पहाड़ों को चीरता हुआ सूरज: मोहन की मेहनत से सफलता तक की यात्रा

पहाड़ों को चीरता हुआ सूरज: मोहन की मेहनत से सफलता तक की यात्रा

एक ऐसा बचपन जहाँ खिलौने नहीं, जिम्मेदारियाँ थीं हिमाचल प्रदेश के एक दूरस्थ गाँव “मलाणा” में, जो समुद्र तल से 10,000 फीट की ऊँचाई पर बसा है, मोहन का जन्म हुआ। उसके पिता एक छोटे से खेत में मजदूरी करते थे और माँ गाँव के लोगों के घरों में चूल्हा-चौका करके परिवार चलाती थीं। मोहन …

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पत्थरों से पगडंडी बनाकर सिविल सेवा तक: अनिल की अनोखी यात्रा

पत्थरों से पगडंडी बनाकर सिविल सेवा तक: अनिल की अनोखी यात्रा

गाँव की मिट्टी में उगा सपना बिहार के एक दूरस्थ गाँव, जहाँ बिजली एक विलासिता थी और पक्की सड़क एक सपना, वहाँ एक छोटा सा कच्चा मकान था। इस मकान में अनिल अपने माता-पिता और तीन भाई-बहनों के साथ रहता था। उसके पिता, रामकुमार, एक छोटे से खेत में मजदूरी करते थे, जिसकी आय से …

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दरवाज़े से दूर, आसमान तक: राहुल की अनोखी यात्रा

दरवाज़े से दूर, आसमान तक: राहुल की अनोखी यात्रा

अंधेरी कोठरी से पहली किरण तक दिल्ली के उन तंग गलियों में, जहाँ सूरज की रोशनी भी घुसने से कतराती थी, एक छोटी सी कोठरी में राहुल अपनी माँ के साथ रहता था। उसकी दुनिया महज दस फुट बाई दस फुट थी, जिसमें एक चारपाई, एक छोटा सा चूल्हा और किताबों का एक ढेर था। …

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कच्ची पगडंडी

कच्ची पगडंडी

कच्ची पगडंडी मेघा के लैपटॉप का स्क्रीनसेवर बार-बार बदल रहा था – हिमालय की तस्वीरें, जिन्हें उसने कभी खुद नहीं खींची थी। डेस्क पर रखा हर्बल टी का कप ठंडा पड़ चुका था। बारहवीं मंजिल से दिख रहा मुंबई का शहर अपनी निरंतर गतिशीलता में डूबा हुआ था, पर मेघा का मन कहीं और भटक …

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नानी का मायका

नानी का मायका

नानी का मायका अवनी ने अपने लैपटॉप का लिड बंद कर दिया। मीटिंग का शोर अब भी उसके कानों में गूंज रहा था। ग्रे ग्लास की इमारत से बाहर नीले आसमान को देखकर भी उसकी बेचैनी कम नहीं हुई। पिछले कुछ दिनों से एक अजीब सी खालीपन उसे घेरे हुए थी। शायद यह बैंगलोर की …

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धुन कजरी की, कहानी प्यार की

धुन कजरी की

धुन कजरी की, कहानी प्यार की बनारस की गलियाँ सुबह से ही सरसरा रही थीं। नहीं, हवा नहीं, बातचीत से। “सुनते हो? अम्मा कह रही थीं, आज सावन की पहली सोमवारी है। शहर के बाहर, पुराने पीपल के पेड़ के पास, कोई नया बैंड बजाएगा। कजरी। असली, देशी।” अनन्या के कानों तक यह बात पहुँची …

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पीपल के नीचे पंचायत

पीपल के नीचे पंचायत

गाँव की वो पुरानी पीपल, जिसकी जड़ें धरती के नीचे कितना फैल चुकी थीं, कोई नहीं जानता था। लेकिन उसकी शाखाएं जितनी ऊपर फैली थीं, उतनी ही इस गाँव के इतिहास में भी थीं। बसंती देवी इस पेड़ के नीचे पचास साल से पंचायत लेती आई थीं। आज उनकी आखिरी पंचायत थी। “बसंती काकी, आप …

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गाँव का मास्टर जी: स्याही और संस्कारों की दुनिया

गाँव का मास्टर जी

उस सुबह जब पहली किरण अभी पीपल के पत्तों को छू भी नहीं पाई थी, मास्टर जी पहले ही विद्यालय पहुँच चुके थे। उनका विद्यालय कोई भव्य इमारत नहीं था – चार कच्ची दीवारें, खपरैल की छत और फर्श पर बिछी चटाइयाँ। लेकिन मास्टर जी के लिए यह ताजमहल से कम नहीं था। मास्टर जी …

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लोटा और लाज

लोटा और लाज

खोया हुआ लोटा बाबूजी का अनमोल लोटा रामस्वरूप दास के लिए उनका पीतल का लोटा कोई साधारण बर्तन नहीं था। वह उनकी पहचान थी, उनकी शान थी, उनके पिता की विरासत थी। पचास साल से भी ज्यादा समय से वह उसी लोटे से पानी पीते आ रहे थे। लोटे पर उनके दादा ने उनके नाम …

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पोखरे के किनारे

पोखरे के किनारे

गाँव का वो पुराना पोखरा गर्मियों की एक शाम थी। सूरज ढलने को था और आसमान में नारंगी और बैंगनी रंगों का मेल जैसे किसी चित्रकार की पैलेट पर बिखर गया हो। गाँव के पश्चिमी छोर पर स्थित पोखरे के किनारे बैठी मीनाक्षी की नजरें पानी की सतह पर तैरते कमल के पत्तों पर टिकी …

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