राजेश की कहानी एक आम मध्यमवर्गीय परिवार से शुरू होती है। पिता बैंक क्लर्क, माँ गृहिणी। बचपन से ही राजेश बेहद मेधावी छात्र था। हर कक्षा में प्रथम आता, स्कूल के सभी ट्रॉफी उसके नाम। परिवार, शिक्षक, पड़ोसी – सभी की नजरें उस पर टिकी थीं। बारहवीं में 98% अंक लाने के बाद उसने आईआईटी की तैयारी शुरू की। कोचिंग में लाखों रुपये खर्च हुए। दिन-रात एक कर दिए। पर पहले प्रयास में सफलता नहीं मिली।
रिजल्ट आया – राजेश को आईआईटी में सीट नहीं मिली। न सिर्फ वह असफल हुआ, बल्कि उसके शहर के कई औसत छात्रों ने सफलता प्राप्त कर ली। पहली बार उसने अपने पिता की आँखों में निराशा देखी। रिश्तेदारों के ताने सुनने पड़े, “इतना पढ़ता था, फिर भी…”। दोस्तों के ग्रुप में वह अब ‘वह जो फेल हो गया’ बन चुका था। एक महीने तक वह अपने कमरे से बाहर नहीं निकला। आत्मविश्वास धराशायी हो चुका था। यह उसकी जिंदगी की पहली बड़ी असफलता थी।
आखिरकार एक साधारण इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिला। राजेश ने सोचा, “चलो कोई बात नहीं, कॉलेज में टॉप करके दिखाऊँगा।” पर पहले सेमेस्टर में ही उसे झटका लगा। उसकी रैंक क्लास में 40वीं थी। जो बच्चा हमेशा टॉप करता आया था, वह मध्यम श्रेणी में आ गया। उसे लगा कि शायद उसकी बुद्धिमत्ता ही समाप्त हो गई है। उसने और मेहनत की – रात-रात भर पढ़ाई की, प्रैक्टिकल में अतिरिक्त समय दिया। पर दूसरे सेमेस्टर में स्थिति और खराब हुई।
तीसरे वर्ष तक आते-आते राजेश ने खुद को सुधार लिया था। कैंपस प्लेसमेंट का सीजन आया। वह तीन कंपनियों के इंटरव्यू में गया – तीनों में रिजेक्ट हो गया। चौथी कंपनी में इंटरव्यू के बाद उसे लगा कि इस बार चयन हो जाएगा। पर जब रिजल्ट आया तो उसके सभी दोस्तों का चयन हो गया था, सिर्फ वह बचा था। कॉलेज के अंतिम दिन, जब सभी दोस्त सेलिब्रेट कर रहे थे, राजेश अकेले हॉस्टल के कमरे में बैठा था। उसकी आँखों के सामने उसकी 22 साल की मेहनत बेकार होती दिख रही थी।
कॉलेज खत्म हो गया, पर नौकरी नहीं मिली। छह महीने घर पर बेरोजगार बैठा रहा। पिता का चेहरा हर दिन और उदास होता जा रहा था। माँ चिंता से बीमार पड़ गई। समाज के ताने बढ़ते जा रहे थे। एक दिन उसके पिता ने कहा, “तुम्हारे एक चाचा की दुकान है, वहाँ काम कर लो।” यह सुनकर राजेश के आँसू निकल आए। क्या उसकी इतनी पढ़ाई इसी के लिए थी?
