मेले वाली रात

मेले वाली रात

रात का सन्नाटा चादर की तरह गाँव पर बिछा हुआ था, पर दूर से आते हुए ढोल की आवाज़ उस सन्नाटे को चीरती हुई रामकिशोर के कानों तक पहुँच रही थी। वह अपनी झोपड़ी के बाहर बैठा चिलम खींच रहा था। आँखें बंद करके वह उस आवाज़ को सुन रहा था जो हर साल इसी …

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बैलगाड़ी का सफर

बैलगाड़ी का सफर

बैलगाड़ी की पुरानी चरचराहट जंगल की सन्नाटे को चीर रही थी। बसंत सिंह गाड़ी के आगे वाले हिस्से में बैठा अपने बैलों को हाँक रहा था। उसकी उम्र साठ साल के आसपास थी, पर उसके हाथों में वही मजबूती थी जो तीस साल पहले हुआ करती थी जब वह पहली बार इसी रास्ते से गुजरा …

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आम का पेड़ एक गाँव की विरासत

आम का पेड़ एक गाँव की विरासत

आम का पेड़ एक गाँव की विरासत सुबह की पहली किरण ने जब चंपानगर गाँव को स्पर्श किया, तो सबसे पहले वह विशाल आम के पेड़ की पत्तियों पर ठहरी। यह पेड़ गाँव के बीचों-बीच, चौराहे पर खड़ा था, मानो पूरे गाँव का संरक्षक हो। इसकी शाखाएँ इतनी फैली हुई थीं कि लगभग आधा एकड़ …

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चाचा का रेडियो ध्वनियों का खजाना

चाचा का रेडियो

चाचा का रेडियो ध्वनियों का खजाना सन् 1965 की गर्मियों की वह शाम, जब चाचा श्रीकांत प्रसाद मिश्रा अपने साथ एक बड़ा सा लकड़ी का डिब्बा लेकर गाँव लौटे, आज भी गाँव के बुजुर्गों की स्मृति में ताजा है। उस डिब्बे में था एक रेडियो – फिलिप्स कंपनी का, ब्राउन रंग का, सामने मखमली कपड़े …

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गुड़ की मिठास

गुड़ की मिठास

गुड़ की मिठास कंप्यूटर स्क्रीन की नीली रोशनी में डूबा प्रतीक, लंदन के अपने ऑफिस की बत्तीसवीं मंजिल से शहर की झिलमिलाती लाइटों को देख रहा था। बाहर कोहरा था, और भीगी सड़कों पर चलते लोग काले कोटों में छिपे हुए से लग रहे थे। उसने अपनी कॉफ़ी का आखिरी घूँट पिया – एक डबल …

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खेतों का राजा

खेतों का राजा

मेरे गाँव में एक कहावत थी—”जिसके पास ज़मीन, उसके पास ज़िंदगी।” और हमारे गाँव में सबसे ज़्यादा ज़मीन थी बाबू शिवनारायण सिंह के पास। पचासी बीघा उपजाऊ ज़मीन, जो गाँव के तीनों ओर फैली हुई थी, मानो पूरा गाँव उनकी हथेली पर बसा हो। बाबू शिवनारायण सिंह—जिन्हें सब “राजा साहब” कहते थे। अस्सी साल के …

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चूल्हे की आँच

चूल्हे की आँच

रमा ने कड़ाही में प्याज़-टमाटर का मसाला चलाते हुए सुबह के सूरज को रसोई की खिड़की से झाँकते देखा। चूल्हे की नारंगी लपटें उसके चेहरे पर नाच रही थीं, और उसकी चूड़ियाँ हर हलचल पर खनकती थीं। पर आज उन खनकती चूड़ियों में भी एक उदास सी सन्नाटा था, जैसे वह सिमरन के फोन न …

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पनघट की मुलाक़ात

पनघट की मुलाक़ात

गर्मी की सुबह। सूरज ने अभी-अभी अपनी पहली किरणें फेंकनी शुरू की थीं, लेकिन हवा में पहले से ही गर्मी का एहसास था। गाँव के पनघट पर पहला व्यक्ति मुन्नी देवी थीं, जिनके सिर पर पीतल का घड़ा चमक रहा था। “कल रात से ही पानी कम आ रहा है,” वह बुदबुदाईं। हाथ से बने …

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स्कूल की आख़िरी घंटी

स्कूल की आख़िरी घंटी

पंद्रह मार्च। आज सेंट जेवियर्स स्कूल के बारहवीं कक्षा के छात्रों के लिए आख़िरी दिन था। आख़िरी घंटी बजने का इंतज़ार करते हुए पूरी कक्षा में एक अजीब सी शांति छाई हुई थी। वह शांति जो दिल में उथल-पुथल छुपाए होती है। राहुल अपनी बेंच पर बैठा खिड़की से बाहर देख रहा था। वही आम …

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कच्चे घर का सपना

कच्चे घर का सपना

कच्चे घर का सपना राजू की आँखें खुलीं तो छत से पानी की एक बूँद उसके माथे पर आकर गिरी। वह फर्श पर पड़े पुराने गद्दे से उठ बैठा। बारिश रातभर होती रही थी और उनके कच्चे घर की दीवारों से कीचड़ टपक रहा था। एक कोने में रखा बर्तन पानी से भर चुका था …

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