एक मिट्टी के घर में पहली सांस
मेरा जन्म बिहार के एक छोटे से गाँव में हुआ था, जहाँ बिजली सपना थी और पक्की सड़क एक लक्जरी। हमारा घर मिट्टी का था, छप्पर की छत थी जिससे मानसून में पानी टपकता रहता था। पिता एक छोटे से खेत में मजदूरी करते थे, माँ घर संभालती थी और साथ में टूटे-फूटे स्कूल में पढ़ाती थी। पाँच भाई-बहनों में मैं सबसे बड़ा था। हमारी दुनिया गाँव की सीमाओं तक सीमित थी।

भूख और अभाव के साथ बचपन
बचपन की सबसे पहली यादें भूख की हैं। एक वक्त की रोटी नसीब होना खुशकिस्मती थी। मैं अक्सर स्कूल खाली पेट जाता था। किताबें इतनी महँगी थीं कि पिता को महीनों कर्ज लेकर खरीदनी पड़ती थीं। जूते नहीं थे, इसलिए स्कूल तीन किलोमीटर का सफर नंगे पैर तय करता था। गर्मी में रेत तपती थी, सर्दी में पाँव जमते थे, पर पढ़ाई से प्यार था। मैं जानता था कि शिक्षा ही एकमात्र रास्ता है इस गरीबी से बाहर निकलने का।
शिक्षा की ललक और चुनौतियाँ
केरोसिन लैंप की रोशनी में पढ़ाई
हमारे घर में बिजली नहीं थी। रात में पढ़ाई केरोसिन लैंप की मद्धम रोशनी में होती थी। माँ कहती थी, “बेटा, तेरी पढ़ाई की रोशनी से ही इस घर में उजाला होगा।” मैं रात भर जागकर पढ़ता, सुबह चार बजे उठकर घर के काम करता, फिर स्कूल जाता। गणित की किताब नहीं थी तो दोस्त से माँगकर उसकी नकल उतारी। अंग्रेजी सीखने के लिए गाँव के एक रिटायर्ड टीचर ने मुझे मुफ्त में पढ़ाया। मेरे लिए हर नई किताब, हर नया शब्द एक खजाना था।
हाई स्कूल तक पहुँचने की लड़ाई
दसवीं कक्षा तक आते-आते परिवार की आर्थिक स्थिति और खराब हो गई। पिता बीमार पड़ गए। परिवार वालों ने कहा, “अब पढ़ाई छोड़कर काम पर लग जाओ।” पर मेरी माँ ने डटकर सबका विरोध किया। उन्होंने अपने गहने बेचे, स्कूल की फीस भरी। मैंने प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। सुबह चार बच्चों को पढ़ाता, फिर खुद स्कूल जाता, शाम को फिर ट्यूशन। इससे महीने के 500 रुपये मिल जाते थे जो घर के काम आते थे। दसवीं में मैंने जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया। यह मेरी जिंदगी का पहला बड़ा मुकाम था।
शहर की ओर पहला कदम
इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए संघर्ष
ग्यारहवीं में साइंस लेने का मतलब था गाँव से 30 किलोमीटर दूर शहर के कॉलेज में जाना। रहने और खाने का खर्च जुटाना असंभव लग रहा था। तब मेरे गणित के शिक्षक ने मदद की। उन्होंने मुझे शहर में रहने की जगह दिलवाई – एक मंदिर के पुजारी के यहाँ रहकर मंदिर की सफाई और पूजा की सामग्री व्यवस्थित करने का काम मिल गया। बदले में मुझे रहने और खाने की जगह मिली। मंदिर के एक कमरे में रहता, वहीं पढ़ता। सुबह चार बजे मंदिर साफ करता, फिर कॉलेज जाता। यह अनुशासन मेरी ताकत बना।
वो निर्णायक तीन आने वाला दिन
12वीं के बाद इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा दी और चयन हो गया। पर फीस भरनी थी। कर्ज लिया, रिश्तेदारों से मदद माँगी। पहली बार शहर आया तो दिशा ही भूल गया। इंटरव्यू के दिन जेब में सिर्फ वापसी का किराया था। इंटरव्यू के बाद पता चला कि किराये के पैसे गुम हो गए हैं। वहीं उस बूढ़े किसान ने मुझे तीन आने दिए। ये तीन आने सिर्फ सिक्के नहीं थे, ये एक संदेश थे – “तुम अकेले नहीं हो, और हार मत मानो।”
