कच्ची पगडंडी
मेघा के लैपटॉप का स्क्रीनसेवर बार-बार बदल रहा था – हिमालय की तस्वीरें, जिन्हें उसने कभी खुद नहीं खींची थी। डेस्क पर रखा हर्बल टी का कप ठंडा पड़ चुका था। बारहवीं मंजिल से दिख रहा मुंबई का शहर अपनी निरंतर गतिशीलता में डूबा हुआ था, पर मेघा का मन कहीं और भटक रहा था। तभी मोबाइल की घंटी बजी। नाम दिखा – “पापा”।
“बेटा, कैसी हो?” पिता की आवाज़ में वही स्नेह था।
“ठीक हूँ पापा। सब काम चल रहा है।”
“सुनो…गाँव वाला घर…तुम्हारी दादी का…उसे बेचने का प्रस्ताव आया है।”
मेघा का दिल एक पल को थम सा गया। उस अजीब से अहसास ने फिर से उसे जकड़ लिया था जो कभी-कभी रातों को जगा देता था – एक खालीपन, जैसे कुछ छूट गया हो।
“बेचेंगे? पर क्यों?” मेघा ने पूछा, आवाज़ थोड़ी अस्थिर।
“बेटा, कोई रखवाला नहीं है। हम तो अब वहाँ कभी-कभी ही जा पाते हैं। तुम तो जानती ही हो, पिछले दस साल से कोई नहीं गया। सब उजड़ रहा है।”
दस साल। मेघा को याद आया। दस साल पहले, बारह साल की उम्र में, वह आखिरी बार गाँव गई थी। दादी की मृत्यु के बाद। फिर शहर की पढ़ाई, नौकरी, जीवन…सब कुछ इतनी तेजी से बदला कि वापस जाने का अवसर ही नहीं मिला।
“पापा…एक हफ्ते की छुट्टी ले लेती हूँ। चलो, एक बार आखिरी बार चलकर देख आएं। शायद कुछ यादगार चीजें संभाल लें।”
पिता को आश्चर्य हुआ, पर वे मान गए। मेघा ने तुरंत अपने बॉस को मेल लिख दिया। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि यह अचानक उत्सुकता क्यों जागी थी। शायद सिर्फ एक बंद अध्याय को ठीक से समाप्त करने की इच्छा।
तीन दिन बाद, मेघा और उसके पिता ट्रेन से उतरकर एक जीप में बैठे गाँव की ओर जा रहे थे। शहर से गाँव तक का सफर एक अजीब समय-यात्रा जैसा था। पक्की सड़कें धीरे-धीरे कच्ची होती गईं, और फिर वह जगह आई जहाँ से जीप आगे नहीं जा सकती थी।
“यहीं से पैदल जाना पड़ेगा,” ड्राइवर ने कहा। “यह कच्ची पगडंडी सीधे गाँव तक जाती है।”
मेघा जीप से उतरी। सामने फैली थी वह पगडंडी – घुमावदार, पथरीली, दोनों ओर ऊँचे खेतों के बीच से गुजरती हुई। हवा में सरसों के पीले फूलों की मादक खुशबू तैर रही थी। एक पल के लिए मेघा स्तब्ध रह गई। कुछ याद आया – बारह साल पहले का वह दिन, जब इसी पगडंडी से वह रोती हुई चल रही थी, दादी का हाथ थामे हुए।
“चलो,” पिता ने कहा, और वे चल पड़े।
पगडंडी की शुरुआत में ही एक पुराना बरगद का पेड़ था। मेघा ने देखा – उसकी जड़ों के पास अभी भी वह पत्थर पड़ा था जिस पर बैठकर दादी उसे कहानियाँ सुनाया करती थीं। उसकी आँखें नम हो गईं।
“याद है मेघा?” पिता ने पूछा। “तुम्हारी दादी तुम्हें यहीं बिठाकर रामायण-महाभारत के किस्से सुनाती थीं।”
“हाँ पापा…याद है। वो कहानी तो मुझे अब भी याद है – एक राजकुमारी जो इसी पगडंडी पर खो गई थी, और उसे रास्ता दिखाने वाला एक जादुई खरगोश मिला था।”
वे आगे बढ़े। पगडंडी ऊपर चढ़ रही थी। बाईं ओर सरसों के खेत थे, दाईं ओर गन्ने की फसल। कहीं दूर बैलगाड़ी की चरचराहट सुनाई दे रही थी। मेघा को लगा जैसे वह किसी भूली हुई यादों की दुनिया में प्रवेश कर रही हो।
थोड़ा आगे चलकर पगडंडी दो हिस्सों में बंटती थी। मेघा रुक गई। “पापा, यह दायाँ रास्ता कहाँ जाता है?”
