गुड़ की मिठास
कंप्यूटर स्क्रीन की नीली रोशनी में डूबा प्रतीक, लंदन के अपने ऑफिस की बत्तीसवीं मंजिल से शहर की झिलमिलाती लाइटों को देख रहा था। बाहर कोहरा था, और भीगी सड़कों पर चलते लोग काले कोटों में छिपे हुए से लग रहे थे। उसने अपनी कॉफ़ी का आखिरी घूँट पिया – एक डबल एस्प्रेसो, बिना चीनी के, कड़वी और तीखी। उसका फ़ोन बजा। माँ का फ़ोन था।

“बेटा, दिवाली पर घर आ रहे हो न?” माँ की आवाज़ में वही पुरानी ललक थी।
“मम्मी, देखता हूँ। प्रोजेक्ट डेडलाइन है। शायद न आ पाऊँ,” प्रतीक ने रूटीन जवाब दिया।
“तुम्हारे पिताजी… उनकी तबीयत ठीक नहीं है। डॉक्टर कहते हैं शुगर ज्यादा है। पर वे मानते नहीं। कहते हैं बस गुड़ बंद कर दो, सब ठीक हो जाएगा।”
गुड़। यह शब्द सुनते ही प्रतीक के ज़हन में एक धुँधली सी तस्वीर उभरी – अपने बचपन के गाँव का आँगन, धूप में सूखते गन्ने के रस की सुगंध, और दादाजी का हाथ से बना वह गुड़, जिसकी एक डली मुँह में रखते ही एक अनोखी, गहरी मिठास फैल जाती थी, जो घंटों रहती थी। यह मिठास शहर की चॉकलेट्स और पेस्ट्रीज़ से बिल्कुल अलग थी। वह तुरंत मीठी होती और गायब हो जाती, पर गुड़ की मिठास देह में उतर जाती थी।
“ठीक है मम्मी, कोशिश करूंगा,” उसने कहा और फ़ोन रख दिया। उस रात उसे नींद नहीं आई। दादाजी की यादें ताज़ा हो गई थीं। वह कहा करते थे, “बेटा, चीनी नकली मिठास है, गुड़ असली। चीनी तो शरीर को खोखला कर देती है, गुड़ ताकत देता है।”
अगले ही दिन, प्रतीक ने छुट्टी के लिए अप्लाई कर दिया। एक हफ्ते बाद, वह अपनी महँगी कार में गाँव की उबड़-खाबड़ सड़क पर चल रहा था। गाँव पहुँचते ही उसे लगा जैसे समय थम सा गया है। हालाँकि, कुछ नए मकान दिखे, पर हवा में वही खुशबू थी – गोबर के उपलों की, धान की फसल की, और दूर से आती गुड़ बनाने की भट्ठी की मीठी गंध।
पिता और बेटे के बीच खाई
घर पहुँचकर प्रतीक ने देखा, पिताजी आँगन में चारपाई पर लेटे थे। उनका शरीर पहले जैसा ताकतवर नहीं रहा था। आँखों के नीचे गड्ढे पड़े थे।
“पापा, कैसे हो?” प्रतीक ने पूछा।
“तुम आ गए? अच्छा हुआ। बस यह डॉक्टर वगैरह परेशान कर रहे हैं। कहते हैं गुड़ मत खाओ। जिस चीज़ को मैं जिंदगीभर खाता रहा, वही अब जहर हो गई?” पिताजी की आवाज़ में गुस्सा और असमंजस था।
माँ ने प्रतीक को अलग ले जाकर बताया, “पिताजी को डायबिटीज़ है, पर वे गुड़ छोड़ने को तैयार नहीं। कहते हैं, बिना गुड़ के खाना बेस्वाद है। और दूसरी बात… तुम्हारे दादाजी की वह गुड़ की भट्ठी, जो पिछले पचास साल से चल रही थी, अब बंद होने वाली है। कोई मजदूर नहीं मिल रहा, और तुम्हारे पिताजी की तबीयत भी साथ नहीं दे रही।”
