सुबह के पहले किरणों के साथ ही रामू कुल्हाड़ी उठाकर जंगल की ओर चल पड़ा। वह सुंदरपुर गाँव का एक साधारण लकड़हारा था, जिसकी ईमानदारी के चर्चे पूरे इलाके में थे। रामू की उम्र चालीस वर्ष थी, लेकिन जीवन की मेहनत ने उसके चेहरे पर समय से पहले ही झुर्रियां डाल दी थीं।
गाँव के लोग अक्सर कहते, “रामू तो इमानदारी की मूरत है। उसने कभी किसी का एक पैसा नहीं लिया, न कभी किसी की लकड़ी चुराई।”
रामू की पत्नी, गीता, घर में चूल्हा जलाते हुए बड़बड़ाती, “इतनी ईमानदारी से क्या फायदा? दिन-रात मेहनत करो, फिर भी दो वक्त की रोटी के लिए तरस जाओ।”
लेकिन रामू अपने सिद्धांतों पर अटल था। उसका मानना था कि ईमानदारी ही सबसे बड़ा धन है, चाहे उसके घर में कितनी भी तंगी क्यों न हो।
एक दिन, रामू गहरे जंगल में लकड़ी काट रहा था। अचानक उसकी कुल्हाड़ी हाथ से फिसलकर पास के तालाब में गिर गई। रामू ने तालाब के किनारे जाकर देखा, लेकिन पानी इतना गहरा था कि कुल्हाड़ी दिखाई नहीं दे रही थी।
“हाय राम! यही एक कुल्हाड़ी थी जिससे रोजी-रोटी चलती थी। अब क्या होगा?” रामू निराश होकर तालाब के किनारे बैठ गया।
तभी अचानक तालाब का पानी चमकने लगा और एक दिव्य आभा के साथ जल देवी प्रकट हुईं। उनके हाथ में सोने की चमकती कुल्हाड़ी थी।
देवी बोलीं, “रामू, तुम्हारी ईमानदारी के बारे में मैं जानती हूँ। क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?”
रामू ने सोने की कुल्हाड़ी देखी और सिर हिलाते हुए कहा, “माता, यह कुल्हाड़ी मेरी नहीं है। मेरी तो लोहे की साधारण कुल्हाड़ी थी।”
देवी मुस्कुराईं और पानी में डुबकी लगाई। इस बार वे चांदी की चमकदार कुल्हाड़ी लेकर प्रकट हुईं।
“क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?” देवी ने पूछा।
रामू ने फिर मना किया, “नहीं माता, मेरी कुल्हाड़ी चांदी की नहीं, बल्कि लोहे की थी।”
तीसरी बार देवी ने डुबकी लगाई और रामू की पुरानी लोहे की कुल्हाड़ी लेकर आईं। रामू की आँखें खुशी से चमक उठीं।
“हाँ माता, यही मेरी कुल्हाड़ी है! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!”
देवी प्रसन्न होकर बोलीं, “तुम्हारी ईमानदारी ने मुझे प्रभावित किया है। इसलिए मैं तुम्हें ये तीनों कुल्हाड़ियाँ उपहार में देती हूँ। सोने और चांदी की कुल्हाड़ियाँ बेचकर तुम अपना जीवन सुधार सकते हो।”
रामू ने देवी को प्रणाम किया और कुल्हाड़ियाँ लेकर घर लौट आया।
रामू ने सोने और चांदी की कुल्हाड़ियाँ बेच दीं और उस पैसे से एक छोटी सी लकड़ी की दुकान खोल ली। धीरे-धीरे उसका व्यवसाय फलने-फूलने लगा। उसने न सिर्फ अपना घर बनवाया, बल्कि गाँव में एक छोटा स्कूल भी बनवाने में मदद की।
लेकिन समृद्धि के साथ ही ईर्ष्या भी पैदा हुई। गाँव का एक लालची लकड़हारा, श्यामू, रामू की तरक्की से जलने लगा। एक दिन उसने रामू से पूछ ही लिया, “भाई रामू, तुम इतने अमीर कैसे बन गए?”
