वह सुबह जब पहली बार मिट्टी की वह ख़ास खुशबू मेरे नथुनों में समाई, मैं सिर्फ सात साल का था। बारिश के बाद की वह सुबह, जब धूप ने पहली बार जमीन को छुआ और भाप बनकर मिट्टी से उठी वह सुगंध… मेरे दादाजी ने मुझे अपनी गोद में उठा लिया और कहा, “देख रहे हो बेटा, यह है मिट्टी की सांस। जीवन की पहली सांस।”
हमारा गाँव उत्तर प्रदेश के एक कोने में बसा था – ‘मिट्ठापुर’। नाम सुनकर लगता है जैसे मिठास से भरा होगा, पर असली मिठास यहाँ की मिट्टी में थी। लाल, चिकनी, जिसमें बरसात का पानी पड़ते ही एक अद्भुत सुगंध फैल जाती। दादाजी कहते थे, “इस मिट्टी में सदियों की कहानियाँ दफन हैं। हर बारिश में यह कहानियाँ सांस लेती हैं।”
दादाजी कुम्हार थे। उनकी कुम्हारघर की वह छोटी सी झोपड़ी मेरे लिए पूरे ब्रह्मांड से बड़ी थी। चाक घूमता, उनकी उंगलियाँ मिट्टी को स्पर्श करतीं और मिट्टी जैसे जीवित हो उठती। एक कलश, एक दीया, एक मटका… हर रूप धारण करती। “मिट्टी बोलती है,” दादाजी कहते थे। “बस सुनने वाले कान चाहिए।”
मैं उनकी गोद में बैठकर चाक देखता रहता। एक दिन उन्होंने मेरे हाथ में गीली मिट्टी दी। “इसे महसूस करो,” उन्होंने कहा। उस मिट्टी का स्पर्श… ठंडा, कोमल, जीवित। मैंने उसे निचोड़ा तो पानी की कुछ बूंदें टपकीं। “यह रो रही है,” मैंने कहा। दादाजी हँसे, “नहीं बेटा, यह हँस रही है। तुम्हारे स्पर्श से खुश होकर।”
धीरे-धीरे मैंने चलना सीखा। पहला कदम मैंने कुम्हारघर की मिट्टी पर ही रखा था। दादाजी ने उस जगह को चिन्हित कर दिया, “यहाँ मेरे लाल ने धरती माँ को पहली बार छुआ।” उस दिन से मेरे लिए मिट्टी सिर्फ मिट्टी नहीं रही – वह एक सजीव सत्ता थी।
जब आठ साल का हुआ तो दादाजी ने मुझे पहला पाठ दिया। उन्होंने चाक पर मिट्टी का एक गोला रखा और मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर चाक घुमाया। “मिट्टी को जबरदस्ती नहीं करनी,” उन्होंने समझाया। “उससे पूछो कि वह क्या बनना चाहती है। तुम सिर्फ सहायक बनो।” घंटों बाद, हमारे हाथों से एक छोटा सा दीया बना। अपूर्ण, टेढ़ा-मेढ़ा, पर मेरा पहला सृजन। दादाजी ने उसे पूजा घर में रख दिया, “भगवान को तुम्हारा पहला उपहार।”
हर शाम दादाजी मुझे गाँव के बाहर ले जाते। खेतों की मेड़ पर बैठकर वह मिट्टी के बारे में बताते। “यह मिट्टी तीन रंग की है – लाल, काली और पीली। लाल मिट्टी में लोहा है, काली में जीवन है, पीली में सोना छुपा है।” मैं उनकी बातें सुनता, और मिट्टी को अपनी उंगलियों के बीच रगड़ता। उसकी खुशबू मेरे भीतर उतरती जाती।