एक रात, जब वह टेरिस पर बैठा आसमान देख रहा था, उसके मन में एक विचार आया। उसने देखा कि उसके गाँव और आसपास के इलाकों में किसानों को अपनी फसल का सही दाम नहीं मिलता। बिचौलिए उनका शोषण करते हैं। राजेश ने सोचा – “क्यों न एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनाया जाए जो किसानों को सीधे ग्राहकों से जोड़े?” उस रात उसने एक नोटबुक निकाली और अपना पहला बिजनेस प्लान लिखा।
राजेश ने अपनी जमा पूँजी (50,000 रुपये) और पिता से उधार लिए 1 लाख रुपये से ‘किसान संबंध’ नामक स्टार्टअप शुरू किया। उसका आइडिया था – एक मोबाइल ऐप जिसके जरिए किसान अपनी उपज की फोटो डालेंगे और शहरी ग्राहक सीधे खरीद सकेंगे। उसने तीन गाँवों के 20 किसानों को जोड़ा। छह महीने तक मेहनत की – किसानों को समझाया, तकनीक विकसित की, ग्राहक ढूँढे।
एक सुबह राजेश को पता चला कि उसके साथ काम कर रहे तीन किसानों ने उसके प्लेटफॉर्म को छोड़कर बिचौलियों के साथ सौदा कर लिया है। दो हफ्ते बाद, उसका मोबाइल ऐप हैक हो गया और सारा डेटा चोरी हो गया। बैंक बैलेंस शून्य हो चुका था। उधार चुकाने की तारीख नजदीक थी। एक शाम, जब वह ऑफिस (एक किराए का छोटा कमरा) से निकला, तो उसने फैसला किया कि कल सब कुछ बंद कर देगा। उस रात उसने अपनी डायरी में लिखा: “मैं हार मानता हूँ। शायद मैं कुछ करने लायक ही नहीं हूँ।”
अगली सुबह, बंद करने का फैसला लेकर राजेश चाय की दुकान पर बैठा था। वहाँ एक बुजुर्ग व्यक्ति बैठे थे जो उसे कई दिनों से देख रहे थे। उन्होंने पूछा, “बेटा, इतने उदास क्यों हो?” राजेश ने अपनी पूरी कहानी सुना दी – आईआईटी की असफलता, कॉलेज की निराशा, नौकरी न मिलना, और अब स्टार्टअप का फेल होना।
बुजुर्ग ने चुपचाप सब सुना, फिर मुस्कुराए। उन्होंने कहा, “तुमने चार बार असफलता देखी है न? पहली – आईआईटी, दूसरी – कॉलेज ग्रेड, तीसरी – नौकरी, चौथी – स्टार्टअप। पर क्या तुमने कभी सोचा कि हर असफलता ने तुम्हें क्या सिखाया?”
बुजुर्ग ने आगे कहा, “पहली असफलता ने तुम्हें विनम्र बनाया। दूसरी ने तुम्हें सिखाया कि किताबी ज्ञान के अलावा भी दुनिया है। तीसरी ने तुम्हें रोजगार सृजन का महत्व सिखाया। चौथी ने तुम्हें बाजार की समझ दी। तुम असफल नहीं हुए, तुमने चार कोर्स पूरे किए हैं जो कोई यूनिवर्सिटी नहीं सिखा सकती।”
ये शब्द राजेश के लिए वैद्युत झटके की तरह थे। उसने पहली बार इस नजरिए से सोचा। बुजुर्ग ने आगे कहा, “तुम्हारा आइडिया अच्छा है, पर तुमने गलत जगह से शुरुआत की। तुमने तकनीक से शुरुआत की, जबकि विश्वास से शुरुआत करनी चाहिए थी।”
राजेश ने अगले एक हफ्ते सिर्फ एक काम किया – अपनी हर असफलता का विश्लेषण किया। उसने पाया:
उसने इन सबकों को एक नोटबुक में लिखा और उसके आधार पर नई रणनीति बनाई।
इस बार राजेश ने अपना नया स्टार्टअप ‘किसान विश्वास’ नाम से शुरू किया। पहली बदलाव – कोई ऐप नहीं, सीधा संपर्क। वह खुद गाँव-गाँव गया। किसानों के साथ रहा, उनकी समस्याएँ सुनीं। उसने पाया कि किसानों को तकनीक से ज्यादा विश्वास चाहिए। उसने पहले पाँच किसानों के साथ अनुबंध किया कि वह उनकी फसल खरीदेगा और बिक्री के बाद पैसे देगा।
पहली फसल – राजेश ने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को सीधे सब्जियाँ बेचीं। उसने मुनाफे का 80% किसानों को दिया, 20% अपने पास रखा। पहले महीने में ही उसने पाया कि किसान खुश हैं और ग्राहक संतुष्ट हैं।