रामू ने ईमानदारी से सारी कहानी सुना दी। श्यामू के मन में लालच जाग उठा। अगले दिन वह भी उसी तालाब के पास जाकर जानबूझकर अपनी कुल्हाड़ी पानी में फेंक दी और रोने लगा।
जैसे ही जल देवी प्रकट हुईं, श्यामू ने नाटकीय अंदाज में कहा, “मेरी कुल्हाड़ी तालाब में गिर गई है! मेरी रोजी-रोटी का सहारा चला गया!”
देवी ने सोने की कुल्हाड़ी निकाली और पूछा, “क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?”
श्यामू की आँखें चमक उठीं, “हाँ! हाँ! यही मेरी कुल्हाड़ी है!”
लेकिन देवी क्रोधित हो गईं, “तुम झूठ बोल रहे हो! यह कुल्हाड़ी तुम्हारी नहीं है। तुम लालची हो और तुम्हें सबक सीखने की जरूरत है।”
इतना कहकर देवी अदृश्य हो गईं और श्यामू को अपनी असली कुल्हाड़ी भी नहीं मिली। वह खाली हाथ और अपमानित होकर घर लौटा।
रामू की समृद्धि देखकर कई लोग उससे ईर्ष्या करने लगे। गाँव के मुखिया का बेटा, विजय, जो हमेशा से रामू को नीचा दिखाना चाहता था, उसने एक योजना बनाई।
एक रात, जब रामू अपनी दुकान बंद करके घर जा रहा था, विजय और उसके दोस्तों ने रास्ते में उसे रोक लिया।
“रामू, तुम्हारी दुकान से लकड़ी की चोरी हुई है और हमें शक है कि तुमने ही अपनी दुकान का बीमा करवाने के लिए यह सब किया है!” विजय ने आरोप लगाया।
रामू स्तब्ध रह गया, “मैं ऐसा कभी नहीं कर सकता! मैंने कभी झूठ नहीं बोला।”
लेकिन विजय ने पुलिस को बुला लिया और झूठे गवाह पेश किए। रामू को हफ्ते भर के लिए जेल में डाल दिया गया।
जेल में बैठे-बैठे रामू निराश हो गया। उसने सोचा, “शायद ईमानदारी से जीने का यही अंजाम होता है।”
लेकिन तभी एक अजीब घटना घटी। जल देवी उसके सपने में प्रकट हुईं और बोलीं, “रामू, ईमानदारी की सच्ची परीक्षा तो अब हो रही है। धैर्य रखो, सच्चाई सामने आएगी।”
रामू के जेल जाने के बाद, गीता बहुत परेशान थी। वह गाँव वालों के पास गई, लेकिन सब डर के मारे चुप थे। तभी एक दिन, श्यामू, जिसने पहले रामू से ईर्ष्या की थी, गीता के पास आया।
“गीता भाभी, मैंने सुना है कि विजय ने ही अपने दोस्तों के साथ मिलकर रामू भाई के ऊपर झूठा आरोप लगाया है। मैंने खुद उनकी बातचीत सुनी थी,” श्यामू ने कहा।
गीता हैरान रह गई, “लेकिन तुम तो रामू से नाराज थे?”
