पीपल के नीचे पंचायत

गाँव की वो पुरानी पीपल, जिसकी जड़ें धरती के नीचे कितना फैल चुकी थीं, कोई नहीं जानता था। लेकिन उसकी शाखाएं जितनी ऊपर फैली थीं, उतनी ही इस गाँव के इतिहास में भी थीं। बसंती देवी इस पेड़ के नीचे पचास साल से पंचायत लेती आई थीं। आज उनकी आखिरी पंचायत थी।

“बसंती काकी, आप बिना तो हम लोग ठीक से फैसला नहीं कर पाएंगे,” रमेश ने कहा। वह गाँव का युवा सरपंच था, जिसे बसंती देवी ने ही खड़ा किया था।

पीपल के नीचे पंचायत
पीपल के नीचे पंचायत

बसंती देवी ने अपनी झुर्रीदार आँखों से सबको देखा। उनकी आवाज़ में वो दमक अब भी थी, “बेटा, पंचायत यह पीपल लगाती है, मैं नहीं। मैं तो बस… एक साधन हूँ।”

आज का मामला गंभीर था। गाँव के दो बड़े परिवारों – त्यागी और शर्मा के बीच ज़मीन को लेकर विवाद था। तीन एकड़ की वो ज़मीन दोनों अपनी-अपनी बता रहे थे। कागज़ात गुम थे, सबूत सिर्फ बुजुर्गों की यादें थीं।

“मेरे दादा जी ने बताया था कि 1947 में जब हम लोग यहाँ आए, तो यह ज़मीन हमें मिली थी,” महेंद्र त्यागी बोले, उनकी आवाज़ में गुस्सा था।

“झूठ! हमारे पिता जी ने 1952 में इसे खरीदा था,” विजय शर्मा ने जवाब दिया।

बसंती देवी ने आँखें बंद कर लीं। उन्हें याद आया 1965 का वो दिन, जब पहली बार वो इस पीपल के नीचे बैठी थीं। तब वो नई-नवेली दुल्हन थीं, और उनकी सास, गाँव की मुखिया, उन्हें पंचायत की बारीकियाँ सिखा रही थीं।

“सुनो बसंती,” सास ने कहा था, “पंचायत सिर्फ फैसला सुनाने के लिए नहीं होती। पंचायत का मतलब होता है सुनना। दोनों पक्षों की बात, दोनों के दर्द, और फिर धरती माँ की बात।”

आँखें खोलते हुए बसंती देवी ने कहा, “दोनों कहते हैं कि ज़मीन उनकी है। कोई कागज़ नहीं है। ऐसे में कैसे तय करें?”

सब चुप थे। फिर बसंती ने एक अनोखा सुझाव दिया, “कल सुबह, जब सूरज निकले, दोनों परिवार के तीन-तीन सदस्य उस ज़मीन पर मिलें। वहीं बैठक होगी।”

अगले दिन सुबह, ठंडी हवा चल रही थी। विवादित ज़मीन गाँव के बीचों-बीच थी। एक तरफ त्यागी परिवार, दूसरी तरफ शर्मा परिवार। बीच में बसंती देवी अपने पोते संजय के सहारे बैठीं।

“अब मैं एक-एक कर तुमसे सवाल पूछूंगी,” बसंती ने कहा।

पहला सवाल महेंद्र त्यागी से, “बताओ, इस ज़मीन की मिट्टी कैसी है?”

महेंद्र ने मिट्टी उठाई, उंगलियों के बीच रगड़ी, “हल्की लाल है, दोमट। गेहूँ के लिए अच्छी है।”

फिर विजय शर्मा से वही सवाल।

विजय ने मिट्टी मुठ्ठी में ली, सूँघी, “यह मिट्टी… इसमें बालू ज्यादा है। पानी जल्दी सोख लेती है।”

बसंती मुस्कुराईं, “दोनों ने अलग-अलग बताया। अब दूसरा सवाल: इस ज़मीन पर पिछले बीस साल में क्या उगाया?”

महेंद्र ने तुरंत जवाब दिया, “सरसों, चना, और कभी-कभी मूंग।”

विजय ने कहा, “गन्ना, गेहूँ और धान।”

बसंती की आँखों में एक चमक आई। उन्होंने संजय से कहा, “बेटा, गाँव के बुजुर्ग रामस्वरूप दादा को बुला लाओ।”

रामस्वरूप दादा, जिनकी उम्र नब्बे साल थी, लाठी टेकते आए। बसंती ने उनसे पूछा, “दादा, आपको याद है इस ज़मीन पर कभी कोई पेड़ था?”

रामस्वरूप दादा ने ठंडी सांस ली, “हाँ… एक नीम का पेड़ था। बिल्कुल बीच में। 1978 की बाढ़ में टूट गया था।”

बसंती ने दोनों परिवारों से कहा, “अब तुममें से जो भी इस ज़मीन का असली मालिक है, वो बताए कि नीम का पेड़ किस तरफ था?”

