राजू की आँखें खुलीं तो छत से पानी की एक बूँद उसके माथे पर आकर गिरी। वह फर्श पर पड़े पुराने गद्दे से उठ बैठा। बारिश रातभर होती रही थी और उनके कच्चे घर की दीवारों से कीचड़ टपक रहा था। एक कोने में रखा बर्तन पानी से भर चुका था जो छत से टपक-टपक कर इकट्ठा हुआ था।
“माँ!” राजू ने आवाज लगाई।
कमरे के दूसरे कोने में माँ सीता देवी चूल्हे के पास बैठी आटा गूँथ रही थीं। छत से पानी टपक रहा था लेकिन वह उसे अनदेखा कर रही थीं।
“उठ गए बेटा? जल्दी से नहा-धोकर तैयार हो जाओ। स्कूल जाना है,” माँ ने कहा, उनकी आवाज में थकान थी।
राजू ने घर के चारों ओर नजर दौड़ाई। यह दो-कमरे का कच्चा मकान था जिसे उसके पिता ने बीस साल पहले बनाया था। दीवारें मिट्टी की थीं, छत खपरैल की। बारिश के दिनों में हर जगह से पानी रिसता था। गर्मियों में भीतर भट्ठी जैसा ताप और सर्दियों में ठंडी हवाएँ सीधे अन्दर आती थीं।
“माँ, कब हमारा नया घर बनेगा? पापा ने कहा था इस साल पक्का मकान बनवाएँगे,” राजू ने पूछा।
सीता देवी ने एक गहरी साँस ली। “तुम्हारे पापा मजदूरी के लिए शहर गए हैं। जब पैसे जमा होंगे, तब घर बनेगा। अभी जल्दी नहीं है।”
लेकिन राजू के लिए यह बहुत जल्दी था। वह अपने दोस्तों के साथ स्कूल जाता था। उसके अधिकांश दोस्त पक्के घरों में रहते थे। जब वे अपने घरों के बारे में बात करते, तो राजू चुप हो जाता। उसे शर्म आती थी कि वह अभी भी कच्चे घर में रहता है।
स्कूल में उस दिन निबंध प्रतियोगिता थी – “मेरा सपनों का घर”। राजू ने पूरी लगन से निबंध लिखा। उसने एक दो मंजिला घर की कल्पना की – सफेद रंग की दीवारें, लाल टाइलों वाली छत, बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ जिनसे धूप आती हो, एक बगीचा जहाँ उसकी माँ फूल उगा सकें।
शिक्षक ने राजू के निबंध को सबसे अच्छा घोषित किया। “राजू ने बहुत सुंदर ढंग से अपने सपनों का घर वर्णित किया है,” शिक्षक ने कहा।
लेकिन एक लड़के ने मजाक उड़ाया, “सपने तो बड़े-बड़े हैं, लेकिन घर तो कच्चा है तुम्हारा!”
सभी बच्चे हँस पड़े। राजू का सिर शर्म से झुक गया। वह दिनभर चुपचाप रहा।
राजू के पिता रमेश कुमार शहर में मजदूरी करते थे। वह हफ्ते में छह दिन काम करते, सातवें दिन गाँव लौटते। उनका सपना था कि वे अपने परिवार के लिए एक पक्का घर बनवाएँ।
एक शनिवार की शाम जब रमेश गाँव लौटे, तो उनकी आँखों में थकान थी। उनके हाथों पर छाले पड़े थे, कपड़े सीमेंट और मिट्टी से सने हुए थे।
“कैसे हो बेटा?” उन्होंने राजू को गले लगाते हुए पूछा।
“पापा, आज स्कूल में निबंध प्रतियोगिता थी। मैंने प्रथम पुरस्कार जीता,” राजू ने उत्साह से कहा।
रमेश ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा। “बहुत अच्छे! किस विषय पर था?”
