रामपुर गाँव के बीचों-बीच एक पुराना खेत था, जिसकी एक मेड़ ने दो परिवारों के बीच दशकों पुराने रिश्ते तार-तार कर दिए थे। यह कोई साधारण मेड़ नहीं थी – यह करीब दो फीट चौड़ी और लगभग सौ मीटर लंबी मिट्टी की दीवार थी, जिस पर बरसों से घास, छोटे-छोटे पौधे और एक पुराना बेर का पेड़ जड़ें जमाए हुए था।
एक तरफ थे रघुवीर सिंह, जिनके पिता और दादा इस खेत में धान और गेहूँ उगाते आए थे। दूसरी तरफ थे श्याम लाल, जिनके परिवार ने पिछले तीस साल से खेती की थी। मेड़ बिल्कुल दोनों खेतों की सीमा पर थी, और दोनों परिवार इस पर अपना अधिकार जताते थे।
“यह मेड़ हमारे बाप-दादा ने बनाई थी,” रघुवीर सिंह गाँव वालों से कहते। “इस पर लगा बेर का पेड़ मेरे दादाजी ने लगाया था।”
श्याम लाल का तर्क अलग था: “मेड़ तो सीमा का निशान है, न कि खेत का हिस्सा। और यह हमारी तरफ झुकी हुई है, तो इसका मतलब यह हमारी जमीन में है।”
गाँव के बुजुर्ग बताते थे कि यह मेड़ असल में पचास साल पहले बनाई गई थी, जब रघुवीर के दादा और श्याम लाल के पिता ने एक बड़े खेत को दो हिस्सों में बाँटा था। उस समय दोनों परिवारों में गहरी दोस्ती थी। मेड़ बनाते समय दोनों ने फैसला किया था कि यह साझी संपत्ति होगी, और इस पर लगने वाले फल दोनों परिवार बाँट लेंगे।
बरसों तक यह परंपरा चलती रही। बेर के पेड़ से मीठे बेर तोड़ना दोनों परिवार के बच्चों का पसंदीदा शगल था। मेड़ की घास दोनों के मवेशी चरते थे। गर्मियों की दोपहर में मेड़ के नीचे छाया में बैठकर दोनों परिवार के लोग गप्पें मारते, फसलों की चिंता करते।
लेकिन समय के साथ रिश्ते बदलने लगे। रघुवीर के पिता की मृत्यु के बाद, और श्याम लाल के परिवार में नई पीढ़ी के आने के साथ, मेड़ साझा संपत्ति से विवाद का विषय बन गई।
सब कुछ तब शुरू हुआ जब रघुवीर सिंह ने मेड़ के पास अपने खेत का कुछ हिस्सा बेचने का फैसला किया। खरीददार ने स्पष्ट किया कि वह मेड़ तक का पूरा हिस्सा चाहता है। रघुवीर ने मेड़ को अपनी जमीन बताते हुए बेचने का प्रस्ताव रखा।
यह सुनकर श्याम लाल आगबबूला हो गए। “तुम मेड़ कैसे बेच सकते हो? यह तो हमारी साझा संपत्ति है!”
“साझा क्या होती है?” रघुवीर ने जवाब दिया। “कागजात में साफ लिखा है कि मेड़ मेरे खेत का हिस्सा है।”
दरअसल, पुराने कागजातों में मेड़ को सीमा रेखा के रूप में दर्शाया गया था, न कि किसी एक की संपत्ति के रूप में। लेकिन समय के साथ दोनों परिवारों ने अपने-अपने दावे मजबूत कर लिए थे।
विवाद बढ़ता देख गाँव के सरपंच ने पंचायत बुलाई। गाँव के बुजुर्ग, दोनों परिवारों के सदस्य और अन्य ग्रामीण इकट्ठा हुए। बहस गर्म हो गई।
रघुवीर के बेटे ने कहा, “आजकल हर इंच जमीन की कीमत है। मेड़ पर हम सब्जियाँ उगा सकते हैं, या फिर इसे समतल करके खेत में मिला सकते हैं।”
श्याम लाल की बेटी, जो शहर में पढ़ी थी, ने कानूनी तर्क दिया: “सीमा की मेड़ किसी एक की संपत्ति नहीं हो सकती। यह तो दोनों खेतों को अलग करती है।”
गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति, 92 साल के ठाकुर प्रताप सिंह, जिन्होंने इस मेड़ को बनते देखा था, ने आवाज उठाई: “बच्चों, यह मेड़ सिर्फ मिट्टी का टीला नहीं है। यह तुम्हारे बाप-दादा की दोस्ती का प्रतीक है। इसे तोड़ोगे तो रिश्ते टूट जाएँगे।”
लेकिन नई पीढ़ी के लिए भावनाएँ कम, और जमीन का मूल्य ज्यादा महत्वपूर्ण था।
फिर एक घटना ने सब कुछ बदल दिया। एक भीषण गर्मी के बाद अचानक हुई मूसलाधार बारिश ने पूरे गाँव को जलमग्न कर दिया। तेज बहाव वाले पानी ने खेतों की मिट्टी बहानी शुरू कर दी। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि जहाँ अन्य खेतों की मिट्टी बह गई, वहीं रघुवीर और श्याम लाल के खेत सुरक्षित रहे।
कारण स्पष्ट था – वह पुरानी मेड़। उसने पानी के बहाव को रोका, मिट्टी को बहने से बचाया, और खेतों को संरक्षण दिया। मेड़ पर लगे पौधों और घास की जड़ों ने मिट्टी को मजबूती से पकड़ रखा था।
