सन् 1965 की गर्मियों की वह शाम, जब चाचा श्रीकांत प्रसाद मिश्रा अपने साथ एक बड़ा सा लकड़ी का डिब्बा लेकर गाँव लौटे, आज भी गाँव के बुजुर्गों की स्मृति में ताजा है। उस डिब्बे में था एक रेडियो – फिलिप्स कंपनी का, ब्राउन रंग का, सामने मखमली कपड़े की जाली लगी हुई, दाएँ तरफ दो चमकदार घूमने वाले बटन। चाचा उस समय पच्चीस साल के युवक थे, जो इलाहाबाद से स्नातक करके अपनी पहली नौकरी कर रहे थे। उनकी पहली तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा इस रेडियो पर खर्च हुआ था।
उन दिनों हमारा गाँव ‘शिवपुर’ बिजली और आधुनिक सुविधाओं से वंचित था। संचार का एकमात्र साधन डाकिया रामस्वरूप की साइकिल थी, जो हफ्ते में तीन बार चिट्ठियाँ लेकर आती थी। ऐसे में रेडियो का आगमन एक क्रांति से कम नहीं था। चाचा ने जब पहली बार उस रेडियो को चालू किया और आकाशवाणी से “जन गण मन” की आवाज गूँजी, तो पूरा गाँव उनके आँगन में जमा हो गया। लोग हैरान थे – आखिर यह आवाज आ कहाँ से रही थी?
धीरे-धीरे चाचा का आँगन गाँव का सामुदायिक केंद्र बन गया। हर शाम पाँच बजे से ही लोग इकट्ठा होने लगते। चाचा ने एक नियमित कार्यक्रम बना दिया, जिसका पूरा गाँव इंतजार करता।
सुबह 6:00 बजे – भजन संध्या (बुजुर्गों के लिए)
दोपहर 2:00 बजे – कृषि दर्शन (किसानों के लिए)
शाम 5:00 बजे – बाल मंडली (बच्चों के लिए)
रात 8:00 बजे – फिल्मी गीत (सभी के लिए)
चाचा रेडियो की देखभाल एक पुजारी की तरह करते। हर सुबह वह नर्म कपड़े से उसे पोंछते, बैटरी चेक करते (उन दिनों बिजली नहीं थी), और एंटीना को सही दिशा में लगाते। उनकी पत्नी चाची गंगा देवी अक्सर कहतीं, “इस रेडियो को तो तुम मुझसे भी ज्यादा चाहते हो।” चाचा मुस्कुराकर जवाब देते, “यह हम सबका है देवी।”
रेडियो सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि शिक्षा और जागरूकता का एक शक्तिशाली माध्यम बन गया था।
1970 के दशक में जब हरित क्रांति शुरू हुई, तो रेडियो ने किसानों की मदद की। आकाशवाणी के कार्यक्रम ‘चौपाल’ में नई कृषि तकनीकों के बारे में बताया जाता। चाचा खुद नोट्स बनाते और किसानों को समझाते। गाँव के किसान रामदीन ने नई किस्म के गेहूँ के बीज के बारे में पहली बार इसी रेडियो से सुना था।
स्वास्थ्य कार्यक्रमों ने महिलाओं को विशेष लाभ पहुँचाया। शिशु देखभाल, टीकाकरण, और सफाई के बारे में जानकारी मिलती। चाची गंगा देवी ने इन कार्यक्रमों से प्रेरणा लेकर गाँव की महिलाओं के लिए एक सफाई अभियान शुरू किया।
चाचा का रेडियो कई ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी बना।
दिसंबर 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान रेडियो पर समाचार सुनने के लिए लोग रात-रात जागते। जब विजय की खबर आई, तो पूरा गाँव खुशी से झूम उठा। चाचा ने मिठाई बाँटी और रेडियो पर विजय के गीत बजाए।
25 जून 1983 की वह ऐतिहासिक शाम आज भी गाँव के लोग याद करते हैं। पूरा गाँव चाचा के आँगन में जमा था। रेडियो पर बीबीसी की कमेंट्री सुन रहा था। जब कपिल देव ने वेस्ट इंडीज की अंतिम विकेट ली, तो खुशी का ठिकाना न रहा। चाचा की आँखों में आँसू थे – गर्व के आँसू।
1990 के दशक में जब टेलीविजन और टेप रिकॉर्डर आए, तो रेडियो की लोकप्रियता घटने लगी।
गाँव के युवा अब चाचा के आँगन की बजाय उन घरों में जाने लगे जहाँ टीवी था। चाचा के अपने बेटे विवेक ने भी कहा, “पिताजी, यह पुराना रेडियो अब किस काम का? नया टीवी ले लीजिए।”
पर चाचा अडिग रहे। एक शाम उन्होंने गाँव के लोगों से कहा, “टीवी आँखों का मनोरंजन है, रेडियो कानों का। और कानों से सुनकर दिमाग में जो चित्र बनते हैं, वे टीवी से ज्यादा सुंदर होते हैं।”
2002 में जब एफएम रेडियो का युग शुरू हुआ, तो चाचा के रेडियो ने नया जीवन पाया। चाचा के पोते आलोक, जो इंजीनियरिंग कर रहा था, ने रेडियो में कुछ बदलाव किए। उसने नई बैटरी सिस्टम लगाई, बाहरी स्पीकर जोड़े, और एंटीना को अपग्रेड किया। अब रेडियो न सिर्फ एएम बल्कि एफएम चैनल भी सुन सकता था।
चाचा के रेडियो ने सामाजिक परिवर्तन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1990 के दशक में रेडियो पर महिला सशक्तिकरण के कार्यक्रम शुरू हुए। चाची ने गाँव की महिलाओं को इकट्ठा करके ये कार्यक्रम सुनने शुरू करवाए। इससे प्रेरित होकर कई महिलाओं ने छोटे-मोटे व्यवसाय शुरू किए।