“मेरा सपनों का घर।”
रमेश का चेहरा गंभीर हो गया। उन्होंने अपने कच्चे घर की ओर देखा। “हमारा भी एक दिन सपनों का घर बनेगा, राजू। मैं वादा करता हूँ।”
रात के खाने के बाद जब राजू सो गया, तो रमेश और सीता बातचीत करने लगे।
“कितना जमा हुआ है?” सीता ने पूछा।
“पिछले महीने तक बीस हजार थे, लेकिन तेराजी की बीमारी के इलाज में दस हजार खर्च हो गए,” रमेश ने उदास स्वर में कहा।
तेराजी रमेश की माँ थीं, जो बीमार रहती थीं।
“घर बनाने के लिए कम से कम दो लाख रुपए तो चाहिए,” सीता ने कहा। “इस हिसाब से तो हमें और पाँच-छह साल लग जाएँगे।”
“मैं और मेहनत करूँगा। दिन में दो जगह काम करूँगा,” रमेश ने दृढ़ता से कहा।
“लेकिन तुम्हारी सेहत…” सीता की आवाज में चिंता थी।
“सेहत की चिंता बाद में। पहले अपने बच्चे को एक अच्छा घर देना है। मैं नहीं चाहता कि वह मेरी तरह शर्मिंदगी झेले।”
जुलाई का महीना था। बारिश लगातार हो रही थी। एक रात तेज बारिश हुई। राजू की नींद में ही छत से पानी टपकने की आवाज आई। वह उठ बैठा। पूरा कमरा पानी से भरा हुआ था। एक कोने में छत से कीचड़ गिर रहा था।
“माँ! पापा!” राजू चिल्लाया।
रमेश और सीता भी जाग गए। रमेश ने तुरंत बिस्तर उठाया और सूखी जगह की तलाश की। लेकिन पूरा घर पानी में तैर रहा था।
अचानक एक तेज आवाज हुई। घर का एक कोना ढह गया। दीवार की मिट्टी पानी में घुलकर गिर रही थी।
“बाहर निकलो! जल्दी बाहर निकलो!” रमेश चिल्लाया।
वे तीनों बारिश में भीगते हुए बाहर निकले। पड़ोसी भी जाग गए थे। सभी ने मिलकर उन्हें अपने घर में शरण दी।
सुबह होते-होते बारिश रुक गई। राजू और उसके माता-पिता जब अपने घर लौटे, तो देखा कि घर का आधा हिस्सा ढह चुका था। बचा हुआ हिस्सा भी खड़ा रहने लायक नहीं था।
सीता देवी रोने लगीं। “हमारा सब कुछ तो नष्ट हो गया!”
रमेश निराशा से घर के मलबे को देखते रहे। उनकी आँखों में आँसू थे। सालों की मेहनत, सपने सब मिट्टी में मिल गए थे।
राजू ने अपनी किताबों को मलबे में से निकालने की कोशिश की। उसकी डायरी, जिसमें उसने अपने सपनों के घर का चित्र बनाया था, पूरी तरह भीगकर नष्ट हो चुकी थी।
गाँव के सरपंच हरि सिंह सुबह ही मौके पर पहुँच गए। उन्होंने रमेश के कंधे पर हाथ रखा।
“चिंता मत करो रमेश। गाँव वाले तुम्हारी मदद करेंगे।”
हरि सिंह ने गाँव की पंचायत बुलाई। सभी गाँव वाले इकट्ठा हुए।
“रमेश का घर बारिश में ढह गया है। उनके पास अब रहने को घर नहीं है। हमें उनकी मदद करनी चाहिए,” हरि सिंह ने कहा।
गाँव के लोगों ने मिलकर फैसला किया कि वे रमेश के लिए एक अस्थायी झोपड़ी बनाएँगे। हर परिवार ने कुछ न कुछ सहायता दी – कोई लकड़ी लाया, कोई खपरैल, कोई रस्सियाँ।
तीन दिनों में एक छोटी सी झोपड़ी तैयार हो गई। यह उनके पुराने घर से भी छोटी थी, लेकिन कम से कम वे खुले आसमान के नीचे तो नहीं थे।
रमेश ने गाँव वालों को धन्यवाद दिया। “आप सबने हमारी जान बचाई। हम कभी इस उपकार को नहीं भूलेंगे।”
लेकिन राजू के मन में एक प्रश्न था। “पापा, क्या हम हमेशा इसी झोपड़ी में रहेंगे?”
