अंतिम सांस तक ममता: एक माँ का अमर त्याग

बारिश की उस रात

सन् 1995 की बात है। एक छोटे से गाँव में तेज़ बारिश हो रही थी। बिजली गिरने से पूरा गाँव अंधकार में डूबा हुआ था। ऐसे में एक छोटी सी झोपड़ी से एक स्त्री की कराह सुनाई दी। वह थीं सुशीला, जो अकेले ही प्रसव पीड़ा से जूझ रही थीं। उनके पति शहर में मजदूरी करते थे और बारिश के कारण लौट नहीं पाए थे।

अंतिम सांस तक ममता: एक माँ का अमर त्याग
अंतिम सांस तक ममता: एक माँ का अमर त्याग

सुशीला ने अपने आखिरी दम तक हिम्मत बनाए रखी और आधी रात को एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। जब गाँव की दाई पहुँची, तो वह देखकर दंग रह गई कि सुशीला ने अकेले ही प्रसव कर लिया था। बच्चे को गोद में लेते हुए सुशीला ने कहा, “मेरा राजू… मेरी जान…”

राजू के जन्म के बाद सुशीला की जिंदगी बदल गई। उनके पति रामलाल ने गाँव में ही रहकर खेती करने का फैसला किया ताकि परिवार एक साथ रह सके।

बचपन की पहली चुनौती

राजू जब तीन साल का था, तब एक दिन अचानक तेज़ बुखार आया। गाँव के ओझा ने कहा कि यह साधारण बुखार है, पर सुशीला को लगा कि कुछ गड़बड़ है। वह राजू को लेकर पैदल ही पास के शहर के अस्पताल पहुँची। दस किलोमीटर का सफर, बच्चे को गोद में लिए, बारिश में भीगते हुए…

डॉक्टर ने जाँच करने के बाद बताया कि राजू को निमोनिया है और अगर वह एक घंटे भी देर से आतीं तो बच्चे की जान चली जाती। सुशीला ने तीन दिन तक अस्पताल में बिना सोए राजू की देखभाल की। जब राजू ठीक हुआ तो डॉक्टर ने कहा, “मैडम, आपकी ममता ने आपके बच्चे की जान बचाई है।”

शिक्षा की पहली पाठशाला

राजू जब स्कूल जाने लायक हुआ, तो सुशीला ने उसे गाँव के प्राथमिक विद्यालय में दाखिल करवाया। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, फिर भी सुशीला ने हर संभव कोशिश की कि राजू की पढ़ाई में कोई कमी न रहे।

एक बार स्कूल में निबंध प्रतियोगिता थी और जीतने वाले को पुरस्कार के रूप में एक जोड़ी जूते मिलने थे। राजू के पैर में फटे हुए चप्पल थे। सुशीला ने देखा कि राजू जूते पाने के लिए बहुत उत्सुक है। उस रात सुशीला ने अपनी एकमात्र सोने की नथ उतारी जो उनकी माँ ने दी थी और अगले दिन शहर जाकर उसे बेचकर राजू के लिए नई यूनिफॉर्म और जूते खरीदे।

जब राजू ने पूछा, “माँ, तुम्हारी नथ कहाँ है?” तो सुशीला ने मुस्कुराकर कहा, “वह मैंने सहेजकर रख ली है। तू बस पढ़ाई पर ध्यान दे।”

राजू ने निबंध प्रतियोगिता जीती। उसका निबंध था – “मेरी माँ: मेरी पहली शिक्षिका”।

एक दुर्घटना और माँ का त्याग

राजू जब दसवीं कक्षा में था, तब एक दुर्घटना ने सब कुछ बदल दिया। रामलाल खेत में काम करते हुए साँप के काटने का शिकार हो गए। गाँव में कोई उपचार नहीं था। सुशीला ने रामलाल को किसी तरह अस्पताल पहुँचाया, पर वह बच नहीं पाए।

रामलाल के देहांत के बाद परिवार की सारी जिम्मेदारी सुशीला पर आ गई। उनके पास दो विकल्प थे – या तो राजू की पढ़ाई रोककर उसे खेती में लगा दें, या फिर खुद और अधिक मेहनत करके राजू की पढ़ाई जारी रखें।

