मेले वाली रात
रात का सन्नाटा चादर की तरह गाँव पर बिछा हुआ था, पर दूर से आते हुए ढोल की आवाज़ उस सन्नाटे को चीरती हुई रामकिशोर के कानों तक पहुँच रही थी। वह अपनी झोपड़ी के बाहर बैठा चिलम खींच रहा था। आँखें बंद करके वह उस आवाज़ को सुन रहा था जो हर साल इसी …