चुड़ैल की चप्पल

वैसे तो अमरनाथ तिवारी को अपनी नई नौकरी और शहर से आने वाली इस पोस्टिंग पर बहुत गर्व था, लेकिन सात दिन बीतते-बीतते उसका यह गर्व एक अनजाने डर में बदल चुका था। छोटे शहर रामपुर में असिस्टेंट कलेक्टर की नौकरी मिलना कोई मामूली बात नहीं थी, पर उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी – रहने के लिए जगह। शहर का एकमात्र अच्छा सरकारी क्वार्टर अभी तक खाली नहीं हुआ था, और प्राइवेट घरों का किराया उसकी जेब से बाहर था।

चुड़ैल की चप्पल

ऐसे में जब तहसीलदार श्रीधरन ने उसे पुराने बंगले के बारे में बताया, तो अमरनाथ ने तुरंत हाँ कर दी। “साहब, बंगला तो बहुत बड़ा है, बगीचा है, कमरे हैं… पर एक छोटी सी बात है,” श्रीधरन ने अपनी मूंछों को सहलाते हुए कहा था।

“क्या बात?” अमरनाथ ने पूछा था।

“बंगला… थोड़ा… पुराना है। लोग कहते हैं कि वहाँ कुछ… अजीब होता है।”

अमरनाथ हँस पड़ा था। आईआईटी से पढ़ा हुआ यह युवक भूत-प्रेत की बातों पर विश्वास करने वालों में से नहीं था। “कोई बात नहीं, श्रीधरन जी। मैं देख लूँगा।”

बंगला वास्तव में शानदार था। अंग्रेजों के जमाने का बना हुआ, लाल ईंटों से निर्मित, दो मंजिला भवन जिसके चारों ओर बरगद और पीपल के पेड़ों का घना जंगल सा लग रहा था। दरवाजे पर जंग लगी हुई ताला लटक रही थी। श्रीधरन ने चाबी दी। “सालों से खाली पड़ा है, साहब। आखिरी रहने वाले… वो… चले गए बिना कुछ बताए।”

अमरनाथ ने बंगले में कदम रखा। अंदर की हवा में नमी और सीलन की गंध थी। फर्नीचर धूल से ढका हुआ था। लेकिन कमरे विशाल थे, छतें ऊँची थीं, और खिड़कियों से आती रोशनी में धूल के कण नाच रहे थे। उसने तुरंत तय कर लिया – यही उसका नया घर होगा।

पहला हफ्ता बिना किसी घटना के बीत गया। अमरनाथ ने बेडरूम और लिविंग रूम साफ किया, बाकी हिस्सों को बंद कर दिया। रातें शांत थीं, बस कभी-कभी पेड़ों की टहनियों की खड़खड़ाहट या दूर से आते जानवरों की आवाजें सुनाई देती थीं।

सातवें दिन की रात थी। अमरनाथ देर रात तक ऑफिस का काम कर रहा था। करीब डेढ़ बजे का समय होगा जब उसे नीचे से आती हुई आवाज सुनाई दी। थप-थप-थप…

ऐसा लगा जैसे कोई नीचे की मंजिल पर चप्पल पहनकर टहल रहा हो। अमरनाथ ने कान लगाए। आवाज साफ थी – चप्पलों के फर्श पर पड़ने की आवाज। वह उठा, टॉर्च उठाई, और धीरे से सीढ़ियों से उतरा।

नीचे का हॉल अंधेरे में डूबा हुआ था। टॉर्च की रोशनी में धूल के बादल उड़ते दिखाई दिए। आवाज बंद हो गई थी। उसने सोचा शायद चूहे होंगे या फिर उसका भ्रम होगा। वह वापस ऊपर आ गया।

अगली रात फिर वही आवाज। इस बार और साफ, और लगातार। थप-थप-थप… थप-थप… ऐसा लग रहा था जैसे कोई नीचे के हॉल में चक्कर लगा रहा हो। अमरनाथ ने फिर नीचे जाने का फैसला किया, लेकिन इस बार छिपकर। वह सीढ़ियों के पीछे छिप गया और हॉल की तरफ देखने लगा।