रमेश ने उसे चुपचाप देखा। उसकी आँखों में जवाब नहीं था।
अगले कुछ हफ्तों में रमेश फिर से शहर मजदूरी करने लगे। लेकिन इस बार उनके मन में एक निराशा थी। वे जानते थे कि मजदूरी से जो पैसे कमाएँगे, वे कभी पक्का घर नहीं बनवा पाएँगे।
एक दिन शहर में काम करते हुए रमेश की मुलाकात एक आर्किटेक्ट से हुई। वह एक साइट पर निरीक्षण के लिए आया था। रमेश ने उससे बात की।
“साहब, पक्का घर बनवाने में कितना खर्च आता है?”
आर्किटेक्ट ने उसे देखा। “तुम्हारे पास कितनी जमीन है?”
“गाँव में दो कट्ठा जमीन है।”
“साधारण दो कमरे का मकान बनवाने में डेढ़ से दो लाख रुपए लगेंगे।”
रमेश का सिर झुक गया। यह रकम उसके लिए असंभव थी।
लेकिन आर्किटेक्ट ने आगे कहा, “लेकिन तुम कच्चा घर क्यों नहीं बनवाते? आधुनिक तकनीक से बना कच्चा घर भी मजबूत हो सकता है।”
“कच्चा घर?” रमेश ने आश्चर्य से पूछा।
“हाँ, मिट्टी से बने घर। लेकिन नई तकनीक से। इससे खर्च बहुत कम आता है और घर टिकाऊ भी होता है। साथ ही, गर्मी में ठंडा और सर्दी में गरम रहता है।”
रमेश के मन में एक आशा की किरण जगी। उसने आर्किटेक्ट से विस्तार से जानकारी ली।
रमेश ने उस आर्किटेक्ट का पता लिया और उसके ऑफिस गया। आर्किटेक्ट का नाम अरविंद शर्मा था। वह पर्यावरण के अनुकूल आवास पर काम कर रहा था।
“मिट्टी के घर बनाने की आधुनिक तकनीक को ‘राममेड अर्थ’ या ‘कंप्रेस्ड अर्थ ब्लॉक’ कहते हैं,” अरविंद ने समझाया। “इसमें मिट्टी को एक मशीन से दबाकर ईंटें बनाई जाती हैं। इन ईंटों से बना घर पक्के घर जितना ही मजबूत होता है।”
“लेकिन इस पर कितना खर्च आएगा?” रमेश ने सबसे महत्वपूर्ण सवाल पूछा।
“तुम्हारे घर के लिए लगभग पच्चीस से तीस हजार रुपए।”
रमेश की आँखें चौंधिया गईं। “केवल तीस हजार?”
“हाँ, क्योंकि मुख्य सामग्री मिट्टी है जो तुम्हारे पास पहले से है। तुम्हें केवल मशीन किराए पर लेनी होगी और थोड़ा सीमेंट व अन्य सामग्री खरीदनी होगी।”
रमेश ने फैसला किया कि वह इस तरह का घर बनवाएगा। अरविंद ने उसे एक छोटी सी ट्रेनिंग दी और मशीन किराए पर लेने के बारे में बताया।
रमेश गाँव लौटकर सीता और राजू को यह खबर सुनाई।
“लेकिन कच्चा घर फिर से बारिश में नहीं गिर जाएगा?” सीता ने चिंता जताई।
“नहीं, यह नई तकनीक है। इससे बना घर बहुत मजबूत होता है। मैंने खुद देखा है,” रमेश ने आश्वासन दिया।
राजू ने पूछा, “पापा, क्या यह हमारे पुराने घर जैसा होगा?”