श्यामू ने सिर झुकाया, “हाँ, मैं नाराज था। लेकिन जब मैंने देखा कि रामू भाई ने गाँव के लिए कितना कुछ किया है, और विजय जैसे लोग उसे नीचा दिखाना चाहते हैं, तो मेरा दिल बदल गया। मैं गवाही दूँगा।”
श्यामू ने न सिर्फ गवाही दी, बल्कि विजय के एक दोस्त को भी सच बोलने के लिए राजी कर लिया। सच्चाई सामने आई और रामू को जेल से रिहा कर दिया गया। विजय और उसके साथियों को सजा मिली।
जेल से छूटने के बाद रामू और भी समझदार हो गया। उसने महसूस किया कि ईमानदारी के साथ-साथ बुद्धिमानी भी जरूरी है। उसने अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाया, लेकिन इस बार उसने गाँव के अन्य लकड़हारों को भी अपने साथ जोड़ा।
रामू ने एक सहकारी समिति बनाई जहाँ सभी लकड़हारे मिलकर काम करते और मुनाफा बाँटते। इससे न सिर्फ उनकी आय बढ़ी, बल्कि जंगल के संरक्षण में भी मदद मिली क्योंकि अब वे पेड़ों की अंधाधुंध कटाई नहीं करते थे।
एक दिन, गाँव के बुजुर्ग ने रामू से कहा, “बेटा, तुमने न सिर्फ अपना, बल्कि पूरे गाँव का भला किया है। तुम्हारी ईमानदारी ने सभी को प्रेरित किया है।”
रामू मुस्कुराया, “बाबूजी, मैंने एक बात सीखी है – ईमानदारी से कमाया गया एक रुपया, बेईमानी से कमाए सौ रुपयों से बेहतर होता है।”
समय बीतता गया। रामू का बेटा, राजू, अब बड़ा हो चुका था और कॉलेज से पढ़कर लौटा था। एक दिन वह अपने पिता से बोला, “पापा, मैं शहर में नौकरी करना चाहता हूँ। यहाँ गाँव में क्या रखा है?”
रामू ने अपने बेटे को समझाया, “बेटा, पैसा ही सब कुछ नहीं होता। सम्मान और इज्जत से जीना भी जरूरी है। हमारे पास अब एक फलता-फूलता व्यवसाय है, और हम पूरे गाँव की जिम्मेदारी उठा रहे हैं।”
लेकिन राजू को लगता था कि गाँव में रहकर वह अपनी पढ़ाई का सही उपयोग नहीं कर पाएगा। तभी एक दिन राजू को पता चला कि गाँव के स्कूल में शिक्षक की कमी है और बच्चों को ठीक से पढ़ाया नहीं जा रहा है।
राजू ने सोचा और फिर अपने पिता के पास आकर कहा, “पापा, मैंने तय किया है कि मैं गाँव में ही रहूंगा। मैं स्कूल में पढ़ाऊंगा और साथ-साथ हमारे व्यवसाय को आधुनिक तरीके से चलाने में आपकी मदद करूंगा।”
रामू की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने महसूस किया कि उसकी ईमानदारी और मेहनत की विरासत अगली पीढ़ी तक जा रही है।
कई साल बीत गए। रामू अब बूढ़ा हो चला था। एक शाम, जब वह अपने पोते-पोतियों को कहानी सुना रहा था, तभी उसे एक आभास हुआ कि जल देवी उसे याद कर रही हैं।
अगली सुबह, रामू अकेले ही उस पुराने तालाब के पास पहुँचा, जहाँ से उसकी जिंदगी बदली थी। तालाब अब भी वैसा ही शांत और सुंदर था।
अचानक जल देवी प्रकट हुईं, लेकिन इस बार उनके चेहरे पर एक गहरी चिंता थी।
“रामू, तुम्हारी ईमानदारी ने न सिर्फ तुम्हारा, बल्कि पूरे गाँव का भला किया है। लेकिन अब एक नई चुनौती सामने है,” देवी बोलीं।
“क्या चुनौती है, माता?” रामू ने पूछा।
“यह जंगल, यह तालाब, सब खतरे में हैं। शहर से आने वाले लोग इसे नुकसान पहुँचा रहे हैं। तुम्हें इसकी रक्षा करनी होगी,” देवी ने कहा।
रामू ने संकल्प लिया, “माता, आप चिंता न करें। मैं इस जंगल और तालाब की रक्षा करूंगा।”
रामू ने गाँव वालों को इकट्ठा किया और जंगल के संरक्षण के बारे में बताया। शुरुआत में कुछ लोगों ने विरोध किया, “हमें अपनी रोजी-रोटी तो चलानी है!”