पिता मुस्कुराए। “तुम्हें याद नहीं? यह तो उस मंदिर की ओर जाता है जहाँ तुम्हारी दादी हर शनिवार को जाती थीं। तुम भी साथ जाती थीं।”
एक झटके से याद आया – हाँ, दादी का हाथ पकड़कर चलना, मंदिर की घंटियों की आवाज़, प्रसाद के रूप में मिला नारियल… ये सब यादें कहाँ दब गई थीं?
मेघा ने अचानक कहा, “पापा, मैं इस रास्ते से जाकर देखना चाहती हूँ। क्या आप यहीं रुक सकते हैं?”
पिता ने हाँ कहा, और मेघा दायीं ओर वाली पगडंडी पर चल पड़ी। यह रास्ता और संकरी थी, दोनों ओर झाड़ियों से घिरी हुई। पाँच मिनट की चलने के बाद सामने एक छोटा सा मंदिर आया – पुराना, पर अभी भी साफ-सुथरा। मंदिर के बाहर एक बूढ़ा पुजारी बैठा था।
मेघा ने नमस्ते की। बूढ़े ने उसे देखा, और अचानक उसकी आँखों में पहचान की चमक दौड़ गई।
“अरे…ये तो गौरी देवी की पोती लगती हो? मेघा नहीं?”
मेघा चौंकी। “जी…पर आपने मुझे कैसे पहचाना?”
पुजारी हँसा। “तुम्हारी दादी तुम्हारी तस्वीर हमेशा दिखाया करती थीं। कहती थीं कि उनकी पोती शहर में पढ़ रही है। और तुम्हारे चेहरे पर उन्हीं की छाप है।”
मेघा की आँखें भर आईं। “आप उन्हें जानते थे?”
“जानते थे? बच्चे, वो तो हर शनिवार आती थीं। आखिरी समय तक आती रहीं। तुम्हारे लिए प्रार्थना करती थीं कि तुम्हारा भला हो।” पुजारी ने अंदर इशारा किया। “आओ, कुछ पल बैठो।”
मंदिर के अंदर वही शांति थी जो मेघा को याद थी। पुजारी ने बताया, “तुम्हारी दादी ने इस मंदिर की मरम्मत के लिए पैसे दिए थे। कहती थीं कि यह मंदिर उनके लिए सबसे प्यारी जगह है, क्योंकि इसी रास्ते पर चलकर वो अपने बचपन के दिन याद करती थीं।”
मेघा ने पूछा, “यह रास्ता कहाँ तक जाता है?”
“चलो, दिखाता हूँ।”
पुजारी उठा और मंदिर के पीछे की ओर ले गया। वहाँ से पगडंडी फिर शुरू होती थी, और एक छोटी सी पहाड़ी पर चढ़ती हुई जाती थी। चढ़ाई कठिन थी, पर मेघा ने पीछा किया। शीर्ष पर पहुँचकर सामने का नज़ारा देखकर उसकी साँस रुक गई।
सामने फैला था एक विशाल तालाब, जिसके चारों ओर सैकड़ों पक्षी थे। पानी इतना स्वच्छ था कि आसमान का प्रतिबिंब साफ दिख रहा था।
“यह तालाब…” मेघा फुसफुसाई।
“तुम्हारी दादी का पसंदीदा स्थान,” पुजारी ने कहा। “वो कहती थीं कि इस तालाब में उनकी सबसे गहरी यादें समाई हुई हैं। उनका बचपन, उनकी माँ, सब कुछ।”
मेघा वहाँ बैठ गई। उसे दादी की एक बात याद आई, जो उन्होंने अपने अंतिम दिनों में कही थी: “हर इंसान की जिंदगी में एक कच्ची पगडंडी होती है, जो उसे उसकी जड़ों की ओर ले जाती है। बस उस पगडंडी पर चलने का साहस चाहिए।”
अब मेघा को समझ आ रहा था कि दादी क्या कहना चाहती थीं।
वह पुजारी से विदा लेकर वापस मुख्य पगडंडी पर आई, जहाँ उसके पिता इंतज़ार कर रहे थे।
“क्या देखा?” पिता ने पूछा।
“बहुत कुछ, पापा। बहुत कुछ।” मेघा की आवाज़ में एक नई गहराई थी।