बारह साल की उम्र तक आते-आते मैं चाक अच्छी तरह चलाने लगा था। मेरे बनाए छोटे-छोटे बर्तन बाजार में बिकने लगे थे। एक दिन दादाजी बीमार पड़ गए। डॉक्टर ने कहा, “अब यह भारी काम नहीं कर सकते।” उस दिन मैंने पहली बार अकेले चाक चलाया। दादाजी की खाँसी की आवाज कुम्हारघर से आ रही थी, और मेरे हाथ काँप रहे थे। पर जैसे ही मैंने मिट्टी को छुआ, एक शांति मुझे छू गई। मैंने एक कलश बनाया – दादाजी जैसा नहीं, पर उसमें मेरी आत्मा थी।
दादाजी ने उसे देखा, आँखें भर आईं। “तुम समझ गए,” उन्होंने कहा। “मिट्टी ने तुम्हें स्वीकार कर लिया।”
समय बीतता गया। मैं सोलह साल का हुआ, और दादाजी की तबीयत बिगड़ने लगी। एक शाम उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया। “मुझे जाने का समय आ गया है,” उन्होंने कहा। “पर डर मत। मैं इस मिट्टी में ही मिल जाऊँगा। जब भी बारिश के बाद मिट्टी की खुशबू आए, समझ लेना दादाजी तुम्हारे पास हैं।”
उनके गुजरने के बाद, कुम्हारघर की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई। माँ ने कहा, “पढ़-लिखकर कुछ बनो। यह पुराना धंधा छोड़ दो।” पर मैं नहीं छोड़ सका। कुम्हारघर में दादाजी की यादें थीं, और मिट्टी की वह खुशबू जो उनकी याद दिलाती।
मैंने कुम्हारघर को आधुनिक बनाने की कोशिश की। नए डिजाइन, नए रंग। पर गाँव के लोग पुराने डिजाइन ही पसंद करते। “तुम्हारे दादा जैसा बनाओ,” वे कहते। मैं फ़्रस्ट्रेट हो जाता।
एक दिन, शहर से एक युवक आया – प्रोफेसर शर्मा का बेटा, जो आर्ट कॉलेज में पढ़ता था। उसने मेरे बनाए बर्तन देखे और कहा, “यह तो कला है! तुम इसे शहर ले चलो। अच्छे दाम मिलेंगे।”
उसकी बातों ने मेरे मन में एक नई आशा जगाई। मैंने कुछ नमूने बनाए और शहर जाने की सोची। पर माँ ने मना किया, “शहर में हमारा क्या काम? यहीं रहो।”
मैं अट्ठारह साल का हुआ, और गाँव में एक नई समस्या आई – एक बड़ी कंपनी ने गाँव के पास सीमेंट फैक्ट्री लगानी चाही। उन्हें हमारी लाल मिट्टी चाहिए थी, जो सीमेंट बनाने के लिए उत्तम थी। वे गाँव वालों को पैसे देकर जमीन खरीद रहे थे।
धीरे-धीरे, गाँव के आसपास की मिट्टी खोदी जाने लगी। गहरे गड्ढे हो गए। बारिश के बाद मिट्टी की वह पुरानी खुशबू धीरे-धीरे कम होने लगी। उसकी जगह सीमेंट और धूल की गंध ने ले ली।
मैंने प्रतिरोध करने की कोशिश की। गाँव के बुजुर्गों को इकट्ठा किया। “यह मिट्टी हमारी पहचान है,” मैंने कहा। “इसे मत बेचो।” पर पैसे का लालच बड़ा था। कई लोगों ने जमीन बेच दी।
फैक्ट्री शुरू हुई, और कुम्हारघर का काम मुश्किल में पड़ गया। अब हमें मिट्टी के लिए दूर जाना पड़ता। नई मिट्टी में वह गुण नहीं था। बर्तन बनते तो थे, पर उनमें वह चमक नहीं थी, वह मजबूती नहीं थी।