कॉलेज का समय – नई दुनिया, नई चुनौतियाँ
अंग्रेजी और कंप्यूटर से पहली मुलाकात
कॉलेज में दाखिला मिला तो नई चुनौतियाँ सामने आईं। मैंने कभी कंप्यूटर नहीं देखा था। अंग्रेजी बोलना तो दूर, समझना भी मुश्किल था। शहरी बच्चों के बीच खुद को अजनबी महसूस करता। पर मैंने हार नहीं मानी। कॉलेज लाइब्रेरी में घंटों अंग्रेजी शब्दकोश के साथ बैठता। कंप्यूटर लैब में सबसे पहले आता, सबसे अंत में जाता। रात में वॉचमैन की नौकरी ली ताकि फीस जमा कर सकूँ। चार साल तक एक ही जोड़ी जूते पहने। पर मैंने कभी शिकायत नहीं की। हर कठिनाई मुझे मजबूत बना रही थी।
पहली इंटर्नशिप और पहली कमाई
तीसरे वर्ष में मुझे एक छोटी सी कंपनी में इंटर्नशिप मिली। महीने के 3000 रुपये मिलते थे। पहली सैलरी मिली तो सबसे पहले मैंने घर वायर ट्रांसफर किए। माँ का फोन आया, “बेटा, तूने हमें रोते देखा है, आज पहली बार हँसते देख रहे हैं।” उस दिन मैंने समझा कि सफलता का असली मतलब अपनों की मुस्कान वापस लाना है। इंटर्नशिप के दौरान मैंने खूब मेहनत की। मेरे प्रोजेक्ट को सर्वश्रेष्ठ का पुरस्कार मिला। इससे मुझे आत्मविश्वास मिला कि मैं भी कुछ कर सकता हूँ।
करियर की शुरुआत और संघर्ष
पहली नौकरी और जिम्मेदारियाँ
कैंपस प्लेसमेंट में मुझे एक अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गई। पहली सैलरी 25,000 रुपये थी। मैंने सबसे पहले घर का कर्ज चुकाया। फिर पिता का इलाज करवाया। घर में बिजली कनेक्शन करवाया। पहली बार माँ ने पंखे की हवा खाई। पर शहर में रहना आसान नहीं था। एक छोटे से कमरे में रहता, सस्ता खाना खाता। ऑफिस में भी चुनौतियाँ थीं। शहरी बच्चों की तरह आत्मविश्वास से बात नहीं कर पाता था। पर मैंने काम से बात करवाने का फैसला किया।
कौशल विकास और प्रोफेशनल ग्रोथ
मैंने ऑफिस के बाद अपनी कमजोरियों पर काम करना शुरू किया। कम्युनिकेशन स्किल्स सुधारने के लिए इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स किया। टेक्निकल स्किल्स अपडेट रखने के लिए रातों को ऑनलाइन कोर्स किए। दो साल में मैं टीम में सबसे विश्वसनीय कर्मचारी बन गया। मेरी प्रमोशन हुई, सैलरी बढ़ी। पर मैंने अपना जीवन सरल ही रखा। अधिकांश पैसे बचाए और निवेश किए। मैं जानता था कि स्थिरता जरूरी है।
उद्यमिता की ओर पहला कदम
स्टार्टअप का विचार और जोखिम
पाँच साल नौकरी करने के बाद मुझे लगा कि अब कुछ अपना करने का समय आ गया है। मैंने देखा कि गाँव के बच्चों के पास अभी भी अच्छी शिक्षा नहीं पहुँच पा रही है। मैंने एक एजुकेशन टेक स्टार्टअप शुरू करने का फैसला किया। सबने मना किया। “नौकरी छोड़कर ये जोखिम मत लो,” सबने कहा। पर मेरे अंदर वो बूढ़े किसान का विश्वास था। मैंने अपनी सारी बचत इस आइडिया में लगा दी। पहले दो साल बहुत कठिन थे। महीनों तक कोई आमदनी नहीं। पर मैं डटा रहा।
पहली सफलता और विस्तार