वे फिर चल पड़े। अब पगडंडी नीचे की ओर उतर रही थी। आधे घंटे बाद, सामने गाँव दिखाई दिया – दस-बारह घर, धुएँ के बादल, और बीच में वह पुराना घर जो मेघा का था।
घर के सामने पहुँचकर मेघा स्तब्ध रह गई। दरवाज़े पर ताला लगा था, पर आँगन में एक पुरानी चारपाई पड़ी थी। खिड़कियाँ टूटी हुई थीं। पर इन सबके बावजूद, इस जगह में एक अजीब सी जीवंतता थी।
पिता ने ताला खोला। अंदर का नज़ारा और भी उदासीन था – जाले लगे हुए, फर्नीचर धूल से ढके हुए। पर मेघा की नज़र सीधे रसोई की ओर गई। वहाँ अभी भी दादी का चूल्हा था, और दीवार पर उनकी एक पुरानी तस्वीर लगी थी।
मेघा ने तस्वीर उतारी। दादी मुस्कुरा रही थीं, जैसे कह रही हों: “मैं जानती थी कि तुम लौटोगी।”
“पापा,” मेघा ने अचानक कहा, “मैं इस घर को नहीं बेचना चाहती।”
पिता चौंके। “पर मेघा…तुम तो शहर में रहती हो। यहाँ कौन रखेगा?”
“मैं रखूंगी।” मेघा के शब्द दृढ़ थे। “मैं इसे फिर से जीवंत करूंगी।”
“पर क्यों? यह तो सिर्फ एक पुराना घर है।”
मेघा ने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ से वह कच्ची पगडंडी दिख रही थी जिससे वे आए थे। “पापा, यह सिर्फ एक घर नहीं है। यह एक कहानी है। मेरी कहानी। दादी की कहानी। और आज इस पगडंडी पर चलकर मुझे एहसास हुआ कि हम कितनी तेजी से अपनी जड़ों को भूल रहे हैं।”
वह पिता की ओर मुड़ी। “मैं हर महीने कुछ दिन यहाँ आया करूंगी। इस घर को ठीक करवाऊंगी। शायद एक छोटी सी लाइब्रेरी बनाऊं, या बच्चों के लिए कक्षाएं शुरू करूं। मुझे लगता है दादी यही चाहती थीं।”
पिता ने मेघा की आँखों में एक चमक देखी जो सालों से नहीं देखी थी। शहर की भागदौड़ में खो गई उनकी बेटी वापस आ गई थी।
“ठीक है,” पिता ने कहा, आवाज़ भावुक। “अगर तुम ऐसा चाहती हो, तो हम इसे नहीं बेचेंगे।”
उस शाम, मेघा आँगन में बैठी थी। चारपाई पर बैठकर वो सूर्यास्त देख रही थी। गाँव की औरतें मिलने आई थीं, कुछ उसे पहचानती थीं, कुछ नहीं। पर सबने प्यार दिया। एक बूढ़ी महिला ने कहा, “तुम बिल्कुल अपनी दादी जैसी लग रही हो।”
रात को, जब पिता सो गए, मेघा फिर से उस पगडंडी पर चल पड़ी। चाँदनी रात में पगडंडी रहस्यमय लग रही थी। वह मंदिर तक गई, फिर तालाब तक। पानी में चाँद का प्रतिबिंब टिमटिमा रहा था।
मेघा ने अपने मोबाइल से एक फोटो खींची – पगडंडी, तालाब, चाँदनी – और इसे अपने इंस्टाग्राम पर डाला। कैप्शन लिखा: “कभी-कभी जीवन आपको वापस उसी जगह ले आता है जहाँ से आपने शुरुआत की थी। सिर्फ इसलिए कि आप यह देख सकें कि आप कितनी दूर आ गए हैं, और यह जान सकें कि अब आप कहाँ जाना चाहते हैं। #कच्चीपगडंडी #जड़ें #घर”
अगले दिन, मेघा ने गाँव के कुछ लोगों से बात की। एक युवक, राहुल, जो गाँव में ही रहता था और कृषि से संबंधित काम करता था, उसने मदद की पेशकश की।