बच्चों के लिए शैक्षिक कार्यक्रमों ने गाँव के बच्चों की पढ़ाई में मदद की। चाचा के नेतृत्व में गाँव में एक पुस्तकालय शुरू हुआ, जहाँ बच्चे पढ़ने आते।
आज चाचा 82 साल के हैं, पर उनकी दिनचर्या में रेडियो अब भी शामिल है।
सुबह 5:00 बजे चाचा:
चाचा का पोता आलोक ने रेडियो को डिजिटल युग से जोड़ा है। अब यह रेडियो:
चाचा के रेडियो से जुड़ी कुछ परंपराएँ गाँव की पहचान बन गई हैं।
हर साल 15 अगस्त को चाचा के आँगन में विशेष कार्यक्रम आयोजित होता है। सुबह प्रधानमंत्री का भाषण, दोपहर में देशभक्ति गीत, और शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम।
आज भी महत्वपूर्ण क्रिकेट मैचों के दौरान चाचा का आँगन भरा रहता है। बुजुर्ग रेडियो पर कमेंट्री सुनना पसंद करते हैं।
चाचा का रेडियो सिर्फ एक यंत्र नहीं, भावनाओं का संग्रह है।
चाचा बताते हैं कि उनके पिता की अंतिम इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार गीता के श्लोकों के बीच हो। रेडियो पर गीता पाठ चल रहा था जब उनका अंतिम संस्कार हुआ।
चाचा का पोता आलोक कहता है, “दादाजी का रेडियो हमारे परिवार की तीन पीढ़ियों को जोड़ता है। दादाजी के लिए यह ज्ञान का स्रोत था, पापा के लिए मनोरंजन का, और हमारे लिए विरासत का।”
समय के साथ नई चुनौतियाँ आईं, पर चाचा और उनका परिवार हर चुनौती का समाधान ढूँढ लिया।
रेडियो के पुराने पुर्जे अब उपलब्ध नहीं थे। आलोक ने 3D प्रिंटिंग तकनीक से कुछ पुर्जे बनवाए और कुछ पुराने रेडियो स्टोर से ढूँढे।
रेडियो को ब्लूटूथ और वाई-फाई से लैस किया गया ताकि यह आधुनिक डिवाइस से कनेक्ट हो सके।
चाचा के रेडियो ने सामुदायिक सेवा में भी योगदान दिया।
1998 में जब गाँव में बाढ़ आई, तो रेडियो ने मदद की। चाचा ने बैटरी से चलने वाले इस रेडियो पर मौसम की जानकारी और राहत शिविरों के बारे में बताया।
2020 के कोविड-19 महामारी के दौरान चाचा के रेडियो ने फिर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गाँव के लोगों को सुरक्षा उपायों, टीकाकरण और सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी दी।
चाचा के परिवार ने रेडियो के माध्यम से कई शैक्षिक पहल शुरू कीं।
गाँव के बच्चों के लिए ऑडियो बुक्स का संग्रह तैयार किया गया। बच्चे चाचा के यहाँ आकर शैक्षिक कार्यक्रम सुनते।
बुजुर्गों के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किए गए, जिनमें पुराने गीत, धार्मिक कथाएँ और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दी जाती।
चाचा का परिवार इस विरासत को आगे बढ़ाने की योजना बना रहा है।
चाचा के घर में एक छोटा संग्रहालय बनाने की योजना है, जहाँ पुराने रेडियो, टेप रिकॉर्डर और अन्य पुराने उपकरण प्रदर्शित किए जाएँगे।
रेडियो के सभी ऐतिहासिक कार्यक्रमों को डिजिटल रूप में संरक्षित किया जा रहा है।
चाचा का रेडियो आज एक साधारण उपकरण नहीं रह गया है। यह गाँव की सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक विरासत और तकनीकी विकास की गाथा है। यह हमें याद दिलाता है कि प्रगति के साथ-साथ अपनी जड़ों से जुड़े रहना भी जरूरी है।
चाचा अक्सर कहते हैं, “यह रेडियो मुझे सिखाता है कि आवाज की ताकत क्या होती है। बिना किसी को देखे, सिर्फ आवाज से ही दिल जीते जा सकते हैं। यह सिर्फ मशीन नहीं, जीवन का दर्शन है।”
आज जब हम स्मार्टफोन और इंटरनेट के युग में जी रहे हैं, चाचा का रेडियो हमें याद दिलाता है कि सादगी में भी खुशी होती है। यह रेडियो न सिर्फ ध्वनियों का, बल्कि संस्मरणों का, भावनाओं का और इतिहास का खजाना है। और यह खजाना आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित रहेगा – एक ऐसी विरासत जो बताएगी कि कैसे एक छोटा सा उपकरण एक पूरे समुदाय की जिंदगी बदल सकता है।
कहानी का सार: यह कहानी एक पुराने रेडियो के माध्यम से गाँव के सामाजिक, सांस्कृतिक और तकनीकी परिवर्तन को दर्शाती है। यह हमें सिखाती है कि तकनीक चाहे कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, पुरानी चीजों में संजोए हुए संस्मरण और अनुभव हमेशा मूल्यवान रहते हैं। चाचा का रेडियो सिर्फ एक उपकरण नहीं, बल्कि जीवन के मूल्यों, सामुदायिकता और विरासत के संरक्षण का प्रतीक है।
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