तीसरे वर्ष हमारा प्रोडक्ट सफल होना शुरू हुआ। हमने ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के लिए एक लो-कॉस्ट लर्निंग एप बनाया था जो ऑफलाइन भी काम करता था। पहले सौ यूजर्स मिले, फिर हजार, फिर लाख। एक वेंचर कैपिटल फर्म ने हमें फंडिंग दी। आज हमारे प्लेटफॉर्म पर 10 लाख से अधिक छात्र हैं, जिनमें से 60% ग्रामीण इलाकों से हैं। हमने 50 से अधिक गाँवों में डिजिटल लर्निंग सेंटर खोले हैं।
समाज को वापस देना
‘तीन आने फाउंडेशन’ की स्थापना
जब कंपनी स्थिर हुई तो मैंने उन तीन आनों के ऋण को चुकाने का फैसला किया। मैंने ‘तीन आने फाउंडेशन’ शुरू किया जो गरीब बच्चों की शिक्षा में मदद करता है। हमने 1000 से अधिक छात्रों को स्कॉलरशिप दी है। 5 ग्रामीण स्कूलों का नवीनीकरण किया है। हमारा नियम है: हर सफल छात्र को एक और छात्र की मदद करनी होगी। इस तरह श्रृंखला बनी रहेगी।
गाँव का विकास और रोजगार सृजन
मैंने अपने गाँव में एक छोटा उद्योग शुरू किया है जो 50 लोगों को रोजगार देता है। गाँव में डिजिटल लाइब्रेरी बनवाई है। बुजुर्गों के लिए हेल्थ कैंप लगवाता हूँ। सबसे बड़ी खुशी तब मिलती है जब गाँव के बच्चे मुझसे मिलते हैं और कहते हैं, “हम आपकी तरह बनना चाहते हैं।” मैं उन्हें बताता हूँ, “मैं कुछ खास नहीं हूँ, बस हिम्मत नहीं हारी।”
सफर से सीखे गए सबक
वो पाँच सिद्धांत जिन्होंने मार्गदर्शन किया
- कभी हार न मानें: हर असफलता सीख का अवसर है। मैंने सैकड़ों बार असफलता देखी, पर हर बार उठ खड़ा हुआ।
- शिक्षा सबसे बड़ी संपत्ति है: पैसा आता-जाता रहेगा, पर ज्ञान हमेशा साथ देगा।
- ईमानदारी बनाए रखें: छोटी-छोटी ईमानदारी आपको लंबे समय में बड़ा बनाती है।
- समाज को वापस दें: सफलता तब सार्थक होती है जब उससे दूसरों की मदद हो।
- विनम्र बने रहें: चाहे कितनी भी सफलता मिल जाए, अपनी जड़ों को न भूलें।
आज की सफलता कल के संघर्ष की देन
आज मैं एक सफल उद्यमी हूँ। मेरी कंपनी 200 से अधिक लोगों को रोजगार देती है। मुझे कई पुरस्कार मिले हैं। पर मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि वो नहीं है। मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है मेरे माता-पिता के चेहरे पर गर्व की मुस्कान, मेरे गाँव के बच्चों के सपनों में उड़ान, और उस बूढ़े किसान के विश्वास को सार्थक कर पाना।
आपका सफर भी शुरू हो सकता है
आपके लिए संदेश
अगर आप भी गरीबी या किसी अन्य संघर्ष से जूझ रहे हैं, तो याद रखिए:
- आप अकेले नहीं हैं: दुनिया में अच्छे लोग हैं जो मदद करना चाहते हैं।
- छोटी शुरुआत करें: बड़े सपने देखें, पर छोटे कदमों से शुरुआत करें।
- अनुशासन जरूरी है: रोज थोड़ा प्रयास, लंबे समय में बड़ा बदलाव लाता है।
- आभारी रहें: जिन्होंने मदद की, उन्हें कभी न भूलें।
अंतिम विचार
गरीबी कोई श्राप नहीं है, बल्कि एक चुनौती है। सफलता रातोंरात नहीं मिलती, यह एक लंबी यात्रा है। मेरी यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है। अभी और बच्चों को शिक्षित करना है, और गाँवों को विकसित करना है। मेरी कहानी का मकसद आपको प्रेरित करना है कि आप भी अपने सपनों को पूरा कर सकते हैं।
याद रखिए, हर बड़ी यात्रा की शुरुआत एक छोटे से कदम से होती है। आपका पहला कदम आज उठ सकता है। बस हिम्मत रखिए, और चल पड़िए। आपका सफर भी किसी की प्रेरणा बन सकता है।