दिल्ली के उन तंग गलियों में, जहाँ सूरज की रोशनी भी घुसने से कतराती थी, एक छोटी सी कोठरी में राहुल अपनी माँ के साथ रहता था। उसकी दुनिया महज दस फुट बाई दस फुट थी, जिसमें एक चारपाई, एक छोटा सा चूल्हा और किताबों का एक ढेर था। राहुल के पिता का निधन तब हुआ था जब वह महज पाँच साल का था, और तब से उसकी माँ, शीला, दूसरों के घरों में बर्तन माँजकर परिवार चलाती थी।
राहुल की सुबह चार बजे शुरू होती थी। जब पूरी दिल्ली गहरी नींद में होती, वह एक टूटी-फूटी मेज पर केरोसिन लैंप की रोशनी में पढ़ाई करता। उसके पास किताबें नहीं थीं, इसलिए वह स्कूल के पुस्तकालय से किताबें उधार लेकर अपने हाथ से नोट्स बनाता। कई बार तो उसे रात के अँधेरे में सड़क के लैंप के नीचे बैठकर पढ़ना पड़ता था।
“बेटा, थोड़ा सो लो,” उसकी माँ अक्सर कहतीं, “तुम्हारी आँखें लाल हो रही हैं।”
“माँ, जब मैं बड़ा होकर इंजीनियर बनूँगा, तब तुम्हें ये सब कष्ट नहीं उठाने पड़ेंगे,” राहुल जवाब देता।
परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि महीने के आखिरी हफ्ते में अक्सर राहुल को भूखे पेट सोना पड़ता। एक बार तो उसने तीन दिन तक सिर्फ चाय पीकर गुज़ारा किया था, क्योंकि घर में आटा खत्म हो गया था और माँ की तनख्वाह आने में अभी दो दिन थे।
राहुल के जीवन में पहला बड़ा मोड़ तब आया जब वह दसवीं कक्षा में था। उसके स्कूल के प्रिंसिपल, श्री वर्मा, ने उसकी मेहनत देखकर उसे एक कोचिंग संस्थान में छात्रवृत्ति दिलवाई। यह कोचिंग IIT की तैयारी करवाती थी, और राहुल के लिए यह स्वर्ग के दरवाज़े खोलने जैसा था।
पर समस्या थी आवागमन की। कोचिंग संस्थान शहर के दूसरे छोर पर था, और राहुल के पास बस का किराया तक नहीं था। उसने हल निकाला – वह हर रोज़ पैदल आठ किलोमीटर जाता और आठ किलोमीटर वापस आता। सुबह चार बजे निकलता, दस बजे कोचिंग पहुँचता, फिर वापस आकर स्कूल जाता।
एक सर्दियों की रात, जब वह कोचिंग से लौट रहा था, तेज़ बारिश होने लगी। भीगते हुए, ठंड से काँपते हुए, जब वह घर पहुँचा तो बुखार से तप रहा था। उसकी माँ ने उसे गले लगाया और रो पड़ी, “मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पा रही, बेटा।”
राहुल ने कमज़ोर सी मुस्कान के साथ कहा, “माँ, तुम मेरी प्रेरणा हो। तुम्हारा हर संघर्ष मुझे मजबूत बनाता है।”
जैसे-जैसे IIT की प्रवेश परीक्षा नज़दीक आने लगी, राहुल पर दबाव बढ़ने लगा। उसे पता था कि यह परीक्षा न सिर्फ उसके भविष्य, बल्कि उसकी माँ के सभी संघर्षों का फल तय करेगी। वह दिन में अठारह घंटे पढ़ता, केवल चार घंटे सोता।
परीक्षा वाले दिन, राहुल के पास जाने के लिए अच्छे कपड़े तक नहीं थे। उसकी माँ ने अपनी एकमात्र साड़ी बेचकर उसके लिए नई शर्ट-पैंट खरीदी। राहुल की आँखों में आँसू थे जब उसने वह कपड़े पहने।
“माँ, मैं तुम्हें कभी निराश नहीं करूँगा,” उसने वादा किया।
परीक्षा कक्ष में बैठकर, राहुल ने पहली बार महसूस किया कि वह देश के सबसे मेधावी छात्रों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है। कई प्रश्न कठिन थे, कई आसान, पर राहुल ने हर प्रश्न को उसी लगन से हल किया जिस लगन से वह जीवन की हर चुनौती का सामना करता था।
