मेरे गाँव में एक कहावत थी—”जिसके पास ज़मीन, उसके पास ज़िंदगी।” और हमारे गाँव में सबसे ज़्यादा ज़मीन थी बाबू शिवनारायण सिंह के पास। पचासी बीघा उपजाऊ ज़मीन, जो गाँव के तीनों ओर फैली हुई थी, मानो पूरा गाँव उनकी हथेली पर बसा हो।
बाबू शिवनारायण सिंह—जिन्हें सब “राजा साहब” कहते थे। अस्सी साल के हो चुके थे, पर उनकी कमर अब भी सीधी थी, आवाज़ में गर्जन थी, और नज़र में वह तेज था जो सीधे आपकी आत्मा तक पहुँच जाता था। वह हमारे गाँव के खेतों के राजा थे, और उनका राज्य उनके खेत थे।
हर सुबह वह अपने पुराने घोड़े “बादल” पर सवार होकर अपने खेतों का दौरा करते। उनकी पगड़ी का रंग बदलता रहता—बसंत में केसरिया, गर्मियों में सफेद, बरसात में हरा। उनके पीछे-पीछे चलता उनका वफादार नौकर मुन्ना, जिसकी उम्र साठ के करीब थी, पर वह अब भी बाबू साहब के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता।
“मुन्ना, आज पश्चिमी खेत में गेहूँ की कटाई शुरू होनी थी। क्यों नहीं हुई?” बाबू साहब की आवाज़ में अफसोस था।
“हुजूर, ट्रैक्टर खराब है। मैकेनिक आ रहा है,” मुन्ना ने सिर झुकाकर जवाब दिया।
“ट्रैक्टर-ट्रैक्टर! हमारे ज़माने में बैलों से कटाई होती थी, और समय पर होती थी। ये मशीनें दिल तोड़ती हैं।”
बाबू साहब को नए ज़माने से चिढ़ थी। उनके तीन बेटे थे—सब शहर में रहते, नौकरी करते। बड़ा बेटा रमेश दिल्ली में इंजीनियर, दूसरा सुरेश कानपुर में प्रोफेसर, तीसरा महेश मुंबई में बैंक मैनेजर। हर साल होली और दिवाली पर आते, बाबू साहब को शहर ले जाने की कोशिश करते, पर वह टस से मस नहीं होते।
“मेरा राज्य यही है। मैं इसे कैसे छोड़ दूँ?” वह कहते।
पर इस बार स्थिति अलग थी। बाबू साहब की तबीयत गिरने लगी थी। डॉक्टर ने आदेश दिया था—”आपको शहर आना होगा। यहाँ अच्छे अस्पताल हैं।”
बाबू साहब के बेटे आए और उन्हें मनाने की कोशिश की। “पिताजी, अब आपकी उम्र हो गई है। आप अकेले यहाँ कैसे रहेंगे?” रमेश ने कहा।
“अकेले? मेरे पास मुन्ना है, मेरे मजदूर हैं, मेरे खेत हैं। ये मेरे परिवार से कम हैं?”
“पर पिताजी, अब आप खेत संभाल नहीं पाएँगे। बेच दीजिए। कंपनियाँ ढूँढ रही हैं। अच्छा दाम मिल जाएगा,” महेश ने व्यावहारिक सलाह दी।
बाबू साहब का चेहरा लाल हो गया। “मेरे खेत बेचूँ? वो खेत जिन पर मेरे पिता, दादा, परदादा ने पसीना बहाया? वो खेत जिनकी मिट्टी में मेरे पूर्वजों की अस्थियाँ मिली हैं?”