टॉर्च की रोशनी में उसने देखा – एक जोड़ी पुरानी चप्पलें, लकड़ी की पट्टी वाली, जो अपने आप फर्श पर चल रही थीं। बिना किसी पैर के, बिना किसी शरीर के। सिर्फ चप्पलें… चल रही थीं।

अमरनाथ की साँसें रुक सी गईं। वह जमा हुआ सा खड़ा रहा। चप्पलें हॉल के एक कोने से दूसरे कोने तक जा रही थीं, फिर वापस आ रही थीं, मानो कोई टहल रहा हो। करीब पाँच मिनट तक यह सिलसिला चला, फिर अचानक चप्पलें रुक गईं, मुड़ीं, और बंद कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ने लगीं। दरवाजा खुद-ब-खुद खुल गया, चप्पलें अंदर चली गईं, और दरवाजा बंद हो गया।

अमरनाथ की टाँगें काँप रही थीं। वह बड़ी मुश्किल से ऊपर अपने कमरे में पहुँचा। उस रात उसकी आँख में नींद नहीं आई।

सुबह होते ही वह श्रीधरन के पास पहुँचा। “बंगले में… कुछ है,” उसने हाँफते हुए कहा।

श्रीधरन ने गहरी साँस ली। “मैंने आपको चेताया था, साहब।”

“वो चप्पलें… वो क्या हैं?”

“चुड़ैल की चप्पलें, साहब।”

श्रीधरन ने बताया – बहुत साल पहले, बंगले में एक अंग्रेज अफसर रहता था। उसकी पत्नी एलिस बहुत सुंदर थी, लेकिन उसे एक गंभीर बीमारी थी। वह चल नहीं सकती थी। अफसर ने उसके लिए लकड़ी की खास चप्पलें बनवाई थीं जो उसे चलने में मदद करती थीं। एलिस उन चप्पलों से इतना प्यार करती थी कि हमेशा उन्हें ही पहनती थी, चाहे वह घर के अंदर हो या बाहर।

एक दिन, अफसर को तबादला हो गया, लेकिन जहाज़ से जाने से पहले, एलिस की तबीयत अचानक बिगड़ गई। डॉक्टरों ने उसे यात्रा करने से मना कर दिया। अफसर को जाना पड़ा, यह सोचकर कि वह एलिस को बाद में बुला लेगा। पर एलिस अकेले बंगले में रह गई, उसकी देखभाल के लिए सिर्फ एक नौकर और एक नर्स छोड़े गए।

“फिर क्या हुआ?” अमरनाथ ने पूछा।

“कहते हैं एलिस की मौत हो गई… पर उसकी आत्मा मुक्त नहीं हुई। वह उन चप्पलों से इतना प्यार करती थी कि उसकी आत्मा उनमें कैद हो गई। और तब से, हर रात, वो चप्पलें चलती हैं… मानो एलिस अभी भी टहल रही हो।”

“यह सब अंधविश्वास है,” अमरनाथ ने कहा, हालाँकि उसकी आवाज़ में पहले जैसा विश्वास नहीं था।

“जो भी हो, साहब। पर हर कोई जो उस बंगले में रहा है, उसने वो चप्पलें देखी हैं। कुछ लोग पागल हो गए, कुछ भाग गए। आखिरी रहने वाले बाबू साहब एक दिन अचानक चले गए, अपना सारा सामान छोड़कर।”

अमरनाथ वापस बंगले लौटा। दिन भर वह सोचता रहा। वह वैज्ञानिक दिमाग का व्यक्ति था। उसने फैसला किया कि वह इस रहस्य को सुलझाएगा।

उस रात, उसने तैयारी की। उसने अपना फोन तैयार रखा, वीडियो रिकॉर्ड करने के लिए। वह नीचे हॉल में एक कोने में छिपकर बैठ गया, कैमरा तैयार करके।

