धुन कजरी की, कहानी प्यार की
बनारस की गलियाँ सुबह से ही सरसरा रही थीं। नहीं, हवा नहीं, बातचीत से। “सुनते हो? अम्मा कह रही थीं, आज सावन की पहली सोमवारी है। शहर के बाहर, पुराने पीपल के पेड़ के पास, कोई नया बैंड बजाएगा। कजरी। असली, देशी।”

अनन्या के कानों तक यह बात पहुँची तो उसका मन विचलित हो उठा। दिल्ली की रहने वाली, यहाँ इंटर्नशिप करने आई थी, पर बनारस की आत्मा अभी तक छू नहीं पाई थी। शाम ढलते ही, उसने पुरानी साड़ी निकाली, चप्पल पहनी और उस पते की ओर निकल पड़ी, जो उसने फोन में सेव किया था।
जगह शहर से दूर, एक खुले मैदान में थी। पुराना विशाल पीपल, उसके नीचे मंच सजा था। लोग बैठने लगे थे – सफ़ेद धोती-कुर्ते वाले बुज़ुर्ग, रंग-बिरंगी साड़ियों वाली महिलाएँ, कैमरे लटकाए पर्यटक। हवा में मिट्टी और बरसात की सोंधी गंध थी।
थोड़ी देर में मंच पर तीन कलाकार आए। एक बुज़ुर्ग, जिनके हाथों में सारंगी थी, एक युवक तबले पर और बीचों-बीच एक युवती, लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी में, जिसकी आँखों में एक अजीब-सी दूरियाँ थीं।
उसने माइक संभाला, आँखें मूंदीं। और फिर, सारंगी का एक लंबा, करुण स्वर हवा में तैरा… और उसके बाद उसके गले से निकला:
“कहीं सावन घिर आयो, कहीं बदरा छायो…
मोरे अँगना में सजनवा, काहे ना आयो…”
वह आवाज़ थी या जादू? अनन्या की साँस थम सी गई। यह वह कजरी नहीं थी जो उसने रेडियो पर सुनी थी। इसमें एक तड़प थी, एक इंतज़ार का दर्द, एक ऐसी व्यथा जो सीधे दिल के तारों को झंझोड़ दे।
उसकी नज़र मंच के पीछे खड़े एक युवक पर टिक गई। वह सावधानी से स्पीकर और तारों का ख्याल रख रहा था। पर उसकी नज़रें केवल गायिका पर थीं। उसके चेहरे पर गर्व था, चिंता थी, और एक अनकही कोमलता भी।
कजरी का माहौल गहरा होता गया। बुज़ुर्ग सारंगी वादक की उँगलियाँ रोमांचक तान छेड़ रही थीं। गायिका अब गा रही थी:
“सावन की झड़ी लगी, मन में उमंग भरी…
तुम बिन सजनी, यह मनवा अधूरो रे…”
अचानक, एक तेज हवा का झोंका आया। मंच पर एक स्पीकर से तेज आवाज़ आई और फिर खराब हो गया। युवक तुरंत कूदा। उसने तेजी से तार जोड़े, स्विच दबाए, पर कुछ काम नहीं कर रहा था। गायन रुकने का खतरा था।
तभी अनन्या का हाथ अपने बैग में गया। वह इवेंट मैनेजमेंट पढ़ रही थी। उसके पास एक पोर्टेबल मिक्सर था, जो उसने कल एक शूट के लिए इस्तेमाल किया था। बिना सोचे, वह मंच की ओर बढ़ी। युवक की आँखों में हताशा देखकर उसने कहा, “मैं मदद कर सकती हूँ।”
कुछ ही मिनटों में, उसके छोटे उपकरण ने काम करना शुरू कर दिया। आवाज़ फिर से स्वच्छ और मधुर हो गई। गायिका ने राहत की सांस ली और फिर से गाने में डूब गई। युवक ने अनन्या की ओर देखा, उसकी आँखों में एक चमकदार “शुक्रिया” था।
कार्यक्रम खत्म हुआ। लोग फैलने लगे। अनन्या अपना सामान समेट ही रही थी कि वह युवक उसके पास आया।
“आपने बचा लिया। बहुत बहुत धन्यवाद। मैं राहुल हूँ। और वह,” उसने गायिका की ओर इशारा किया, जो अब पास आ रही थी, “मेरी दीदी, मीरा हैं।”
“अनन्या,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
“आपको कजरी पसंद आई?” मीरा ने पूछा, उसकी आवाज़ अब गहरी और कोमल थी।
“मैंने ऐसी कजरी कभी नहीं सुनी। इसमें… दर्द था।”
मीरा की आँखें नम हो गईं। “यह दर्द मेरा नहीं, हमारी दादी का है। यह राग-रागनियाँ, यह बोल, सब उन्हीं से सीखा है। आज उनका सपना था कि हम बड़े मंच पर गाएँ। पर वह इस साल सावन से पहले ही चली गईं। आज उनकी याद में ही तो गा रही थी।”
अनन्या समझ गई। उस आवाज़ में जो दर्द था, वह सैकड़ों साल पुराने इंतज़ार का नहीं, एक पोती की ताज़ा विदाई का दर्द था, जो परंपरा के साथ मिलकर एक नया रूप ले रहा था।
राहुल बोला, “चलिए, आपको छोड़ दें? रात हो गई है।”
रास्ते में, रिक्शा की झनझनाहट के बीच, राहुल ने बताया, “हम छोटे-मोटे कार्यक्रम करके परिवार चलाते हैं। दादी का सपना था कि कजरी को नए लोग सुनें। आज आप जैसे लोग आए, तो लगा सपना सच हो रहा है।”
अनन्या ने कहा, “मैं… मैं अगले कार्यक्रम का प्रमोशन कर सकती हूँ। सोशल मीडिया पर, वीडियो बनाकर।”
राहुल की आँखें चमक उठीं। “सच्ची?”
