लोटा और लाज
रामस्वरूप दास के लिए उनका पीतल का लोटा कोई साधारण बर्तन नहीं था। वह उनकी पहचान थी, उनकी शान थी, उनके पिता की विरासत थी। पचास साल से भी ज्यादा समय से वह उसी लोटे से पानी पीते आ रहे थे। लोटे पर उनके दादा ने उनके नाम का नक्शा करवाया था – “रामस्वरूप” की नक्काशी अब भी मद्धम चमक के साथ मौजूद थी।
वह सुबह चार बजे उठते, लोटा हाथ में लेते और गंगा घाट की ओर चल पड़ते। स्नान करने के बाद लोटे से जल भरकर पूजा करते, फिर उसी लोटे से पानी पीते। यह दिनचर्या उनके जीवन का अटूट हिस्सा थी।
एक शाम जब रामस्वरूप दास बगीचे में टहल रहे थे, तभी उनकी पोती नेहा दौड़ती हुई आई। “दादाजी! दादाजी! लोटा… लोटा गायब है!”
रामस्वरूप दास के पैरों तले जमीन खिसक गई। “क्या कहा? मेरा लोटा? वह तो मैंने रसोई की खिड़की पर रखा था।”
“वहाँ नहीं है दादाजी! हमने सारा घर छान मारा।”
पूरा परिवार लोटे की तलाश में जुट गया। कोई अलमारियाँ खंगार रहा था, कोई बिस्तर के नीचे झाँक रहा था। रामस्वरूप दास बैठक में कुरसी पर बैठे, उनका चेहरा विषाद से भरा हुआ था। उनकी पत्नी शांति देवी ने आकर कहा, “इतना परेशान मत हो। नया लोटा ले आते हैं।”
“नया लोटा?” रामस्वरूप दास की आवाज़ में झल्लाहट थी, “तुम समझती ही नहीं! यह लोटा मेरे पिता ने मुझे दिया था। इसमें मेरा नाम खुदवाया है। यह सिर्फ एक बर्तन नहीं है… यह मेरी शान है।”
शाम ढलने लगी थी। लोटा नहीं मिला। रामस्वरूप दास ने आँखें बंद कर लीं। उन्हें पचास साल पहले का वह दिन याद आ गया जब उनके पिता ने लोटा उन्हें सौंपते हुए कहा था, “बेटा रामस्वरूप, यह लोटा तुम्हारी लाज है। जब तक यह लोटा तुम्हारे पास है, तुम्हारी इज्जत सलामत है।”
अगले दिन सुबह जब परिवार के सदस्य बैठक में इकट्ठे हुए, तो रामस्वरूप दास के बड़े बेटे विजय ने एक संभावना जताई, “पिताजी, कल दोपहर को हमारे यहाँ मोहन आया था। क्या पता…”
मोहन उनके घर का काम करने वाला युवक था, जो पिछले छह महीने से उनके यहाँ काम कर रहा था। गरीब परिवार से आने वाला मोहन ईमानदार और मेहनती था, पर विजय को हमेशा उस पर शक रहता था।
रामस्वरूप दास ने सिर हिलाया, “मोहन? वह कभी चोरी नहीं कर सकता। उसकी आँखों में ईमानदारी झलकती है।”
“पिताजी, आजकल किस पर भरोसा किया जाए?” विजय ने कहा, “हमने उसके परिवार के बारे में कुछ नहीं जानता। क्या पता वह किस मजबूरी में ऐसा कर बैठा हो।”
शांति देवी ने हस्तक्षेप किया, “बिना सबूत के किसी पर आरोप मत लगाओ। हो सकता है लोटा कहीं और हो।”
पर विजय अपनी बात पर अड़ा रहा। उसने फैसला किया कि वह मोहन के घर जाकर पूछताछ करेगा।
मोहन एक झुग्गी बस्ती में रहता था। विजय जब वहाँ पहुँचा, तो मोहन अपनी बीमार माँ के लिए दवाई बना रहा था।
“साहब! आप यहाँ?” मोहन हैरान था।
विजय ने सीधे मुद्दे पर बात की, “मोहन, कल हमारे घर से एक पीतल का लोटा गायब हुआ है। तुमने कुछ देखा?”