रात के एक बजे, आवाज़ शुरू हुई। थप-थप-थप… अमरनाथ ने कैमरा चालू किया। चप्पलें फिर से हॉल में प्रवेश कर रही थीं। इस बार वह उन्हें करीब से देख सका। चप्पलें पुरानी थीं, लकड़ी की पट्टी थोड़ी टेढ़ी थी, उन पर नक्काशी की हुई थी। वे सचमुच बिना किसी के पहने हुए चल रही थीं।

वह कैमरा लेकर धीरे से पीछे की तरफ हटा, ताकि बेहतर शॉट ले सके। पर तभी चप्पलें अचानक रुक गईं। वे मुड़ीं, और सीधे उसकी तरफ बढ़ने लगीं।

अमरनाथ की धड़कनें तेज हो गईं। चप्पलें उसकी तरफ आ रही थीं, और वे रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। वह पीछे हटा, पर चप्पलें और तेजी से आने लगीं। थप-थप-थप-थप… अब वे दौड़ रही थीं।

अमरनाथ भागा। वह सीढ़ियों की तरफ दौड़ा, पर चप्पलें उसके पीछे थीं। वह ऊपर पहुँचा, अपने कमरे में घुसा, और दरवाजा बंद कर दिया। उसने साँस लेने के लिए रुका, और दरवाजे के नीचे की ओर देखा।

वहाँ चप्पलें खड़ी थीं। वे दरवाजे के बाहर थीं, मानो इंतजार कर रही हों। पूरी रात वे वहीं रहीं। अमरनाथ ने दरवाजा नहीं खोला।

सुबह होते ही चप्पलें गायब हो गईं। अमरनाथ सीधे श्रीधरन के पास गया। “मुझे उस कमरे की चाबी चाहिए, जिसमें चप्पलें जाती हैं।”

श्रीधरन ने आँखें फैलाईं। “साहब, मैं आपको मना करता हूँ। उस कमरे को सालों से कोई नहीं खोलता।”

“मुझे चाबी दीजिए,” अमरनाथ ने दृढ़ता से कहा।

श्रीधरन ने एक पुरानी, जंग लगी चाबी निकाली। “ये लीजिए, पर याद रखिए, मैंने आपको चेताया था।”

उस दिन अमरनाथ ने ऑफिस से छुट्टी ली। वह दोपहर में ही बंगले लौट आया। वह सीधे उस कमरे के दरवाजे पर पहुँचा जहाँ चप्पलें रात में जाती थीं। दरवाजा पुराना था, लकड़ी का, उस पर नक्काशी थी। उसने चाबी लगाई। ताला खुल गया।

कमरे के अंदर अंधेरा था। खिड़कियाँ बंद थीं, उन पर मोटे पर्दे पड़े हुए थे। अमरनाथ ने पर्दे खोले। धूल उड़ी। कमरे में पुराना फर्नीचर था – एक बिस्तर, एक अलमारी, एक ड्रेसिंग टेबल। सब कुछ धूल से ढका हुआ था।

उसने ड्रेसिंग टेबल की ओर देखा। उस पर कुछ चीजें रखी थीं – एक पुरानी हाथ से बना हुआ कंघा, कुछ खाली शीशियाँ, और एक फोटो फ्रेम। अमरनाथ ने फोटो फ्रेम उठाया। उसे साफ किया।

फोटो में एक सुंदर महिला थी, लंबे सुनहरे बाल, नीली आँखें। वह एक कुर्सी पर बैठी थी, और उसके पैरों में वही चप्पलें थीं – लकड़ी की पट्टी वाली। उसकी आँखों में एक उदासी थी, मानो वह कहीं दूर देख रही हो।

अमरनाथ ने अलमारी खोली। अंदर पुराने कपड़े लटके हुए थे – विक्टोरियन युग के गाउन और ड्रेसेस। और एक कोने में… वह चप्पलें रखी हुई थीं।

वह चप्पलें जो रात में चलती थीं।

अमरनाथ ने सावधानी से चप्पलें उठाईं। वे हल्की थीं, लकड़ी की बनी हुईं। उन पर बारीक नक्काशी थी – फूलों और पत्तियों की। उन्हें देखकर लगता था कि किसी ने बहुत मेहनत से बनाया होगा।

