गोकुलपुर गाँव में भोकू नाम का एक कुत्ता रहता था। वह गाँव के सबसे धनी व्यक्ति रामलाल की हवेली में पल रहा था। भोकू को रोज दो बार पौष्टिक भोजन मिलता – सुबह दूध-रोटी और शाम को मांस के टुकड़े। उसका अपना एक आरामदायक बिस्तर था और वह हवेली के बगीचे में आजादी से घूमता।
लेकिन भोकू के मन में हमेशा एक असंतोष रहता। जब भी वह हवेली से बाहर निकलता, तो देखता कि गाँव के अन्य कुत्तों को उससे कम खाना मिलता है। इससे उसे गर्व का अनुभव होता। वह सोचता, “मैं सबसे विशेष कुत्ता हूँ। मुझे सबसे अच्छा खाना मिलता है।”
एक दिन, रामलाल के यहाँ एक बड़ी दावत हुई। हवेली में सैकड़ों मेहमान आए। रसोई से स्वादिष्ट व्यंजनों की खुशबू पूरे गाँव में फैल रही थी। भोकू रसोई के पास बैठा था, उसकी लार टपक रही थी।
जब दावत समाप्त हुई, तो रसोइये ने बचा हुआ भोजन कुत्तों के लिए निकाला। भोकू के सामने एक विशाल हड्डी रखी गई – जिस पर अभी भी काफी मांस लगा हुआ था। भोकू की आँखें चमक उठीं। उसने हड्डी उठाई और अपने पसंदीदा स्थान पर जाने लगा।
रास्ते में उसे गाँव का एक और कुत्ता टोमी मिला। टोमी पतला और कमजोर था। उसने भोकू की हड्डी देखी तो उसकी आँखों में भूख और इच्छा झलकने लगी।
टोमी ने विनम्रता से कहा, “भोकू भैया, क्या मुझे थोड़ा सा मांस मिल सकता है? मैं दो दिन से कुछ नहीं खाया हूँ।”
भोकू ने घुरघुराते हुए कहा, “दूर हो जा! यह मेरी हड्डी है। तुम्हारे जैसे गरीब कुत्ते हमेशा दूसरों का खाना चाहते हैं।”
भोकू टोमी को डाँटकर आगे बढ़ गया। वह एक शांत जगह ढूँढ रहा था जहाँ वह आराम से अपनी हड्डी खा सके। वह गाँव से बाहर निकला और नदी किनारे पहुँचा। वहाँ एक पेड़ के नीचे बैठकर उसने हड्डी खानी शुरू की।
तभी उसने नदी के पानी में अपनी परछाई देखी। पानी साफ और शांत था। परछाई में भोकू को एक और कुत्ता दिखाई दिया जिसके मुँह में भी एक हड्डी थी। भोकू ने ध्यान से देखा – वह कुत्ता तो खुद उसी जैसा दिख रहा था, लेकिन उसकी हड्डी उसकी अपनी हड्डी से कहीं बड़ी और मांसल लग रही थी!
भोकू की आँखों में लालच चमक उठा। उसने सोचा, “वाह! उस कुत्ते की हड्डी तो मेरी हड्डी से कहीं बेहतर है। अगर मैं उसकी हड्डी ले लूँ, तो मुझे दो हड्डियाँ मिल जाएँगी!”
भोकू ने अपनी हड्डी जमीन पर रखी और जोर से भौंका ताकि पानी वाले कुत्ते को डराकर भगा सके। पर जैसे ही उसने भौंकना शुरू किया, उसका मुँह खुला और उसमें से उसकी अपनी हड्डी निकलकर नदी में गिर गई।
“अरे नहीं!” भोकू चिल्लाया। उसने तुरंत नदी में छलाँग लगानी चाही, लेकिन तभी उसे समझ आया कि पानी में जो कुत्ता दिख रहा था, वह उसकी खुद की परछाई थी। और जो हड्डी उसने देखी थी, वह भी उसी की हड्डी की परछाई थी।
भोकू ने नदी में देखा – उसकी हड्डी पानी की गहराई में डूबती जा रही थी। वह तैरना नहीं जानता था। वह बेबस होकर नदी किनारे खड़ा रहा और अपनी हड्डी को डूबते हुए देखता रहा।
भोकू उदास और निराश होकर हवेली वापस लौटा। उसका पेट खाली था और मन भारी था। रास्ते में उसे फिर टोमी मिला।
टोमी ने पूछा, “भोकू भैया, तुम्हारी हड्डी कहाँ गई? तुमने तो इतनी बड़ी हड्डी ले जाई थी।”
भोकू ने शर्मिंदगी से सिर झुकाते हुए कहा, “वह… वह नदी में गिर गई।”
टोमी ने आश्चर्य से कहा, “पर तुमने तो मुझे कुछ भी नहीं दिया। कम से कम तुम मुझे थोड़ा सा दे देते, तो तुम्हारी हड्डी भी बच जाती और मेरा पेट भी भर जाता।”
भोकू को अपनी गलती का एहसास होने लगा। उसने लालच में आकर न केवल अपना भोजन खो दिया था, बल्कि एक भूखे कुत्ते की मदद करने का अवसर भी गँवा दिया था।
उस रात भोकू को बहुत भूख लगी। उसे रामलाल के रसोइए ने खाना दिया, लेकिन वह सामान्य खाना था – हड्डी नहीं। भोकू ने खाना खाया, लेकिन उसका मन नहीं भरा। वह सोचता रहा कि अगर उसने लालच न किया होता, तो अब वह उस स्वादिष्ट हड्डी को चबा रहा होता।
भोकू ने उस रात सोने से पहले एक निर्णय लिया – वह कभी भी लालच नहीं करेगा। लेकिन क्या वह अपने इस निर्णय पर टिक पाएगा?
