नानी का मायका
अवनी ने अपने लैपटॉप का लिड बंद कर दिया। मीटिंग का शोर अब भी उसके कानों में गूंज रहा था। ग्रे ग्लास की इमारत से बाहर नीले आसमान को देखकर भी उसकी बेचैनी कम नहीं हुई। पिछले कुछ दिनों से एक अजीब सी खालीपन उसे घेरे हुए थी। शायद यह बैंगलोर की भागदौड़ भरी ज़िंदगी का असर था, या फिर 27 साल की उम्र में आकर जो एकाकीपन महसूस होने लगता है।

तभी उसका फ़ोन बजा। माँ का चेहरा स्क्रीन पर चमका।
“बेटा अवनी, एक काम है।”
“हाँ मम्मी, बोलो।”
“तुम्हारी नानी…उनकी तबीयत बहुत ज़्यादा ठीक नहीं है। डॉक्टर ने कहा है कि उन्हें आराम की ज़रूरत है, लेकिन वो बार-बार एक ही बात कह रही हैं…कि अपने ‘मायके’ जाना है।”
अवनी को थोड़ी अजीब सी लगी यह बात। नानी का मायका? उसे तो याद था कि बचपन से ही नानी उन्हीं के साथ रहती थीं। माँ का भी बचपन दिल्ली में ही बीता था। नानी ने कभी अपने मायके के बारे में विस्तार से कुछ बताया ही नहीं। बस इतना पता था कि वो एक छोटे से गाँव की रहने वाली थीं, जो उत्तर प्रदेश में कहीं था।
“पर मम्मी, नानी का मायका…वो तो कभी गयी ही नहीं शादी के बाद से, सुनाई तो बहुत दूर है। और अब उनकी तबीयत भी…क्या वो सफ़र झेल पाएँगी?” अवनी ने चिंतित स्वर में पूछा।
माँ ने एक गहरी सांस ली। “यही तो समस्या है बेटा। वो जाने के लिए बहुत बेचैन हैं। कहती हैं कि अगर अब नहीं गयी, तो फिर कभी नहीं जा पाऊँगी। तुम्हारे ममेरे भाई यानी मेरे चचेरे भाई अभी भी वहीं रहते हैं, पर उनसे भी कोई खास संपर्क नहीं है। मैं तो ऑफिस के काम और पापा की तबीयत की वजह से नहीं जा सकती…तुम…तुम चली जाओगी उनके साथ? तुम छुट्टी ले सकती हो ना? तुम ही उन्हें संभाल पाओगी।”
अवनी ने एक पल के लिए सोचा। लगातार तीन प्रोजेक्ट्स के बाद उसकी छुट्टियाँ जमा थीं। और कुछ दिनों के लिए इस कंक्रीट के जंगल से दूर जाने का विचार भी बुरा नहीं लगा। पर सबसे बढ़कर थी नानी। जिस नानी ने उसे बचपन में कहानियाँ सुनाकर, हाथ से बनी गुड़ की रोटियाँ खिलाकर बड़ा किया था, उनकी एक इच्छा पूरी करने का यह तो बहुत छोटा सा अवसर था।
“ठीक है मम्मी, मैं चलूँगी। आप ट्रेन के टिकट और सब का इंतज़ाम कर दो।”
तीन दिन बाद, राजधानी एक्सप्रेस में अवनी अपनी नानी के साथ एक स्लीपर बर्थ पर बैठी थी। नानी, गीली माँँ के बाल, नई निकाली हुई साड़ी में, अपने बिस्तर पर सीधे बैठी खिड़की से बाहर बदलते नज़ारों को देख रही थीं। उनके चेहरे पर एक अलग सी चमक थी, एक बेचैन उत्सुकता। उनकी तबीयत डॉक्टर के सख्त हिदायत के बावजूद इस सफर के लिए जैसे राज़ी हो गयी थी।
“नानी, आपको अच्छे से याद है वो जगह?” अवनी ने पूछा, उन्हें कम्बल ओढ़ाते हुए।