तभी उसने कुछ महसूस किया। चप्पलें… गर्म थीं। मानो अभी किसी ने उन्हें पहना हो। उसने उन्हें वापस रख दिया।

उसने पूरा कमरा खंगाला। अलमारी के नीचे एक पुराना ट्रंक मिला। उसमें पत्र थे, डायरियाँ। अमरनाथ ने एक डायरी खोली। यह एलिस की डायरी थी, अंग्रेजी में लिखी हुई।

पन्ने पलटते हुए उसने पढ़ा:

“3 मार्च, 1897: आज डॉक्टर ने फिर कहा कि मैं कभी नहीं चल पाऊँगी। मेरे पैर… मेरे बेकार पैर। विलियम ने मेरे लिए नई चप्पलें बनवाई हैं। वे मुझे थोड़ी मदद करती हैं। मैं उन्हें ‘माई वॉकिंग फ्रेंड्स’ कहती हूँ।”

“15 अप्रैल, 1897: विलियम को कलकत्ता जाना है। वह मुझे यहाँ अकेला छोड़कर जा रहा है। मैं डरती हूँ। इस बड़े बंगले में अकेले… मेरे पास सिर्फ ये चप्पलें हैं।”

“20 मई, 1897: आज रात मैंने सपना देखा कि मैं चल रही हूँ। मैं बंगले के हॉल में टहल रही थी, मेरे पैरों में मेरी चप्पलें। कितना अच्छा लगा… काश यह सच होता।”

डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था:

“10 जून, 1897: मैं मर रही हूँ। डॉक्टर कहते हैं कुछ दिन और। मैं विलियम से मिलने नहीं जा पाऊँगी। पर मैं चलना चाहती हूँ… कम से कम एक बार तो… इस बंगले में चलना चाहती हूँ। मैं प्रार्थना करती हूँ कि कम से कम मेरी आत्मा तो चल सके… इन चप्पलों के साथ।”

अमरनाथ ने डायरी बंद की। उसकी आँखों में पानी आ गया। एलिस की कहानी ने उसे छू दिया था। एक औरत जो अपनी पूरी जिंदगी चलने के लिए तरसती रही, और मरने के बाद भी उसकी आत्मा को चैन नहीं मिला।

उस रात, अमरनाथ ने फैसला किया कि वह डरने के बजाय, एलिस की मदद करेगा।

रात को, जब चप्पलें फिर हॉल में निकलीं, अमरनाथ उनके सामने खड़ा हो गया। “एलिस,” उसने धीरे से कहा, “मैं आपकी डायरी पढ़ चुका हूँ।”

चप्पलें रुक गईं।

“मैं जानता हूँ कि आप चलना चाहती थीं। मैं आपकी मदद करना चाहता हूँ।”

चप्पलें आगे बढ़ीं, और अमरनाथ के सामने रुक गईं। वह नीचे बैठ गया। “आप इस बंगले में कैद हैं, एलिस। आपकी आत्मा इन चप्पलों में फँसी हुई है। आपको मुक्त होना चाहिए।”

चप्पलें हिलीं, मानो हाँ में सिर हिला रही हों।

अमरनाथ ने अगले दिन श्रीधरन से पूछा, “क्या आप जानते हैं कि एलिस को कहाँ दफनाया गया था?”

श्रीधरन ने सिर हिलाया। “पुराने ईसाई कब्रिस्तान में, शहर से तीन मील दूर। पर वह कब्रिस्तान अब उपेक्षित पड़ा है, जंगल ने घेर लिया है।”

“मुझे वहाँ ले चलिए,” अमरनाथ ने कहा।

दोपहर में, वे दोनों कब्रिस्तान पहुँचे। जंगली झाड़ियों और बेलों के बीच कुछ पुरानी कब्रें दिखाई दे रही थीं। श्रीधरन ने एक कब्र की तरफ इशारा किया। पत्थर पर लिखा था: “एलिस मार्गरेट थॉमसन, 1865-1897, रेस्ट इन पीस।”

