माँ की खामोश दुआएँ

सुबह की पहली किरण ने गाँव के छोटे-से घर की खिड़की को छुआ। माँ आँगन में बैठी रोटी बना रही थी, उसके हाथों में आटे के साथ-साथ एक सूखी पीली डायरी भी थी। यह डायरी उन्होंने तब से रखी थी जब उनका बेटा राजू दस साल का था। आज राजू अमेरिका से लौट रहा था, पाँच साल बाद।

माँ ने एक साफ कपड़े से डायरी को साफ किया और धीरे से उसके पन्ने पलटने लगीं।


डायरी के पन्नों में छुपी यादें

हर पन्ने पर लिखा था— “आज राजू स्कूल से फिर रोता हुआ आया। मास्टरजी ने डाँटा क्योंकि उसने होमवर्क नहीं किया था। पर मैं जानती हूँ वह पूरी रात बुखार से तप रहा था। भगवान, उसे ताकत दो।”

दूसरे पन्ने पर— “आज राजू ने इंटरमीडिएट में फर्स्ट डिवीज़न लाया। पूरे गाँव ने बधाई दी, पर पिता ने कहा— ‘यह तो करना ही था।’ मैं चुपचाप रोई। भगवान, उसे और आगे बढ़ने दो।”

फिर एक पन्ने पर— “राजू को आईआईटी में दाखिला मिल गया। पिता ने घर बेचकर फीस भरी। राजू रात-रात भर पढ़ता है। भगवान, उसकी मेहनत रंग लाए।”

एक पन्ने पर स्याही के धब्बे थे— “राजू विदेश चला गया। हवाईअड्डे पर वह मुस्कुरा रहा था, पर मैं उसकी आँखों में डर देख रही थी। भगवान, उसकी हर कदम पर रक्षा करना।”

डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था— “आज राजू लौट रहा है। मैंने उसकी पसंद की सब्जियाँ बनाई हैं। भगवान, बस वह खुश रहे।”


फिर वह मुलाकात का दिन

शाम को जब राजू घर पहुँचा, तो माँ ने उसे देखते ही गले लगा लिया। चाय पीते हुए राजू ने कहा, “माँ, तुमने इतनी मेहनत की, मुझे पढ़ाया। आज मैं सफल हूँ तो सिर्फ तुम्हारी वजह से।”

माँ मुस्कुरा दीं, “बेटा, तूने खुद मेहनत की।”

रात को जब राजू सो गया, तो माँ ने डायरी का आखिरी पन्ना पलटा और लिखा— “आज मेरा राजू खुश है। मेरी खामोश दुआएँ कबूल हुईं। भगवान, अब बस यही चाहती हूँ कि वह हमेशा इतना ही मुस्कुराता रहे।”

डायरी बंद करते हुए माँ की आँखों में आँसू थे, पर चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी। वह जानती थीं कि उनकी दुआओं ने कभी आवाज़ नहीं बढ़ाई, पर हर शब्द ने उनके बेटे के जीवन की नींव रखी थी।


निष्कर्ष

माँ की खामोश दुआएँ ही तो होती हैं, जो बिना किसी स्वार के, बिना किसी दिखावे के, संतान के लिए आसमान तक पहुँच जाती हैं। यह कहानी माँ के प्यार और त्याग की अद्भुत मिसाल है, जहाँ उनकी चुप्पी में छुपी हर दुआ संतान के जीवन का आधार बनती है।

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