परिणाम आने के दिन, राहुल और उसकी माँ स्कूल के कंप्यूटर लैब में गए। जब राहुल ने अपना रोल नंबर डाला और स्क्रीन पर देखा कि उसने IIT दिल्ली में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के लिए चयनित हो गया है, तो वह स्तब्ध रह गया।
उसकी माँ ने उसे गले लगा लिया और दोनों खुशी के आँसू बहाने लगे। पूरे स्कूल में खुशी की लहर दौड़ गई। राहुल गरीब परिवार से IIT में चयनित होने वाला पहला छात्र था।
पर खुशी ज्यादा देर नहीं रही। IIT की फीस इतनी थी कि राहुल के लिए वहाँ पढ़ना असंभव लग रहा था। एक बार फिर से निराशा के बादल छाने लगे।
जब स्थानीय अखबार ने राहुल की कहानी छापी, तो कुछ अजनबियों ने आगे आकर मदद की पेशकश की। एक स्थानीय व्यवसायी ने उसकी पूरी फीस भरने का वादा किया। एक परिवार ने उसे रहने के लिए कमरा दिया। लोगों ने किताबें, कपड़े और अन्य जरूरत की चीजें दीं।
राहुल हैरान था। “मैंने कभी नहीं सोचा था कि इतने लोग मेरी चिंता करेंगे,” उसने अपनी माँ से कहा।
“बेटा, दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है। तुम्हारी मेहनत ने सबका दिल जीत लिया है,” उसकी माँ ने जवाब दिया।
IIT का पहला दिन राहुल के लिए सपने जैसा था। विशाल कैंपस, आधुनिक लैब, दुनिया भर के प्रोफेसर – यह सब उसकी कल्पना से परे था। पर शीघ्र ही उसे एहसास हुआ कि यहाँ का स्तर बिल्कुल अलग था। अंग्रेजी में कमजोर होने के कारण उसे शुरुआत में काफी दिक्कतें आईं।
एक बार क्लास में प्रोफेसर ने उससे कुछ पूछा, और राहुल का जवाब सुनकर कुछ छात्र हँस पड़े क्योंकि उसकी अंग्रेजी में गलतियाँ थीं। उस दिन राहुल ने ठान लिया कि वह अंग्रेजी सीखेगा। उसने लाइब्रेरी में घंटों बिताकर अंग्रेजी सीखी, अखबार पढ़े, और छह महीने में ही उसने न केवल अंग्रेजी सीख ली, बल्कि क्लास में टॉप भी किया।
राहुल की मेहनत और प्रतिभा ने जल्द ही सबका ध्यान खींचा। दूसरे वर्ष में, उसने एक ऐसी डिवाइस बनाई जो गरीब इलाकों में सस्ते दामों पर शुद्ध पानी उपलब्ध करा सकती थी। इस आविष्कार ने उसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
राहुल की प्रतिभा को देखते हुए उसे एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए चुना गया। पर समस्या थी विमान किराये की। एक बार फिर, उसके प्रोफेसरों और सहपाठियों ने चंदा इकट्ठा करके उसका किराया जमा किया।
अमेरिका में आयोजित उस प्रतियोगिता में राहुल ने एक ऐसी सामग्री विकसित की जो सौर ऊर्जा को तीन गुना अधिक कुशलता से संग्रहित कर सकती थी। उसने प्रथम पुरस्कार जीता और दुनिया भर के वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया।
वहाँ मौजूद एक प्रमुख टेक कंपनी के CEO ने उसे नौकरी की पेशकश की, पर राहुल ने विनम्रता से इनकार कर दिया। “मैं भारत वापस जाकर अपने देश की सेवा करना चाहता हूँ,” उसने कहा।
IIT से स्नातक होने के बाद, राहुल ने अपनी स्टार्टअप कंपनी ‘जलसुधा’ शुरू की, जो गाँवों और शहरी झुग्गियों में सस्ते दामों पर शुद्ध पानी उपलब्ध कराती थी। शुरुआत में उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा – फंडिंग की कमी, बिज़नेस नेटवर्क का अभाव, और सरकारी अनुमतियों की जटिल प्रक्रिया।