“नहीं बेटा, यह उससे कहीं बेहतर होगा। इसमें खिड़कियाँ होंगी, अलग कमरे होंगे, और सबसे बड़ी बात – यह बारिश में नहीं गिरेगा।”
रमेश ने गाँव के लोगों को अपनी योजना के बारे में बताया। कुछ लोगों को संदेह था, लेकिन अधिकांश ने उसका समर्थन किया। हरि सिंह ने गाँव के युवाओं को रमेश की मदद करने को कहा।
पहला कदम मिट्टी इकट्ठा करना था। रमेश के खेत से मिट्टी ली गई। अरविंद ने गाँव आकर जाँच की कि मिट्टी उपयुक्त है या नहीं।
फिर मशीन आई। यह एक छोटी सी मशीन थी जो मिट्टी को दबाकर ईंटें बनाती थी। गाँव के युवाओं ने इसे चलाना सीखा।
रमेश, राजू और गाँव के कुछ युवा मिलकर ईंटें बनाने लगे। यह कठिन काम था, लेकिन सभी के चेहरे पर उत्साह था।
दो हफ्तों में पर्याप्त ईंटें तैयार हो गईं। अब घर की नींव रखने का समय था। अरविंद ने गाँव आकर नींव के लिए निर्देश दिए।
“कच्चे घर की भी मजबूत नींव जरूरी है,” अरविंद ने समझाया। “नींव में पत्थर और सीमेंट का प्रयोग करेंगे ताकि नमी ऊपर न आ सके।”
गाँव के लोगों ने मिलकर नींव खोदी। हरि सिंह ने एक छोटा सा समारोह आयोजित किया जिसमें नींव का पत्थर रखा गया।
राजू ने अपने हाथों से पहली ईंट रखी। उसका चेहरा खुशी से चमक रहा था।
“यह ईंट मैं रख रहा हूँ,” राजू ने कहा। “यह हमारे नए घर की शुरुआत है।”
दीवारें बननी शुरू हुईं। नई तकनीक से बनी ईंटें बहुत मजबूत थीं। दीवारें सीधी और समान ऊँचाई की बन रही थीं।
अरविंद ने एक और नई तकनीक सिखाई – “कोब” तकनीक। इसमें मिट्टी, रेत और भूसा मिलाकर दीवारों पर पलस्तर किया जाता था। यह पलस्तर बहुत मजबूत और टिकाऊ होता था।
घर बनने में एक महीना लगा। अंत में एक सुंदर दो कमरे का घर तैयार हुआ। इसमें दो खिड़कियाँ थीं, एक दरवाजा, और एक छोटा सा बरामदा। छत के लिए लकड़ी के शहतीर और खपरैल का प्रयोग किया गया था।
अरविंद ने एक और महत्वपूर्ण सुझाव दिया। “छत से बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए एक व्यवस्था करो। इससे तुम्हें पीने के पानी की समस्या नहीं होगी।”
रमेश ने छत से पानी इकट्ठा करने की व्यवस्था बनाई। एक बड़ा टैंक लगाया गया जिसमें बारिश का पानी जमा हो सकता था।
आखिरकार वह दिन आया जब घर पूरा हुआ। गाँव के सभी लोग उसे देखने आए। घर बाहर से साधारण लगता था, लेकिन अन्दर से बहुत आरामदायक था।
हरि सिंह ने कहा, “यह घर सिर्फ रमेश का नहीं, पूरे गाँव की उपलब्धि है। हमने मिलकर यह साबित किया है कि कम खर्च में भी अच्छा घर बन सकता है।”
राजू ने अपने नए कमरे में प्रवेश किया। यह उसके पुराने कमरे से बड़ा था। खिड़की से सूरज की रोशनी आ रही थी। वह खिड़की के पास बैठ गया और बाहर देखने लगा।
“माँ, अब बारिश में पानी नहीं टपकेगा न?” राजू ने पूछा।
सीता देवी मुस्कुराईं। “नहीं बेटा, अब नहीं टपकेगा। यह हमारा नया, मजबूत घर है।”
