राहुल सात साल का एक चतुर लड़का था, पर उसकी एक समस्या थी – वह खेलना भूल चुका था। उसका सारा समय टीवी, वीडियो गेम्स और मोबाइल फोन में बीतता था। एक दिन, जब उसकी दादी ने उसे अपने बचपन के खेलों के बारे में बताया, तो राहुल ने नाक-भौं सिकोड़ते हुए कहा, “दादी, वो सब पुराने खेल बोरिंग हैं। मेरे पास तो सुपर-डुपर वीडियो गेम है!”
दादी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, असली खेल तो कल्पना में होते हैं। चलो, मैं तुम्हें एक राज़ की बात बताती हूँ।”
दादी ने अटारी से एक पुराना, धूल भरा डिब्बा निकाला। उसमें कोई आधुनिक गेम कंसोल नहीं था, बल्कि कुछ साधारण चीजें थीं: एक लाल रुमाल, पाँच पत्थर, एक लकड़ी का स्पिनिंग टॉप, एक गुल्लक की तरह दिखने वाली डिब्बी, और कुछ रंगीन कंचे।
“यह है जादुई खेलों का डिब्बा,” दादी ने रहस्यमय अंदाज में कहा।
राहुल ने उपहास किया, “ये कैसे जादुई हैं? इनमें तो बैटरी भी नहीं है, न ही स्क्रीन है!”
दादी ने लाल रुमाल उठाया और कहा, “इस रुमाल का नाम है ‘आकाशदर्शी’। इसे आँखों पर बाँधो और कल्पना करो कि तुम आकाश में उड़ रहे हो।”
राहुल ने मजाक समझकर रुमाल आँखों पर बाँध लिया। कुछ ही पलों में, उसे एहसास हुआ कि वह सचमुच हवा में तैर रहा है! नीचे छोटे-छोटे घर, हरे-भरे खेत और नदी बहती दिख रही थी।
वह चिल्लाया, “दादी! मैं उड़ रहा हूँ! सचमुच!”
जैसे ही उसने रुमाल हटाया, सब कुछ सामान्य हो गया। वह अपने कमरे में जमीन पर खड़ा था।
“यह कैसे हुआ?” राहुल हैरान था।
दादी ने समझाया, “यह तुम्हारी अपनी कल्पना का जादू था। जादुई खेल तुम्हारी कल्पना को जगाते हैं।”
अगले दिन, दादी ने पाँच चिकने पत्थर निकाले। “इन्हें ‘सपनों के पत्थर’ कहते हैं। हर पत्थर एक अलग दुनिया में ले जाता है।”
पहला पत्थर – राहुल ने जब इसे हाथ में लिया, तो वह एक जंगल में पहुँच गया जहाँ जानवर बोल सकते थे। एक हिरण ने उससे कहा, “तुम वह पहले इंसान हो जिसने हमसे बात करने की कोशिश की।”
दूसरा पत्थर – समुद्र की गहराइयों में, मछलियों के साथ तैरते हुए।
तीसरा पत्थर – बादलों के ऊपर एक महल में, जहाँ हवा से बातें होती थीं।
चौथा पत्थर – एक ऐसी दुनिया जहाँ सब कुछ उल्टा था: पेड़ जमीन के अंदर उगते थे और घर पेड़ों पर लटके थे।
पाँचवा पत्थर – एक शांत झील के किनारे, जहाँ पानी संगीत बजाता था।
हर बार पत्थर छोड़ते ही राहुल वापस अपने कमरे में आ जाता। उसकी आँखों में एक नई चमक थी।
“अब यह लकड़ी का लट्टू देखो,” दादी ने कहा। “इसका नाम है ‘गीतघुमरी’।”
जैसे ही राहुल ने लट्टू को घुमाया, वह गाने लगा! एक मधुर आवाज में गा रहा था:
“घूम-घूम कर दुनिया देखूँ
रंग-बिरंगे सपने सेखूँ
खेल-खेल में सीखूँ जीवन
कल्पना है मेरा धन…”
लट्टू के गीत के साथ-साथ, कमरे में रंग-बिरंगी रोशनी नाचने लगी। फर्नीचर भी हल्का-सा हिलने लगा मानो नाच रहे हों।
राहुल ने पूछा, “दादी, क्या सब कुछ जीवित है?”
