अमित का चेहरा सूरज की आखिरी किरणों में डूबे उस पीली-सुर्ख इमारत की तरफ था, लेकिन नज़रें कहीं और थीं। वह बार-बार अपनी कार की स्टीयरिंग पर बंधी सफेद पट्टी को टटोल रहा था, जिस पर “मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट – अपडेटेड” लिखा था। दो साल, छह महीने और सत्रह दिन। इतने समय के बाद वह फिर इसी रास्ते पर था, उसी अस्पताल की तरफ, जहाँ से एक दिन उसे मरा हुआ समझकर विदा किया गया था।

दो साल पहले, वह अमित शर्मा, सफल सॉफ्टवेयर इंजीनियर, अपनी नई प्रोमोशन की खुशी मनाने दोस्तों के साथ मिलने जा रहा था। बारिश हो रही थी, रास्ता फिसलन भरा। एक जोखिम भरा ओवरटेक, एक तेज आवाज, फिर सब कुछ काला हो गया। अगली बार जब आँखें खुलीं, तो वह हवा में लटकता हुआ महसूस कर रहा था। उसका शरीर किसी टुकड़ों में बँटा हुआ था। उसे पता चला कि उसकी रीढ़ की हड्डी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गई थी। डॉक्टरों ने उसके परिवार को साफ कह दिया – “तैयार रहिए। शायद वह कभी चल नहीं पाएगा।”
उन शब्दों ने अमित को तोड़कर रख दिया था। जिंदगी, जो अभी शुरू ही हुई थी, वहीं खत्म होने का नाम ले रही थी। उसकी प्रेमिका नेहा ने शुरुआत के कुछ महीनों तक साथ दिया, लेकिन धीरे-धीरे उसकी उपस्थिति कम होती गई, फोन कॉल्स छूटने लगे, और एक दिन उसने सीधे कह दिया – “अमित, मैं तुम्हारे साथ इस तरह की जिंदगी नहीं जी सकती।” वह टूटा हुआ आईना था, और नेहा का चले जाना उस पर आखिरी चोट थी।
जो बचा था, बस वही था: परिवार
परिवार – माँ, पिताजी और छोटी बहन आशी – ने हिम्मत नहीं हारी। माँ रोज सुबह चार बजे उठकर उसकी मालिश करती, पिताजी ने कर्ज लेकर सबसे अच्छी फिजियोथेरेपी का इंतजाम किया। आशी, जो कॉलेज जाती थी, रोज शाम को उसके पास बैठकर पुराने चुटकुले सुनाती, उसकी पसंद की फिल्में दिखाती।
लेकिन अमित का मन एक काल कोठरी में कैद था। वह गुस्सैल, चिड़चिड़ा और हताश हो गया था। एक दिन, जब माँ उसे खाना खिला रही थी, उसने थाली उठाकर दूर फेंक दी। “छोड़ दो मुझे! मरने दो! मैं बोझ बनकर नहीं जिऊँगा!”
उस दिन माँ ने एक आँसू नहीं बहाया। उसने चुपचाप टुकड़े समेटे, और कहा, “तू मेरा बेटा है। तुझे मैंने नौ महीने पेट में रखा था। तू बोझ नहीं, मेरी जान है। और जान कभी बोछ नहीं होती।” उन शब्दों ने अमित को अंदर तक झकझोर दिया।
धीरे-धीरे, फिजियोथेरेपी की कठिन एक्सरसाइज, दर्द, और असीम धैर्य के साथ कुछ हलचल शुरू हुई। पहले एक उंगली हिली, फिर हाथ, फिर पैर का अंगूठा। हर छोटी हरकत जश्न का कारण बनती। डॉक्टर हैरान थे। “ये मेडिकल साइंस नहीं, जिद है,” उन्होंने कहा।
एक नई दृष्टि: रिया से मुलाकात
इसी बीच, अस्पताल की लाइब्रेरी में, जहाँ व्हीलचेयर पर बैठकर अमित वक्त बिताता, उसकी मुलाकात रिया से हुई। रिया एक वॉलंटियर थी, जो मरीजों को किताबें पहुँचाती थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति और जीवटता थी। बातचीत से पता चला कि रिया बचपन में पोलियो का शिकार हो गई थी, और उसने कभी अपने पैरों पर चलना नहीं सीखा था। लेकिन उसने सामान्य स्कूल से पढ़ाई की, ग्रेजुएशन की, और अब एक ग्राफिक डिजाइनर के रूप में काम करती थी।
रिया ने अमित को देखकर कहा, “लगता है तुम अपनी कहानी के विलेन बन गए हो।”
अमित ने कड़वाहट से जवाब दिया, “जब जिंदगी ही खलनायक बन जाए, तो हीरो बनना मुश्किल होता है।”
रिया मुस्कुराई, “ज़िंदगी कभी विलेन नहीं होती, अमित। वह एक स्क्रिप्ट राइटर है, बुरी तरह लिखती है कभी-कभी, लेकिन एक्टिंग तो हमें करनी होती है। और बेहतरीन एक्टिंग तभी होती है, जब डायलॉग बेकार हों।”
विज्ञान और जिद का संगम