प्रतीक के लिए यह एक झटका था। दादाजी की भट्ठी सिर्फ एक व्यवसाय नहीं थी; वह गाँव की पहचान थी, परंपरा का प्रतीक थी। दिवाली पर गाँव के हर घर में उसी भट्ठी का गुड़ पहुँचता था। उसने फैसला किया कि वह पिताजी की भट्ठी देखने जाएगा।
भट्ठी गाँव के बाहर, एक खुले मैदान में थी। जाते ही उसकी आँखें चौंधिया गईं। वह जगह उजाड़ और उदास लग रही थी। विशाल कढ़ाहियाँ (कड़ाह) उलटी पड़ी थीं, चूल्हे ठंडे पड़े थे, और चारों तरफ सन्नाटा था। एक बूढ़ा मजदूर, रामू काका, वहाँ बैठा बीड़ी पी रहा था।
“रामू काका, आप यहाँ?” प्रतीक ने पूछा।
“अरे प्रतीक बाबू! आ गए तुम? देखो, यह भट्ठी तो अब बस इतिहास बन गई। तुम्हारे पिता जी की तबीयत ठीक नहीं, और आजकल के लोग इस मेहनत वाले काम को कोई नहीं करना चाहते। सब शहर भाग गए। और हाँ… अब गुड़ की डिमांड भी कम है। लोग शहर से आई चीनी और चॉकलेट खाना पसंद करते हैं।”
प्रतीक ने भट्ठी की एक उलटी कढ़ाही को हाथ लगाया। उसे दादाजी की याद आई, जो उसे गन्ने का रस चखाते थे और कहते थे, “देख, यही है असली अमृत। इसमें सूरज की गर्मी, ज़मीन का पानी और मेहनत की मिठास सब कुछ समाया हुआ है।”
भाग 3: गुड़ बनाने की कला और एक निर्णय
उस रात, प्रतीक ने अपने पिता से बातचीत शुरू की। “पापा, मैं भट्ठी देखकर आया। बहुत उदास लग रही है।”
पिताजी ने एक लंबी साँस ली। “हाँ बेटा। यह सिर्फ हमारी आजीविका नहीं थी। यह हमारी विरासत थी। गुड़ बनाना एक कला है। गन्ने का रस निकालो, उसे साफ़ करो, फिर घंटों उबालो… बिल्कुल सही तापमान पर। एक पल की चूक, और सारा रस खराब। गुड़ बनाने वाला उसकी आवाज़ से, उसकी महक से पता लगा लेता है कि वह तैयार है। आजकल मशीनों से बनता है गुड़, पर उसमें वह मिठास नहीं होती।”
प्रतीक ने पूछा, “पर पापा, अगर यह इतनी अच्छी चीज़ है, तो लोग इसे क्यों छोड़ रहे हैं? आपकी तबीयत भी इसी की वजह से खराब हुई है कि नहीं?”
पिताजी चुप रहे, फिर बोले, “शायद हमने ही इसकी कद्र करनी छोड़ दी है, बेटा। हमने इसे सिर्फ एक मीठी चीज़ समझा, इसके गुण नहीं समझे। और हाँ… शायद मैंने भी ज़रूरत से ज्यादा खा लिया। पर तुम समझो, जब दिल उदास हो, तो बस एक डली गुड़ की मुँह में रख लेने से लगता है, सब ठीक हो जाएगा।”
यह बात प्रतीक के दिल में उतर गई। उसे एहसास हुआ कि गुड़ पिताजी के लिए सिर्फ एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि सुकून का साधन, उनकी विरासत से जुड़ने का जरिया था। तभी उसके मन में एक विचार कौंधा। क्यों न वह इस भट्ठी को फिर से जीवित करने की कोशिश करे? न सिर्फ परंपरा के नाम पर, बल्कि एक आधुनिक, स्वास्थ्यकर व्यवसाय के तौर पर।
उसने अपने पिता से कहा, “पापा, मैं कुछ दिन और रुकता हूँ। मुझे इस पूरी प्रक्रिया को समझना है। क्या आप रामू काका को कहेंगे कि वह मुझे सब कुछ दिखाए और सिखाए?”