लेकिन रामू ने समझाया, “अगर जंगल ही नहीं रहेगा, तो रोजी-रोटी कहाँ से चलेगी? हमें संतुलन बनाना होगा।”
रामू के बेटे, राजू ने एक योजना बनाई। उन्होंने जंगल के एक हिस्से को संरक्षित क्षेत्र घोषित करवाया और दूसरे हिस्से में सिर्फ पुराने और सूखे पेड़ों की कटाई की अनुमति दी। साथ ही, उन्होंने नए पेड़ लगाने का अभियान शुरू किया।
तालाब के आसपास उन्होंने एक छोटा पार्क बनवाया, जहाँ गाँव के बच्चे खेल सकते थे और बड़े आराम कर सकते थे। धीरे-धीरे यह स्थान पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया, जिससे गाँव वालों को आय का एक नया स्रोत मिला।
रामू अब बहुत बूढ़ा हो चुका था। एक शाम, जब पूरा परिवार इकट्ठा था, रामू ने सबको अपने पास बुलाया।
“मैंने अपने जीवन में एक ही सिद्धांत अपनाया – ईमानदारी,” रामू ने कमजोर आवाज में कहा। “और देखो, इसने न सिर्फ मुझे, बल्कि हम सभी को समृद्ध किया।”
राजू ने अपने पिता का हाथ थामा, “पापा, आपकी विरासत हमेशा जिंदा रहेगी। हम आपके सिद्धांतों पर चलते रहेंगे।”
अगले दिन सुबह, रामू ने अपनी आखिरी सांस ली। पूरा गाँव उसके अंतिम दर्शनों के लिए इकट्ठा हुआ। लोगों की आँखों में आँसू थे, लेकिन दिलों में गर्व भी था कि उनके गाँव ने रामू जैसा इंसान पैदा किया था।
रामू की मृत्यु के बाद, गाँव वालों ने तालाब के किनारे उसकी एक मूर्ति लगवाई, जिसके नीचे लिखा था:
“ईमानदारी सबसे बड़ा धन है,
जिसने इस गाँव को समृद्ध किया।
रामू – सुंदरपुर का गौरव।”
रामू के जाने के बाद भी उसकी शिक्षाएँ जिंदा रहीं। राजू ने न सिर्फ व्यवसाय संभाला, बल्कि गाँव के विकास के लिए नई-नई योजनाएँ भी बनाईं।
एक दिन, जब राजू तालाब के किनारे बैठा था, उसका छोटा बेटा रोहन उसके पास आकर बोला, “पापा, दादाजी की कहानी सुनाओ न!”
राजू ने अपने बेटे को गोद में उठाया और कहानी शुरू की, “एक समय की बात है, एक ईमानदार लकड़हारा रहता था…”
और इस तरह रामू की कहानी नई पीढ़ियों तक पहुँचती रही, उन्हें ईमानदारी, साहस और दृढ़ता का पाठ पढ़ाती रही।
सुंदरपुर गाँव आज भी उस ईमानदार लकड़हारे की कहानी सुनाता है, जिसने न सिर्फ अपना, बल्कि पूरे गाँव का भाग्य बदल दिया। और तालाब का पानी आज भी चमकता है, मानो जल देवी अभी भी वहाँ रहती हों, ईमानदार लोगों पर नजर रखती हों।
~ कहानी का अंत ~
कहानी से सीख: ईमानदारी एक ऐसा गुण है जो व्यक्ति को न सिर्फ आंतरिक शांति देता है, बल्कि दीर्घकालिक समृद्धि और सम्मान भी दिलाता है। रामू की कहानी हमें सिखाती है कि सच्चाई और ईमानदारी के मार्ग पर चलने वाले को अंततः जीत मिलती है, चाहे रास्ते में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएँ।
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