दोनों चुप। फिर महेंद्र ने अनिश्चितता से कहा, “उत्तर की तरफ?”

विजय ने सोचा, “दक्षिण में?”

रामस्वरूप दादा ने सिर हिलाया, “पूरब में था। दोनों गलत बोले।”

बसंती देवी ने गंभीर होते हुए कहा, “तो न तो त्यागी जानते हैं, न शर्मा। फिर यह ज़मीन किसकी है?”

एक गहरी चुप्पी छा गई। तभी बसंती ने एक हैरान करने वाली बात कही, “यह ज़मीन किसी की नहीं है। यह ज़मीन… गाँव की है।”

सब हैरान। बसंती ने समझाया, “जब कोई कागज़ न हो, कोई सबूत न हो, और दोनों पक्ष सच्चाई न जानते हों, तो ज़मीन समाज की हो जाती है। मेरा प्रस्ताव है: यहाँ गाँव का सामुदायिक भवन बने। दवाखाना, पुस्तकालय, और बुजुर्गों के बैठने की जगह।”

पहले तो सब अवाक रह गए, फिर धीरे-धीरे बात समझ में आने लगी। महेंद्र त्यागी बोले, “लेकिन… हमारा हक?”

“हक?” बसंती ने पूछा, “क्या तुमने कभी इस ज़मीन पर फसल उगाई? क्या तुम्हारे पास कोई सबूत है? क्या तुम वाकई जानते हो कि यह तुम्हारी है?”

महेंद्र ने सिर झुका लिया।

विजय शर्मा ने कहा, “पर हम तो…”

“तुम भी वही हो,” बसंती ने कहा, “जिस चीज़ का तुम्हें ज्ञान ही नहीं, उस पर दावा कैसे?”

रामस्वरूप दादा ने आवाज़ दी, “बसंती सही कह रही है। मुझे याद है… यह ज़मीन पहले गाँव के चौधरी की थी। उनके कोई वारिस नहीं था। 1960 में उनकी मौत के बाद से यह विवादित है।”

बसंती ने आगे कहा, “आज मैंने जो तरीका अपनाया, यही पंचायत की असली भावना है। हमने मिट्टी से पूछा, इतिहास से पूछा, और अपनी स्मृतियों से पूछा। सबने कहा – यह ज़मीन किसी एक की नहीं हो सकती।”

धीरे-धीरे लोग समझने लगे। गाँव के शिक्षक प्रकाश ने कहा, “बसंती दादी का विचार अच्छा है। हमें एक सामुदायिक केंद्र की ज़रूरत है।”

लेकिन विवाद इतनी आसानी से खत्म नहीं हुआ। त्यागी और शर्मा परिवार के कुछ युवा नाराज़ थे। रात में, उन्होंने बसंती देवी के घर के सामने नारेबाजी की।

“बूढ़ी औरत हमारी ज़मीन हड़पना चाहती है!”
“हम कोर्ट में जाएंगे!”

बसंती देवी घर के अंदर बैठी थीं। उनकी पोती प्रिया ने चिंतित होकर कहा, “दादी, आप क्यों इतना जोखिम उठा रही हैं? आखिरी दिनों में इतना तनाव?”

बसंती ने प्रिया को अपने पास बिठाया, “बेटी, पंचायत का मतलब ही होता है जोखिम उठाना। सच बोलने में हमेशा जोखिम होता है।”

अगले दिन, एक और घटना हुई। विवादित ज़मीन पर किसी ने रात में “इस ज़मीन पर शर्मा का हक” पेंट कर दिया था। यह देखकर त्यागी परिवार के युवा भड़क गए। स्थिति बिगड़ने लगी।

तभी बसंती देवी वहाँ पहुँच गईं। उनके हाथ में न तो लाठी थी, न कोई हथियार। सिर्फ एक छोटी सी पोटली थी।

“रुको!” उनकी आवाज़ में वो ताकत थी कि सब रुक गए।

उन्होंने पोटली खोली। उसमें से पुराने कागज़ निकाले। “यह देखो,” उन्होंने कहा, “यह 1955 का गाँव का नक्शा है। और यह… 1970 का भूमि रिकॉर्ड।”

सब हैरान। “यह कहाँ से आए?” महेंद्र त्यागी ने पूछा।

“मेरी सास ने मुझे दिए थे,” बसंती ने कहा, “उन्होंने कहा था – इन्हें तभी निकालना जब गाँव बंटने लगे।”

नक्शे में साफ दिख रहा था कि विवादित ज़मीन पर “सामुदायिक” लिखा था। 1970 के रिकॉर्ड में इसे “ग्राम सभा भूमि” दर्शाया गया था।

विजय शर्मा ने पूछा, “आपके पास यह सब था, तो पहले दिन क्यों नहीं दिखाया?”

