गाँव की पहली साइकिल: पहियों पर सवार एक क्रांति
एक अनोखा आगमन सन् 1962 की बात है। हमारा गाँव ‘सुखपुरा’ दुनिया की भागदौड़ से कोसों दूर, शांति से सोया हुआ था। गाँव की धूलभरी सड़कों पर बैलगाड़ियों के पहियों के निशान और पैदल चलने वालों के पैरों के निशान ही देखने को मिलते थे। एक दिन सुबह-सुबह जब गाँव वाले अपने दैनिक कामों में …