“हर चीज में जीवन है, बस हमें देखने की आँखें चाहिए,” दादी ने जवाब दिया।
सबसे रहस्यमय थी वह गुल्लकनुमा डिब्बी। दादी ने इसे ‘कल्पना कोष’ बताया।
“इसमें पैसे नहीं, बल्कि विचार जमा होते हैं,” दादी ने समझाया।
राहुल ने डिब्बी खोली तो अंदर से चमकदार बुलबुले निकले। हर बुलबुले में एक तस्वीर थी: एक बच्चा पतंग उड़ाते हुए, बच्चे गिल्ली-डंडा खेलते हुए, लड़कियाँ रस्सी कूदते हुए।
“ये सारे बुलबुले उन बच्चों के विचार हैं जो पहले इस डिब्बी का इस्तेमाल कर चुके हैं,” दादी ने बताया।
राहुल ने भी एक विचार डाला – एक ऐसे खेल का जहाँ बच्चे चाँद पर क्रिकेट खेल सकें। डिब्बी से एक नया, चमकीला बुलबुला निकला और हवा में तैरने लगा।
कंचे सबसे आकर्षक थे। “ये हैं ‘मित्र मणि’,” दादी ने कहा। “हर कंचा एक नया दोस्त बनाता है।”
राहुल ने पहला कंचा उठाया – नीला। अचानक, उसके सामने एक लड़का प्रकट हुआ जो सौ साल पहले इसी घर में रहता था। उसका नाम था बिरजू।
“चलो, गिल्ली-डंडा खेलते हैं,” बिरजू ने कहा।
दूसरा कंचा – हरा। एक लड़की आई जो पेड़ों से बात कर सकती थी।
तीसरा कंचा – पीला। एक ऐसा लड़का जो बादलों पर चल सकता था।
हर कंचे से मिला दोस्त राहुल को एक नया खेल सिखाता। उसे एहसास हुआ कि खेल सिर्फ जीतने-हारने के लिए नहीं होते, बल्कि दोस्ती, सीख और मस्ती के लिए होते हैं।
एक दिन, जब राहुल जादुई खेलों में मग्न था, उसके पड़ोसी मोहन ने देख लिया। मोहन एक बिज़नेसमैन था जो हर चीज से पैसा कमाना चाहता था।
उसने राहुल से कहा, “ये जादुई खेल मुझे बेच दो। मैं तुम्हें दस नए वीडियो गेम दूंगा।”
राहुल ने मना कर दिया, “ये बिकाऊ नहीं हैं। ये तो कल्पना के खेल हैं।”
पर मोहन ने चाल चली। उसने राहुल के माता-पिता को समझाया कि ये पुराने खिलौने सिर्फ धूल इकट्ठा करते हैं और राहुल का समय बर्बाद करते हैं।
राहुल के पिता ने कहा, “बेटा, मोहन अंकल ठीक कह रहे हैं। तुम इन पुराने खिलौनों के बजाय नए गेम्स खेलो।”
राहुल बहुत दुखी हुआ। दादी ने उसे समझाया, “जादुई खेल तभी काम करते हैं जब कोई उन पर विश्वास करे। अगर तुम्हारे माता-पिता इन्हें फेंक देंगे, तो ये साधारण खिलौने बन जाएंगे।”
राहुल ने एक योजना बनाई। उसने मोहन से कहा, “मैं आपको जादुई खेल दूंगा, पर पहले आपको एक शर्त माननी होगी। आपको इनमें से एक खेल खेलकर देखना होगा।”
मोहन हँसा, “ठीक है, मुझे दिखाओ तुम्हारा जादू।”
राहुल ने मोहन की आँखों पर लाल रुमाल बाँधा। “अब कल्पना करिए आप एक बच्चे हैं और आकाश में उड़ रहे हैं।”
शुरू में मोहन हँसता रहा, पर धीरे-धीरे उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव आने लगे। “वाह! मैं सचमुच उड़ रहा हूँ! ये कैसे हो रहा है?”
रुमाल हटाते ही मोहन की आँखों में आँसू थे। “मैंने बचपन में ऐसे ही उड़ने का सपना देखा था। पर फिर… फिर मैं बड़ा हो गया। पैसा कमाने में इतना व्यस्त हो गया कि सपने देखना भूल गया।”
मोहन ने राहुल से माफी माँगी। “तुम्हारे ये जादुई खेल अनमोल हैं। इन्हें कभी मत खोना।”
उसने राहुल के माता-पिता को समझाया, “भाई साहब, ये कोई साधारण खिलौने नहीं हैं। ये तो कल्पना के द्वार हैं। इन्हें संभालकर रखिए।”
राहुल के पिता ने पूछा, “पर हमें कैसे पता चलेगा कि ये सचमुच जादुई हैं?”
