एक ऐसा बचपन जहाँ खिलौने नहीं, जिम्मेदारियाँ थीं
हिमाचल प्रदेश के एक दूरस्थ गाँव “मलाणा” में, जो समुद्र तल से 10,000 फीट की ऊँचाई पर बसा है, मोहन का जन्म हुआ। उसके पिता एक छोटे से खेत में मजदूरी करते थे और माँ गाँव के लोगों के घरों में चूल्हा-चौका करके परिवार चलाती थीं। मोहन तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ा था, और पाँच साल की उम्र से ही उसने अपने पिता के साथ खेत में काम करना शुरू कर दिया था।

उसका स्कूल घर से पाँच किलोमीटर दूर था, और रास्ता इतना दुर्गम था कि बारिश या बर्फबारी में स्कूल जाना असंभव हो जाता। मोहन की दिनचर्या सुबह चार बजे शुरू होती – पहले खेत पर काम, फिर स्कूल के लिए निकलना, शाम को फिर खेत पर काम, और रात को केरोसिन लैंप की रोशनी में पढ़ाई।
“मोहन, तू इतना क्यों पढ़ता है?” उसके पिता ने एक दिन पूछा, “हमारे घर में तो कोई आगे पढ़ा ही नहीं। तू खेती कर ले, हम तेरी शादी कर देंगे।”
पर मोहन का जवाब था, “पिताजी, मैं बड़ा होकर इंजीनियर बनूँगा और पहाड़ों के लोगों की जिंदगी आसान बनाऊँगा।”
पहाड़ों को पार करती शिक्षा की चाह
मोहन ने दसवीं कक्षा में गाँव के स्कूल से पहली बार 95% अंक प्राप्त किए। यह उस पहाड़ी इलाके के लिए एक रिकॉर्ड था। उसके शिक्षक ने उसे आगे पढ़ने के लिए शहर भेजने की सलाह दी, पर मोहन के पिता के पास इतने पैसे नहीं थे।
तभी गाँव के सरपंच ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने गाँव वालों से चंदा इकट्ठा किया और मोहन को शहर भेजा। शहर आकर मोहन के सामने नई चुनौतियाँ थीं – भाषा की बाधा, शहरी संस्कृति से अनभिज्ञता, और आर्थिक तंगी।
मोहन ने एक छोटे से होटल में बर्तन साफ करने का काम शुरू किया। वह सुबह चार बजे उठता, होटल का काम करता, फिर स्कूल जाता, शाम को फिर काम करता, और रात को पढ़ता। एक दिन वह इतना थक गया कि कक्षा में ही सो गया। शिक्षक ने उसे डाँटा, पर जब उसने मोहन की कहानी सुनी तो उसकी आँखें भर आईं।
एक दोस्त की खोज और एक अनमोल रिश्ता
ग्यारहवीं कक्षा में मोहन की मुलाकात आकाश से हुई। आकाश एक धनी परिवार से था, और शुरू में उसने मोहन के साधारण कपड़े और शर्मीले स्वभाव के कारण उससे दूरी बनाई। पर एक घटना ने सब कुछ बदल दिया।
एक दिन कक्षा में शिक्षक ने एक कठिन गणित का प्रश्न पूछा। कोई भी छात्र उसे हल नहीं कर पा रहा था। तभी मोहन ने हाथ उठाया और बोर्ड पर जाकर प्रश्न हल कर दिया। आकाश हैरान रह गया। उस दिन के बाद आकाश ने मोहन से दोस्ती कर ली।
धीरे-धीरे उनकी दोस्ती गहरी होती गई। आकाश ने मोहन को अपने घर बुलाया। मोहन पहली बार किसी शहरी घर में गया था। आकाश की माँ ने मोहन का स्वागत किया और उसे खाना खिलाया।
“तुम कहाँ रहते हो, मोहन?” आकाश की माँ ने पूछा।
मोहन ने झिझकते हुए कहा, “मैं होटल के पीछे एक छोटे से कमरे में रहता हूँ।”
