दोहरी छाया: एक डरावनी कहानी
वह अजनबी घर
राजेश ने अपनी कार से निकलते हुए उस पुराने हवेली को घूरा। बारिश की हल्की फुहार उसके चेहरे पर पड़ रही थी, और हवा में नमी का अहसास था। उसने अपना कोट कस कर पहना और सामान निकालना शुरू किया।

“सर, आप यहाँ अकेले रहेंगे?” ड्राइवर ने डरते हुए पूछा।
“हाँ, मुझे इस जगह पर एक आर्टिकल लिखना है। बस दो हफ्ते के लिए,” राजेश ने जवाब दिया।
ड्राइवर ने सिर हिलाया, “लोग कहते हैं यह जगह… ठीक नहीं है।”
राजेश मुस्कुराया। एक पत्रकार के तौर पर वह अंधविश्वासों में विश्वास नहीं रखता था। उसने पैसे देकर ड्राइवर को विदा किया और हवेली के मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ा। चाबी लॉक में घूमी और भारी लकड़ी का दरवाजा चरचराता हुआ खुला।
अंदर की हवा ठंडी और स्थिर थी, जैसे सदियों से बंद पड़ी हो। राजेश ने स्विच ऑन किया, लेकिन बल्ब ने सिर्फ एक धुंधली पीली रोशनी ही फैलाई। वह अपने सामान के साथ लिविंग रूम में पहुँचा।
पहली रात सब कुछ शांत थी। राजेश ने अपना लैपटॉप लगाया, कुछ नोट्स बनाए, और सोने चला गया।
पहली छाया
आधी रात को वह एक अजीब आवाज से जागा। ऐसा लगा जैसे कोई सीढ़ियों से उतर रहा हो। धीमे, लेकिन स्पष्ट कदमों की आवाज।
राजेश उठ बैठा। उसने अपना फोन उठाया और टॉर्च जलाकर कमरे से बाहर झाँका। कोरिडोर खाली था।
“शायद पुराने घर की आवाजें,” उसने खुद को समझाया।
लेकिन जब वह वापस बिस्तर पर लेटा, तो उसे महसूस हुआ कि कमरे का तापमान अचानक गिर गया है। उसने रजाई ओढ़ी और आँखें बंद कर लीं।
तभी उसे लगा जैसे कोई उसे देख रहा है।
वह धीरे से आँखें खोलकर देखा। दीवार पर, मंद प्रकाश में, एक लम्बी सी छाया दिखाई दी। छाया उसकी नहीं थी।
राजेश की सांसें थम सी गईं। छाया हिली, और फिर धीरे-धीरे दीवार से खिसक कर गायब हो गई।
सुबह होने तक वह आँखें बंद किए लेटा रहा।
दूसरी छाया
अगले कुछ दिन सामान्य बीते। राजेश हवेली के इतिहास पर शोध करने लगा। उसे पता चला कि यह हवेली 1920 में एक जमींदार ने बनवाई थी, जिसकी अचानक रहस्यमय मौत हो गई थी। उसके बाद कई लोगों ने इस घर में अजीब घटनाओं का दावा किया था।
पाँचवीं रात को फिर वही आवाजें सुनाई दीं। इस बार राजेश तैयार था। उसने अपना कैमरा और वॉयस रिकॉर्डर तैयार रखा था।
आधी रात को जब कदमों की आवाज फिर शुरू हुई, तो उसने कैमरा चालू कर दिया और कमरे से बाहर आया।
कोरिडोर के अंत में एक आकृति दिखाई दी। एक लंबा, पतला साया जो प्रकाश के बिना ही दीवार पर मौजूद था। राजेश ने कैमरा उठाया, लेकिन तभी…
उसे पीछे से सांस लेने की आवाज सुनाई दी।
वह पलटा। उसके पीछे, दूसरी दीवार पर, एक दूसरी छाया थी। छोटी, मोटी, और पहली से बिल्कुल अलग।
दोनों छायाएँ एक-दूसरे की ओर बढ़ने लगीं।
राजेश भागकर अपने कमरे में गया और दरवाजा बंद कर दिया। पूरी रात वह दरवाजे के पीछे से आने वाली खरोंचने की आवाजें सुनता रहा।
सच्चाई का पर्दाफाश
अगले दिन राजेश ने हवेली के बारे में और गहराई से शोध किया। स्थानीय पुस्तकालय में उसे एक पुरानी डायरी मिली, जो उस जमींदार की थी। डायरी में लिखा था:
“मेरे पास दो हैं – एक दिन का, एक रात का। दिन वाला मेरी हर गलती को दर्ज करता है, रात वाला उन गलतियों का हिसाब चुकाता है। मैं उनके बीच फँस गया हूँ।”
राजेश को समझ आने लगा। ये दोनों छायाएँ जमींदार के दो पहलू थे – एक उसका सामाजिक रूप, दूसरा उसका अंधेरा पक्ष। मौत के बाद भी ये दोनों इस हवेली में फँसे हुए थे।
उस रात, राजेश ने फैसला किया कि वह इन छायाओं का सामना करेगा। उसने हवेली के मुख्य हॉल में दो मोमबत्तियाँ जलाईं।
आधी रात को दोनों छायाएँ प्रकट हुईं। लंबी छाया एक कोने से, और छोटी छाया दूसरे कोने से।
राजेश ने डायरी पढ़नी शुरू की। जैसे-जैसे वह जमींदार के गुनाह पढ़ता गया, वैसे-वैसे दोनों छायाएँ एक-दूसरे के करीब आती गईं।
अचानक हवा तेज हो गई, मोमबत्तियाँ बुझ गईं, और एक चीख की आवाज गूंज उठी।
मुक्ति
सुबह होते ही राजेश ने हवेली छोड़ दी। उसने महसूस किया कि दोनों छायाएँ आखिरकार एक हो गई थीं, और शायद इस तरह उन्हें मुक्ति मिल गई।
लेकिन जब वह शहर लौटा और अपने अपार्टमेंट में पहुँचा, तो उसने देखा कि उसकी खुद की छाया… दोहरी हो गई थी।
दीवार पर दो छायाएँ स्पष्ट दिखाई दे रही थीं। एक उसके हर हरकत की नकल कर रही थी, दूसरी… थोड़ी देर बाद।
राजेश ने खिड़की से बाहर देखा। सूरज ढल रहा था, और लम्बी-लम्बी छायाएँ बन रही थीं।
उसने मुस्कुराते हुए अपनी डबल छाया को देखा। कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। बल्कि, शायद अब शुरू ही हुई थी।
~ समाप्त ~