हाँ, सच्ची। और यहीं से शुरू हुई एक नई कहानी। एक ऐसी कहानी जिसकी धुन थी पुरानी कजरी, और बोल थे नए रिश्तों के। अनन्या का कैमरा मीरा के गहन अभ्यास, राहुल के संघर्ष और बनारस के गली-कूचों में छिपे संगीत को कैद करने लगा।
धीरे-धीरे, उनके वीडियो वायरल होने लगे। न सिर्फ़ कजरी, बल्कि उस पारिवारिक जज़्बे की वजह से, जो हर स्वर में झलकता था। एक दिन, एक बड़े संगीत समारोह से बुलावा आया।
फिर वह शाम आई। विशाल मंच। रोशनी। भीड़। मीरा नर्वस थीं। राहुल की उँगलियाँ काँप रही थीं। अनन्या विंग में खड़ी, उन्हें हौसला दे रही थी।
मंच पर जाते हुए, मीरा ने अपनी चूड़ियाँ खनखनाई और आँखें बंद कर लीं। दादी का चेहरा याद किया। सारंगी ने फिर वही पुराना, मार्मिक स्वर छेड़ा। और फिर मीरा की आवाज़ फूटी:
“सावन में लेहराये, मनवा मेरा डोल रे…
जैसे बिन मोती के, धागा हो खोल रे…”
इस बार, दर्द के साथ आशा का स्वर भी था। विदाई के साथ विरासत का गर्व भी। अनन्या की नज़र राहुल पर पड़ी, जो तबले पर था और उसकी आँखों में एक चमक थी… जो सिर्फ़ संगीत के लिए नहीं, बल्कि उसके लिए भी थी, जो अब उनकी दुनिया का हिस्सा बन चुकी थी।
कार्यक्रम के बाद, रात की ठंडी हवा में, तीनों चाय की दुकान पर बैठे। चुप्पी तोड़ते हुए राहुल ने कहा, “अनन्या, तुम्हारी इंटर्नशिप तो अगले हफ्ते खत्म हो रही है न?”
“हाँ,” अनन्या ने चाय के कप को दोनों हाथों से पकड़ते हुए कहा।
“तो… क्या तुम्हारी कहानी यहीं खत्म हो जाएगी?” राहुल की आवाज़ में एक असामान्य गंभीरता थी।
अनन्या ने मुस्कुराते हुए आकाश की ओर देखा, जहाँ बादलों के पीछे चंद्रमा झाँक रहा था। “कजरी की धुन कभी खत्म नहीं होती, राहुल। बस, बदलती रहती है। थोड़ी पुरानी, थोड़ी नई। मेरी ट्रेन का टिकट कट गया है, पर मेरा दिल अब एक और टिकट कटवा रहा है। दिल्ली से बनारस का।”
और उस रात, पहली बार, राहुल की आँखों में केवल संगीत नहीं, बल्कि पूरा का पूरा भविष्य चमक उठा।
कहानी का अंत नहीं, बस विराम है। क्योंकि कजरी की धुन अभी बजनी बाकी है… और इस बार, उसमें दो दिलों की धड़कनों का साथ भी शामिल है।
कहानी का सार:
यह कहानी परंपरा और आधुनिकता, विरासत और नए रिश्तों, दर्द और आशा के बीच का सेतु है। दादी के सपने को पूरा करने की कोशिश, एक नई मुलाकात, और संगीत के माध्यम से जुड़ते हुए दो अलग-अलग दुनियाओं के लोग। यह प्यार है संगीत से, विरासत से, और फिर एक-दूसरे से। बिल्कुल प्यारी सी।