सुशीला ने दूसरा रास्ता चुना। उन्होंने सुबह चार बजे उठकर खेत का काम करना शुरू किया, फिर दोपहर में गाँव के लोगों के घरों में चूल्हा-चौका करतीं, और शाम को फिर खेत पर काम करतीं। इतने काम के बावजूद वह राजू की पढ़ाई पर पूरा ध्यान देतीं।

एक बार राजू ने देखा कि उसकी माँ रात में केवल नमक-रोटी खा रही हैं। उसने पूछा, “माँ, तुम दाल-सब्जी क्यों नहीं खाती?”

सुशीला ने कहा, “मुझे नमक-रोटी पसंद है। तू जल्दी खाना खा ले, तेरी पढ़ाई बाकी है।”

राजू समझ गया कि उसकी माँ उसके लिए अपना खाना कम कर रही हैं। उस दिन उसने ठान लिया कि वह कुछ भी करके अपनी माँ के संघर्ष को सार्थक करेगा।

शहर की पढ़ाई और माँ का संघर्ष

राजू ने दसवीं कक्षा में गाँव के स्कूल में प्रथम स्थान प्राप्त किया। आगे की पढ़ाई के लिए उसे शहर जाना था। सुशीला ने अपने जेवर बेचकर और कुछ कर्ज लेकर राजू को शहर भेजा।

शहर में राजू ने एक छोटे से कमरे में रहकर पढ़ाई शुरू की। वह ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्च चलाता। पर एक दिन उसे पता चला कि उसकी माँ बीमार हैं और उन्होंने उसे बताया नहीं ताकि उसकी पढ़ाई में व्यवधान न आए।

राजू तुरंत गाँव लौटा। उसने देखा कि उसकी माँ बिस्तर पर पड़ी हैं और बुखार से तप रही हैं। गाँव के डॉक्टर ने बताया कि सुशीला कुपोषण और अधिक काम के कारण बीमार पड़ी हैं।

राजू ने रोते हुए कहा, “माँ, तुमने अपना ख्याल क्यों नहीं रखा?”

सुशीला ने कमजोर आवाज में कहा, “तेरी पढ़ाई पूरी हो जाए, फिर मैं आराम करूँगी।”

राजू ने फैसला किया कि वह अपनी माँ को शहर ले जाएगा। उसने एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया जहाँ दोनों रह सकें। सुशीला ने शुरू में मना किया, “मैं तेरे बोझ बनूँगी।”

राजू ने कहा, “माँ, तुमने मेरे लिए अपना सब कुछ त्याग दिया। अब मेरी बारी है तुम्हारी देखभाल करने की।”

माँ की ममता का अनोखा उपहार

शहर में सुशीला ने फिर से काम शुरू किया। उन्होंने घर-घर जाकर सफाई का काम करना शुरू किया। राजू ने लाख मना किया, पर सुशीला ने कहा, “जब तक मेरे हाथ-पैर चलते हैं, मैं काम करूँगी। तू बस पढ़ाई पर ध्यान दे।”

एक दिन राजू ने देखा कि उसकी माँ एक बुजुर्ग महिला के घर से लौट रही हैं और उनके हाथ में एक पुरानी किताब है। सुशीला ने कहा, “यह किताब उस दादी ने दी है। उन्होंने कहा कि इसे पढ़कर तुझे फायदा होगा।”

वह किताब थी एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए। सुशीला ने उस बुजुर्ग महिला से कहा था कि उनका बेटा पढ़ाई कर रहा है और उसे अच्छी किताबों की जरूरत है। उस महिला के बेटे ने वह किताब अपनी पढ़ाई के बाद सहेज कर रखी थी।

राजू के लिए यह किताब सोने से भी कीमती थी। उसने देखा कि उसकी माँ ने अपनी ममता से उसके लिए किताब जुटाई है।

बीमारी और माँ की मजबूरी

राजू जब इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहा था, तब सुशीला की तबीयत फिर से खराब हो गई। डॉक्टर ने बताया कि उन्हें गुर्दे की बीमारी है और नियमित दवाईयों की जरूरत है।