रिया धीरे-धीरे अमित की दुनिया का हिस्सा बन गई। उसने उसे रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर काम करने वालों से जोड़ा, जो विशेष जरूरतों वाले लोगों के लिए सहायक उपकरण बना रहे थे। अमित की रुचि फिर से जागी। उसने अपना लैपटॉप उठाया, और कोडिंग शुरू की। व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे उसने एक ऐप डेवलप किया जो वॉयस कमांड के जरिए घर के उपकरणों को नियंत्रित कर सकता था, खासकर उन लोगों के लिए जिनकी शारीरिक गतिशीलता सीमित हो।
धीरे-धीरे, एक दिन, वह चलने लगा। पहले वॉकर के सहारे, फिर बैसाखियों के सहारे। हर कदम एक जंग थी, हर कदम एक जीत। उसकी माँ की आँखों में आँसू थे, पिता का सिर गर्व से ऊँचा था, और आशी की शोर मचाती खुशी से पूरा घर गूँज उठा था।
मंजिल का पहला पड़ाव: वह सर्टिफिकेट
आज, वह डॉक्टर से अपनी आखिरी जाँच के लिए जा रहा था। ड्राइविंग लाइसेंस के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट लेना था। क्लीनिक के अंदर, डॉक्टर मेहरा, जो उसका मुख्य सर्जन रहा था, उसकी रिपोर्ट देखकर मुस्कुराए।
“अमित, तुमने साबित कर दिया कि इंसान की इच्छाशक्ति, मेडिकल रिपोर्ट से बड़ी होती है। ये लो तुम्हारा सर्टिफिकेट। तुम फिट हो।”
उस कागज के छूने का एहसास किसी जीत के पत्र जैसा था। अस्पताल से निकलते हुए, उसने अपनी कार में बैठकर स्टीयरिंग पर हाथ रखे। सालों बाद वह खुद गाड़ी चलाएगा। आजादी का यह एहसास अतुलनीय था।
शुरुआत के उस मोड़ पर वापसी
लेकिन उसकी मंजिल अभी नहीं आई थी। वह सीधा शहर के बाहर बने एक छोटे से संस्थान की तरफ मुड़ा, जहाँ रिया और उसके साथी विकलांगों के लिए प्रौद्योगिकी आधारित समाधानों पर काम करते थे। गेट के बाहर, रिया अपनी व्हीलचेयर पर बैठी उसकी राह देख रही थी। उसने अमित को चलते देखा। उसकी आँखें चमक उठीं।
“तो, डॉक्टर ने तुम्हें दुनिया जीतने की इजाजत दे दी?” रिया ने मुस्कुराते हुए कहा।
“नहीं,” अमित ने कहा, “बस गाड़ी चलाने की। लेकिन मैं एक सवारी शेयर करना चाहता हूँ।”
“कहाँ?”
“वहाँ, जहाँ से मेरी नई शुरुआत हुई थी।”
अमित ने रिया की व्हीलचेयर को कार में रखने में मदद की, और फिर वे उसी पहाड़ी रास्ते पर चल पड़े, जहाँ उसका एक्सीडेंट हुआ था। वह जगह आ चुकी थी। अमित ने कार रोकी। सामने खाई थी, नीचे गहरी घाटी। दो साल पहले यहीं उसकी जिंदगी रुक गई थी।
“मैं यहाँ हर महीने आता हूँ,” अमित ने कहा, अपनी आवाज में गंभीरता के साथ। “खुद को याद दिलाने के लिए कि मैं कहाँ से निकला हूँ।”
रिया ने उसकी तरफ देखा, “और आज क्यों लाए हो मुझे?”
“क्योंकि आज मैंने सर्टिफिकेट लिया। शारीरिक रूप से फिट होने का। लेकिन असली फिटनेस तो यहाँ है,” उसने अपने दिल की तरफ इशारा किया। “और इस फिटनेस में तुम्हारा बहुत बड़ा हाथ है, रिया। तुमने मुझे दिखाया कि अधूरा होना कमजोरी नहीं, बल्कि एक अलग तरह की पूर्णता है।”
एक नया मिशन: ‘अभय’ का सफर
रिया ने उसकी आँखों में देखा। “तो अब क्या करोगे?”
“वही जो हमने सोचा था। ‘अभय’ को आगे बढ़ाऊँगा।” ‘अभय’ उनका वह स्टार्टअप था, जो कम कीमत पर सहायक उपकरण बनाता था। अमित ने अपनी पूरी सेविंग और एक इन्क्यूबेटर से मिली फंडिंग उसमें लगा दी थी।
“तुम्हारा ऐप तो लॉन्च होने वाला है,” रिया बोली।
“हाँ, पर उससे भी बड़ी बात है। मैंने आज सुबह एक मेल भेजा। हमारे पुराने कॉलेज को। मैं वहाँ ‘इन्क्लूसिव टेक्नोलॉजी’ पर एक वर्कशॉप लेने जा रहा हूँ। और तुम मेरी को-ट्रेनर होगी।”
रिया की आँखें चौंधिया गईं। यह वह कदम था जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत थी – सम्मान और स्वीकार्यता, तिरस्कार और दया नहीं।
माफी और मुक्ति
शाम ढल रही थी। अमित ने कार स्टार्ट की। रास्ते में, रिया ने पूछा, “कभी नेहा के बारे में सोचा है?”
