पंद्रह मार्च। आज सेंट जेवियर्स स्कूल के बारहवीं कक्षा के छात्रों के लिए आख़िरी दिन था। आख़िरी घंटी बजने का इंतज़ार करते हुए पूरी कक्षा में एक अजीब सी शांति छाई हुई थी। वह शांति जो दिल में उथल-पुथल छुपाए होती है।
राहुल अपनी बेंच पर बैठा खिड़की से बाहर देख रहा था। वही आम का पेड़ जिस पर वह चौथी कक्षा में चढ़ गया था और प्रिंसिपल सर से डाँट खाई थी। वही बास्केटबॉल कोर्ट जहाँ उसने आख़िरी मैच में विजयी शॉट लगाया था। और वही लाइब्रेरी की खिड़की जहाँ से वह मोहित को चुपके से नोट फेंकता था।

“क्या सोच रहे हो?” उसके साथ बैठे अनुराग ने पूछा।
“कुछ नहीं। बस… आज आख़िरी दिन है न। बारह साल का सफर खत्म।” राहुल ने कहा।
“हाँ भाई, फिर तो सब अलग हो जाएँगे। तू दिल्ली जा रहा है इंजीनियरिंग के लिए, मैं मुंबई, सोनल चेन्नई, मोहित कोलकाता…” अनुराग की आवाज धीमी हो गई।
कक्षा के आगे प्रियंका मैडम खड़ी थीं, जो बारहवीं की कक्षा अध्यापिका थीं। उनकी आँखें भी नम थीं। उन्होंने सोलह साल इसी स्कूल में पढ़ाया था, लेकिन हर बार यह आख़िरी दिन उनके लिए कठिन होता था।
“बच्चों, आज हमारा आख़िरी दिन है एक साथ,” प्रियंका मैडम ने कहा, उनकी आवाज भावुक हो रही थी। “मैं चाहती हूँ कि आज हम सब अपनी कुछ यादें साझा करें। कोई भी बोल सकता है।”
यादों का सफर
पहला खड़ा हुआ विकास, कक्षा का मॉनिटर। “मैडम, मुझे याद है जब मैं छठी कक्षा में नया आया था। मैं बहुत शर्मीला था। पहले दिन ही मेरी किताबें गिर गई थीं और राहुल ने उन्हें उठाने में मेरी मदद की थी। उस दिन से हम दोस्त हैं।”
सोनल, कक्षा की टॉपर, बोली, “मुझे याद है जब मैंने आठवीं में पहली बार डेबेट प्रतियोगिता जीती थी। मैडम, आपने मुझे तैयार किया था। आपने कहा था – ‘सोनल, डरना मत, बोलो। तुम्हारी आवाज़ में ताकत है।’ उस दिन मैंने सीखा कि आत्मविश्वास क्या होता है।”
एक-एक कर सभी बोल रहे थे। हर किसी के पास सुनाने के लिए एक कहानी थी। कोई खेल की याद, कोई पिकनिक की, कोई परीक्षा की तैयारी की, कोई शरारत की।
राहुल ने देखा कि आकाश, जो आमतौर पर कक्षा का मज़ाकिया लड़का था, आज गंभीर था। जब उसकी बारी आई तो वह बोला, “मुझे याद है जब नौवीं में मैंने प्रयोगशाला में गलती से केमिकल्स मिला दिए थे और छोटा सा विस्फोट हो गया था। मैं डर गया था कि स्कूल से निकाल दिया जाएगा। लेकिन प्रिंसिपल सर ने मुझे समझाया, ‘आकाश, गलतियाँ सबसे होती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि उनसे सीखो।’ उस दिन मैंने जिम्मेदारी सीखी।”
प्रियंका मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा, “और उस दिन के बाद तुमने कभी लैब में शरारत नहीं की।”
सब हँस पड़े। लेकिन हँसी के पीछे एक कसक थी।
दोपहर का समय था। आख़िरी घंटी बजने में अभी एक घंटा था। प्रियंका मैडम ने कहा, “बच्चों, आज मैं आपको आख़िरी पाठ पढ़ाना चाहती हूँ। यह किताब का नहीं, जीवन का पाठ है।”
सभी ने ध्यान से सुनना शुरू किया।