बहस बढ़ने लगी। आखिरकार बाबू साहब ने एक शर्त रखी—”ठीक है, मैं शहर आऊँगा। पर एक महीने के लिए। और इस एक महीने में तुम तीनों में से कोई एक गाँव आकर खेत संभालेगा। जो सबसे अच्छा संभालेगा, उसे ही ये खेत मिलेंगे।”
बेटे हैरान रह गए। उन्होंने कभी खेत संभालने के बारे में नहीं सोचा था। पर खेतों का लालच था—पचासी बीघा ज़मीन की कीमत करोड़ों में थी।
“पर पिताजी, हमें खेती का अनुभव नहीं है,” सुरेश ने कहा।
“मुन्ना है न। वो सिखाएगा। मैं भी फोन पर रहूँगा।”
और इस तरह शुरू हुई “खेतों का राजा” बनने की होड़।
पहले महीने के लिए रमेश आया। दिल्ली से आया था, तीन-पीस सूट में, लैपटॉप बैग लिए। उसने खेत देखे, फिर अपना लैपटॉप खोला। “मुन्ना काका, हमें मॉडर्न फार्मिंग अपनानी होगी। ड्रिप इरिगेशन, ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर, हाइब्रिड बीज।”
मुन्ना ने सिर खुजलाया। “साहब, यहाँ के किसान पुराने तरीके से ही खेती करते हैं।”
“तो बदलना होगा।”
रमेश ने ऑनलाइन रिसर्च की, कंपनियों से संपर्क किया, नए बीज मँगवाए। उसने ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगवाने का ऑर्डर दिया। पर जब बिल आया—दस लाख रुपए—तो उसकी हिम्मत जवाब दे गई।
फिर शुरू हुई फसल की बुआई। रमेश ने नए हाइब्रिड गेहूँ के बीज मँगवाए। मुन्ना ने कहा—”साहब, यहाँ की मिट्टी के लिए ये बीज ठीक नहीं हैं।”
“तुम जानो या मैं जानूँ? मैं इंजीनियर हूँ। मैंने सब कैलकुलेट किया है।”
बुआई हुई। पहले हफ्ते तो सब ठीक रहा। फिर पत्तियाँ पीली पड़ने लगीं। रमेश ने फर्टिलाइजर डाला, पर फसल सुखती चली गई। एक महीने बाद जब बाबू साहब ने फोन पर पूछा, तो रमेश को स्वीकार करना पड़ा—”फसल खराब हो गई, पिताजी।”
“कितना नुकसान हुआ?”
“लगभग पाँच लाख का।”
“ठीक है। तुम वापस जाओ। अगले महीने सुरेश आएगा।”
दूसरे महीने सुरेश आया। वह प्रोफेसर था, तर्कसंगत, शांत। उसने पहले गाँव के बुजुर्ग किसानों से बात की, किताबें पढ़ीं, फिर योजना बनाई।
“मुन्ना काका, हमें मिश्रित खेती करनी चाहिए। खेत के एक हिस्से में फलों के पेड़, दूसरे में सब्ज़ियाँ, तीसरे में अनाज।”
“अच्छा विचार है साहब।”
सुरेश ने आम के पेड़ लगवाए, सब्ज़ियाँ बोईं। उसने गाँव के किसानों को इकट्ठा किया और उन्हें नई तकनीक सिखाई। सब कुछ ठीक चल रहा था, पर एक समस्या थी—पानी की।
गाँव में पानी की कमी थी। कुएँ सूख रहे थे। सुरेश ने बोरवेल करवाने का फैसला किया। पहले बोरवेल में पानी नहीं मिला। दूसरे में थोड़ा मिला। तीसरे में… जब तीसरा बोरवेल लगा, तो खर्च बीस लाख तक पहुँच गया।
बाबू साहब को जब पता चला, तो वह क्रोधित हो गए। “तुमने बीस लाख पानी में फेंक दिए? हमारे पूर्वजों ने तालाब बनवाए थे, वो आज भी काम कर रहे हैं। नए ज़माने के लोगों को सिर्फ गहरे पानी का पता है, ऊपर के पानी का नहीं।”
सुरेश ने माफी माँगी, पर बाबू साहब ने कहा—”तुम भी वापस जाओ।”
तीसरे महीने महेश आया। बैंक मैनेजर था, व्यावहारिक। उसने खेत देखे, हिसाब लगाया, फिर फैसला किया—खेती नहीं, खेत बेचने हैं।
उसने रियल एस्टेट एजेंटों को बुलाया, कंपनियों से बात की। एक बिल्डर ने पूरी ज़मीन के लिए पाँच करोड़ का ऑफर दिया। महेश खुश था। उसने बाबू साहब को फोन किया—”पिताजी, मैंने पाँच करोड़ का डील फाइनल कर दी है। हम अमीर हो जाएँगे।”
फोन के दूसरी ओर सन्नाटा था। फिर बाबू साहब की आवाज़ आई, जिसमें एक अजीब सी थकान थी—”महेश, क्या तुम समझते हो कि पैसा सब कुछ है? वो खेत तुम्हारी विरासत हैं, तुम्हारी पहचान हैं। तुम उसे बिल्डर को बेच दोगे? वहाँ कॉलोनियाँ बनेंगी, मॉल बनेंगे, और हमारी विरासत मिट्टी में मिल जाएगी।”
“पर पिताजी—”
“कोई पर नहीं। तुम भी वापस जाओ।”
तीनों बेटे असफल हो चुके थे। बाबू साहब निराश थे। एक सप्ताह बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई। डॉक्टरों ने कहा—अब वह गाँव नहीं लौट सकते।
बाबू साहब शहर के अस्पताल में थे। उनका कमरा दसवीं मंजिल पर था, जहाँ से पूरा शहर दिखता था। पर उनकी आँखें हमेशा खिड़की से बाहर देखतीं, मानो वह अपने खेतों को ढूँढ रहे हों।
एक दिन मुन्ना उनसे मिलने आया। उसकी आँखें नम थीं। “हुजूर, खेत सूने पड़े हैं। मजदूरों ने काम छोड़ दिया है। फसलें सूख रही हैं।”
बाबू साहब की आँखों में आँसू आ गए। “मेरे जाने के बाद यही होना था। खेतों का राजा बिना खेत के, और खेत बिना राजा के।”
उसी शाम बाबू साहब के कमरे में एक नया मेहमान आया—रमेश की बेटी प्रिया। बारह साल की प्रिया बाबू साहब की पसंदीदा पोती थी। वह उनके पास आई और उनका हाथ थाम लिया।
“दादाजी, आप उदास क्यों हैं?”
