रमा ने कड़ाही में प्याज़-टमाटर का मसाला चलाते हुए सुबह के सूरज को रसोई की खिड़की से झाँकते देखा। चूल्हे की नारंगी लपटें उसके चेहरे पर नाच रही थीं, और उसकी चूड़ियाँ हर हलचल पर खनकती थीं। पर आज उन खनकती चूड़ियों में भी एक उदास सी सन्नाटा था, जैसे वह सिमरन के फोन न आने का इंतज़ार कर रही हो।
“अजय, सिमरन को फोन लगा देते हो? एक हफ्ते से कोई खबर नहीं,” रमा ने पति से कहा, जो अखबार पढ़ते हुए चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे।
“अभी अमेरिका में रात होगी। कल फोन करेंगे,” अजय ने बिना अखबार नीचे किए जवाब दिया।
रमा ने साँस छोड़ी। सिमरन उनकी इकलौती बेटी थी, पाँच साल पहले उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गई थी, और फिर वहीं की होकर रह गई। शादी, नौकरी, जीवन—सब वहीं। हर बार फोन पर वही बातें—”मम्मी, तुम आ जाओ यहाँ”, “इतना मत पढ़ो”, “घर में नौकर रख लो”। रमा हर बार मुस्कुरा कर टाल देती, क्योंकि वह जानती थी कि उसके लिए यह रसोई, यह चूल्हा, यह घर सिर्�़फ एक जगह नहीं, बल्कि उसकी पहचान थी।
दोपहर को जब रमा दाल-चावल बना रही थी, तभी फोन की घंटी बजी। सिमरन का वीडियो कॉल था।
“मम्मी! कैसी हो?” स्क्रीन पर सिमरन का चेहरा चमक रहा था, पीछे उसका आधुनिक, साफ-सुथरा किचन दिख रहा था।
“सब ठीक है बेटा। तू कैसी है? इतने दिन फोन नहीं किया।”
“बहुत बिजी थी मम्मी। प्रोजेक्ट डेडलाइन था। सुनो, एक बड़ी खबर है। हमने तुम्हारे और पापा के लिए ग्रीन कार्ड स्पॉन्सर कर दिया है। तुम लोग अब यहाँ आ सकते हो! परमानेंट रह सकते हो!”
रमा का हाथ रुक गया। चमचे से दाल टपकने लगी। “यहाँ? पर हमारा तो सब कुछ यहीं है…”
“वही बात मत शुरू करो मम्मी। तुम्हें आराम से रहना चाहिए। यहाँ सब सुविधा है। माइक्रोवेव, डिशवॉशर, ऑटोमैटिक हर चीज़। तुम्हें चूल्हे-चक्की में दिन भर क्यों पिसना है?”
रमा ने एक नज़र अपनी रसोई पर डाली—धुएँ से थोड़ी स्याह पड़ी दीवारें, पुरानी लकड़ी की अलमारी में चमचों-कटोरियों का कुनबा, और वह पीतल का बड़ा चूल्हा जो उसकी सास ने उसे दहेज में दिया था। उस चूल्हे पर तीन पीढ़ियों ने खाना पकाया था।
“सिमरन, यह फैसला तो हम सोचकर बताएँगे,” अजय ने फोन संभाला।
बातचीत के बाद घर में सन्नाटा छा गया। अजय चुपचाप बैठे रहे। वे भी जानते थे कि यह घर, यह मोहल्ला, यह शहर छोड़ना आसान नहीं होगा। पर बेटी की चिंता भी उन्हें सता रही थी।
उस रात रमा सो नहीं पाई। वह रसोई में आकर चूल्हे के पास बैठ गई। उसने हाथ फैलाकर उसकी गर्मी महसूस की, जैसे वह कोई जीवित प्राणी हो। इस चूल्हे पर उसने पहली बार अपने हाथों से खाना बनाया था, जब वह इस घर में नई-नवेली दुल्हन बनकर आई थी। उसकी सास, जो अब इस दुनिया में नहीं थीं, ने ही उसे इस चूल्हे पर रोटी बेलना सिखाया था। “बहू, चूल्हे की आँच से ही घर का तापमान तय होता है,” वह कहा करती थीं।
रमा को याद आया—वह दिन जब सिमरन छोटी थी और बुखार से तप रही थी। डॉक्टर ने सूप पिलाने को कहा था। रमा ने इसी चूल्हे पर मुर्ग़ा धीरे-धीरे पकाया था, घंटों। सिमरन ने जब वह सूप पिया, तो कहा था—”मम्मी, तुम्हारे हाथ का सूप दवा से भी ज़्यादा अच्छा लगता है।” आज वही सिमरन माइक्रोवेव में दो मिनट में तैयार सूप पीती है।
