खेतों का राजा

खेतों का राजा

मेरे गाँव में एक कहावत थी—”जिसके पास ज़मीन, उसके पास ज़िंदगी।” और हमारे गाँव में सबसे ज़्यादा ज़मीन थी बाबू शिवनारायण सिंह के पास। पचासी बीघा उपजाऊ ज़मीन, जो गाँव के तीनों ओर फैली हुई थी, मानो पूरा गाँव उनकी हथेली पर बसा हो। बाबू शिवनारायण सिंह—जिन्हें सब “राजा साहब” कहते थे। अस्सी साल के …

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चूल्हे की आँच

चूल्हे की आँच

रमा ने कड़ाही में प्याज़-टमाटर का मसाला चलाते हुए सुबह के सूरज को रसोई की खिड़की से झाँकते देखा। चूल्हे की नारंगी लपटें उसके चेहरे पर नाच रही थीं, और उसकी चूड़ियाँ हर हलचल पर खनकती थीं। पर आज उन खनकती चूड़ियों में भी एक उदास सी सन्नाटा था, जैसे वह सिमरन के फोन न …

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पनघट की मुलाक़ात

पनघट की मुलाक़ात

गर्मी की सुबह। सूरज ने अभी-अभी अपनी पहली किरणें फेंकनी शुरू की थीं, लेकिन हवा में पहले से ही गर्मी का एहसास था। गाँव के पनघट पर पहला व्यक्ति मुन्नी देवी थीं, जिनके सिर पर पीतल का घड़ा चमक रहा था। “कल रात से ही पानी कम आ रहा है,” वह बुदबुदाईं। हाथ से बने …

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स्कूल की आख़िरी घंटी

स्कूल की आख़िरी घंटी

पंद्रह मार्च। आज सेंट जेवियर्स स्कूल के बारहवीं कक्षा के छात्रों के लिए आख़िरी दिन था। आख़िरी घंटी बजने का इंतज़ार करते हुए पूरी कक्षा में एक अजीब सी शांति छाई हुई थी। वह शांति जो दिल में उथल-पुथल छुपाए होती है। राहुल अपनी बेंच पर बैठा खिड़की से बाहर देख रहा था। वही आम …

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कच्चे घर का सपना

कच्चे घर का सपना

कच्चे घर का सपना राजू की आँखें खुलीं तो छत से पानी की एक बूँद उसके माथे पर आकर गिरी। वह फर्श पर पड़े पुराने गद्दे से उठ बैठा। बारिश रातभर होती रही थी और उनके कच्चे घर की दीवारों से कीचड़ टपक रहा था। एक कोने में रखा बर्तन पानी से भर चुका था …

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मिट्टी की खुशबू

मिट्टी की खुशबू

वह सुबह जब पहली बार मिट्टी की वह ख़ास खुशबू मेरे नथुनों में समाई, मैं सिर्फ सात साल का था। बारिश के बाद की वह सुबह, जब धूप ने पहली बार जमीन को छुआ और भाप बनकर मिट्टी से उठी वह सुगंध… मेरे दादाजी ने मुझे अपनी गोद में उठा लिया और कहा, “देख रहे …

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अकेलेपन की कहानी अनकहा सन्नाटा

अकेलेपन की कहानी अनकहा सन्नाटा

शहर के एक कोने में बसा वह पुराना मकान नंबर 47, जिसकी खिड़कियाँ सालों से बंद पड़ी थीं। उस मकान में अकेले रहते थे रमेश शर्मा, सत्तर साल के वो बुजुर्ग जिनके चेहरे पर मुस्कान तब आती थी जब वो पुराने एल्बम के पन्ने पलटते। रमेश जी का परिवार बड़ा था। पत्नी सरोज, दो बेटे …

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पिता की छाया

पिता की छाया

पहला अध्याय: वह बरगद का पेड़ गाँव की उस पुरानी कोठी के सामने एक विशाल बरगद का पेड़ था, जिसकी छाया में बैठकर पंडित जी दर्ज़ी की दुकान चलाते थे। रोहन के लिए वह पेड़ सिर्फ एक पेड़ नहीं था, वह उसका पूरा बचपन था। उसकी जड़ों में छुपकर खेलना, डालियों पर चढ़ना, और शाम …

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माँ की खामोश दुआएँ

सुबह की पहली किरण ने गाँव के छोटे-से घर की खिड़की को छुआ। माँ आँगन में बैठी रोटी बना रही थी, उसके हाथों में आटे के साथ-साथ एक सूखी पीली डायरी भी थी। यह डायरी उन्होंने तब से रखी थी जब उनका बेटा राजू दस साल का था। आज राजू अमेरिका से लौट रहा था, …

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