“मेरे खेत, बेटी। मेरे खेत मर रहे हैं।”
“मैं देखना चाहती हूँ वो खेत।”
अगले दिन प्रिया ने अपने पिता से कहा—”पापा, मुझे गर्मियों की छुट्टियों में दादाजी के गाँव जाना है।”
रमेश हैरान हुआ। “पर वहाँ क्या करोगी?”
“दादाजी के खेत देखूँगी।”
प्रिया के आग्रह पर रमेश मान गया। वह प्रिया को गाँव ले आया और मुन्ना के हवाले कर दिया।
प्रिया ने पहली बार खेत देखे। हरित-सुनहरे खेत, जो धूप में नहा रहे थे। उसने मुन्ना से पूछा—”मुन्ना दादा, यह सब क्या उगता है?”
मुन्ना ने उसे समझाया—यह गेहूँ है, यह चना है, वह सरसों है। प्रिया ने सब कुछ ध्यान से सुना।
एक हफ्ते बाद प्रिया ने बाबू साहब को फोन किया। “दादाजी, मैंने एक आइडिया सोचा है।”
“क्या आइडिया, बेटी?”
“हम आपके खेतों को ऑर्गेनिक फार्म बनाएँगे। और शहर के लोगों को सब्सक्रिप्शन देंगे। वो पैसे देंगे, हम उनके लिए ऑर्गेनिक सब्ज़ियाँ और फल उगाएँगे।”
बाबू साहब मुस्कुराए। “तुम कहाँ से ये सब जानती हो?”
“मैंने इंटरनेट पर पढ़ा है। और मुन्ना दादा ने मुझे सब कुछ सिखाया है।”
प्रिया ने काम शुरू किया। उसने मुन्ना की मदद से छोटा सा ऑर्गेनिक फार्म बनाया—बिना केमिकल के, बिना हाइब्रिड बीज के। उसने अपने स्कूल के दोस्तों को बताया, जिन्होंने अपने माता-पिता को बताया।
धीरे-धीरे ऑर्डर आने लगे। पहले महीने में पाँच परिवार जुड़े। दूसरे महीने में बीस। प्रिया ने बाबू साहब को हर हफ्ते अपनी प्रगति बताई।
बाबू साहब की तबीयत में सुधार होने लगा। डॉक्टर हैरान थे। “आपका उत्साह बढ़ गया है।”
“मेरे खेत फिर से जीवित हो रहे हैं,” बाबू साहब ने कहा।
गर्मियों की छुट्टियाँ खत्म होने वाली थीं। प्रिया ने एक बड़ा फैसला किया। उसने अपने पिता और चाचाओं को एक मीटिंग के लिए बुलाया।
“मैं चाहती हूँ कि हम सब मिलकर दादाजी के खेतों को बचाएँ,” प्रिया ने कहा। “पापा, आप टेक्नोलॉजी ला सकते हैं। सुरेश चाचा, आप ऑर्गेनिक फार्मिंग के बारे में रिसर्च कर सकते हैं। महेश चाचा, आप फाइनेंस संभाल सकते हैं।”
तीनों चुप थे। फिर रमेश बोला—”पर हम शहर में रहते हैं। हम यहाँ कैसे रहेंगे?”