“बारह साल पहले जब आप इस स्कूल में आए थे, तो आप सब छोटे-छोटे बच्चे थे। कुछ रोते हुए आए थे, कुछ हँसते हुए। आज आप युवा हो चुके हैं। आपने यहाँ न केवल गणित, विज्ञान, अंग्रेजी सीखी, बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण पाठ भी सीखे।”
“आपने सीखा कि असफलता सफलता से अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि वही हमें मजबूत बनाती है। आपने सीखा कि दोस्ती में ईमानदारी कितनी ज़रूरी है। आपने सीखा कि सम्मान देना और सम्मान पाना क्या होता है।”
राहुल की नज़र कक्षा के कोने में लगे उस शेल्फ़ पर गई जहाँ सभी ट्रॉफियाँ रखी थीं। उनमें से एक बास्केटबॉल ट्रॉफी थी जो उसने जीती थी। लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण थी वह दोस्ती जो उसने इस स्कूल में बनाई थी।
प्रियंका मैडम ने आगे कहा, “आज के बाद आप सब अलग-अलग रास्तों पर चल पड़ेंगे। कुछ डॉक्टर बनेंगे, कुछ इंजीनियर, कुछ वैज्ञानिक, कुछ कलाकार। लेकिन याद रखना, जो भी बनो, अच्छे इंसान बनना न भूलना।”
“सफलता का मापदंड केवल पैसा या पद नहीं है। सच्ची सफलता तब है जब आप दूसरों की मदद करें, समाज के लिए कुछ अच्छा करें।”
लंच ब्रेक की घंटी बजी। आज यह आख़िरी लंच ब्रेक था। सभी छात्र अपने-अपने टिफ़िन लेकर मैदान में इकट्ठा हुए। आज कोई अलग-अलग ग्रुप में नहीं बैठा। सभी एक साथ बैठे थे।
राहुल, अनुराग, सोनल, विकास, आकाश और मोहित एक साथ बैठे थे। उन्होंने अपने टिफ़िन साझा किए। राहुल की माँ ने उसके लिए पूरी, अनुराग की माँ ने राजमा-चावल, सोनल ने इडली-सांभर लाई थी।
“याद है नौवीं कक्षा में जब हम सबने पहली बार एक दूसरे के साथ लंच शेयर किया था?” सोनल ने पूछा।
“हाँ, तब तूने मुझे अपना सैंडविच दिया था क्योंकि मेरा टिफ़िन भूल गया था,” अनुराग ने कहा।
“और तूने अगले दिन मेरे लिए दो सैंडविच लाए थे!” सोनल हँसी।
मोहित, जो आमतौर पर चुप रहता था, बोला, “मुझे याद है जब हम सबने मिलकर दसवीं की परीक्षा की तैयारी की थी। राहुल मुझे गणित पढ़ाता था, मैं उसे अंग्रेजी, सोनल सबको विज्ञान।”
“और अनुराग सबको सोने के लिए कहता था!” आकाश ने मज़ाक किया।
सब हँस पड़े। लेकिन हँसी जल्दी ही खत्म हो गई। एक सच्चाई उन सबके सामने थी – यह उनकी आख़िरी साझा लंच थी।
“क्या तुम सबको लगता है कि हम फिर कभी एक साथ बैठ पाएँगे?” विकास ने सवाल किया।
एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। फिर राहुल बोला, “हम कोशिश करेंगे। हर साल मिलने का वादा करते हैं।”
“वादा!” सभी ने एक साथ कहा।
विदाई समारोह
लंच के बाद विदाई समारोह का आयोजन था। स्कूल का ऑडिटोरियम सजा हुआ था। सभी बारहवीं कक्षा के छात्र एक साथ बैठे थे। मंच पर प्रिंसिपल डॉ. शर्मा, सभी शिक्षक और कुछ अभिभावक बैठे थे।
प्रिंसिपल डॉ. शर्मा ने भाषण शुरू किया। “आज का दिन मेरे लिए भी भावुक कर देने वाला है। मैं इस स्कूल के तीसरे बैच को विदा कर रहा हूँ। हर बार यह दिन कठिन होता जाता है।”
