देसी शादी
उज्जैन के एक मध्यमवर्गीय परिवार में रहने वाली आर्या शर्मा जब पहली बार राहुल मेहरा से मिली, तो उसे एहसास नहीं था कि यह मुलाकात उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगी। दोनों की मुलाकात एक कॉमन फ्रेंड के जन्मदिन की पार्टी में हुई थी, जहाँ पहली नज़र में ही कुछ ऐसा जुड़ाव महसूस हुआ जिसे शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल था।
छह महीने की दोस्ती के बाद जब राहुल ने आर्या को शादी का प्रस्ताव दिया, तो आर्या की खुशी का ठिकाना न रहा। पर देसी शादी सिर्फ दो लोगों की सहमति से नहीं, बल्कि दो परिवारों की सहमति से होती है। और इसी के साथ शुरू हुई औपचारिकताओं की लंबी प्रक्रिया।
शनिवार का शुभ दिन चुना गया दोनों परिवारों की पहली मुलाकात के लिए। आर्या का घर सजावट से चमक उठा था। माँ ने सुबह से ही विशेष व्यंजन तैयार करने शुरू कर दिए थे – आलू की टिक्की, छोले-भटूरे, समोसे और गुलाब जामुन।
राहुल अपने माता-पिता और चाचा-चाची के साथ दोपहर तीन बजे पहुँचा। पहली नज़र में ही दोनों परिवारों के बीच एक सहज संबंध बन गया। चाय-नाश्ते के बाद गंभीर बातचीत शुरू हुई।
“हमारी आर्या बहुत सीधी-सादी लड़की है,” आर्या के पिता ने गर्व से कहा, “उसने एमबीए किया है और अभी एक बैंक में काम करती है।”
राहुल के पिता ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “राहुल भी आईआईटी से इंजीनियर है और मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी पोजीशन पर है। हमें आपकी बेटी पसंद आई है।”
लगभग दो घंटे की बातचीत के बाद रिश्ता तय हो गया। राहुल के पिता ने आर्या के माता-पिता को श्रीफल (नारियल) और मिठाई भेंट की। यह देसी रीति थी – सादा लेकिन दिल से भरा हुआ।
एक महीने बाद, एक सुंदर रेस्तराँ में सगाई समारोह आयोजित किया गया। आर्या ने गुलाबी रंग का अनारकली सूट पहना था जबकि राहुल क्रीम रंग के शेरवानी में सजधज कर आया था।
समारोह की शुरुआत में दोनों परिवारों के बुजुर्गों ने आशीर्वाद दिया। फिर राहुल ने आर्या को अंगूठी पहनाई और आर्या ने राहुल को। कैमरा फ्लैश चमक उठे, मेहमानों ने तालियाँ बजाईं। यह आधुनिकता और परंपरा का सुंदर मेल था।
सगाई के बाद आर्या और राहुल के लिए एक नया चरण शुरू हुआ – शादी की तैयारियाँ। दोनों माँएं अब लगातार फोन पर बातें करने लगीं – शादी की तारीख, स्थान, मेहमानों की सूची, मेनू, और सबसे महत्वपूर्ण, दुल्हन के लहंगे और ज्वैलरी का चुनाव।
पंडित जी ने शुभ मुहूर्त निकाला – तीन महीने बाद। अब तैयारियों ने गति पकड़ी। दोनों परिवारों में उत्साह का माहौल था।
शादी से एक हफ्ते पहले हल्दी समारोह हुआ। आर्या के घर सुबह से ही महिलाएं इकट्ठा होने लगीं। पीली हल्दी पिसी जा रही थी, जिसमें थोड़ा तेल मिलाया गया। आर्या को एक विशेष आसन पर बैठाया गया। उसकी सहेलियों ने पहले हल्दी लगाई, फिर उसकी मौसी, चाची और अन्य रिश्तेदारों ने।