आकाश के माता-पिता मोहन की मेहनत और ईमानदारी से प्रभावित हुए। उन्होंने मोहन को अपने घर रहने का न्योता दिया। शुरू में मोहन ने मना कर दिया, पर आकाश के जिद करने पर वह मान गया।
एक नई दुनिया और नई चुनौतियाँ
आकाश के घर आकर मोहन की जिंदगी बदल गई। अब उसे होटल में काम नहीं करना पड़ता था, और उसे पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय मिलने लगा। पर नई समस्याएँ भी सामने आईं।
मोहन को कंप्यूटर चलाना नहीं आता था, अंग्रेजी में कमजोर था, और शहरी जीवनशैली से अनजान था। आकाश ने उसे कंप्यूटर सिखाया, अंग्रेजी सिखाई, और शहर के तौर-तरीके समझाए।
एक दिन स्कूल में प्रोजेक्ट वर्क था। आकाश और मोहन ने मिलकर “पहाड़ी इलाकों में सोलर एनर्जी के उपयोग” पर प्रोजेक्ट बनाया। मोहन ने अपने गाँव की समस्याएँ बताईं और आकाश ने तकनीकी समाधान सुझाए। उनका प्रोजेक्ट स्कूल में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
पर इस सफलता के बाद मोहन के मन में एक डर पैदा हो गया। उसे लगा कि वह आकाश के घर पर बोझ बन रहा है। एक रात उसने आकाश से कहा, “तुम्हारे परिवार ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है। मैं अब अपने कमरे में वापस चला जाऊँगा।”
आकाश ने कहा, “मोहन, दोस्ती में लेन-देन नहीं होता। तुम मेरे भाई हो, और भाई एक-दूसरे की मदद करते हैं।”
इंजीनियरिंग की ओर पहला कदम
बारहवीं कक्षा में मोहन ने 98% अंक प्राप्त किए और IIT की प्रवेश परीक्षा की तैयारी शुरू की। आकाश ने भी उसके साथ तैयारी करने का फैसला किया। दोनों ने मिलकर एक टाइमटेबल बनाया – सुबह पाँच बजे से रात ग्यारह बजे तक पढ़ाई।
पर मोहन के लिए कोचिंग की फीस एक बड़ी बाधा थी। आकाश के पिता ने मोहन की फीस भरने का प्रस्ताव रखा, पर मोहन ने कहा, “मैं अपनी फीस खुद भरूँगा।”
मोहन ने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। वह गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ाता और अमीर परिवारों के बच्चों से पैसे लेता। छह महीने में उसने अपनी कोचिंग की पूरी फीस जमा कर ली।
प्रवेश परीक्षा के दिन, मोहन बहुत तनाव में था। आकाश ने उसे समझाया, “तुमने इतनी मेहनत की है, तुम जरूर सफल होंगे।”
परिणाम आए और मोहन ने IIT दिल्ली में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के लिए चयन प्राप्त किया। आकाश ने भी एक अच्छे कॉलेज में कंप्यूटर साइंस में प्रवेश पाया।
कॉलेज की दुनिया और नए संघर्ष
IIT आकर मोहन के सामने नई चुनौतियाँ थीं। अंग्रेजी में कमजोर होने के कारण उसे शुरुआत में काफी दिक्कतें आईं। कई बार वह क्लास में प्रश्न पूछने से डरता क्योंकि उसे लगता था कि लोग उसकी अंग्रेजी का मजाक उड़ाएँगे।
एक दिन उसके प्रोफेसर ने उसे बुलाया, “मोहन, मैंने तुम्हारी फाइल देखी है। तुमने बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए हैं। पर तुम क्लास में क्यों नहीं बोलते?”