“आप सब ने न केवल शैक्षिक उपलब्धियाँ हासिल की हैं, बल्कि इस स्कूल की संस्कृति को भी आगे बढ़ाया है। आपने सिखाया है कि प्रतिस्पर्धा के इस युग में भी सहयोग और दोस्ती बनी रह सकती है।”
एक-एक कर सभी शिक्षकों ने अपने विचार रखे। फिजिक्स के श्री नायर ने कहा, “मुझे याद है जब राहुल ने पहली बार प्रोजेक्टर का बल्ब बदलकर दिखाया था। मैं हैरान रह गया था।”
कंप्यूटर साइंस की श्रीमती खन्ना बोलीं, “सोनल, तुम्हारा कोडिंग का प्रोजेक्ट पूरे राज्य में पुरस्कार जीता। मुझे तुम पर गर्व है।”
हिंदी की श्रीमती पाठक भावुक हो गईं। “आकाश, तुमने कविता पाठ प्रतियोगिता में जो भाव दिखाया, वह अद्भुत था। कभी सोचा नहीं था कि तुम इतने संवेदनशील हो।”
हर शिक्षक के पास हर छात्र के लिए एक याद थी। यह सुनकर सभी छात्रों को एहसास हुआ कि वे सिर्फ रोल नंबर नहीं थे, बल्कि हर शिक्षक ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से जाना था।
छात्रों की ओर से
अब छात्रों के प्रतिनिधि भाषण देने के लिए आमंत्रित किए गए। राहुल को यह सम्मान मिला कि वह अपनी कक्षा की ओर से बोले।
वह मंच पर गया। माइक्रोफोन के सामने खड़े होकर उसने पूरे ऑडिटोरियम को देखा। उसके सामने वे सभी चेहरे थे जिनके साथ उसने बारह साल बिताए थे।
“आदरणीय प्रिंसिपल सर, सभी शिक्षकगण, और मेरे सहपाठियों,” राहुल ने शुरुआत की, उसकी आवाज़ भावुक थी।
“जब मैं आज सुबह स्कूल आया, तो मैंने सोचा कि मैं क्या बोलूँगा। फिर मुझे एहसास हुआ कि शब्द कभी भी भावनाओं को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकते।”
“इन बारह वर्षों में हमने क्या नहीं सीखा? हमने सीखा कि कैसे पेंसिल पकड़नी है, कैसे लिखना है, कैसे गणना करनी है। लेकिन उससे भी अधिक, हमने सीखा कि कैसे मित्र बनाने हैं, कैसे समस्याओं का सामना करना है, कैसे सपने देखने हैं।”
“हर शिक्षक ने हमें कुछ न कुछ दिया है। प्रियंका मैडम ने हमें आत्मविश्वास दिया, नायर सर ने हमें तार्किक सोच सिखाई, खन्ना मैडम ने हमें तकनीक से परिचित कराया, पाठक मैडम ने हमें अपनी संस्कृति से जोड़ा।”
राहुल की आँखें नम हो गईं। “लेकिन सबसे बड़ा पाठ जो हमने सीखा, वह यह है कि स्कूल सिर्फ एक इमारत नहीं है। यह एक परिवार है। और आज हम इस परिवार से बाहर जा रहे हैं।”
“हम वादा करते हैं कि हम जहाँ भी जाएँगे, हम इस स्कूल की मर्यादा को बनाए रखेंगे। हम अच्छे नागरिक बनेंगे। और हम कभी नहीं भूलेंगे कि हम सेंट जेवियर्स के छात्र हैं।”
पूरा ऑडिटोरियम तालियों से गूँज उठा। कई लोगों की आँखें नम थीं।
आख़िरी घंटी
समारोह के बाद सभी छात्र अपनी-अपनी कक्षाओं में लौट आए। अब आख़िरी घंटी बजने में केवल कुछ मिनट बचे थे।
प्रियंका मैडम कक्षा में आईं। उनके हाथ में एक छोटा सा बॉक्स था।
“बच्चों, मैं आप सबको कुछ देना चाहती हूँ,” उन्होंने कहा। बॉक्स खोलकर उन्होंने छोटे-छोटे पत्थर निकाले, हर पत्थर पर एक छात्र का नाम लिखा था।
“ये पत्थर मैंने पिछले सप्ताह नदी से इकट्ठे किए थे। हर पत्थर अलग है, जैसे आप सब अलग हैं। लेकिन सब मिलकर एक सुंदर संग्रह बनाते हैं।”