मोहन का चेहरा फक्क पड़ गया। “लोटा? नहीं साहब, मैंने तो कल रसोई की सफाई की और चला आया। मुझे कुछ नहीं पता।”
विजय ने आँखों से मोहन के छोटे से कमरे का मुआयना किया। वहाँ गरीबी साफ झलक रही थी, पर कोई पीतल का लोटा नहीं दिखाई दिया।
“ठीक है,” विजय ने कहा, “अगर तुम्हें कुछ पता चले तो बताना।”
वापस लौटते हुए विजय के मन में शक और गहरा गया। मोहन का घबराना उसे संदेहजनक लगा।
दो दिन बीत गए। रामस्वरूप दास उदास बैठे थे। लोटे के बिना उनकी दिनचर्या बिखर गई थी। वह गंगा घाट भी नहीं जा रहे थे।
तभी नेहा दौड़ती हुई आई, “दादाजी! मुझे कुछ याद आया! कल जब लोटा गायब हुआ, तब मैंने खिड़की से बाहर देखा था। शर्मा अंकल का बेटा रोहित हमारे बगीचे के पास खड़ा था।”
रोहित पड़ोसी शर्मा जी का बेटा था, उम्र चौदह साल। रामस्वरूप दास को यकीन नहीं हुआ। “रोहित? वह तो अच्छा लड़का है। वह ऐसा क्यों करेगा?”
“दादाजी, कल स्कूल में रोहित ने मुझे बताया था कि उसे नए जूते चाहिए पर उसके पापा ने मना कर दिया है,” नेहा ने कहा।
रामस्वरूप दास सोच में पड़ गए। क्या रोहित ने लोटा चुराकर बेचने की सोची होगी? पीतल के लोटे की कीमत कम से कम दो हज़ार रुपये तो होगी।
रामस्वरूप दास ने फैसला किया कि वह सीधे शर्मा जी के पास जाएँगे। शर्मा जी उनके पुराने मित्र थे।
शर्मा जी के घर पहुँचकर रामस्वरूप दास ने सारी बात बताई। शर्मा जी का चेहरा लज्जा से भर गया। “रामस्वरूप भाई, मैं शर्मिंदा हूँ। मैं रोहित से पूछता हूँ।”
रोहित को बुलाया गया। जब उसने रामस्वरूप दास को देखा, तो उसका चेहरा पीला पड़ गया।
“रोहित बेटा,” रामस्वरूप दास ने कोमल स्वर में कहा, “तुमने मेरा लोटा लिया है क्या?”
रोहित ने आँखें नीची कर लीं। उसकी आँखों में आँसू आ गए। “हाँ दादाजी… मैंने लिया। माफ़ कर दीजिए।”
“पर क्यों बेटा? तुम्हें पैसों की जरूरत थी?”
रोहित रोने लगा, “मैंने अपनी मम्मी के लिए तोहफा लेना चाहा। उनका जन्मदिन है और हमारे पास पैसे नहीं हैं। मैंने सोचा पीतल बेचकर उनके लिए एक साड़ी लूँगा।”
रोहित ने लोटा निकालकर दिया जो उसने अपने कमरे में छिपा रखा था। रामस्वरूप दास ने लोटा हाथ में लिया। पचास साल पुराना यह लोटा अब भी चमक रहा था।
शर्मा जी गुस्से में थे, “रोहित! तुमने यह क्या किया! हमने तुम्हें यह सब सिखाया है?”
रोहित सिर झुकाए खड़ा था। रामस्वरूप दास ने शर्मा जी से कहा, “उसे डाँटो मत। उसने गलती की है, पर उसके इरादे अच्छे थे।”
“पर रामस्वरूप भाई, चोरी तो चोरी है,” शर्मा जी ने कहा, “हम इसकी सूचना पुलिस को देंगे।”
“नहीं,” रामस्वरूप दास ने दृढ़ता से कहा, “पुलिस की कोई जरूरत नहीं। रोहित ने अपनी गलती स्वीकार कर ली है।”
रामस्वरूप दास ने रोहित की ओर देखा, “बेटा, तुम्हें पता है इस लोटे में क्या है? इसमें मेरी लाज है। मेरे पिता ने मुझे यह लोटा देते हुए कहा था कि यह मेरी इज्जत का प्रतीक है। आज तुमने इस लोटे को छुआ है, पर तुमने मेरी लाज नहीं लूटी। क्योंकि लाज तब लूटी जाती है जब हम किसी की गलती को दुनिया के सामने लाते हैं।”
रोहित हैरान था। उसने उम्मीद नहीं की थी कि रामस्वरूप दास उसे इस तरह माफ कर देंगे।
रामस्वरूप दास ने आगे कहा, “तुम्हारी माँ का जन्मदिन है न? कल तुम और तुम्हारे पिता मेरे घर आना।”
अगले दिन शर्मा जी और रोहित रामस्वरूप दास के घर पहुँचे। रामस्वरूप दास ने रोहित की माँ के लिए एक सुन्दर साड़ी निकाली।
“यह लो बेटा,” उन्होंने रोहित से कहा, “तुम अपनी माँ को यह उपहार देना।”
रोहित की आँखों में आँसू आ गए, “दादाजी, मैं इस लायक नहीं हूँ।”
“तुम पूरी तरह लायक हो,” रामस्वरूप दास ने कहा, “क्योंकि तुमने सच्चाई स्वीकार की। यह साड़ी मेरी तरफ से है, पर एक शर्त पर।”
“क्या शर्त दादाजी?”