दवाईयाँ महँगी थीं। सुशीला ने राजू से कहा, “मैं दवाई नहीं लूँगी। तू अपनी पढ़ाई पूरी कर।”

राजू ने हठ किया, “या तो तुम दवाई लोगी, या फिर मैं पढ़ाई छोड़ दूँगा।”

राजू ने अपने समय को तीन हिस्सों में बाँट लिया – पढ़ाई, ट्यूशन पढ़ाना, और एक रेस्तराँ में पार्ट-टाइम काम। वह सुबह चार बजे उठता, पढ़ता, फिर कॉलेज जाता, शाम को ट्यूशन पढ़ाता, और रात को रेस्तराँ में काम करता।

एक रात रेस्तराँ से लौटते समय राजू बाइक दुर्घटना का शिकार हो गया। उसका पैर टूट गया। सुशीला अस्पताल पहुँची तो उनकी आँखों में आँसू थे। “मैंने तुझसे कहा था ना कि इतना काम मत कर।”

राजू ने मुस्कुराते हुए कहा, “माँ, तुम्हारी दवाई के पैसे कहाँ से आते? तुमने मेरे लिए जो किया, उसके आगे मेरा यह त्याग कुछ भी नहीं है।”

सपना साकार

राजू ने इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा पास की और एक अच्छे कॉलेज में दाखिला मिला। सुशीला के लिए यह सबसे खुशी का दिन था। उस दिन उन्होंने सालों बाद पूरा खाना खाया।

कॉलेज के दिनों में राजू ने अपनी माँ के लिए एक छोटा सा घर किराए पर लिया। सुशीला ने फिर से काम शुरू किया, पर इस बार राजू ने उन्हें केवल हल्का काम करने दिया।

एक दिन सुशीला ने राजू से कहा, “मैं एक काम करना चाहती हूँ। मैं गरीब बच्चों को पढ़ाऊँगी।”

राजू ने उनका सपना पूरा किया। उन्होंने एक छोटी सी कोचिंग क्लास शुरू की जहाँ सुशीला गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ातीं। इस काम ने सुशीला को नया जीवन दिया।

वह दिन जब सब बदल गया

राजू ने इंजीनियरिंग पूरी की और एक अच्छी नौकरी मिली। पहली सैलरी मिलते ही उसने अपनी माँ के लिए एक नया साड़ी खरीदी और कहा, “माँ, आज से तुम्हें काम करने की जरूरत नहीं है। मैं तुम्हारा ख्याल रखूँगा।”

सुशीला की आँखें भर आईं, “तेरी सफलता ही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार है।”

राजू ने अपनी माँ को उनकी पहली हवाई यात्रा करवाई, समुद्र दिखाया, और बड़े शहर में घुमाया। हर जगह सुशीला की एक ही चाह थी – “काश मेरा राजू बचपन में भी ऐसी चीजें देख पाता।”

राजू ने कहा, “माँ, तुम्हारा प्यार ही मेरे लिए दुनिया की सबसे बड़ी चीज है।”

बीमारी की कड़वी सच्चाई

राजू की जिंदगी स्थिर होने लगी थी कि अचानक सुशीला की तबीयत फिर से बिगड़ी। इस बार डॉक्टर ने बताया कि उन्हें कैंसर है और उपचार के लिए बहुत पैसों की जरूरत है।

राजू ने अपनी नौकरी छोड़ दी और अपनी सारी बचत उपचार में लगा दी। सुशीला ने कहा, “मत कर ये सब। तू अपनी जिंदगी बर्बाद मत कर।”

राजू ने जवाब दिया, “माँ, तुमने मेरे लिए अपनी जिंदगी दाँव पर लगा दी थी। आज मेरी बारी है।”

राजू ने दिन-रात एक कर दिया। वह दिन में काम करता और रात को अस्पताल में अपनी माँ की सेवा करता। उसने अपना फ्लैट बेच दिया और एक छोटे से कमरे में रहने लगा।