एक-एक कर सभी को उनका पत्थर दिया गया। राहुल के पत्थर पर उसका नाम और “नेतृत्व” लिखा था। सोनल के पत्थर पर “जिज्ञासा”, अनुराग के पत्थर पर “वफादारी”, आकाश के पत्थर पर “उत्साह”।
“ये पत्थर याद दिलाएँगे कि आप सबकी अपनी विशेषताएँ हैं। इन्हें कभी न भूलना।”
तभी घड़ी ने तीन बजाए। आख़िरी घंटी बजने का समय हो गया था।
कक्षा के बाहर पियोन सुखराम जी खड़े थे, जो बारह साल से स्कूल की घंटी बजाते आ रहे थे। आज उनकी आँखें भी नम थीं।
प्रियंका मैडम ने कहा, “बच्चों, यह आख़िरी घंटी है जो आप सबके लिए बजेगी।”
सुखराम जी ने घंटी की रस्सी खींची। “घंटी~~~”
वह ध्वनि जो बारह साल से उनकी दिनचर्या का हिस्सा थी, आज आख़िरी बार सुनाई दी।
विदाई
घंटी बजते ही सभी छात्रों की आँखों से आँसू बह निकले। कोई चुपचाप रो रहा था, कोई दूसरों को गले लगा रहा था।
राहुल ने अनुराग, विकास, आकाश और मोहित को गले लगाया। “याद रखना, हर साल मिलेंगे।”
“वादा!” सबने एक साथ कहा।
सोनल रो रही थी। राहुल ने उसकी ओर देखा। “सोनल, रो मत। यह अलविदा नहीं है, बस फिर मिलने तक का विराम है।”
“लेकिन सब कुछ बदल जाएगा,” सोनल ने कहा।
“हाँ, बदल जाएगा। लेकिन हमारी दोस्ती नहीं बदलेगी।”
सभी शिक्षकों से विदा ली गई। प्रियंका मैडम ने हर छात्र को आशीर्वाद दिया।
जब राहुल मैडम के पास पहुँचा, तो उन्होंने उसे गले लगा लिया। “राहुल, तुम एक अच्छे नेता हो। तुम्हारे अंदर दूसरों की देखभाल करने की क्षमता है। इसे कभी न खोना।”
“धन्यवाद, मैडम। मैं कभी नहीं भूलूँगा आपका प्यार और मार्गदर्शन।”
एक-एक कर सभी छात्र स्कूल गेट की ओर चल पड़े। गेट पर खड़े होकर राहुल ने पीछे मुड़कर देखा। वह इमारत जहाँ उसने अपना बचपन और किशोरावस्था बिताई थी। वह मैदान जहाँ उसने अपने पहले कदम रखे थे। वह कक्षा जहाँ उसने इतना कुछ सीखा था।
गेट के बाहर
स्कूल गेट के बाहर अभिभावक अपने बच्चों का इंतज़ार कर रहे थे। राहुल के पिता उसके लिए आए थे।
“कैसा रहा आख़िरी दिन?” पिता ने पूछा।
राहुल ने उत्तर नहीं दिया। वह केवल स्कूल की इमारत को देखता रहा।
“पापा, क्या मैं कुछ देर और यहाँ रुक सकता हूँ?” राहुल ने पूछा।
“ज़रूर, बेटा। मैं कार में इंतज़ार करता हूँ।”
राहुल वापस स्कूल के मैदान में गया। वह उस पेड़ के नीचे बैठ गया जहाँ वह और उसके दोस्त अक्सर बैठते थे। उसे याद आया कि कैसे उन्होंने यहाँ बैठकर परीक्षा की तैयारी की थी, कैसे खेलों की रणनीति बनाई थी, कैसे जीवन के सपने बुने थे।
तभी उसे किसी के आने की आहट सुनाई दी। वह अनुराग था।
“मैंने सोचा तू भी यहाँ होगा,” अनुराग ने कहा।
“हम दोनों ही विदा नहीं ले पा रहे,” राहुल मुस्कुराया।
दोनों पेड़ के नीचे बैठ गए। कुछ देर तक चुप रहे। फिर अनुराग बोला, “याद है जब हमने पहली बार इस पेड़ के नीचे बैठकर लंच किया था? हम तब छठी कक्षा में थे।”
“हाँ, तूने मुझे अपना आम का अचार दिया था। और मैंने कहा था कि यह बहुत तीखा है!”