रमेश का घर पूरे गाँव में चर्चा का विषय बन गया। लोग आते और घर देखकर जाते। कई लोगों ने रमेश से पूछा कि क्या वे भी इस तरह का घर बनवा सकते हैं।
हरि सिंह ने एक बैठक बुलाई। “रमेश के घर ने हमें एक नया रास्ता दिखाया है। हमारे गाँव में कई लोग हैं जो पक्का घर नहीं बनवा पा रहे हैं। हम सब मिलकर एक सहकारी समिति बना सकते हैं और इस तकनीक से सबके घर बना सकते हैं।”
गाँव वालों ने इस विचार का समर्थन किया। एक “ग्राम आवास सहकारी समिति” बनी। रमेश को इसका प्रमुख बनाया गया। अरविंद ने भी मदद का वादा किया।
धीरे-धीरे गाँव में और भी मिट्टी के घर बनने लगे। गाँव का रूप बदलने लगा। अब यहाँ कच्चे घर नहीं, बल्कि आधुनिक मिट्टी के घर थे जो सुंदर और टिकाऊ थे।
राजू के स्कूल में फिर से निबंध प्रतियोगिता हुई। इस बार विषय था – “मेरा घर”। राजू ने अपने नए घर के बारे में लिखा।
“मेरा घर मिट्टी का बना हुआ है, लेकिन यह मेरे लिए महल के समान है। इसमें मेरी माँ की मेहनत है, मेरे पिता का सपना है, और पूरे गाँव का प्यार है। मुझे अपने घर पर गर्व है।”
इस बार कोई राजू का मजाक नहीं उड़ाया। बल्कि, शिक्षक ने उसके निबंध को सभी बच्चों को सुनाया।
कुछ महीनों बाद मानसून आया। तेज बारिश हुई। पहले की तरह राजू डरा नहीं। वह खिड़की के पास बैठकर बारिश देखने लगा।
बूँदें छत पर गिर रही थीं, लेकिन अन्दर एक बूँद भी नहीं आ रही थी। घर मजबूती से खड़ा था।
रमेश और सीता देवी भी खुश थे। सालों का सपना साकार हुआ था।
एक दिन अरविंद फिर से गाँव आया। उसने देखा कि अब गाँव में दस नए मिट्टी के घर बन चुके थे।
“तुमने न केवल अपना सपना पूरा किया, बल्कि पूरे गाँव को एक नई दिशा दी,” अरविंद ने रमेश से कहा।
रमेश मुस्कुराया। “मैंने सीखा कि सपना कच्चा नहीं होता। सपने तो हमेशा पक्के होते हैं। बस उन्हें पूरा करने के लिए हमें सही रास्ता चुनना होता है।”
राजू ने अपने पिता की बात सुनी। उसे अब समझ आया कि घर की मजबूती उसकी दीवारों में नहीं, बल्कि उसमें रहने वाले लोगों के सपनों और एकता में होती है।
उस रात राजू ने अपनी डायरी में लिखा: “आज मैंने सीखा कि कच्चा घर केवल मिट्टी का नहीं होता, बल्कि वह होता है जिसमें सपनों की नींव न हो। हमारा नया घर कच्ची मिट्टी से बना है, लेकिन इसकी नींव हमारे सपनों की पक्की नींव पर टिकी है। और यही इसे दुनिया का सबसे मजबूत घर बनाता है।”
बारिश रुक गई। आसमान में इंद्रधनुष नजर आया। राजू ने खिड़की से बाहर देखा। इंद्रधनुष के सात रंग उसके नए घर की दीवारों पर पड़ रहे थे, मानो प्रकृति भी उसके सपने को सलाम कर रही हो।
कच्चे घर का सपना अब पूरा हो चुका था, लेकिन नए सपने जन्म ले रहे थे – एक बेहतर गाँव का सपना, एक बेहतर जीवन का सपना। और राजू जानता था कि ये सपने भी एक दिन सच होंगे, क्योंकि अब उसे पता था कि सपनों को सच करने का रास्ता कैसे तय किया जाता है।
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