हल्दी लगाते समय महिलाएं गीत गा रही थीं:
“हल्दी चढ़े दुल्हन के गाल, लग जाए पिया का प्यार खास”
राहुल के घर भी यही रस्म अदायगी हो रही थी। हल्दी समारोह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि दुल्हन-दूल्हे को शादी के लिए तैयार करने और उनकी त्वचा को निखारने की परंपरा है।
शादी से दो दिन पहले मेहंदी समारोह था। आर्या के घर का आँगन रंग-बिरंगी लाइट्स और फूलों से सजाया गया था। मेहंदी वाली दीदी आईं, जो अपने साथ ताज़ी मेहंदी और डिज़ाइन के बेहतरीन नमूने लाई थीं।
आर्या को एक आरामदायक कुर्सी पर बैठाया गया। दीदी ने उसके हाथों पर बारीकी से मेहंदी लगाना शुरू किया। पहले दाहिने हाथ की हथेली पर, फिर पीछे, फिर बाएँ हाथ पर। डिज़ाइन इतनी जटिल और सुंदर थी कि देखने वाले हैरान रह जाते।
मेहंदी लगाते समय आर्या की सहेलियों ने मस्ती भरे गीत गाए:
“मेहंदी हाथों में रचा दो नाम पिया का, हो जाए रंग गहरा तो मिले दामाद ससुराल वाला”
राहुल का नाम मेहंदी में छुपाया गया था। परंपरा के अनुसार, दूल्हे को दुल्हन के हाथों से अपना नाम ढूंढना होता है। जितना रंग गहरा होगा, पति-पत्नी का प्यार उतना ही गहरा माना जाता है।
मेहंदी समारोह के बाद संगीत और नृत्य का कार्यक्रम था। युवाओं ने धमाल मचा दिया। आर्या की छोटी बहन ने भांगड़ा किया तो राहुल की कज़िन ने गरबा। सभी उम्र के लोग नाच-गा रहे थे।
आर्या की दादी ने भी यादों में खोकर कहा, “हमारे ज़माने में तो इतनी धूमधाम नहीं होती थी। सादगी से शादी हो जाती थी। पर आजकल के ज़माने में तो यह भी जरूरी है। बच्चे खुश रहें, बस यही दुआ है।”
रात भर चले इस कार्यक्रम के बाद आर्या थकी हुई थी, पर खुशी से भरी हुई। उसे एहसास हो रहा था कि शादी सिर्फ एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि यादों का एक खजाना है जो जीवनभर साथ रहता है।
शादी वाले दिन आर्या सुबह चार बजे उठ गई। ब्यूटीशियन आ चुके थे। तीन घंटे तक चला मेकअप और हेयर स्टाइलिंग का सिलसिला। फिर लहंगा पहनने का समय आया।
आर्या का लहंगा लाल रंग का था, जिस पर सोने की ज़री का काम किया गया था। लहंगे का वजन इतना था कि उसे चलने में मदद की जरूरत पड़ती। ज्वैलरी सेट में हार, बाली, नथ, चूड़ियाँ और कंगन शामिल थे। माँ ने आँसू भरी आँखों से उसे सजाया।
“मेरी बेटी आज बहू बन रही है,” माँ ने गले लगाते हुए कहा, “तुम हमेशा खुश रहो, यही दुआ है।”
दूसरी ओर, राहुल घोड़ी पर सवार होकर बारात लेकर आ रहा था। बैंड बाजा बज रहा था, नाच-गाना हो रहा था। बारात में करीब 200 लोग थे।
जब बारात आर्या के घर पहुँची, तो आर्या के भाई और रिश्तेदारों ने स्वागत किया। जनेऊ समारोह हुआ जहाँ राहुल के मामा ने उसे जनेऊ पहनाई। फिर दुल्हन के घर वालों ने बारात का स्वागत मिठाई और पानी पिलाकर किया।
मंडप सजा हुआ था। आग्नेय (अग्नि) जल रही थी। पंडित जी मंत्रोच्चारण कर रहे थे। आर्या और राहुल मंडप में आए। आर्या के पिता ने कन्यादान किया – अपनी बेटी को राहुल के हवाले करते हुए।