“हमें यहाँ रहने की ज़रूरत नहीं। हम वीकेंड पर आ सकते हैं। और मुन्ना दादा और दूसरे किसान दैनिक काम संभाल सकते हैं।”
बाबू साहब ने, जो वीडियो कॉल पर मौजूद थे, कहा—”प्रिया ने वो कह दिया जो मैं सालों से कहना चाहता था। खेत मर नहीं रहे थे, सिर्फ नए जीवन की प्रतीक्षा कर रहे थे।”
उस दिन एक नई शुरुआत हुई। रमेश ने ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगवाया, पर सौर ऊर्जा से चलने वाला। सुरेश ने ऑर्गेनिक फार्मिंग के नए तरीके ढूँढे। महेश ने बिजनेस प्लान बनाया।
प्रिया ने “खेतों का राजा” नाम से एक वेबसाइट बनाई, जहाँ लोग ऑर्डर दे सकते थे। उसने सोशल मीडिया पर फार्म की कहानी शेयर की—कैसे एक परिवार अपनी विरासत को बचाने के लिए एकजुट हुआ।
धीरे-धीरे चमत्कार होने लगा। खेत फिर से हरे-भरे हो गए। नए पेड़ लगे, नए पौधे उगे। गाँव के युवाओं ने भी रुचि दिखाई। कई ने शहर की नौकरियाँ छोड़कर खेती शुरू की।
एक साल बाद बाबू साहब गाँव लौटे। जब उन्होंने अपने खेत देखे, तो उनकी आँखों में चमक लौट आई। खेत न सिर्फ जीवित थे, बल्कि पहले से ज़्यादा उपजाऊ थे।
प्रिया उनके साथ थी। “दादाजी, देखो! हमारे पास अब सौ परिवार हैं जो हमारी सब्ज़ियाँ लेते हैं। और हमने गाँव की दस महिलाओं को रोज़गार दिया है।”
बाबू साहब ने प्रिया को गले लगा लिया। “तुम सच्ची खेतों की रानी बन गई हो।”
उस शाम बाबू साहब ने अपने तीनों बेटों और प्रिया को बुलाया। “मैंने फैसला किया है। मेरे बाद ये खेत प्रिया के नाम होंगे।”
सब हैरान रह गए। रमेश बोला—”पर पिताजी, वह तो अभी बच्ची है।”
“वह बच्ची नहीं, बुद्धिमान है। उसने वो किया जो तुम तीनों नहीं कर पाए—उसने इस ज़मीन से प्यार किया, समझा कि यह सिर्फ ज़मीन नहीं, जीवन है।”
प्रिया ने कहा—”पर दादाजी, मैं अकेले नहीं संभाल पाऊँगी। पापा और चाचाओं की मदद चाहिए।”
बाबू साहब मुस्कुराए। “तुम सब मिलकर संभालोगे। और याद रखना—खेतों का असली राजा वह नहीं जो सबसे ज़्यादा ज़मीन का मालिक हो, बल्कि वह होता है जो उस ज़मीन को समझता हो, उससे प्यार करता हो।”
आज बाबू शिवनारायण सिंह नहीं रहे। पर उनके खेत आज भी हरे-भरे हैं। प्रिया अब कॉलेज में पढ़ती है, पर हर वीकेंड गाँव आती है। रमेश, सुरेश और महेश भी हर महीने आते हैं। उन्होंने एक ट्रस्ट बनाया है, जिसके तहत खेत चलते हैं।
गाँव में अब “खेतों का राजा” कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक समुदाय है। किसान एकजुट होकर काम करते हैं, नई तकनीक सीखते हैं, और अपनी उपज शहरों में बेचते हैं।
प्रिया ने हाल ही में एक नई योजना शुरू की है—”हर घर खेत”। गाँव के हर घर के सामने छोटा सा किचन गार्डन, ताकि हर परिवार अपनी ज़रूरत की सब्ज़ियाँ उगा सके।
जब भी कोई प्रिया से पूछता है कि उसने यह सब कैसे किया, तो वह मुस्कुराकर कहती है—”मैंने सिर्फ दादाजी की बात मानी। उन्होंने कहा था कि ज़मीन सिर्फ मिट्टी नहीं होती, वह हमारी जड़ें होती हैं। और जड़ों को कभी नहीं काटना चाहिए।”
बाबू शिवनारायण सिंह का सपना सच हुआ—उनके खेत न सिर्फ बचे, बल्कि फले-फूले। और खेतों का राजाअब एक विचार है, एक विरासत है, जो एक नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े हुए है।
गाँव के बाहर बाबू साहब की समाधि है। उस पर लिखा है—”यहाँ सोते हैं खेतों का राजा, जिसकी आत्मा आज भी इन खेतों में घूमती है।” और सच में, जब हवा चलती है और गेहूँ के खेत लहराते हैं, तो लगता है मानो बाबू साहब अपने राज्य का मुआयना कर रहे हों।
खेतों का राजा अमर हो गया। क्योंकि जब तक खेत हैं, जब तक फसलें उगती हैं, तब तक उनकी याद भी जीवित रहेगी। और यही सच्ची विरासत है—न सिर्फ ज़मीन बचाना, बल्कि उस पर उगने वाले जीवन को बचाना।
Berlin, Germany – In a major coup for the Berlin International Film Festival, the world…
The Chief Minister of Goa, Pramod Sawant, has stated that the state government is considering…
TARRANT COUNTY, Texas — In a political race that has captivated local voters and drawn…
MADRID, SPAIN – In a capital derby that proved more challenging than many anticipated, league…
In an era where political spouses are expected to be both accessible and relatable, Melania…
In today’s fast-evolving tech landscape, AI agents are becoming essential tools for automating complex tasks,…
This website uses cookies.