बसंती मुस्कुराईं, “क्योंकि मैं जानना चाहती थी कि तुम लोगों में कितनी लालच है, कितनी सच्चाई। और मैं चाहती थी कि तुम खुद समझो कि यह ज़मीन किसी की नहीं है।”

यह सुनकर दोनों परिवारों के सदस्य शर्मिंदा हो गए। उन्हें एहसास हुआ कि वो किस बेवकूफी में लड़ रहे थे।

महेंद्र त्यागी ने आगे बढ़कर कहा, “माफ़ कीजिए, बसंती काकी। हम… हम गलत थे।”

विजय शर्मा ने भी सिर झुकाया, “हाँ, हमने गाँव की शांति खराब की।”

बसंती ने दोनों की तरफ देखा, “अब तुम समझ गए न? पंचायत का मतलब जीत-हार नहीं होता। पंचायत का मतलब होता है समझदारी।”

फिर उन्होंने गाँव वालों से कहा, “कल सुबह पीपल के नीचे आखिरी पंचायत होगी। फैसला सुनाना है।”

अगले दिन, पूरा गाँव पीपल के नीचे इकट्ठा था। बसंती देवी ने अपनी आखिरी पंचायत शुरू की।

“पचास साल पहले,” उन्होंने शुरू किया, “जब मैं पहली बार यहाँ बैठी थी, मेरी सास ने मुझसे कहा था – बसंती, यह पीपल सिर्फ एक पेड़ नहीं है। यह हमारे गाँव की आत्मा है। इसकी छाँव में बैठकर जो फैसले होते हैं, वो सिर्फ इंसान नहीं, प्रकृति की सुनकर होते हैं।”

लोग चुपचाप सुन रहे थे।

“आज मैं फैसला सुनाती हूँ,” बसंती ने आगे कहा, “विवादित ज़मीन गाँव की सामुदायिक संपत्ति होगी। वहाँ स्वास्थ्य केंद्र, पुस्तकालय और बुजुर्गों का क्लब बनेगा।”

किसी ने आपत्ति नहीं की।

“लेकिन यह फैसला पूरा नहीं है,” बसंती ने कहा, “इस भवन के निर्माण की ज़िम्मेदारी त्यागी और शर्मा परिवार की होगी। दोनों मिलकर बनाएंगे।”

यह सुनकर दोनों परिवारों के लोग एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

“और एक बात,” बसंती ने कहा, “इस भवन का नाम होगा – ‘एकता भवन’। और इसके प्रवेश द्वार पर लिखा होगा – ‘यहाँ वो आए जिन्होंने लड़ना छोड़कर मिलकर बनाना सीखा।'”

गाँव वालों की आँखों में पानी आ गया। यह सिर्फ ज़मीन का फैसला नहीं था, यह गाँव के भविष्य का फैसला था।

रमेश सरपंच ने खड़े होकर कहा, “बसंती काकी, आप हमारी मार्गदर्शक रही हैं। हम वादा करते हैं कि इस परंपरा को कायम रखेंगे।”

बसंती ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं नहीं रहूंगी, लेकिन यह पीपल रहेगा। और जब तक यह पीपल है, तब तक इसकी छाँव में न्याय मिलता रहेगा।”

कुछ महीने बाद, बसंती देवी चल बसीं। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार, उनकी अस्थियाँ पीपल के पास ही बनाई गई एक छोटी सी जगह में रख दी गईं।

आज, विवादित ज़मीन पर ‘एकता भवन’ खड़ा है। त्यागी और शर्मा परिवार मिलकर उसे चलाते हैं। और हर शाम, गाँव के बुजुर्ग पीपल के नीचे बैठते हैं, उस पंचायत की कहानी सुनाते हैं जब एक बूढ़ी औरत ने सिर्फ ज़मीन का ही नहीं, गाँव के दिलों का भी विवाद सुलझा दिया था।

रमेश अब भी सरपंच है। वो कहता है, “बसंती काकी ने सिखाया कि पंचायत सत्ता नहीं, सेवा है। और न्याय कागज़ों में नहीं, इंसानों के दिलों में होता है।”

पीपल की छाँव अब भी उतनी ही ठंडी है। उसकी पत्तियाँ अब भी कहती हैं वही कहानी – कि सच्ची पंचायत वही है जो लड़ाई को समझदारी में बदल दे। और यह काम कोई कागज़ नहीं, सिर्फ इंसानी दिल कर सकते हैं।

आज भी, जब गाँव में कोई विवाद होता है, लोग पीपल के नीचे इकट्ठा होते हैं। और बसंती देवी की तस्वीर के सामने बैठकर फैसला करते हैं। क्योंकि वो जानते हैं कि बसंती देवी अब भी उन्हें देख रही हैं। पीपल की हर पत्ती पर उनकी मुस्कान बसी है, हर डाल पर उनकी समझदारी।

यही है पंचायत की असली ताकत – न कानून की, न सत्ता की, बल्कि उस विश्वास की जो एक पुराने पीपल और एक बूढ़ी औरत ने मिलकर गाँव के दिलों में बसा दी। और यही विश्वास आज भी उस गाँव को एकता के धागे में बांधे हुए है।

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