कुछ दिनों बाद, रामलाल के घर फिर एक दावत हुई। इस बार रामलाल के बेटे की शादी थी। पूरा गाँव आमंत्रित था। हवेली में और भी भव्य भोजन तैयार हुआ।
भोकू पिछली घटना के बाद सतर्क था। उसने सोचा, “इस बार मैं लालच नहीं करूँगा। जो मिलेगा, उसी में संतुष्ट रहूँगा।”
जब दावत समाप्त हुई, तो रसोइए ने भोकू के लिए एक बड़ी हड्डी निकाली। यह हड्डी पिछली हड्डी से भी बड़ी और मांसल थी। भोकू की आँखें चमक उठीं, लेकिन उसने अपने आप पर काबू रखा।
भोकू हड्डी लेकर बाहर निकला। रास्ते में उसे फिर टोमी मिला। टोमी और भी पतला लग रहा था। उसकी पसलियाँ दिखाई दे रही थीं।
टोमी ने भोकू की हड्डी देखी, लेकिन इस बार वह कुछ नहीं बोला। वह चुपचाप एक तरफ हट गया।
भोकू ने टोमी को रोकते हुए कहा, “रुको टोमी।”
टोमी ने डरते हुए कहा, “क्या बात है भोकू भैया? मैंने तुम्हें परेशान नहीं किया।”
भोकू ने हड्डी को दो भागों में तोड़ने की कोशिश की। हड्डी मजबूत थी, लेकिन भोकू ने पूरी ताकत लगाई और उसे दो हिस्सों में तोड़ दिया। उसने बड़ा हिस्सा अपने पास रखा और छोटा हिस्सा टोमी की ओर बढ़ाया।
“ले लो,” भोकू ने कहा।
टोमी की आँखों में आँसू आ गए। “धन्यवाद भोकू भैया! धन्यवाद! मैं तीन दिन से कुछ नहीं खाया हूँ। तुमने मेरी जान बचा ली।”
भोकू ने पहली बार महसूस किया कि दूसरों की मदद करने में कितनी खुशी मिलती है। उसने कहा, “कोई बात नहीं टोमी। हम सबको एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए।”
दोनों कुत्ते पास-पास बैठकर हड्डियाँ चबाने लगे। टोमी ने बताया कि उसका मालिक बीमार पड़ गया है और उसे खिलाने वाला कोई नहीं है। इसलिए वह इधर-उधर भटककर कुछ खाने की तलाश में रहता है।
भोकू ने कहा, “तुम चिंता मत करो। अब से रोज शाम को हवेली के पिछवाड़े आ जाना। मैं तुम्हारे लिए कुछ खाना ले आया करूँगा।”
उस दिन के बाद भोकू और टोमी में गहरी मित्रता हो गई। भोकू रोज टोमी के लिए खाना लाता और दोनों साथ बैठकर खाते। भोकू ने महसूस किया कि खाना साझा करने से उसकी खुशी दोगुनी हो जाती है।
एक दिन टोमी ने भोकू से कहा, “तुम्हें पता है भोकू भैया, गाँव के सभी कुत्ते तुमसे डरते थे। तुम हमेशा घुरघुराते रहते थे और किसी को अपने पास फटकने नहीं देते थे। लेकिन अब तुम बिल्कुल बदल गए हो।”
भोकू ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैंने सीख लिया है टोमी। लालच और स्वार्थ से केवल नुकसान ही होता है। दूसरों की मदद करने और साझा करने में असली खुशी है।”
धीरे-धीरे भोकू ने गाँव के अन्य कुत्तों से भी मित्रता करनी शुरू कर दी। वह अब हवेली से मिलने वाले अतिरिक्त खाने को सभी कुत्तों में बाँट देता। गाँव के कुत्तों ने मिलकर एक छोटी सी संगठन बनाई, जहाँ वे एक-दूसरे की मदद करते।
भोकू ने कुत्तों को सिखाया कि कैसे वे मिलजुल कर रहें, कैसे खाना साझा करें और कैसे गाँव की रक्षा करें। भोकू के नेतृत्व में गाँव के कुत्तों ने चोरों को पकड़ने में भी मदद की।
एक रात, दो चोर गाँव में घुसने की कोशिश कर रहे थे। भोकू ने उन्हें देख लिया और जोर से भौंकना शुरू कर दिया। उसकी आवाज सुनकर गाँव के सभी कुत्ते इकट्ठा हो गए और उन्होंने मिलकर चोरों पर हमला कर दिया। चोरों के हाथ कुछ न लगा और वे भाग खड़े हुए।
अगले दिन गाँव के लोगों को पता चला कि कुत्तों ने चोरों को भगा दिया है। सभी ने कुत्तों की प्रशंसा की। रामलाल ने भोकू को विशेष पुरस्कार दिया – एक नया कॉलर और अतिरिक्त खाना।