बारिश रुकने के बाद जब दोनों किसान अपने खेतों की ओर गए, तो उन्होंने देखा कि आसपास के खेतों की उपजाऊ मिट्टी बह चुकी थी, लेकिन उनके खेतों को मेड़ ने बचा लिया था।
रघुवीर सिंह ने श्याम लाल की ओर देखा। श्याम लाल की नजरें मेड़ पर टिकी थीं, जो अब पानी से सराबोर थी, लेकिन अडिग खड़ी थी।
अगले दिन, रघुवीर सिंह स्वयं श्याम लाल के घर पहुँचे। “श्याम भाई, कल मैंने समझा कि यह मेड़ कितनी महत्वपूर्ण है,” उन्होंने कहा। “इसने हमारी फसल बचाई है।”
श्याम लाल ने सिर हिलाया। “हम दोनों ही भूल गए थे कि हमारे बुजुर्गों ने यह मेड़ सिर्फ सीमा बनाने के लिए नहीं, बल्कि खेतों की रक्षा के लिए बनाई थी।”
दोनों ने मिलकर फैसला किया कि वे मेड़ को नहीं हटाएँगे। बल्कि, उसे और मजबूत करेंगे। उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और एक सामुदायिक कार्यक्रम का आयोजन किया।
गाँव के युवाओं, महिलाओं और बच्चों ने मिलकर मेड़ को और मजबूत करने का काम शुरू किया। नई मिट्टी डाली गई, घास के बीज बोए गए, और मेड़ के किनारों पर और पेड़ लगाए गए। गाँव के बुजुर्गों ने बताया कि पुराने समय में मेड़ें सिर्फ सीमा निर्धारित नहीं करती थीं, बल्कि वे जल संरक्षण, मिट्टी की सुरक्षा और जैव विविधता के केंद्र होती थीं।
रघुवीर और श्याम ने फैसला किया कि मेड़ पर लगने वाले बेर और अन्य फल दोनों परिवार बाँटेंगे, और बचे हुए फल गाँव के बच्चों के लिए होंगे। मेड़ के पास एक छोटा सा बैठने का स्थान बनाया गया, जहाँ गाँव वाले इकट्ठा हो सकते थे।
इस एक मेड़ ने पूरे गाँव का नजरिया बदल दिया। अन्य किसानों ने भी अपने खेतों में मेड़ों को मजबूत करना शुरू किया। गाँव की महिलाओं ने मेड़ों पर औषधीय पौधे लगाने का अभियान चलाया। स्कूल के बच्चों ने ‘मेड़ बचाओ’ प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसमें उन्होंने गाँव की सभी पुरानी मेड़ों को चिह्नित किया और उनकी देखभाल का जिम्मा लिया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह हुई कि रघुवीर और श्याम के परिवार फिर से मिल गए। दोनों परिवारों की अगली पीढ़ी ने मिलकर एक सहकारी समिति बनाई, जो जैविक खेती और पारंपरिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देती थी।
आज रामपुर गाँव की वह मेड़ सिर्फ एक सीमा रेखा नहीं रह गई है। यह गाँव की एकता, पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक ज्ञान का प्रतीक बन गई है। गाँव वाले इसे ‘जीवंत मेड़’ कहते हैं।
मेड़ पर अब कई प्रकार के पौधे हैं – कुछ फलदार, कुछ औषधीय, कुछ सजावटी। यह छोटे-छोटे कीट-पतंगों, चिड़ियों और अन्य जीवों का आश्रय स्थल बन गई है। बारिश के पानी को रोकने में यह मददगार साबित हुई है, जिससे भूजल स्तर बढ़ने में मदद मिली है।
खेत की मेड़ की यह कहानी हमें कई सबक सिखाती है:
आज रामपुर गाँव के लोग अपनी मेड़ पर गर्व करते हैं। वे इसे न सिर्फ खेत का हिस्सा, बल्कि गाँव की सांस्कृतिक धरोहर मानते हैं। और जब भी कोई नया परिवार गाँव में आता है, तो उसे सबसे पहले इस मेड़ की कहानी सुनाई जाती है – एक ऐसी कहानी जो टकराव से शुरू हुई और एकता पर समाप्त हुई।
मेड़ अब दो खेतों को अलग नहीं करती, बल्कि पूरे गाँव को जोड़ती है। वह सिर्फ मिट्टी का टीला नहीं, बल्कि रामपुर गाँव की पहचान बन गई है। और शायद यही है असली विरासत – न कि जमीन के टुकड़े, बल्कि वे कहानियाँ और सबक जो हमें हमारे पूर्वजों से मिलते हैं, और जिन्हें हम आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाते हैं।
सीख: कभी-कभी हमारे सामने मौजूद सबसे साधारण चीजें ही सबसे गहरे सबक सिखाती हैं। जरूरत है तो बस उन्हें समझने की।
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