अमरनाथ ने कब्र के पास जाकर प्रार्थना की। “एलिस, आप अब आजाद हैं। आप चल सकती हैं।”

उस रात, अमरनाथ ने एक छोटी सी विदाई रस्म की तैयारी की। उसने हॉल में मोमबत्तियाँ जलाईं, चप्पलों को बीच में रखा, और एलिस की डायरी से कुछ पन्ने पढ़े।

रात बारह बजे, चप्पलें अपने आप चलने लगीं। पर इस बार वे हॉल में चक्कर नहीं लगा रही थीं। वे सीधे दरवाजे की तरफ बढ़ीं।

अमरनाथ ने दरवाजा खोला। चप्पलें बाहर निकलीं, बगीचे में चलीं, और गेट की तरफ बढ़ने लगीं। अमरनाथ उनके पीछे-पीछे चला।

चप्पलें सड़क पर चलती रहीं, शहर से बाहर की तरफ। अमरनाथ उनके पीछे चलता रहा। करीब एक घंटे की चलने के बाद, वे कब्रिस्तान के सामने पहुँचे।

चप्पलें कब्रिस्तान के गेट से अंदर गईं, सीधे एलिस की कब्र की तरफ। वहाँ पहुँचकर वे रुक गईं। फिर एक अजीब सी घटना हुई।

चप्पलें धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगीं, मानो उनका अस्तित्व खत्म हो रहा हो। और फिर… वे गायब हो गईं। उनकी जगह सिर्फ हल्की सी सफेद रोशनी दिखाई दी, जो हवा में घुलती चली गई।

अमरनाथ ने एक आखिरी प्रार्थना की, और वापस लौट आया।

उस रात के बाद, चप्पलों की आवाज कभी नहीं सुनाई दी। बंगला अब पूरी तरह शांत था। अमरनाथ ने एलिस के कमरे को साफ किया, उसकी चीजों को संभाल कर रखा, और उसकी कब्र की देखभाल करनी शुरू की।

एक रात, उसे सपना आया। सपने में एलिस खड़ी थी, वह चल रही थी, उसके चेहरे पर मुस्कान थी। वह अमरनाथ की तरफ मुड़ी, और बोली, “थैंक यू।”

अमरनाथ जाग गया। उसने महसूस किया कि बंगले की हवा अब हल्की और ताज़ा लग रही थी। सीलन और नमी की गंध गायब हो गई थी।

कुछ महीने बाद, जब श्रीधरन ने पूछा, “साहब, अब तो सब ठीक है न?”

अमरनाथ मुस्कुराया। “हाँ, सब ठीक है। एलिस आखिरकार चलना सीख गई।”

“पर साहब… वो तो चुड़ैल थी न?” श्रीधरन ने पूछा।

“नहीं, श्रीधरन जी। वो चुड़ैल नहीं थी। वो सिर्फ एक औरत थी जो चलना चाहती थी। और कभी-कभी… इच्छाएँ इतनी ताकतवर होती हैं कि मौत के बाद भी जिंदा रहती हैं।”

आज भी, रामपुर के उस पुराने बंगले में अमरनाथ तिवारी रहता है। लोग कहते हैं कि बंगला अब पहले से ज्यादा खुशनुमा लगता है। और कभी-कभी, पूर्णिमा की रात को, लोग कहते हैं कि बंगले के बगीचे में दो जोड़ी पैरों के निशान दिखाई देते हैं – एक आदमी के, और एक औरत के – मानो कोई साथ-साथ टहल रहा हो।

एलिस की चप्पलें अब नहीं चलतीं। पर उनकी कहानी चलती रहती है – एक ऐसी औरत की कहानी जिसकी इच्छा इतनी ताकतवर थी कि मौत के बाद भी मर नहीं पाई। और कभी-कभी, इच्छाएँ ही सबसे बड़ा जादू होती हैं… चाहे वे जिंदगी में पूरी हों, या मौत के बाद।

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