एक दिन, मैंने फैसला किया कि शहर जाऊँगा। कला महोत्सव में भाग लूँगा। मैंने अपने सबसे अच्छे बर्तनों को पैक किया – दादाजी के डिजाइन पर बने, पर मेरी शैली में। माँ ने आशीर्वाद दिया, “जाओ बेटा। दादाजी का नाम रोशन करो।”
शहर पहुँचकर मैं हैरान रह गया। इतनी भीड़, इतना शोर। कला महोत्सव एक बड़े हॉल में हो रहा था। मेरी दुकान एक कोने में थी। लोग आते, मेरे बर्तनों को देखते, और चले जाते। कोई खरीददार नहीं।
दो दिन बीत गए। मैं निराश हो रहा था। तीसरे दिन, एक बुजुर्ग महिला मेरी दुकान पर आई। उन्होंने मेरे बनाए एक कलश को उठाया, उसे घुमा-घुमाकर देखा। “यह मिट्टी कहाँ की है?” उन्होंने पूछा।
“मिट्ठापुर की, दीदा,” मैंने कहा।
उनकी आँखें चमक उठीं। “मैं भी मिट्ठापुर की हूँ। पचास साल पहले विवाह के बाद यहाँ आ गई।”
उन्होंने कलश को अपने चेहरे के पास ले जाकर सूँघा। “इसमें वही खुशबू है… बारिश के बाद की मिट्टी की खुशबू। मैं इसे भूली नहीं।”
उन्होंने न सिर्फ कलश खरीदा, बल्कि अपने सभी दोस्तों को बुला लिया। “आओ, देखो! असली मिट्टी के बर्तन! मशीन से नहीं, हाथ से बने!” उस दिन मेरी सारी कृतियाँ बिक गईं।
एक व्यापारी ने मुझसे संपर्क किया। “मैं तुम्हारे सारे बर्तन खरीदने को तैयार हूँ। पर शर्त यह है कि तुम शहर में रहकर काम करो।”
मैंने सोचा, इतना पैसा मिलेगा तो गाँव की क्या चिंता? पर तभी मैंने उस कलश को देखा जो उस बुजुर्ग महिला ने खरीदा था। उसमें मिट्ठापुर की याद थी। और मैंने महसूस किया – अगर मैं शहर आ गया, तो मिट्ठापुर की मिट्टी की कहानी खत्म हो जाएगी।
मैंने व्यापारी का प्रस्ताव ठुकरा दिया। “मेरी मिट्टी मिट्ठापुर में है,” मैंने कहा। “मैं वहीं रहकर काम करूँगा।”
गाँव लौटकर मैंने एक नया संकल्प लिया। मैंने गाँव के युवाओं को इकट्ठा किया। “हमारी मिट्टी को बचाना है,” मैंने कहा। “यह सिर्फ मिट्टी नहीं, हमारी विरासत है।”
हमने एक सहकारी समिति बनाई। मिट्टी के नए उत्पाद बनाए – सजावट की वस्तुएँ, छोटे-छोटे स्मृति चिन्ह। मैंने इंटरनेट पर इन्हें बेचना शुरू किया। आदेश आने लगे।
धीरे-धीरे, गाँव के लोग समझने लगे कि मिट्टी सिर्फ जमीन नहीं, हमारी पहचान है। जिन लोगों ने जमीन बेची थी, वे पछताने लगे। फैक्ट्री से निकलता प्रदूषण फसलों को नुकसान पहुँचा रहा था।
एक दिन, भारी बारिश हुई। फैक्ट्री के पास के गड्ढे पानी से भर गए। पानी रिसकर गाँव की ओर आने लगा। कई घरों में पानी भर गया। लोग समझ गए – प्रकृति से छेड़छाड़ का परिणाम।
गाँव वालों ने एकजुट होकर फैक्ट्री के खिलाफ आवाज उठाई। धरना-प्रदर्शन शुरू हुआ। मैंने स्थानीय अखबारों को बुलाया। “यह मिट्टी हमारी माँ है,” मैंने कहा। “हम इसे नहीं बेच सकते।”