फिर सात फेरे शुरू हुए। हर फेरे के साथ एक वचन:
हर फेरे पर दोनों परिवारों की महिलाओं ने रोली और चावल के दाने फेंके। फेरे पूरे होने के बाद आर्या और राहुल ने एक-दूसरे को माला पहनाई।
सबसे भावुक पल विदाई का था। आर्या ने माता-पिता के पैर छुए। माँ का दिल भर आया, पिता की आँखें नम हो गईं। भाई ने आर्या को पालकी में बैठाया।
“माँ, बापू, मैं जल्दी मिलने आऊँगी,” आर्या ने रोते हुए कहा।
“बेटा, यह तेरा नया घर है। खुश रहना,” पिता ने आशीर्वाद दिया।
राहुल ने वादा किया, “चिंता न करें, मैं आर्या का पूरा ख्याल रखूँगा।”
जब आर्या नए घर पहुँची, तो राहुल की माँ ने दही-चीनी का कलश घुमाकर उसका स्वागत किया। फिर आर्या ने घर में प्रवेश किया, जहाँ उसने कलश को एक जगह रखकर चावल से भरा। यह समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक था।
अगले दिन गृहप्रवेश समारोह था, जहाँ आर्या ने पहली बार रसोई में प्रवेश किया और मीठा व्यंजन बनाया। यह परंपरा नई दुल्हन को नए घर में समायोजित करने में मदद करती है।
शादी के बाद आने वाली पहली होली पर आर्या के मायके से उसके भाई आए। उन्होंने आर्या के लिए उपहार लाए और होली मनाई। यह रिवाज है कि शादी के बाद पहली होली पर दुल्हन के भाई उसे लेने आते हैं।
इस अवसर पर आर्या ने राहुल के परिवार के सभी सदस्यों के साथ खूब मस्ती की। रंगों की होली के साथ-साथ दिलों की दूरियाँ भी मिट गईं।
आर्या और राहुल की शादी को अब छह महीने हो चुके हैं। आर्या ने नौकरी जारी रखी है। वह सुबह घर का काम संभालती है, फिर ऑफिस जाती है। शाम को वह और राहुल साथ समय बिताते हैं।
आर्या ने राहुल के परिवार के साथ तालमेल बैठा लिया है। उसकी सास ने उसे परिवार के रीति-रिवाज सिखाए हैं। आर्या ने भी उन्हें कुछ नए व्यंजन सिखाए हैं।
एक शाम जब आर्या और राहुल अपनी शादी की अलबम देख रहे थे, तो आर्या ने कहा, “क्या सोचा था कि शादी इतनी बड़ी चीज़ होती है? यह सिर्फ एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवनभर की यादों की नींव है।”
राहुल मुस्कुराया, “हमारी देसी शादी की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह सिर्फ हम दोनों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन है। और इसीलिए इसकी खुशी दोगुनी हो जाती है।”
आर्या ने हाँ में सिर हिलाया। उसे एहसास हो रहा था कि देसी शादी सिर्फ रीति-रिवाज नहीं, बल्कि एक जीवनशैली है। यह संबंधों को मजबूत करती है, परिवारों को जोड़ती है, और प्यार को एक नया आयाम देती है।
और इस तरह, एक देसी शादी ने न सिर्फ दो लोगों को जोड़ा, बल्कि दो दिलों, दो परिवारों और दो जीवनों को एक नई दिशा दी। क्योंकि देसी शादी में हर रस्म एक मंत्र है, हर रिवाज एक बंधन है, और हर परंपरा प्यार की एक नई परत है जो जीवनभर चमकती रहती है।
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