अगले दिन से एक अजीब सी बेचैनी ने घर में डेरा डाल लिया। पड़ोस की शांति दीदी, जो रोज़ शाम को आटा गूँधने आ जाती थीं, ने पूछा—”क्या हुआ रमा? चेहरा उतरा हुआ है।”
रमा ने सब कुछ बता दिया। शांति दीदी ने सिर हिलाया—”समझती हूँ। पर बच्चों का दिल भी तो देखो। वो चाहते हैं कि तुम आराम से रहो।”
“लेकिन दीदी, यही मेरा आराम है,” रमा ने चूल्हे की ओर इशारा किया। “इसकी आँच में वो सबक है जो मुझे मेरी माँ और सास ने सिखाए। धीरे पकाना, धैर्य रखना, प्रेम मिलाना। माइक्रोवेव में तो बस बटन दबाना है।”
धीरे-धीरे पूरे मोहल्ले को खबर फैल गई। सबने अलग-अलग सलाह दी। किसी ने कहा—”जाओ, बेटी के पास रहो। बुढ़ापे में सहारा चाहिए।” किसी ने कहा—”यहीं रहो, यही तुम्हारी जड़ें हैं।”
एक हफ्ते बाद सिमरन का फोन फिर आया। “मम्मी, क्या सोचा? मैंने तो टिकट बुक करने भी शुरू कर दिए थे।”
“बेटा, हमें यहीं रहना है,” रमा ने दृढ़ता से कहा, पर आवाज़ में एक कंपन था।
“पर क्यों? क्या कमी है यहाँ?”
“सब कुछ है वहाँ, सिमरन। पर वहाँ मैं नहीं हूँ। जो मैं हूँ, वह यहीं है।”
सिमरन चुप रही। फिर बोली—”ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्जी।”
उस रात रमा ने सोने से पहले अजय से कहा—”क्या मैं गलत कर रही हूँ? क्या हमें चला जाना चाहिए?”
अजय ने उसका हाथ थामा—”नहीं। तुम सही हो। पर सिमरन को समझाना होगा। सिर्फ इनकार करने से नहीं चलेगा।”
रमा को एक विचार आया। अगले दिन से वह हर रोज़ सिमरन को एक चीज़ बनाने का वीडियो भेजने लगी—कभी गुलाब जामुन, कभी बैंगन का भर्ता, कभी नारियल की बर्फी। हर वीडियो में वह बताती—”देख बेटा, इसमें घी का ताप इतना रखना है, दूध को उबलने देना है, हल्की आँच पर पकाना है।”
पहले तो सिमरन ने हँसकर टाल दिया—”मम्मी, यह सब मुझे नहीं आएगा।” पर रमा लगातार भेजती रही। एक दिन सिमरन ने खुद से पूछा—”मम्मी, वो राजमा की रेसिपी भेजोगी? वो तुम जैसा कभी नहीं बन पाता।”
रमा के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने राजमा बनाने का विस्तार से वीडियो बनाया। “पहले राजमा रात भर भिगोना है। फिर सुबह इसी चूल्हे पर हल्की आँच पर पकाना है। इसमें जो धैर्य चाहिए, वही इसका राज है।”
सिमरन ने वीडियो देखा, और उसकी आँखें भर आईं। उसे याद आया कि कैसे हर रविवार को राजमा-चावल बनता था, और पूरा घर उसकी खुशबू से महक उठता था। उसे एहसास हुआ कि यह सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि उसकी विरासत थी।
दो महीने बीत गए। रमा और अजय ने ग्रीन कार्ड के पेपरवर्क को टाल दिया। एक दिन सिमरन का फोन आया—”मम्मी, मैं आ रही हूँ। दो हफ्ते की छुट्टी ली है।”
रमा की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने सफाई शुरू कर दी, सिमरन के कमरे को सजाया, और उसके पसंदीदा व्यंजनों की सामग्री जुटाने लगी।
जब सिमरन आई, तो रमा ने देखा कि उसके चेहरे पर थकान थी, आँखों में एक उदासी थी। पहले दिन तो सब ठीक रहा, पर दूसरे दिन सुबह सिमरन रसोई में आई और माइक्रोवेव की तरफ बढ़ी।
“नहीं बेटा, आज नाश्ता मैं बनाऊँगी,” रमा ने कहा और चूल्हा जलाया।
सिमरन चुपचाप एक कुर्सी पर बैठ गई और रमा को काम करते देखने लगी। आटा गूँधना, लड्डू बनाना, चाय उबालना। हर काम में एक लय थी, एक संगीत था।
“मम्मी,” सिमरन ने अचानक कहा, “मैं थक गई हूँ।”
रमा ने चूल्हे की आँच धीमी की और बैठ गई। “क्या हुआ?”