दोनों हँस पड़े।
“राहुल, क्या तुम्हें डर लगता है? भविष्य का?” अनुराग ने पूछा।
“हाँ। लेकिन साथ ही उत्साह भी है। हम नए लोग मिलेंगे, नए अनुभव होंगे। लेकिन ये यादें हमेशा हमारे साथ रहेंगी।”
कुछ देर बाद सोनल, विकास, आकाश और मोहित भी आ गए। सभी फिर से एक साथ थे।
“हमने सोचा कि आख़िरी बार एक साथ इस पेड़ के नीचे बैठें,” सोनल ने कहा।
सभी ने हाथ मिलाया। राहुल बोला, “हम वादा करते हैं कि हम हमेशा दोस्त रहेंगे। चाहे हम कितनी भी दूर क्यों न चले जाएँ।”
“वादा!” सभी ने एक साथ कहा।
आकाश ने अपना फोन निकाला। “चलो, एक आख़िरी तस्वीर लेते हैं।”
सभी पेड़ के नीचे खड़े हो गए। आकाश ने सेल्फी ली। उस तस्वीर में सबके चेहरे पर आँसू थे, लेकिन मुस्कान भी थी।
“मैं यह तस्वीर प्रिंट करवाकर सबको भेजूँगा,” आकाश ने कहा।
राहुल ने अपना पत्थर निकाला जो प्रियंका मैडम ने दिया था। “यह पत्थर मैं हमेशा अपने पास रखूँगा। जब भी मुझे यहाँ की याद आएगी, मैं इसे देखूँगा।”
एक-एक कर सभी ने अपने पत्थर निकाले। वे पत्थर उनकी विशेषताओं का प्रतीक थे, और उन बारह वर्षों का भी जो उन्होंने एक साथ बिताए थे।
शाम होने लगी थी। अब वाकई में जाने का समय था।
“चलो, अब विदा लेते हैं,” विकास ने कहा।
सभी ने एक आख़िरी बार स्कूल को देखा। फिर धीरे-धीरे गेट की ओर चल पड़े।
नई शुरुआत
राहुल जब कार में बैठा, तो उसने पीछे मुड़कर स्कूल को देखा। सूरज की आख़िरी किरणें स्कूल की इमारत पर पड़ रही थीं, जैसे उसे आशीर्वाद दे रही हों।
“पापा, क्या स्कूल की यादें हमेशा ऐसी ही रहेंगी?” राहुल ने पूछा।
“हाँ, बेटा। स्कूल के दिन जीवन के सबसे खूबसूरत दिन होते हैं। तुम इन्हें कभी नहीं भूलोगे। लेकिन याद रखना, यह अंत नहीं है, बल्कि एक नई शुरुआत है।”
राहुल ने अपने बैग से वह पत्थर निकाला। उसे देखकर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसे एहसास हुआ कि स्कूल ने उसे जो दिया है, वह उसके साथ हमेशा रहेगा – ज्ञान, मूल्य, दोस्ती, और वह आत्मविश्वास जो उसे जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद करेगा।
कार चल पड़ी। राहुल ने आख़िरी बार स्कूल की ओर देखा। उसे लगा जैसे स्कूल उसे विदा करते हुए कह रहा हो – “जाओ, दुनिया को दिखाओ कि तुम क्या सीखकर आए हो।”
उस रात राहुल ने अपनी डायरी में लिखा:
“आज स्कूल की आख़िरी घंटी बजी। बारह साल का सफर पूरा हुआ। आँसू थे, लेकिन मुस्कान भी थी। दर्द था, लेकिन उम्मीद भी थी। मैंने सीखा कि विदाई सबसे कठिन पाठ होता है, लेकिन यह भी सिखाता है कि जीवन गतिमान है। हम आगे बढ़ते रहेंगे, लेकिन अपने साथ ये यादें लेकर। स्कूल की आख़िरी घंटी ने एक अध्याय तो समाप्त किया, लेकिन एक नए अध्याय की शुरुआत भी की। और मैं इस नए सफर के लिए तैयार हूँ।”
राहुल ने डायरी बंद करके खिड़की से बाहर देखा। आसमान में तारे चमक रहे थे। उसे लगा जैसे वे तारे उसके भविष्य की रोशनी हैं। स्कूल की आख़िरी घंटी बज चुकी थी, लेकिन जीवन की घंटी अभी बजनी बाकी थी। और वह इसके लिए पूरी तरह तैयार था।