नानी की आँखों में एक धुंधलापन छा गया, मानो वो दशकों पुराने समय में झाँक रही हों। “याद है बेटा…बहुत याद है। नदी किनारे वाला वो छोटा सा गाँव…’शिवपुर’। हमारा घर…पीपल के पेड़ के ठीक सामने। सामने एक कुआँ था। मेरी माँ…तुम्हारी परनानी…वो उसी कुएँ से पानी भरती थीं। उनके गले की आवाज़…जब वो मुझे बुलाती थीं…’गौरी…ओ गौरी…'”
अवनी को पहली बार पता चला कि नानी का असली नाम गौरी था। वो तो उन्हें हमेशा ‘दादी’ या ‘नानी’ ही कहती थी।
“फिर आप कभी लौटकर क्यों नहीं गयीं नानी?” अवनी ने सहज भाव से पूछा।
नानी ने एक लम्बी सांस ली। “शादी के बाद ननिहाल जाने का रिवाज़ उन दिनों इतना नहीं था बेटा। फिर बच्चे हुए, ज़िम्मेदारियाँ…समय निकलता गया। और फिर…” नानी ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी, और खिड़की से बाहर देखने लगीं। अवनी को लगा जैसे कोई और दर्द भरी याद उन्हें खा रही थी, जिसके बारे में वो बात नहीं करना चाहती थीं।
ट्रेन से उतरने के बाद एक टैक्सी ने उन्हें दो घंटे के खड़खड़ाते सफर के बाद शिवपुर गाँव के बाहर छोड़ दिया। आगे सड़क इतनी संकरी थी कि गाड़ी अंदर नहीं जा सकती थी।
नानी टैक्सी से उतरीं। उनके पैर जमीन पर पड़े और उन्होंने आँखें बंद कर लीं। एक अजीब सी सुगंध, मिट्टी, गोबर और सरसों के फूलों की, हवा में तैर रही थी। उनके गालों पर आँसू की दो धाराएँ बह निकलीं। “सुगंध…बिल्कुल वही सुगंध।” वो फुसफुसाईं।
अवनी ने उनका हाथ थाम लिया और एक स्थानीय लड़के की मदद से उनका सामान उठवाकर, गाँव के अंदर की ओर चल पड़ी। गाँव बहुत ज़्यादा बदला नहीं लग रहा था। पक्की सड़क जरूर बन गयी थी, लेकिन कच्ची गलियाँ, मिट्टी के घर, और खुले आँगन वही के वही थे। बच्चे खेल रहे थे, औरतें कुएँ पर पानी भर रही थीं, बूढ़े पेड़ के नीचे बैठे गप्पें मार रहे थे।
नानी बिना किसी से पूछे, एक तरफ़ चल पड़ीं, मानो उनके पैरों में कोई छिपा हुआ नक्शा हो। अवनी उनके पीछे-पीछे चलती रही। वो एक छोटे से चौराहे पर रुकीं, जहाँ एक विशाल, पुराना पीपल का पेड़ था। उसके सामने एक जर्जर सी हवेली नुमा इमारत थी, जिसका बड़ा सा लोहे का फाटक जंग खाया हुआ था।
“यह रहा…” नानी की आवाज़ कांप रही थी। उन्होंने फाटक को हल्के से धक्का दिया। वो कड़ाक करके खुल गया।
अंदर एक विशाल आँगन था, जिसमें घास उग आई थी। चारों ओर कमरे बने हुए थे, जिनकी खिड़कियाँ टूटी हुई थीं। एक तरफ़ वह कुआँ भी था, अब ढक्कन से बंद किया हुआ। सन्नाटा था, पर एक पवित्र सा सन्नाटा।
तभी पीछे से एक बूढ़े आदमी की आवाज़ आई। “कौन हो तुम? यहाँ क्या चाहिए?”
अवनी मुड़ी। एक सफ़ेद दाढ़ी वाले बुढ़े, लाठी टेके खड़े थे।
नानी धीरे से मुड़ीं। उन्होंने उस बूढ़े को देखा। और बूढ़े ने नानी को देखा। कुछ पलों के लिए समय थम सा गया।
फिर बूढ़े की आँखें फैल गयीं। उनकी लाठी हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ी। उनके होंठ कांपने लगे। “गौरी…? गौरी बहन…? सच में…तुम…?”