“तुम हफ्ते में तीन दिन मेरे पास आकर पढ़ाई करोगे। मैं तुम्हें ट्यूशन दूँगा। तुम्हें अच्छे अंक लाने हैं।”
रोहित ने खुशी से हामी भरी।
उस शाम रामस्वरूप दास फिर से गंगा घाट गए, अपना पुराना लोटा हाथ में लिए। लोटा वापस मिल गया था, पर उन्हें कुछ और मिला था – एक नया रिश्ता, एक नया उद्देश्य।
वापस लौटकर उन्होंने परिवार को बुलाया। विजय ने कहा, “पिताजी, मैं मोहन पर शक करके गलत था। मुझे उससे माफी माँगनी चाहिए।”
“हाँ बेटा,” रामस्वरूप दास ने कहा, “हमें किसी पर बिना सबूत शक नहीं करना चाहिए। मोहन एक ईमानदार लड़का है। हम उसकी माँ का इलाज करवाएँगे।”
कुछ महीने बीत गए। रोहित अब नियमित रूप से रामस्वरूप दास के पास पढ़ने आता था। उसके अंकों में सुधार आया था। मोहन की माँ का इलाज चल रहा था और वह अब बेहतर महसूस कर रही थी।
एक दिन रामस्वरूप दास ने रोहित से कहा, “तुम्हें पता है बेटा, इस लोटे की सबसे बड़ी कीमत क्या है?”
रोहित ने सिर हिलाया।
“इसकी सबसे बड़ी कीमत यह है कि इसने मुझे सिखाया कि लाज सिर्फ अपनी नहीं होती। दूसरों की लाज बचाना भी उतना ही जरूरी है। तुम्हारी लाज बचाकर मैंने अपनी लाज बचाई।”
रोहित समझ गया। उस दिन के बाद से उसका जीवन बदल गया था।
आज रामस्वरूप दास का लोटा अब भी उनके पास है, पर अब उसकी महत्ता और बढ़ गई है। वह न केवल उनकी व्यक्तिगत विरासत है, बल्कि एक सबक है – क्षमा और मानवता का सबक।
रोहित अब कॉलेज जाता है और मोहन ने एक छोटी दुकान खोल ली है। रामस्वरूप दास अब भी सुबह चार बजे उठते हैं, लोटा हाथ में लेते हैं और गंगा घाट जाते हैं। पर अब उनके साथ कभी-कभी रोहित भी होता है।
एक दिन रोहित ने पूछा, “दादाजी, जब आप नहीं रहेंगे, तो यह लोटा किसे मिलेगा?”
रामस्वरूप दास मुस्कुराए, “यह लोटा उसे मिलेगा जो समझेगा कि लाज सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। और मुझे लगता है, तुम इसके हकदार हो।”
रोहित की आँखों में चमक आ गई। उसने समझ लिया कि लोटा सिर्फ पीतल का बर्तन नहीं, बल्कि एक विरासत है जिसमें इंसानियत, क्षमा और सम्मान का सार समाया हुआ है।
और इस तरह, पीतल के एक साधारण लोटे ने न सिर्फ एक परिवार की लाज बचाई, बल्कि कई जिंदगियाँ बदल दीं। क्योंकि असली लाज कभी चोरी नहीं होती, वह तो हमारे कर्मों में बसती है।
Berlin, Germany – In a major coup for the Berlin International Film Festival, the world…
The Chief Minister of Goa, Pramod Sawant, has stated that the state government is considering…
TARRANT COUNTY, Texas — In a political race that has captivated local voters and drawn…
MADRID, SPAIN – In a capital derby that proved more challenging than many anticipated, league…
In an era where political spouses are expected to be both accessible and relatable, Melania…
In today’s fast-evolving tech landscape, AI agents are becoming essential tools for automating complex tasks,…
This website uses cookies.