया और फोन उठाने लगा, पुलिस को फोन करने के लिए। लेकिन फोन की स्क्रीन पर कोई सिग्नल नहीं था। सिर्फ एक ही चीज़ दिख रही थी – टाइम। 2:00 AM।
पर अभी तो शाम के सात बजे थे! उसने खिड़की से बाहर देखा – बाहर घना अँधेरा था। सड़कें खाली थीं। सामने वाले अपार्टमेंट की खिड़कियाँ अंधेरी थीं, सिवाय एक के। उस एक खिड़की में, एक आकृति खड़ी थी। बिल्कुल वैसी ही, पतली, लंबी। और वह उसकी तरफ मुंह किए हुए थी।
अरुण ने आवाज़ लगाई, चीख़ा, लेकिन आवाज़ कमरे की दीवारों से टकराकर वापस लौट आई, मरोड़ खाई हुई, बेसुरी। उसने अपनी हथेली देखी। अब वहाँ कुछ उभर रहा था। एक लाल रेखा, धीरे-धीरे, जैसे कोई अदृश्य कलम उसे खींच रही हो। एक सीधी, गहरी रेखा, ठीक वैसी ही जैसी उसकी याद में थी।
उसने अपनी जेब से चाबी निकाली, रेखा पर रगड़ी – कुछ नहीं हुआ। यह उसकी त्वचा के नीचे से आ रही थी। और जैसे-जैसे रेखा पूरी हो रही थी, उसे एक खिंचाव सा महसूस होने लगा, जैसे कोई उसे खींच रहा हो… उसके अपने ही कमरे की तरफ।
अंत:
अरुण ने खुद को संभाला। यह नहीं हो सकता। यह सब उसके दिमाग का खेल है। शायद उसे नींद में चलने की बीमारी है, शायद वह तनाव में है। उसने गहरी साँसें लेनी शुरू कीं, जैसे मेडिटेशन में सिखाया जाता है। उसने अपनी हथेली पर बन रही रेखा को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की। उसने अपने फोन की घड़ी देखी – अब 2:30 AM दिखा रही थी।
वह धीरे-धीरे सीढ़ियों से ऊपर अपने कमरे की तरफ चल पड़ा। दरवाज़ा खुला था। अंदर का नज़ारा उसे स्तब्ध कर गया। शीशा अब पूरी तरह से साफ था। कोई दरारें नहीं, कोई दाग नहीं। ऐसा लग रहा था जैसे कुछ हुआ ही न हो। कमरे में हवा स्थिर और ठंडी थी।
उसने अपनी स्मार्टवॉच पर नज़र डाली, जो अभी भी उसकी कलाई पर थी। स्क्रीन चमक रही थी। उस पर एक नोटिफिकेशन था: “स्लीप साइकिल पूरा हुआ। नया शेड्यूल सेव किया गया: 2:00 AM – 5:00 AM। शीर्षक: प्रतिकृति। अगला सत्र: आज रात।”
‘डिलीट’ का विकल्प झिलमिला रहा था। अरुण का हाथ काँप रहा था। उसने ‘डिलीट’ पर क्लिक किया। नोटिफिकेशन गायब हो गया। उसने राहत की साँस ली। शायद… शायद सब ठीक हो जाएगा।
वह नीचे लिविंग रूम में आया और सोफे पर बैठ गया। थकान और तनाव से उसकी आँखें भारी होने लगीं। वह सो गया।
जब उसकी आँख खुली, तो वह अपने बिस्तर पर था। सुबह के सूरज की किरणें कमरे में आ रही थीं। उसकी बेडसाइड घड़ी में… छह बज रहे थे। उसका दिल धक से रह गया। उसने अपना फोन उठाया – 6:05 AM। उसने अपनी स्मार्टवॉच देखी। स्लीप डाटा पूरी रात का, बिना किसी खालीपन के, सामान्य ग्राफ दिखा रहा था।
क्या सब कुछ एक बुरा सपना था? उसने अपनी बाईं हथेली देखी – साफ थी। वह हँसा, एक ठंडी, नर्वस हँसी। भगवान का शुक्र है। वह उठा, और रोज़ की तरह दौड़ने जाने के लिए तैयार होने लगा। ड्रेसिंग टेबल के पास जाते हुए, उसने शीशे में अपना चेहरा देखा। थका हुआ, लेकिन शांत। उसने शेविंग क्रीम लगानी शुरू की।
और तभी, उसकी नज़र शीशे में अपनी ही आँखों पर पड़ी। वह रुक गया। कुछ गलत था। आँखों की पुतलियों में… उसकी अपनी परछाई नहीं थी। वहाँ, गहराई में, एक और छवि थी – एक लंबी, पतली आकृति, एक खाली, सफेद चेहरा, जो उसे देख रहा था। और जब अरुण ने हैरानी से अपनी आँखों के और पास झुककर देखा, तो शीशे में उसकी परछाई ने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया, और उसकी हथेली दिखाई।
हथेली पर, लाल रेखाओं से बना एक निशान साफ उभर आया था।
शीशे के बाहर, असली अरुण की हथेली अभी भी साफ थी।
लेकिन जैसे ही वह देखता रहा, उसकी अपनी हथेली की त्वचा के नीचे, हल्की सी एक लाल रेखा उभरने लगी, धीरे-धीरे, अनिवार्य रूप से, उसी पैटर्न में, जैसे कोई अदृश्य सुई उसे टैटू बना रही हो।
उसने घड़ी देखी। रात दस बजने में अभी पंद्रह घंटे थे।
और सामने वाले अपार्टमेंट की खिड़की में, वह आकृति अब भी खड़ी थी, और अब उसके साथ एक और आकृति दिखाई दे रही थी – एक नई, कम ऊँची, अरुण के कद की। वह दोनों आकृतियाँ, शांतिपूर्वक, अँधेरी खिड़की से उसे देख रही थीं। इंतज़ार कर रही थीं।
अगले तीन घंटों का।