अंतिम इच्छा

सुशीला को पता था कि उनका समय अब ज्यादा नहीं है। एक दिन उन्होंने राजू से कहा, “मैं एक इच्छा मन में लिए जा रही हूँ।”

राजू ने कहा, “कहो माँ, तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूँगा।”

सुशीला ने कहा, “मैं चाहती हूँ कि तू गाँव में एक स्कूल बनवाए जहाँ गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिले। मेरे नाम से नहीं, बल्कि उन सभी माओं के नाम से जो अपने बच्चों के लिए जीती-मरती हैं।”

राजू ने आँसू पोछते हुए कहा, “तुम्हारी यह इच्छा जरूर पूरी करूँगा।”

अंतिम विदाई

सुशीला के अंतिम दिन थे। राजू उनके बिस्तर के पास बैठा था। सुशीला ने कमजोर आवाज में कहा, “राजू, मैं एक बात कहना चाहती हूँ। मैंने तेरे लिए बहुत त्याग किया, पर तू मेरा त्याग नहीं, मेरा प्यार था। एक माँ के लिए उसका बच्चा ही सब कुछ होता है।”

राजू ने उनका हाथ थाम लिया, “माँ, तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूँ।”

सुशीला ने आखिरी बार मुस्कुराते हुए कहा, “तेरी खुशी देखकर मेरा जीवन सफल हो गया। अब मैं चैन से जा सकती हूँ।”

उस रात सुशीला ने आखिरी सांस ली। उनके चेहरे पर शांति थी, मुस्कान थी।

माँ की विरासत

सुशीला के देहांत के बाद राजू ने अपनी नौकरी फिर से शुरू की, पर उसका लक्ष्य अब पैसा कमाना नहीं था। उसने अपनी माँ की अंतिम इच्छा पूरी करने का फैसला किया।

तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद, राजू ने अपने गाँव में “मातृत्व विद्यालय” की स्थापना की। यह एक ऐसा स्कूल था जहाँ गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा, यूनिफॉर्म, किताबें और भोजन मिलता था।

स्कूल के उद्घाटन के दिन राजू ने कहा, “यह स्कूल मेरी माँ की ममता और त्याग की यादगार है। मैं चाहता हूँ कि यहाँ पढ़ने वाला हर बच्चा अपनी माँ के प्यार का सम्मान करे, क्योंकि माँ का प्यार दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है।”

आज की कहानी

आज राजू एक सफल इंजीनियर है और “मातृत्व विद्यालय” देश के कई गाँवों में फैल चुका है। हर साल स्कूल में “मातृ दिवस” मनाया जाता है जहाँ बच्चे अपनी माओं के लिए कविताएँ सुनाते हैं और उनका सम्मान करते हैं।

राजू अक्सर कहता है, “मेरी माँ ने मुझे सिखाया कि प्यार देने में ही असली खुशी है। उन्होंने अपना सब कुछ मेरे लिए त्याग दिया, और आज मैं जो कुछ भी हूँ, वह उन्हीं की देन है।”

निष्कर्ष

सुशीला की कहानी हर उस माँ की कहानी है जो अपने बच्चे के लिए जीती-मरती है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि माँ का प्यार दुनिया का सबसे निस्वार्थ प्यार है। वह बिना किसी अपेक्षा के देती है, बिना किसी शिकायत के त्याग करती है।

माँ की ममता एक ऐसा आशीर्वाद है जो हमें जीवन भर सहारा देता है। सुशीला जैसी लाखों माएँ हैं जो चुपचाप अपना जीवन बच्चों के लिए समर्पित कर देती हैं। उनका त्याग कभी दिखाई नहीं देता, पर उसकी छाया में पलकर ही हम बड़े होते हैं।

राजू की तरह हम सभी का कर्तव्य है कि हम अपनी माँ के प्यार और त्याग का सम्मान करें, क्योंकि माँ ही हमारी पहली शिक्षिका, पहली दोस्त और पहली पूज्य होती है। उनके बलिदान को शब्दों में बयान करना असंभव है, क्योंकि माँ का प्यार तो अनंत और अमर है।

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