नानी के चेहरे पर एक कोमल, दर्द भरी मुस्कान फैल गयी। “हाँ रमेश…तुम्हारी बहन गौरी।”
अवनी हैरान रह गयी। ये बूढ़ा आदमी…ये नानी का भाई था?
रमेश, या रमेश काका, लंगड़ाते हुए तेजी से आगे बढ़े और नानी के पैर छूने लगे। नानी ने उन्हें गले से लगा लिया। दोनों के रोने की आवाज़ से वह सूनी हवेली जीवित हो उठी।
बैठक में चाय पीते हुए, रमेश काका ने बताया कि उनके और दो भाई थे, जो अब इस दुनिया में नहीं थे। उनके बच्चे शहरों में रहते थे। यह घर, नानी का मायका, बरसों से खाली पड़ा था, और रमेश काका अपने एक बेटे के साथ पास के ही एक नए मकान में रहते थे, पर रोज़ आकर इस घर को देख जाते थे।
“तुम आ गयी गौरी बहन…माँ की मृत्यु के बाद, तुमने एक चिट्ठी भेजी थी ना? उसके बाद से…कोई खत-पता नहीं। बाप जी तो तुम्हें याद कर-करके रोया करते थे,” रमेश काका की आँखें नम थीं।
नानी फूट-फूट कर रोने लगीं। “मैं बहुत अपराध बोध में जीती रही रमेश…जब माँ का देहांत हुआ, मैं आ नहीं पायी। फिर पापा…उन्हें भी मैंने आखिरी बार नहीं देखा। शायद इसीलिए मेरी आत्मा यहाँ लौटना चाहती थी…माफ़ी माँगने।”
अवनी ने महसूस किया कि यह सिर्फ एक यात्रा नहीं थी। यह एक अपूर्ण इतिहास को पूरा करने, दबे हुए गिल्ट को बाहर निकालने की यात्रा थी।
अगले तीन दिन जादुई थे। गाँव भर में खबर फैल गयी कि गौरी लौट आयी है। बुज़ुर्ग औरतें, जो नानी की बचपन की सहेलियाँ थीं या उनसे छोटी थीं, उनसे मिलने आईं। चाय, गपशप और पुरानी यादों का दौर चला। नानी, जो दिल्ली में चुप-सी रहती थीं, यहाँ बिल्कुल बदल गयी थीं। उनके चेहरे पर एक नयी रौनक थी, आँखों में चमक लौट आयी थी।
एक दिन रमेश काका एक पुराना टीन का बक्सा लेकर आए। “यह तुम्हारा है गौरी बहन। माँ ने संभालकर रखा था। हमने कभी खोला नहीं।”
नानी ने कांपते हाथों से बक्सा खोला। अंदर थीं: एक फटी हुई गुड़िया, कुछ पुराने काँच के चूड़े, स्याही से सनी हुई एक स्लेट, और चिट्ठियों के कुछ पुलिंदे। एक पुराना काले-सफेद फोटो था, जिसमें एक युवती गौरी अपने माता-पिता और तीन छोटे भाइयों के साथ खड़ी थी। नानी ने वह फोटो अपने सीने से लगा लिया।
अवनी ने चिट्ठियाँ पढ़ीं। वो नानी की ही लिखी हुई थीं, शादी के बाद के पहले कुछ सालों में, जब वो इस घर से जुड़ी हुई थीं। एक चिट्ठी में लिखा था – “प्रिय माँ, यहाँ सब ठीक है। पर रात को जब चाँद निकलता है, तो लगता है कि यह चाँद वही है जो हमारे आँगन में आता था। क्या आप भी उसे देखती हैं? मेरा मन बहुत उदास हो जाता है। मैं आप सबको बहुत याद करती हूँ।”
अवनी की आँखें भर आयीं। उसे समझ आया कि ‘मायका’ सिर्फ एक जगह नहीं होता। वो एक भावना है। सुरक्षा की, बिना शर्त प्यार की, वो धरती जहाँ तुम्हारी जड़ें होती हैं। और जब तुम उससे कट जाते हो, तो एक हिस्सा सूना सा रह जाता है, चाहे तुम कितनी भी खुशियाँ क्यों न जी लो।