राहुल ने पूरे परिवार को एक साथ जादुई खेल खेलने के लिए आमंत्रित किया। उसने हर किसी को एक कंचा दिया।
दादी ने पीला कंचा लिया और वह अपनी बहन के साथ बचपन में खेलते दिखाई दीं।
माँ ने हरा कंचा लिया और वह एक बगीचे में थीं जहाँ फूल गा रहे थे।
पिता ने नीला कंचा लिया और वह अपने पुराने दोस्तों के साथ क्रिकेट खेल रहे थे।
पूरा परिवार हँसी-मजाक में डूब गया। उन्हें एहसास हुआ कि ये साधारण खिलौने नहीं थे। ये तो खुशियों के संदेशवाहक थे।
राहुल के पिता ने कहा, “मुझे माफ करना बेटा। मैंने तुम्हारी कल्पना की दुनिया को नहीं समझा।”
अब राहुल ने एक नया मिशन शुरू किया। उसने अपने दोस्तों को जादुई खेल दिखाए। पहले तो वे हँसे, पर जब उन्होंने खुद अनुभव किया, तो वे भी मंत्रमुग्ध हो गए।
राहुल और उसके दोस्तों ने मिलकर “कल्पना क्लब” बनाया। हर शनिवार को वे पार्क में मिलते और जादुई खेल खेलते।
धीरे-धीरे, और बच्चे भी जुड़ने लगे। वे सब मिलकर नए खेल बनाते – बादलों से चित्रकारी, हवा के साथ संवाद, पेड़ों से कहानियाँ सुनना।
मोहन ने भी क्लब को सपोर्ट किया। उसने पार्क में एक छोटा सा शेड बनवाया जहाँ बच्चे किसी भी मौसम में खेल सकते थे।
कई साल बीत गए। राहुल अब बड़ा हो चुका था। उसकी अपनी एक बेटी थी – नीरा।
एक दिन, नीरा ने कहा, “पापा, मेरा वीडियो गेम बोरिंग हो गया है।”
राहुल मुस्कुराया और अटारी से वही पुराना डिब्बा निकाला। “चलो बेटी, मैं तुम्हें कुछ जादुई खेल दिखाता हूँ।”
जब राहुल ने लाल रुमाल नीरा की आँखों पर बाँधा, तो दादी भी कमरे में आ गईं। अब वे बूढ़ी हो चुकी थीं, पर उनकी आँखों में वही चमक थी।
तीन पीढ़ियाँ एक साथ बैठकर जादुई खेल खेलने लगीं। नीरा की कल्पना में नई दुनियाएँ जन्म ले रही थीं।
दादी ने कहा, “यही है जादुई खेलों की सबसे बड़ी शक्ति – ये कभी पुराने नहीं होते। हर पीढ़ी इनमें नया जादू ढूंढ लेती है।”
आज, राहुल का “कल्पना क्लब” पूरे शहर में मशहूर है। बच्चे वहाँ आते हैं और जादुई खेलों के साथ-साथ अपने खुद के खेल भी बनाते हैं।
राहुल ने एक किताब भी लिखी – “जादुई खेल: कल्पना की दुनिया” जिसमें उसने हर खेल को विस्तार से समझाया।
पुस्तक के अंत में उसने लिखा:
“हर बच्चे के अंदर एक जादुई दुनिया होती है।
बस जरूरत है उसे खोलने की चाभी की।
जादुई खेल वह चाभी हैं।
ये कोई साधारण खिलौने नहीं,
ये तो कल्पना के द्वार हैं।
इन्हें खोलो, और देखो
कैसे साधारण चीजें
असाधारण बन जाती हैं।”
कहानी का सार: यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा जादू महंगे खिलौनों या टेक्नोलॉजी में नहीं, बल्कि हमारी कल्पना में होता है। साधारण चीजें भी असाधारण बन सकती हैं अगर हम उन्हें कल्पना की नजर से देखें। खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं हैं, बल्कि वे हमारी रचनात्मकता, सामाजिकता और भावनात्मक बुद्धिमत्ता को विकसित करते हैं।
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