रामलाल ने कहा, “भोकू, तुमने न केवल हवेली की, बल्कि पूरे गाँव की रक्षा की। मैं तुम पर गर्व करता हूँ।”
भोकू ने पूँछ हिलाकर रामलाल का अभिवादन किया, लेकिन उसके मन में यही विचार आया कि यह सफलता उसकी अकेले की नहीं, बल्कि सभी कुत्तों की सामूहिक कोशिश का नतीजा थी।
एक दिन, गाँव में एक सर्कस आया। सर्कस वालों ने गाँव के बाहर अपना तंबू लगाया। भोकू और अन्य कुत्ते सर्कस देखने गए। वहाँ उन्होंने देखा कि सर्कस के कुत्तों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है और उन्हें बहुत अच्छा खाना मिलता है।
सर्कस के मालिक ने भोकू को देखा तो वह उसकी ताकत और सुंदरता से प्रभावित हुआ। उसने भोकू को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन भोकू भाग निकला।
रात को, सर्कस का एक कुत्ता भोकू से मिलने आया। उसने कहा, “तुम्हें पता है, सर्कस में हमें रोज ताजा मांस मिलता है। हमें आरामदायक बिस्तर मिलते हैं और हम पूरे देश में घूमते हैं। तुम भी सर्कस में आ जाओ।”
भोकू के मन में फिर से लालच पैदा हो गया। उसने सोचा, “क्या पता सर्कस में जीवन और भी अच्छा हो? वहाँ मुझे और भी बेहतर खाना मिलेगा।”
भोकू ने टोमी को अपना विचार बताया। टोमी ने चेतावनी दी, “भोकू भैया, सर्कस के कुत्ते स्वतंत्र नहीं होते। उन्हें पिंजरों में रखा जाता है और उन पर अत्याचार किया जाता है। मैंने सुना है कि जो कुत्ते प्रदर्शन नहीं कर पाते, उन्हें मार दिया जाता है।”
लेकिन भोकू ने टोमी की बात नहीं सुनी। लालच ने उसकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया था। उसने सोचा कि टोमी ईर्ष्या के कारण ऐसा कह रहा है।
अगले दिन, भोकू सर्कस के तंबू के पास गया। सर्कस के मालिक ने उसे देखा तो मुस्कुराया। उसने भोकू के सामने एक बड़ा मांस का टुकड़ा रखा।
भोकू मांस के टुकड़े की ओर आकर्षित हुआ। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। जैसे ही उसने मांस खाने के लिए मुँह खोला, सर्कस के मालिक ने उस पर जाल फेंक दिया।
भोकू फँस गया! वह छटपटाने लगा, लेकिन जाल मजबूत था। सर्कस के मालिक ने उसे एक पिंजरे में डाल दिया।
“अब तुम हमारे हो,” मालिक ने कहा। “तुम्हें यहाँ रहना होगा और हमारे लिए काम करना होगा।”
भोकू को एहसास हुआ कि टोमी सही कह रहा था। सर्कस का जीवन उसने जिस तरह सोचा था, वैसा बिल्कुल नहीं था। उसे एक छोटे पिंजरे में रखा गया था, जहाँ वह ठीक से हिल भी नहीं सकता था।
अगले दिन से भोकू का प्रशिक्षण शुरू हुआ। उसे कई तरकीबें सिखाई गईं – गोल घेरे से कूदना, पहिये पर चलना, बंदूक की आवाज पर मरने का अभिनय करना।
जब भोकू कोई तरकीब ठीक से नहीं कर पाता, तो उसे मार पड़ती। उसे खाने में भी वह नहीं मिलता था जो सर्कस के कुत्ते ने बताया था। उसे सिर्फ सूखी रोटी और पानी मिलता।
भोकू को अपने गाँव, रामलाल की हवेली, टोमी और अन्य कुत्तों की याद आने लगी। उसे एहसास हुआ कि उसने लालच में आकर कितनी बड़ी गलती की है।
जब भोकू तीन दिन तक हवेली नहीं लौटा, तो टोमी चिंतित हो गया। उसने अन्य कुत्तों के साथ मिलकर भोकू की खोज शुरू की। किसी ने बताया कि उसे सर्कस वालों ने पकड़ लिया है।
टोमी ने एक योजना बनाई। वह रात के अँधेरे में सर्कस के तंबू में घुस गया। उसने भोकू को पिंजरे में देखा। भोकू उदास और कमजोर लग रहा था।
“भोकू भैया!” टोमी ने फुसफुसाया।
भोकू ने टोमी की आवाज सुनी तो उसकी आँखों में आशा की चिंगारी जगी। “टोमी! तुम यहाँ कैसे?”