आखिरी दिन, नानी ने अवनी से कहा कि वो उन्हें गाँव के बाहर नदी किनारे ले चलें। वहाँ पहुँचकर नानी ने एक खास पेड़ के पास जाकर हाथ जोड़ लिए। “यहाँ मेरी माँ का अस्थि विसर्जन किया गया था,” उन्होंने शांत स्वर में कहा। “मैं उनसे माफ़ी माँगने आयी थी।”
फिर उन्होंने अवनी की तरफ देखा। “तुम्हें पता है बेटा, तुम्हारे साथ आकर मेरा सबसे बड़ा सपना पूरा हुआ है। मैं चाहती थी कि मेरी कोई नई पीढ़ी, मेरी बेटी की बेटी, इस धरती को देखे, इसकी हवा में सांस ले। ताकि जब मैं न रहूँ, तो मेरी याद सिर्फ दिल्ली के फ्लैट तक ही सीमित न रहे। तुम यहाँ आयी हो, तो अब मेरी कहानी का एक हिस्सा तुम्हारे अंदर भी रहेगा।”
अवनी ने नानी को गले लगा लिया। उसे लगा जैसे उसने न सिर्फ नानी के मायके की खोज की है, बल्कि खुद की एक नई पहचान, एक नया इतिहास भी खोज लिया है। उसे वो खालीपन अब महसूस नहीं हो रहा था। शायद क्योंकि अब उसकी जड़ें भी इस धरती से जुड़ गयी थीं।
वापसी की ट्रेन में नानी शांत थीं, पर संतुष्ट। उनका चेहरा एक अजीब सी शांति से भरा हुआ था, जैसे कोई लम्बा सफर पूरा कर लिया हो।
“नानी,” अवनी ने कहा, “मैं एक वादा करती हूँ। मैं हर साल, कम से कम एक बार, तुम्हें यहाँ लेकर आऊंगी। और…घर की मरम्मत करवाऊंगी। ताकि यह हमेशा तैयार रहे। हमारे लिए।”
नानी ने अवनी का हाथ अपने हाथों में ले लिया। उनकी आँखों में प्यार और कृतज्ञता थी। “तुम सच्ची हो बेटा। मेरे मायके को तुम्हारे जैसी ही ज़रूरत थी। एक नई जान की।”
ट्रेन चल पड़ी थी। नानी की नज़रें खिड़की से बाहर गाँव की ओर थीं, जो धीरे-धीरे दूर हो रहा था। पर इस बार उनके चेहरे पर विदाई का दर्द नहीं, एक गहरा सुकून था। क्योंकि वो जानती थीं कि वो अब इस धरती से फिर से जुड़ गयी थीं। और उनकी नातिन, अवनी, अब उस कड़ी का नया हिस्सा थी, जो अतीत को भविष्य से जोड़ती है।
अवनी ने अपना हेडफोन लगाया, पर इस बार उसमें कोई पॉप सॉन्ग नहीं चल रहा था। उसने अपने फ़ोन में रिकॉर्ड किए हुए उन गीतों को सुनना शुरू किया, जो गाँव की औरतों ने नानी के सम्मान में गाये थे – पुराने लोक गीत, जिनमें बेटी के विदा होने का दर्द और मायके की याद छिपी थी।
उसे लगा, यह यात्रा उसकी नानी के लिए तो ‘क्लोजर’ थी ही, पर उसके लिए एक ‘ओपनिंग’ थी। एक नयी शुरुआत। एक ऐसी विरासत की खोज जो उसे अब तक मिली ही नहीं थी। वो मुस्कुराई। बैंगलोर का अपार्टमेंट अब भी वहीं होगा, प्रोजेक्ट्स और डेडलाइन्स भी वहीं होंगी। पर अब उसके पास एक रिट्रीट भी था – नदी किनारे एक पुरानी हवेली, एक पीपल का पेड़, और एक कहानी…जो अब सिर्फ नानी की नहीं, उसकी भी अपनी कहानी थी। नानी का मायका, अब उसका भी मायका था।