गाँव के उस छोर पर बूढ़े गुरुजी का कच्चा मकान था, जिसकी देहरी पर हमेशा एक पुरानी लालटेन टँगी रहती। उसकी मद्धम पीली रोशनी न सिर्फ रास्ता दिखाती, बल्कि समय के एक पूरे दौर की कहानी कहती।
मेरे बचपन की शामें लालटेन की रोशनी में ही ढलती थीं। दादाजी कहते, “बेटा, जब हम बच्चे थे, तो लालटेन ही हमारा सूरज था।”
हर शाम की रस्म एक जैसी होती:
उस नारंगी रोशनी में सब कुछ जादुई लगता:
सर्दियों की रातें:
हम सब एक कम्बल में सिमटकर बैठते। दादाजी रामायण की कहानी सुनाते। लालटेन की लौ हवा में थिरकती, और कहानी के साथ हमारी कल्पना भी उड़ान भरती।
बारिश के दिन:
बिजली चली जाती, पर हमारी लालटेन जगमगाती रहती। टप-टप की आवाज के साथ लौ का नाच – मानो प्रकृति और मानव का मिलन।
दिवाली की तैयारी:
लालटेन को नहलाया जाता, काँच चमकाया जाता। नए कपड़े की बाती काटी जाती। और फिर दीयों के साथ लालटेन भी जलाई जाती।
फिर एक दिन बिजली पहुँची गाँव में। पहला बल्ब जला तो सब हैरान:
“अरे वाह! इतना तेज उजाला!”
“और झुकाना नहीं पड़ता!”
“हवा से बुझती भी नहीं!”
धीरे-धीरे लालटेन को कोने में धकेल दिया गया। वह अब केवल बिजली जाने पर याद आती।
एक दिन मैंने दादाजी से पूछा, “अब तो बिजली है, फिर भी आप लालटेन क्यों जलाते हैं?”
उन्होंने गहरी साँस लेकर कहा, “बेटा, बल्ब सिर्फ रोशनी देता है। लालटेन जीवन देती है। उसकी गर्मी, उसका नाच, उसकी आवाज़… ये सब मिलकर एक जीवित प्राणी जैसा अनुभव देते हैं।”
समय बीता। दादाजी चले गए। उनकी लालटेन अब केवल कोने में धूल खा रही थी। एक दिन माँ ने कहा, “यह पुरानी चीज़ फेंक दो।”
मैंने लालटेन उठाई। उस पर समय के निशान थे:
मैंने उसे साफ किया, नई बाती डाली, तेल डाला और जलाई।
वही नारंगी रोशनी… वही नरम चमक… मानो दादाजी की यादों ने जीवन पा लिया हो।
आज मेरे शहर के फ्लैट में वही लालटेन मेरी स्टडी टेबल पर है। जब भी मैं थक जाता हूँ, तब उसे जला लेता हूँ। उसकी रोशनी में:
मेरे बच्चे पूछते हैं, “पापा, यह अजीब लाइट क्या है?”
मैं कहता हूँ, “यह कोई लाइट नहीं, यह तुम्हारे परदादा की कहानी है।”
और फिर शुरू होती है कहानी की शाम…
आज लालटेन सिर्फ प्रकाश का साधन नहीं, बल्कि बहुत कुछ है:
आज बिजली के हज़ार बल्ब जलते हैं, पर घर उजाले से खाली लगते हैं। वहीं एक लालटेन की मद्धम रोशनी पूरे घर को भर देती है – शायद इसलिए कि वह दिल से जलती है।
हर साल दिवाली पर, जब हज़ारों लाइटें जलती हैं, मैं अपनी लालटेन भी जलाता हूँ। मेरे पड़ोसी पूछते हैं, “यह क्या पुराना फैशन?”
मैं मुस्कुराकर कहता हूँ, “नहीं, यह नया नज़रिया है पुरानी यादों को देखने का।”
आज मैं अपने बच्चों को सिखाता हूँ:
“तुम्हारे फोन की रोशनी बिजली से आती है, पर लालटेन की रोशनी प्यार से आती है।”
वो लालटेन अब भी हर शाम जलती है। न सिर्फ तेल से, बल्कि:
लालटेन की वो रोशनी शायद कभी नहीं बुझेगी। क्योंकि जो रोशनी दिल से जले, उसे हवा भी नहीं बुझा सकती। वह तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी जलती रहेगी – एक विरासत की लौ की तरह, एक सभ्यता की याद की तरह, और एक सच्चाई की तरह कि असली उजाला वही है जो अँधेरे को डराए नहीं, बल्कि उसे अपने साथ नचाए।
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