पर राहुल ने हार नहीं मानी। उसने अपनी माँ के जेवर तक बेचकर प्रोटोटाइप तैयार किया। धीरे-धीरे, उसके इनोवेशन ने निवेशकों का ध्यान खींचा। दो साल के भीतर, ‘जलसुधा’ ने भारत के दस राज्यों में अपनी पहुँच बना ली और पचास हजार से अधिक परिवारों को शुद्ध पानी उपलब्ध कराया।
आज राहुल सिर्फ एक सफल उद्यमी नहीं है, बल्कि लाखों गरीब बच्चों के लिए प्रेरणा स्रोत है। उसने ‘उम्मीद फाउंडेशन’ शुरू किया है जो गरीब मेधावी छात्रों को शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति देता है। अब तक इस फाउंडेशन ने पाँच सौ से अधिक छात्रों की मदद की है।
राहुल अक्सर स्कूलों और कॉलेजों में जाकर युवाओं को संबोधित करता है। “संसाधनों की कमी सफलता की रुकावट नहीं है,” वह कहता है, “अगर आपके पास सपने हैं और उन्हें पूरा करने का जुनून है, तो कोई भी बाधा आपको रोक नहीं सकती।”
राहुल की माँ अब उसके साथ रहती है। वह अब काम नहीं करती, बल्कि ‘उम्मीद फाउंडेशन’ की ओर से महिलाओं को सशक्त बनाने के कार्यक्रमों में भाग लेती है। एक बार जो महिला दूसरों के घरों में बर्तन माँजती थी, आज वह सैकड़ों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देती है।
राहुल का विवाह एक सामाजिक कार्यकर्ता से हुआ है और उनका एक बेटा है। वह चाहता है कि उसका बेटा भी समाज सेवा के मूल्यों को समझे। “मैं उसके लिए धन नहीं, बल्कि मानवता और करुणा की विरासत छोड़ना चाहता हूँ,” राहुल कहता है।
हाल ही में राहुल को राष्ट्रपति भवन में सम्मानित किया गया है। उसकी कहानी पाठ्यपुस्तकों में शामिल की गई है। पर राहुल के लिए यह यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है। वह अब एक नई परियोजना पर काम कर रहा है जिसका उद्देश्य गाँवों में सौर ऊर्जा के माध्यम से रोजगार सृजन करना है।
“मैं चाहता हूँ कि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे,” राहुल अपने एक भाषण में कहता है, “मेरी कहानी सिर्फ मेरी नहीं है, यह हर उस बच्चे की कहानी है जो संघर्ष कर रहा है। मैं चाहता हूँ कि मेरी कहानी उन्हें बताए कि असंभव कुछ भी नहीं है।”
राहुल की यात्रा हमें कई सबक सिखाती है:
राहुल की कहानी सिर्फ एक गरीब लड़के के अमीर बनने की कहानी नहीं है। यह मानवीय इच्छाशक्ति की शक्ति, शिक्षा के परिवर्तनकारी प्रभाव और सामाजिक जिम्मेदारी की कहानी है। उसने साबित किया कि जन्म से कोई गरीब या अमीर नहीं होता, बल्कि विचार और कर्म से होता है।
आज राहुल जिस मकान में रहता है, वह उसी इलाके में है जहाँ वह बड़ा हुआ था। वह चाहता था कि उसे हमेशा अपनी जड़ें याद रहें। उसकी कोठरी अब एक संग्रहालय में बदल गई है जहाँ हर साल हज़ारों बच्चे आते हैं और प्रेरणा लेते हैं।
राहुल की कहानी हमें याद दिलाती है कि हर मुश्किल में एक अवसर छुपा होता है, हर अंधेरी रात के बाद एक नई सुबह आती है, और हर संघर्ष हमें उस सफलता के लिए तैयार करता है जिसके हम हकदार हैं।
“सपने वो नहीं जो हम नींद में देखते हैं,” राहुल अक्सर कहता है, “सपने वो हैं जो हमें नींद ही न आने दें। और मेरा सपना है एक ऐसे भारत का जहाँ हर बच्चे को शिक्षा मिले, हर युवा को अवसर मिले, और हर इंसान को सम्मान के साथ जीने का अधिकार मिले।”
यही सपना आज राहुल को हर सुबह जगाता है, और यही सपना उसे नई ऊँचाइयों की ओर ले जा रहा है – दरवाज़े से दूर, आसमान तक।
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