“सब कुछ इतना फास्ट, इतना ऑटोमैटिक। सब कुछ परफेक्ट चाहिए—परफेक्ट जॉब, परफेक्ट हाउस, परफेक्ट लाइफ। पर कुछ भी पूरा नहीं लगता। जैसे कुछ खो सा गया है।”
रमा ने उसके सिर पर हाथ फेरा। “तूने मेरे वीडियो देखे?”
“हाँ। और मैंने कोशिश भी की वही बनाने की। पर मेरे इंडक्शन कुकटॉप पर वैसा स्वाद नहीं आया।”
“क्योंकि उसमें आँच नहीं है, बेटा। सिर्फ ताप है। आँच में जीवन होता है, अनियमितता होती है, आग होती है। जैसे ज़िंदगी—परफेक्ट नहीं, पर असली होती है।”
सिमरन की आँखों में आँसू आ गए। “मुझे यहाँ आकर एहसास हुआ कि मैंने क्या खो दिया। यह खुशबू, यह गर्माहट, यह सब…”
उस दिन रमा ने सिमरन को चूल्हे पर खाना बनाना सिखाया। पहली रोटी सिमरन ने बनाई, थोड़ी जली हुई, थोड़ी टेढ़ी। पर रमा ने उसे गले लगा लिया—”बिल्कुल मेरी तरह पहली बार में।”
धीरे-धीरे सिमरन ने इस रसोई में वो शांति और संतुष्टि पाई जो उसे अपने आधुनिक, सुविधाओं से भरे अपार्टमेंट में कभी नहीं मिली। वह समझ गई कि यह चूल्हा सिर्फ खाना पकाने की जगह नहीं, बल्कि इस परिवार का हृदय था।
एक शाम जब तीनों बैठे थे, सिमरन ने कहा—”मम्मी-पापा, मैं एक साल के लिए यहाँ आना चाहती हूँ। वर्क फ्रॉम होम कर सकती हूँ। क्या मैं रह सकती हूँ?”
रमा और अजय की आँखें चमक उठीं। “यह तो तेरा घर है बेटा। तू जब चाहे आ सकती है।”
सिमरन के लौटने से घर में फिर से वही पुरानी रौनक लौट आई। वह रोज़ रमा के साथ रसोई में समय बिताने लगी। उसने सीखा कि कैसे मसालों को धीरे-धीरे भूनना है, कैसे दाल को हल्की आँच पर पकाना है, कैसे आटे में प्यार गूँधना है।
एक दिन सिमरन ने एक विचार रखा—”मम्मी, क्यों न हम एक फूड ब्लॉग शुरू करें? तुम्हारी रेसिपीज़ को दुनिया के साथ साझा करें।”
रमा को पहले तो अजीब लगा, पर सिमरन के समझाने पर वह मान गई। “पर एक शर्त है—सब कुछ इसी चूल्हे पर बनेगा।”
“बिल्कुल!” सिमरन ने कहा।
उन्होंने “चूल्हे की आँच” नाम से एक ब्लॉग और यूट्यूब चैनल शुरू किया। रमा पकाती, सिमरन वीडियो बनाती। शुरुआत में कुछ ही लोग देखते थे, पर धीरे-धीरे उनके वीडियोज़ ने लोकप्रियता पकड़नी शुरू कर दी। लोगों को रमा की सरल शैली, उसकी कहानियाँ, और उस पारंपरिक चूल्हे पर बनते व्यंजन आकर्षित करने लगे।
एक वीडियो में रमा ने कहा—”आजकल सब तेज़ चाहते हैं। पर कुछ चीज़ें धीरे-धीरे ही पकनी चाहिए। जैसे रिश्ते, जैसे प्यार, जैसे ज़िंदगी।”
यह वीडियो वायरल हो गया। हजारों लोगों ने कमेंट किए—”आपकी आवाज़ सुनकर दादी याद आ गई”, “इस डिजिटल दुनिया में यह देखकर अच्छा लगा कि अभी भी असल चीज़ें बची हैं।”