मामला बड़ा हुआ। पर्यावरण विभाग ने नोटिस दिया। फैक्ट्री को कुछ समय के लिए बंद करना पड़ा।
इस संघर्ष के दौरान, मैंने एक नया प्रयोग किया। फैक्ट्री वाली जमीन से दूर, गाँव के पीछे एक छोटी पहाड़ी थी। वहाँ की मिट्टी मैंने परखी। वह भी उतनी ही उत्तम थी। मैंने गाँव वालों को समझाया, “इस पहाड़ी की मिट्टी का उपयोग करें, पर जमीन न बेचें। हम सब मिलकर काम करेंगे।”
आज, दस साल बाद, मिट्ठापुर की कहानी बदल चुकी है। हमारी सहकारी समिति में पचास परिवार जुड़े हैं। हमने ‘मिट्ठापुर मिट्टी कला’ नाम से एक ब्रांड बनाया है। हमारे बर्तन देश-विदेश में जाते हैं।
पर सबसे बड़ी बात यह है कि बारिश के बाद फिर से वही पुरानी खुशबू हवा में तैरती है। फैक्ट्री तो अब भी है, पर उसकी गतिविधियाँ सीमित हैं। हमने समझौता किया है – वे पर्यावरण के नियमों का पालन करेंगे, और हम उनका विरोध नहीं करेंगे।
आज मैं तीस साल का हूँ। मेरा अपना परिवार है। मेरा बेटा आठ साल का है, और वह भी कुम्हारघर में आकर बैठता है। मैं उसे वही पाठ देता हूँ जो दादाजी ने मुझे दिया था – “मिट्टी से प्यार करो, वह तुमसे प्यार करेगी।”
कल ही बारिश हुई थी। सुबह मैंने अपने बेटे को गोद में उठाया और बाहर ले गया। धूप निकली थी, और मिट्टी से वही पुरानी खुशबू उठ रही थी। मैंने बेटे से कहा, “सूँघो, यह है दादा परदादा की सांस।”
उसने गहरी सांस ली और मुस्कुरा दिया, “अच्छी खुशबू है, पापा।”
मैंने उसे जमीन पर उतारा। उसने पहला कदम मिट्टी पर रखा, ठीक उसी जगह जहाँ मैंने रखा था। मेरी आँखें नम हो गईं। दादाजी सही कहते थे – मिट्टी अमर है। हम आते-जाते रहते हैं, पर मिट्टी रहती है। उसकी खुशबू रहती है।
आज शाम मैं कुम्हारघर में बैठा हूँ। चाक घूम रहा है, मिट्टी मेरे हाथों में नाच रही है। बाहर बारिश की बूंदों की आवाज आ रही है। कल सुबह फिर वह खुशबू आएगी। और मैं जानता हूँ, दादाजी मेरे आसपास होंगे, मिट्टी की उस सांस में समाए हुए।
मिट्टी सिर्फ मिट्टी नहीं होती। वह स्मृतियों का भंडार होती है, पीढ़ियों का साक्षी होती है, और जीवन का आधार होती है। उसकी खुशबू में इतिहास बसा होता है – हँसी-खुशी का, दुःख-दर्द का, जीवन-मरण का।
और जब तक यह खुशबू हवा में तैरती रहेगी, तब तक हमारा गाँव जीवित रहेगा, हमारी संस्कृति जीवित रहेगी, और हमारी पहचान जीवित रहेगी।
यही है मिट्टी की खुशबू की कहानी – एक ऐसी खुशबू जो सिर्फ नथुनों में नहीं, हृदय में उतरती है। जो हमें याद दिलाती है कि हम कहाँ से आए हैं, और हमें कहाँ जाना है। हमारी जड़ें इसी मिट्टी में हैं, और हमारे सपने इसी मिट्टी से उगते हैं।
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