टोमी ने कहा, “हम सब तुम्हारी तलाश में हैं। हम तुम्हें यहाँ से निकालेंगे।”
टोमी ने गाँव के सभी कुत्तों को इकट्ठा किया। उनकी संख्या लगभग बीस थी। टोमी ने योजना समझाई, “हम सब मिलकर रात को सर्कस पर हमला करेंगे। हमारा उद्देश्य भोकू को छुड़ाना है, लड़ना नहीं।”
रात को जब सर्कस का पहरेदार सो गया, तो सभी कुत्ते तंबू में घुस गए। टोमी ने पिंजरे का ताला कुतरना शुरू किया। अन्य कुत्तों ने शोर मचाना शुरू कर दिया ताकि पहरेदार का ध्यान भटके।
शोर सुनकर पहरेदार जाग गया। उसने डंडा उठाया और कुत्तों की ओर दौड़ा। लेकिन कुत्तों ने मिलकर उस पर हमला कर दिया। पहरेदार डर गया और भाग खड़ा हुआ।
इस बीच टोमी ने ताला तोड़ दिया और भोकू को आजाद कर दिया। सभी कुत्ते मिलकर गाँव की ओर भागे।
भोकू की वापसी पर गाँव के सभी कुत्तों ने खुशी जताई। रामलाल को जब पता चला कि सर्कस वालों ने भोकू को पकड़ लिया था, तो वह बहुत नाराज हुआ। उसने गाँव के लोगों के साथ मिलकर सर्कस वालों को गाँव से बाहर निकलवा दिया।
भोकू ने सबके सामने अपनी गलती स्वीकार की। “मैंने लालच में आकर फिर से गलती की। मैंने टोमी की सलाह नहीं मानी और मुसीबत में फँस गया। लेकिन इस बार मैंने सीख लिया है – लालच हमेशा बुरा होता है।”
टोमी ने कहा, “भोकू भैया, हर कोई गलती करता है। महत्वपूर्ण यह है कि हम उन गलतियों से सीखें।”
उस दिन के बाद भोकू पूरी तरह बदल गया। वह न केवल कुत्तों की, बल्कि गाँव के सभी जानवरों की मदद करने लगा। उसने बिल्लियों, बकरियों और यहाँ तक कि पक्षियों के साथ भी मित्रता कर ली।
भोकू ने गाँव के जानवरों के लिए एक सहकारी समिति बनाई। इसमें सभी जानवर मिलजुल कर रहते, एक-दूसरे की मदद करते और खाना साझा करते।
रामलाल ने भोकू के इस बदलाव को देखकर बहुत खुशी व्यक्त की। उसने गाँव के बाहर एक छोटा सा शेड बनवाया जहाँ सभी जानवर आकर आराम कर सकते थे और खा सकते थे।
लालची कुत्ते की यह कहानी हमें कई महत्वपूर्ण जीवन पाठ सिखाती है:
यह कहानी हमें यह याद दिलाती है कि लालच मानव और पशु दोनों के लिए हानिकारक है। संतोष, सहयोग और दयालुता जैसे गुण ही सच्चे सुख और समृद्धि की कुंजी हैं। भोकू की तरह, अगर हम भी अपनी गलतियों से सीखें और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएँ, तो हम न केवल खुद के लिए, बल्कि समाज के लिए भी बेहतर जीवन बना सकते हैं।
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