एक दिन एक बड़ी फूड कंपनी से ऑफर आया—वे रमा की रेसिपीज़ को प्रकाशित करना चाहते थे। रमा ने शर्त रखी कि हर रेसिपी में चूल्हे का ज़िक्र जरूर होगा।
सिमरन का एक साल पूरा होने वाला था। एक शाम वह रमा से बोली—”मम्मी, मैं वापस जा रही हूँ। पर इस बार अलग तरह से। मैंने यहाँ जो सीखा, उसे वहाँ ले जाऊँगी। मैंने अपने अपार्टमेंट में एक छोटा चूल्हा लगवाया है।”
रमा की आँखें भर आईं, पर इस बार दुख के आँसू नहीं, गर्व के थे। “तू हमेशा याद रखना—चूल्हा सिर्फ खाना पकाने की जगह नहीं, वह घर की आत्मा है। उसकी आँच में वह गर्माहट है जो रिश्तों को जोड़े रखती है।”
सिमरन के जाने के बाद भी “चूल्हे की आँच” चलता रहा। रमा अब सिर्फ अपने लिए नहीं पकाती थी, बल्कि हज़ारों लोगों के लिए पकाती थी जो उसे देखकर अपनी दादी-नानी की याद करते थे।
एक दिन सिमरन का वीडियो कॉल आया। वह अपनी नई रसोई दिखा रही थी—एक कोने में एक छोटा, पारंपरिक चूल्हा था। “देखो मम्मी, मैंने आज राजमा बनाया। तुम्हारी विधि से।”
रमा ने देखा कि सिमरन के चेहरे पर वही संतुष्टि थी जो उसे यहाँ चूल्हे के पास मिलती थी।
“शाबाश बेटा,” रमा ने कहा। “अब तू भी इस आँच को आगे बढ़ाएगी।”
उस रात जब रमा चूल्हे के पास बैठी थी, तो अजय ने कहा—”तुमने न सिर्फ सिमरन को वापस बुलाया, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को याद दिलाया कि उनकी जड़ें कहाँ हैं।”
रमा ने मुस्कुराते हुए चूल्हे की लपटों को देखा। “यह आँच कभी बुझनी नहीं चाहिए, अजय। क्योंकि जब तक चूल्हा जलता है, तब तक घर भी जीवित रहता है।”
आज रमा का “चूल्हे की आँच” चैनल दस लाख सब्सक्राइबर पार कर चुका है। पर उसकी दिनचर्या वही है—सुबह उठना, चूल्हा जलाना, खाना बनाना। और हर रोज़ वह सिमरन को एक नई रेसिपी भेजती है, जिसके साथ एक नई सीख जुड़ी होती है।
क्योंकि रमा जानती है कि यह चूल्हा सिर्फ उसका नहीं, बल्कि हर उस शख्स का है जो अपनी विरासत को संजोकर रखना चाहता है। और इस चूल्हे की आँच अब देश-विदेश में फैल चुकी है, हर उस रसोई में जहाँ कोई अपने हाथों से प्यार से खाना बनाता है।
जब रमा चूल्हे की आँच को देखती है, तो उसे उसमें सिर्फ लपटें नहीं दिखतीं—उसे अपनी माँ दिखती हैं, अपनी सास दिखती हैं, और अब अपनी बेटी भी दिखती है। वह आँच जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती है, रिश्तों को गर्माहट देती है, और याद दिलाती है कि कुछ चीज़ें तेज़ी से नहीं, धीरे-धीरे ही पकनी चाहिए।
चूल्हे की आँच कभी नहीं बुझी। बस, अब वह और जगहों पर जलने लगी है।
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