“दीदी, अगर आप यहाँ कुछ करना चाहती हैं, तो मैं मदद कर सकता हूँ,” राहुल ने कहा। “मेरे पास समय है, और मैं चाहता हूँ कि हमारा गाँव भी विकास करे।”
मेघा ने एक योजना बनाई। वह घर के एक हिस्से को डिजिटल लाइब्रेरी और कंप्यूटर केंद्र में बदलना चाहती थी, जहाँ गाँव के बच्चे आकर पढ़ सकें। दूसरे हिस्से में एक छोटा सा संग्रहालय बनाना चाहती थी, जहाँ गाँव की इतिहास और संस्कृति को संजोया जा सके।
सप्ताह भर में, मेघा ने शहर लौटना था। पर अब वह वापसी को विदाई नहीं, एक नई शुरुआत मान रही थी। जाने से पहले, उसने एक बार फिर उस पगडंडी पर चलने का फैसला किया।
इस बार अकेले। हर कदम के साथ, वह अपने भीतर एक परिवर्तन महसूस कर रही थी। बरगद के पेड़ के पास, उसने एक पत्थर उठाया और उसे जेब में रख लिया – एक यादगार। मंदिर में जाकर प्रार्थना की। तालाब के किनारे बैठकर कुछ पल मौन रही।
वापस लौटते हुए, उसने देखा कि पगडंडी के किनारे कुछ नए पौधे लगाए जा सकते हैं। शायद फलों के पेड़, ताकि राहगीरों को छाया और फल मिल सकें।
गाँव पहुँचकर, मेघा ने राहुल से कहा, “मैं महीने में एक सप्ताह यहाँ आया करूंगी। बाकी समय आप इस प्रोजेक्ट को संभालिएगा। मैं फंड और सामग्री का इंतजाम करूंगी।”
“जरूर, दीदी,” राहुल ने उत्साह से कहा।
विदा लेते समय, गाँव के लोग इकट्ठा हुए। बूढ़े पुजारी ने आशीर्वाद दिया। “तुम्हारी दादी तुम पर गर्व कर रही होंगी।”
जीप में बैठकर जाते हुए, मेघा ने पीछे मुड़कर देखा। वह कच्ची पगडंडी अब भी वहीं थी, घुमावदार, रहस्यमय, जैसे कोई प्रतीक्षा कर रहा हो। पर अब मेघा को डर नहीं था। वह जानती थी कि यह पगडंडी उसे हमेशा घर लौटा लाएगी।
ट्रेन में बैठकर मेघा ने अपने लैपटॉप पर एक नया फोल्डर बनाया – “प्रोजेक्ट कच्ची पगडंडी”। पहली फाइल का नाम दिया – “योजना: गाँव का पुनर्जीवन”।
उसे एहसास हुआ कि कच्ची पगडंडियाँ सिर्फ जमीन पर नहीं होतीं। वे हमारे मन में भी होती हैं – वे रास्ते जो हमें हमारी पहचान, हमारी यादों, हमारे सपनों तक ले जाते हैं। बस, उन पर चलने का साहस चाहिए।
मुंबई पहुँचकर, जब मेघा ने अपने आलीशान अपार्टमेंट में प्रवेश किया, तो उसे वह खालीपन महसूस नहीं हुआ। क्योंकि अब उसकी जेब में एक पत्थर था – एक पगडंडी से उठाया हुआ – जो उसे याद दिलाता रहेगा कि उसका घर कहीं और भी है। और उसके कंप्यूटर पर एक योजना थी जो उसे बार-बार उसी पगडंडी पर वापस ले जाएगी।
मेघा ने खिड़की से बाहर देखा। शहर की रोशनियाँ टिमटिमा रही थीं। पर अब उन रोशनियों के पीछे, उसे एक और रोशनी दिखाई दे रही थी – एक पुराने घर की, एक गाँव की, और एक कच्ची पगडंडी की, जो चाँदनी रात में मदहोश कर देने वाली चमक से भर गई थी।
वह मुस्कुराई। दादी सही कहती थीं। हर इंसान की जिंदगी में एक कच्ची पगडंडी होती है। और मेघा ने अंततः अपनी पगडंडी पा ली थी।
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