पिताजी की आँखों में एक चिंगारी सी दिखी, जो सालों से बुझी हुई थी।
भाग 4: मिठास के पीछे की मेहनत
अगले दिन से प्रतीक की नई पढ़ाई शुरू हो गई। रामू काका उसके गुरु बन गए। पहला पाठ था – गन्ने का चयन। “देखो प्रतीक बाबू, ऐसा गन्ना चुनो जो पका हुआ हो, पर ज्यादा सख्त न हो। उसका रस मीठा और साफ होना चाहिए।”
फिर आया गन्ने का रस निकालने का पुराना कोल्हू (रसौट)। बैल की जगह अब एक पुराना डीज़ल इंजन लगा था। रस निकलकर एक बड़े बरतन में इकट्ठा होता। फिर उसे कपड़े से छानकर बड़ी-बड़ी कढ़ाहियों में डाला जाता। आग जलाई जाती।
“अब सबसे मुश्किल हिस्सा शुरू होता है,” रामू काका ने कहा। “इस रस को लगातार चलाते रहना होता है, और उसके गाढ़े होने का पता लगाना होता है। देखो, अभी यह पानी जैसा है। धीरे-धीरे यह गाढ़ा होने लगेगा।”
घंटों तक प्रतीक ने रामू काका के साथ वहाँ खड़े होकर रस को चलाया। आग की गर्मी से उसका चेहा तप्त हो गया, पर उसे एक अलग ही संतुष्टि मिल रही थी। यह मेहनत उसकी ऑफिस की मेहनत से बिल्कुल अलग थी। यहाँ नतीजा स्पष्ट दिख रहा था।
करीब पाँच घंटे बाद, रामू काका ने एक चम्मच में थोड़ा गाढ़ा रस लिया और उसे ठंडा किया। फिर उसे प्रतीक को चखने दिया। “कैसा लगा?”
“यह तो बिल्कुल दादाजी वाला स्वाद है!” प्रतीक की आँखें चमक उठीं। यह मिठास सीधे दिल तक उतर रही थी।
“हाँ, अब यह गुड़ बनने के लिए तैयार है। इसे साँचों में डालेंगे, जमने देंगे, और फिर तैयार है तुम्हारा गुड़।”
उस दिन प्रतीक ने जो गुड़ खाया, वह उसकी ज़िंदगी का सबसे यादगार स्वाद बन गया। उसे एहसास हुआ कि इस एक डली में कितनी मेहनत, ज्ञान और प्यार समाया हुआ है। यह मिठास सस्ती नहीं थी।
भाग 5: पुराने और नए का मेल
प्रतीक ने अपने लैपटॉप पर काम शुरू किया। उसने गुड़ के पोषण संबंधी फायदों पर रिसर्च की, ऑर्गेनिक फार्मिंग के बारे में पढ़ा, और मार्केटिंग के नए तरीकों को समझा। उसने पिताजी के सामने एक प्रस्ताव रखा।
“पापा, हम इस भट्ठी को फिर से शुरू करेंगे, पर कुछ बदलाव के साथ। हम ऑर्गेनिक तरीके से उगाए गए गन्ने का इस्तेमाल करेंगे। गुड़ बनाने की प्रक्रिया वही रहेगी, पर हम थोड़ी आधुनिक मशीनें लगाएंगे जिससे मेहनत कम हो और सफ़ाई ज्यादा रहे। हम इस गुड़ को ‘शुद्ध देसी गुड़’ के नाम से बेचेंगे, और सीधे ग्राहकों तक ऑनलाइन पहुँचाएंगे।”
पहले तो पिताजी को शंका हुई। “यह ऑनलाइन-वॉनलाइन क्या होता है? हमारा गुड़ तो हमेशा आसपास के गाँवों में ही बिकता था।”
“पापा, दुनिया बदल गई है। आज लोग शहरों में बैठे-बैठे असली, स्वास्थ्यवर्धक चीज़ें ढूंढ रहे हैं। हमारा गुड़ उन तक पहुँच सकता है। और हाँ, आपको डॉक्टर की सलाह माननी होगी। गुड़ खाएं, पर एक सीमित मात्रा में। यह चीनी से बेहतर है, पर इसे भी संयम से खाना है।”
धीरे-धीरे पिताजी मान गए। प्रतीक ने अपनी बचत का एक हिस्सा इस काम में लगाया। उसने रामू काका को प्रमुख बनाया और कुछ नए युवाओं को प्रशिक्षण दिया, जिन्हें गाँव में रोज़गार चाहिए था। भट्ठी फिर से जीवंत हो उठी। इस बार उसमें नया जोश था।