अमित ने एक पल को रुककर कहा, “हाँ। लेकिन गुस्से से नहीं। एक तरह की शुक्रगुजारी से। अगर वह मेरे साथ रहती, तो शायद मैं यह सब कभी नहीं कर पाता। मैं उस पर निर्भर होकर रह जाता। उसके जाने ने मुझे तोड़ा जरूर, लेकिन उन टुकड़ों से मैंने खुद को दोबारा गढ़ा। और इस नए अमित में मेरे परिवार की तपन है, मेरी बहन की हंसी है, तुम्हारी दोस्ती है, और… मेरी अपनी जिद है।”
वह कागज जो विश्वास था
वे शहर में वापस आ रहे थे। रोशनियाँ जगमगा रही थीं। अमित ने कार की विंडो नीची की। ताजी हवा ने उसके चेहरे को छुआ। यह वही हवा थी जो दो साल पहले भी थी, वही सड़क थी, वही शहर था। लेकिन वह अमित नहीं था। दुर्घटना ने उसे तोड़ दिया था, लेकिन टूटना ही उसकी कहानी का अंत नहीं था। टूटने के बाद ही तो मोहक कलाकृति बनती है। टुकड़ों को जोड़ने वाली दरारें ही उसे अनोखा बनाती हैं।
उसने रिया को उसके घर छोड़ा। जाते-जाते रिया ने कहा, “अमित, तुम्हारी कहानी बहुतों के लिए प्रेरणा बनेगी।”
अमित मुस्कुराया, “मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई, रिया। यह तो बस दूसरा अध्याय शुरू हुआ है। पहला अध्याय ‘ज़िंदगी ने मौका छीना’ था। यह अध्याय है – ‘ज़िंदगी ने फिर मौका दिया’।”
और वह मौका सिर्फ चलने-फिरने का नहीं था। यह मौका था दूसरों की जिंदगी में रोशनी बनकर चमकने का। उसकी टूटी हुई रीढ़ ने उसे एक नया स्टैंड दिया था – गरिमा, संवेदना और दृढ़ संकल्प का।
अप्रत्याशित समर्थन और नई उड़ान
अगले दिन, जब अमित अपने ऑफिस (अब ‘अभय’ का छोटा सा दफ्तर) पहुँचा, तो उसकी टेबल पर एक लिफाफा पड़ा था। उसके पुराने कंपनी के बॉस का लिखा हुआ। उसमें एक चेक था, और एक नोट – “अमित, तुम्हारी कहानी मैंने सुनी। यह चेक ‘अभय’ के लिए है। और हाँ, अगर तुम्हारा ऐप लॉन्च होता है, तो हमारी कंपनी तुम्हारा पहला क्लाइंट बनना चाहेगी। हमें गर्व है कि तुम हमारे साथ काम कर चुके हो।”
अमित की आँखें नम हो गईं। यह सिर्फ पैसे का नहीं, विश्वास का चेक था। उसने रिया को फोन किया। “हो गया, रिया। हमें सपोर्ट मिल गया।”
“मुझे पता था,” रिया ने कहा, “जब कोई सच्चे मन से उठता है, तो पूरी दुनिया उसे थामने को आगे आ जाती है।”
घर वापसी: जश्न और जिम्मेदारी
शाम को, वह अपने घर लौटा। माँ ने उसके पसंद का राजमा-चावल बनाया था। पिताजी ने चुपचाप उसकी प्लेट में एक और रोटी रख दी। आशी ने एक केक निकाला, जिस पर लिखा था – “मेरे भैया, द विल पावर मैन!”
उस रात, अमित अपनी डायरी में लिख रहा था – “आज मैं फिर से चलना सीख गया। नहीं, सिर्फ पैरों से नहीं। मैंने सपनों से चलना सीखा, विचारों से चलना सीखा, और दूसरों की उम्मीदों का बोझ संभालना सीखा। जिंदगी ने मुझे दोबारा मौका दिया। पहले मैं सिर्फ जी रहा था। अब मैं जीने का कारण ढूंढ चुका हूँ। और कभी-कभी टूटना ही सबसे बड़ा कारण बन जाता है… फिर से जुड़ने का, फिर से शुरू करने का, और इस बार और मजबूती से, और ज्यादा खूबसूरती से चलने का।”
उसने डायरी बंद की, और खिड़की से बाहर देखा। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। उनमें से एक बहुत चमकीला था। शायद वह भी कभी टूटा था, और अब अपनी टूटन से ही जगमगा रहा था। जिंदगी ने फिर मौका दिया था। और इस बार, अमित इसे बर्बाद नहीं होने देगा। वह इसे उन सभी के नाम कर देगा, जो टूट चुके हैं, और समझते हैं कि टूटना ही अंत है। वह उन्हें दिखाएगा कि टूटना तो एक शुरुआत है… नई शुरुआत। जिंदगी की सबसे खूबसूरत शुरुआत।