दूसरे महीने, पहले पाँच किसानों ने दस और किसानों को जोड़ा। छह महीने में राजेश के पास 50 किसान थे। अब उसने एक साधारण वेबसाइट बनाई जहाँ ग्राहक ऑर्डर दे सकते थे। उसने दो बेरोजगार युवाओं को नौकरी पर रखा – डिलीवरी और कोऑर्डिनेशन के लिए।
एक साल बाद, ‘किसान विश्वास’ 200 किसानों और 500 नियमित ग्राहकों के साथ काम कर रहा था। राजेश ने अब तक कोई बाहरी फंडिंग नहीं ली थी। वह अपने मुनाफे से ही व्यवसाय चला रहा था। उसका मॉडल सरल था – किसानों के साथ पारदर्शिता, ग्राहकों के साथ ईमानदारी।
दूसरे वर्ष में एक नई समस्या आई – फसलों की गुणवत्ता में अंतर। कुछ किसान अच्छी फसल दे रहे थे, कुछ औसत। राजेश ने इसका समाधान निकाला। उसने किसानों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। जैविक खेती के तरीके सिखाए। गुणवत्ता के आधार पर प्रीमियम कीमत देने का सिस्टम बनाया। इससे किसानों में प्रतिस्पर्धा का स्वस्थ माहौल बना।
तीसरे वर्ष, एक स्थानीय अखबार ने ‘किसान विश्वास’ पर एक रिपोर्ट छापी। यह रिपोर्ट राष्ट्रीय अखबारों तक पहुँची। राजेश को टीवी चैनलों पर बुलाया जाने लगा। उसकी कहानी ने लाखों लोगों को प्रेरित किया। अब उसके पास 1000 से अधिक किसान और 10,000 ग्राहक थे।
एक बड़ी कंपनी ने उसे अधिग्रहण का प्रस्ताव दिया – 5 करोड़ रुपये। राजेश ने सोचा, फिर सबको बुलाया – अपने कर्मचारियों, कुछ किसानों, और उस बुजुर्ग को जिसने उसे सही रास्ता दिखाया था। सबने सलाह दी कि प्रस्ताव स्वीकार कर लो। पर राजेश ने कहा, “मैंने यह व्यवसाय पैसा कमाने के लिए नहीं, एक समस्या का समाधान करने के लिए शुरू किया था। मैं इसे बेचूँगा नहीं, बल्कि और विस्तार दूँगा।”
चौथे वर्ष, राजेश को राष्ट्रपति भवन में ‘युवा उद्यमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। जब वह मंच पर अपनी कहानी सुना रहा था, तो उसने कहा, “मैं इस मंच पर अपनी सफलता के लिए नहीं, बल्कि अपनी असफलताओं के लिए खड़ा हूँ। क्योंकि हर असफलता मुझे यहाँ तक लाई है।”
आज ‘किसान विश्वास’ 5 राज्यों में 10,000 से अधिक किसानों के साथ काम करता है। सालाना टर्नओवर 50 करोड़ रुपये से अधिक है। पर राजेश के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसके किसानों की आय दोगुनी हो गई है और हजारों ग्राहकों को शुद्ध, ताजा भोजन मिल रहा है।
राजेश आज युवाओं को समझाता है, “असफलता से डरो मत। असफलता तो एक डेटा पॉइंट है जो बताता है कि क्या नहीं करना है। जितने ज्यादा डेटा पॉइंट, उतनी ही सटीक सफलता की राह।”
अगर आप भी किसी असफलता से जूझ रहे हैं, तो याद रखिए:
राजेश की कहानी हमें सिखाती है कि किस्मत बदलने के लिए असफलता जरूरी है। समुद्र की लहरें जब चट्टानों से टकराती हैं, तभी सुंदर मोती बनते हैं। ठीक उसी तरह, जब हमारे सपने कठिनाइयों से टकराते हैं, तभी सफलता के मोती बनते हैं।
आपकी आज की असफलता कल की सफलता की नींव है। बस विश्वास रखिए, सीखते रहिए, और चलते रहिए। आपकी किस्मत बदलने वाली असफलता शायद अभी आपके सामने है, या शायद बीत चुकी है। उसे पहचानिए, उससे सीखिए, और उसे अपनी सफलता की सीढ़ी बनाइए।
क्योंकि असली सफलता वह नहीं जो हमें कभी नहीं गिरने देती, बल्कि वह है जो हर बार गिरकर उठना सिखाती है। और यही वह यात्रा है जो साधारण इंसान को असाधारण बना देती है।
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