मोहन ने झिझकते हुए कहा, “सर, मेरी अंग्रेजी अच्छी नहीं है।”
प्रोफेसर ने मुस्कुराते हुए कहा, “अंग्रेजी एक भाषा है, बुद्धिमत्ता का मापदंड नहीं। तुम जो जानते हो, उसे बेझिझक बोलो।”
इस बात ने मोहन का आत्मविश्वास बढ़ाया। उसने अंग्रेजी सीखने के लिए कड़ी मेहनत की। वह अंग्रेजी समाचार सुनता, अखबार पढ़ता, और अपने सहपाठियों से अंग्रेजी में बात करता।
दोस्ती की राह में मोड़
कॉलेज के दूसरे वर्ष में, मोहन और आकाश की दोस्ती में पहली बार खटास आई। आकाश के पिता का व्यवसाय ठप हो गया और उन्हें आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। आकाश डिप्रेशन में चला गया।
मोहन ने आकाश की मदद करने का फैसला किया। उसने अपनी छात्रवृत्ति का आधा हिस्सा आकाश को देना शुरू किया और उसे समझाया, “जब तुमने मेरी मदद की थी, तब मैंने तुमसे पैसे नहीं लिए थे। आज जब तुम मुश्किल में हो, तो मैं तुम्हारा साथ कैसे छोड़ सकता हूँ?”
मोहन ने आकाश के साथ मिलकर एक छोटा सा स्टार्टअप शुरू किया – एक ऐसा ऐप जो छात्रों को पुरानी किताबें कम दामों में उपलब्ध कराता था। शुरुआत में उन्हें सफलता नहीं मिली, पर हार नहीं मानी।
धीरे-धीरे उनका व्यवसाय चल निकला। एक साल में उन्होंने न केवल अपना खर्च निकाला, बल्कि आकाश के परिवार की आर्थिक मदद भी की।
एक सपना जो सच हुआ
कॉलेज के आखिरी वर्ष में, मोहन ने अपनी पहली बड़ी परियोजना शुरू की – एक ऐसा सोलर वॉटर प्यूरीफायर जो पहाड़ी इलाकों में कम लागत में शुद्ध पानी उपलब्ध करा सके।
उसने इस परियोजना के लिए आकाश की मदद ली। आकाश ने तकनीकी जानकारी दी और मोहन ने व्यावहारिक पक्ष समझाया। छह महीने की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने प्रोटोटाइप तैयार किया।
मोहन ने इस प्रोजेक्ट को एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में पेश किया और प्रथम पुरस्कार जीता। इस जीत ने न केवल उसे पैसा दिलाया, बल्कि एक बड़ी कंपनी की नज़र में भी लाया।
कंपनी ने मोहन को नौकरी का प्रस्ताव दिया, पर मोहन ने इनकार कर दिया। उसने कहा, “मैं अपना स्टार्टअप शुरू करना चाहता हूँ जो पहाड़ी इलाकों के लोगों की समस्याओं का समाधान करे।”
वापसी गाँव की ओर
डिग्री पूरी करने के बाद, मोहन अपने गाँव लौटा। गाँव वाले उसे देखकर हैरान रह गए। “तूने इतनी पढ़ाई की, अब शहर में नौकरी कर लेता,” एक बुजुर्ग ने कहा।
मोहन ने जवाब दिया, “मैंने पढ़ाई इसलिए की ताकि अपने गाँव की सेवा कर सकूँ।”
मोहन ने अपना स्टार्टअप “पहाड़ उत्थान” शुरू किया। इसका उद्देश्य था पहाड़ी इलाकों में सस्ती तकनीकी समाधान उपलब्ध कराना। उसने आकाश को भी अपने साथ जोड़ लिया।
पहली परियोजना के रूप में उन्होंने मोहन के गाँव में सोलर वॉटर प्यूरीफायर लगाया। पहली बार गाँव वालों को शुद्ध पानी मिला। इस सफलता के बाद आस-पास के गाँवों ने भी उनसे संपर्क किया।
चुनौतियों का सामना
शुरुआत में मोहन और आकाश को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लोगों को नई तकनीक पर भरोसा नहीं था, सरकारी अनुमति लेना मुश्किल था, और फंडिंग की कमी थी।
एक बार तो स्थिति इतनी खराब हो गई कि उनके पास कर्मचारियों को तनख्वाह देने के पैसे नहीं थे। मोहन ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपनी जमा पूँजी लगाई और आकाश ने भी अपने कुछ जेवर बेचकर मदद की।
धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई। एक एनजीओ ने उनकी परियोजना में दिलचस्पी दिखाई और फंडिंग की। सरकार ने भी उन्हें सब्सिडी दी।
सफलता और मान्यता
पाँच साल में, “पहाड़ उत्थान” ने सौ से अधिक गाँवों में अपने प्रोजेक्ट लगाए। उन्होंने न सिर्फ सोलर वॉटर प्यूरीफायर, बल्कि सोलर लाइटिंग, सोलर कुकर और अन्य उपकरण भी उपलब्ध कराए।
मोहन की सफलता की कहानी अखबारों और टीवी चैनलों पर छाई। उसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और राष्ट्रपति ने सम्मानित किया।
पर मोहन के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार था उसके गाँव के लोगों का आशीर्वाद। “तूने हमारे गाँव का नाम रोशन किया,” उसके पिता ने गर्व से कहा।
दोस्ती की निरंतरता
आकाश और मोहन की दोस्ती आज भी कायम है। दोनों ने मिलकर न केवल एक सफल व्यवसाय शुरू किया, बल्कि एक अनूठी मित्रता की मिसाल भी कायम की।
“दोस्ती ने मुझे सिखाया कि सफलता अकेले नहीं मिलती,” मोहन कहता है, “आकाश ने मुझे समझदार बनाया, और मैंने आकाश को जिम्मेदार बनाया। हम एक-दूसरे के पूरक हैं।”
आकाश कहता है, “मोहन ने मुझे सिखाया कि सफलता का असली मतलब धन कमाना नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी बदलना है।”
समाज सेवा का संकल्प
आज मोहन और आकाश “पहाड़ उत्थान फाउंडेशन” चलाते हैं जो गरीब मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति देता है। उन्होंने अपने गाँव में एक आवासीय विद्यालय शुरू किया है जहाँ पहाड़ी बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है।
“शिक्षा सबसे बड़ा हथियार है जिससे हम गरीबी और पिछड़ेपन को मिटा सकते हैं,” मोहन कहता है।
प्रेरणा का स्रोत
मोहन आज हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वह अक्सर स्कूलों और कॉलेजों में जाता है और छात्रों से बात करता है।
“सफलता के लिए तीन चीजें जरूरी हैं – मेहनत, लगन और सही दोस्त,” वह कहता है, “मेहनत आपको मौका देती है, लगन आपको लक्ष्य तक पहुँचाती है, और सही दोस्त आपको गिरने नहीं देता।”
निष्कर्ष
मोहन की कहानी सिर्फ एक गरीब लड़के के सफल होने की कहानी नहीं है। यह मेहनत, लगन और सच्ची दोस्ती की कहानी है। यह कहानी हमें सिखाती है कि कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है अगर हम मेहनत करें और सही लोगों का साथ मिले।
मोहन और आकाश की दोस्ती ने साबित किया कि दोस्ती सामाजिक या आर्थिक सीमाओं में नहीं बँधती। यह दिल से दिल का रिश्ता होता है जो हमें बेहतर इंसान बनाता है।
आज मोहन का सपना सच हो चुका है। वह न सिर्फ एक सफल इंजीनियर और उद्यमी है, बल्कि एक समाज सेवक भी है। उसकी यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है। वह आगे बढ़ रहा है, नई ऊँचाइयों को छू रहा है, पर अपनी जड़ों से कभी दूर नहीं हुआ है।
“मैं चाहता हूँ कि हर पहाड़ी बच्चे के पास शिक्षा के अवसर हों,” मोहन कहता है, “ताकि वह भी सपने देख सके और उन्हें सच कर सके।”
यही सपना आज मोहन को आगे बढ़ाता है – पहाड़ों को चीरता हुआ सूरज बनकर, अंधेरे को मिटाता हुआ, नई रोशनी लेकर आता हुआ।