भाग 6: नई शुरुआत और असली मिठास
दिवाली आने वाली थी। प्रतीक ने एक साधारण, पर आकर्षक पैकेजिंग डिज़ाइन की – भूरे रंग के कागज़ पर, हाथ से लिखा हुआ ‘दादाजी का गुड़’। उसने एक छोटी सी वेबसाइट बनाई और सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी दी। कहानी दिखाई – एक पुरानी विरासत को बचाने की कहानी।
पहला ऑर्डर आया। फिर दूसरा, तीसरा… धीरे-धीरे ऑर्डरों की बाढ़ सी आ गई। लोगों को यह आइडिया पसंद आया कि वे सीधे गाँव से, किसान से, शुद्ध गुड़ खरीद रहे हैं। कुछ लोगों ने फीडबैक दिया, “इतना स्वादिष्ट गुड़ सालों बाद खाया है।” “हमारे बुजुर्गों को याद आ गया।”
दिवाली की सुबह, घर में पहले जैसी रौनक थी। पिताजी ने सीमित मात्रा में गुड़ की बनी मिठाई खाई और प्रसन्न थे। प्रतीक आँगन में बैठा था। उसके पास एक पार्सल था – लंदन में अपने एक दोस्त के लिए, जिसने हमेशा भारतीय मिठाइयों की तारीफ़ की थी। उसने पार्सल में गुड़ की डलियाँ और एक चिट्ठी रखी, जिसमें इस गुड़ की कहानी लिखी थी।
माँ ने आकर कहा, “तुमने सिर्फ भट्ठी नहीं बचाई बेटे, तुमने अपने पिता का हौसला बचाया है।”
पिताजी ने प्रतीक के कंधे पर हाथ रखा। उनकी आँखें नम थीं। “तुम्हारे दादाजी आज होते, तो तुम पर गर्व करते। तुमने सिखाया कि परंपरा को बचाने के लिए उसे नए ज़माने के साथ जोड़ना पड़ता है। और हाँ… तुम्हारी एक और बात सही निकली। मैंने डॉक्टर की सलाह मानी है, गुड़ कम खाता हूँ। पर आज जो खाया, उसकी मिठास जिंदगीभर याद रहेगी।”
प्रतीक ने एक डली गुड़ मुँह में रखी। वह मिठास धीरे-धीरे फैली, उसके तन-मन को छू गई। उसे एहसास हुआ कि यह मिठास सिर्फ जीभ तक सीमित नहीं थी। यह मिठास थी अपनी जड़ों से जुड़ने की, पिता को खुश देखने की, एक विरासत को आगे बढ़ाने की, और उस मेहनत को सम्मान देने की जो इस एक डली में समाई हुई थी।
निष्कर्ष:
कुछ हफ्ते बाद, प्रतीक लंदन लौटा। उसकी टेबल पर अब एक शीशे के जार में दादाजी का गुड़ रखा था। जब भी वह थकता, या शहर की कृत्रिमता उसे बोझिल लगती, वह एक छोटी सी डली मुँह में डाल लेता। उस मिठास के साथ उसे गाँव की याद आती, भट्ठी की आग की गर्मी याद आती, पिताजी की मुस्कान याद आती, और रामू काका की कही वह बात याद आती – “जिंदगी की असली मिठास तो वही है जो मेहनत से आती है, जो धीरे-धीरे आती है, और जो दिल तक उतर जाती है।”
‘गुड़ की मिठास’ सिर्फ एक स्वाद नहीं, एक फिलॉसफी थी। यह सिखाती थी कि सब कुछ तुरंत और आसानी से मिलने वाली इस दुनिया में, कुछ चीज़ें अभी भी वही हैं – जो वक्त लेती हैं, मेहनत माँगती हैं, पर जो मिलती हैं, तो उनकी खुशी और संतुष्टि भी उतनी ही गहरी और टिकाऊ होती है। प्रतीक ने सीखा था कि कभी-कभी पीछे मुड़कर देखना, अपनी जड़ों को समझना, ही आगे बढ़ने का सही रास्ता दिखाता है। और यह कि सफलता का असली मिठासपन, उस रास्ते में छिपा होता है जो आपको घर वापस ले आता है।