हल चलाता किसान: मिट्टी और पसीने की कहानी

रामसिंह सुबह चार बजे ही उठ गया। पूर्वी आकाश में अभी तारे झिलमिला रहे थे और ठंडी हवा में खेतों से आती नमी की गंध उसके नथुनों में समा रही थी। उसने चूल्हे पर बची हुई रात की चाय गर्म की और एक घूँट लेकर अपने खेतों की ओर देखा। पांच एकड़ ज़मीन – न तो बहुत ज्यादा, न बहुत कम। बस एक किसान के लिए पर्याप्त, अगर मौसम साथ दे और कीमतें ठीक रहें।

हल चलाता किसान: मिट्टी और पसीने की कहानी
हल चलाता किसान: मिट्टी और पसीने की कहानी

“बाबू, आज दो एकड़ गेहूँ की कटाई पूरी करनी है,” उसने अपने बेटे मोहन से कहा, जो अभी आँखें मलता हुआ बाहर आ रहा था।

“हाँ बाबू, लेकिन ट्रैक्टर वाला कल कह रहा था कि अब दो दिन बाद आएगा। तेल महंगा हो गया है,” मोहन ने जवाब दिया।

रामसिंह ने चुपचाप अपना हल और बैलों की तरफ देखा। आधुनिक उपकरणों की कमी उसे हमेशा खलती थी, लेकिन आज उसे अपने पिता की याद आ गई, जो पूरी ज़िंदगी इन्हीं बैलों के सहारे खेती करते रहे थे।

पुराने दिनों की याद

उसकी यादों में वह बचपन लौट गया जब वह महज दस साल का था और अपने पिता के साथ हल चलाता था। उसके पिता, भगवानसिंह, मजबूत कद-काठी के आदमी थे। उनके हाथों में हल की मूठ इतनी आसानी से घूमती थी जैसे वह कोई कलम हो। रामसिंह को याद आया कि कैसे वह अपने पिता से पूछता था:

“बाबू, हल चलाना इतना कठिन क्यों है?”

उसके पिता मुस्कुराते हुए कहते, “बेटा, हल केवल ज़मीन नहीं जोतता, यह तो किसान की आत्मा को भी जोतता है। हर फ़ुर्रा मिट्टी में नई उम्मीद बोता है।”

वे दिन सरल थे। खेती पारंपरिक तरीकों से होती थी, लेकिन समृद्धि थी। गाँव में सबके अपने-अपने खेत थे, सब एक-दूसरे की मदद करते थे। फसल चक्र नियमित था और प्रकृति के साथ सामंजस्य था।

लेकिन समय बदला। हरित क्रांति आई, नई किस्में आईं, रासायनिक खाद और कीटनाशक आए। शुरू में तो उपज बढ़ी, लेकिन धीरे-धीरे मिट्टी की उर्वरता कम होने लगी। पानी का स्तर नीचे चला गया और खेती की लागत बढ़ती चली गई।

वर्तमान संघर्ष

“बाबू, सोच रहे हो क्या?” मोहन की आवाज़ ने रामसिंह को वर्तमान में लौटा दिया।

“कुछ नहीं बेटा। चलो, काम शुरू करते हैं।”

दोनों बैलों – गोरी और कालू – को जोता गया। रामसिंह ने हल को संभाला और मोहन ने बैलों की रस्सी पकड़ी। हल की नोक जैसे ही मिट्टी में धंसी, एक परिचित खनखनाहट हवा में गूंज उठी। यह आवाज़ रामसिंह के लिए संगीत से कम नहीं थी – मिट्टी और लोहे का मिलन, जो अन्न उगाने का वादा लिए होता था।

सुबह का पहला प्रकाश जैसे ही खेतों पर पड़ा, रामसिंह का चेहरा चमक उठा। उसने देखा कि कैसे हल चलते-चलते मिट्टी के ढेले टूट रहे थे और ज़मीन नरम होती जा रही थी। यह दृश्य उसे हमेशा आश्वस्त करता था कि चाहे दुनिया कितनी भी बदल जाए, कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं।

लेकिन इस शांति के बीच भी, रामसिंह के मन में चिंताओं का तूफान उठ रहा था। कर्ज़ की किश्त देने का समय नज़दीक आ रहा था। पिछले साल ओलावृष्टि ने आधी फसल बर्बाद कर दी थी। बैंक से लिया कर्ज़ अब भार बन गया था। उसकी पत्नी सरस्वती की तबीयत भी ठीक नहीं रहती थी, और शहर के डॉक्टर के पास ले जाने के लिए पैसे की जरूरत थी।

दोपहर का विराम

दोपहर होते-होते रामसिंह और मोहन ने एक एकड़ ज़मीन जोत ली थी। दोनों पेड़ की छाया में बैठकर सरस्वती द्वारा भेजा हुआ दोपहर का खाना खाने लगे।

“बाबू, रितिक ने फोन किया था,” मोहन ने कहा, रामसिंह के छोटे बेटे का नाम लेते हुए जो शहर में इंजीनियरिंग पढ़ रहा था।

“क्या कहा?”

“कह रहा था कि इस बार फीस बढ़ा दी गई है। पच्चीस हज़ार और चाहिए।”

रामसिंह ने चुपचाप अपना सिर हिलाया। उसके लिए यह कोई नई बात नहीं थी। उसने अपने तीनों बच्चों को पढ़ाया-लिखाया था। बड़ी बेटी सुमन की शादी हो चुकी थी, मोहन खेती में हाथ बंटाता था, और रितिक उनकी आखिरी उम्मीद था – जो शहर जाकर अच्छी नौकरी करेगा और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारेगा।

“ठीक है, देखते हैं,” रामसिंह ने कहा, हालांकि वह जानता था कि इतने पैसे जुटाना आसान नहीं होगा।

समाधान की तलाश

खाना खत्म करके जब रामसिंह अकेला बैठा था, तो उसके पड़ोसी सुखराम आ गए। सुखराम उम्र में रामसिंह से कुछ छोटे थे और आधुनिक खेती के तौर-तरीकों के प्रति ज्यादा खुले थे।

“कैसे चल रहा है रामसिंह भाई?” सुखराम ने पूछा।

“वही दिन-रात एक किए जा रहा हूँ। तुम सही कहते थे सुखराम, ट्रैक्टर ले लेना चाहिए था। इस हल से कब तक चलेंगे?”

सुखराम ने गंभीर होकर कहा, “भाई, मैं एक बात कहना चाहता हूँ। कल मैं शहर गया था और वहाँ एक सहकारी समिति के बारे में पता चला। वे किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। प्रशिक्षण भी देते हैं और उपज की खरीद की गारंटी भी।”

रामसिंह ने उत्सुकता से सुखराम की ओर देखा। “लेकिन जैविक खेती में तो शुरू में उपज कम होती है। और कीटनाशक न डालने से फसल खराब भी हो सकती है।”

“हाँ, शुरू के दो साल कठिन होंगे,” सुखराम ने स्वीकार किया। “लेकिन उसके बाद मिट्टी की सेहत सुधरने लगेगी। और आजकल लोग जैविक उत्पादों के लिए अच्छी कीमत देने को तैयार हैं। मैंने सोचा है कि अगले सीज़न से अपने दो एकड़ में जैविक खेती शुरू करूंगा। तुम भी सोचो, हम मिलकर शुरू कर सकते हैं।”

यह विचार रामसिंह के मन में घर कर गया। वर्षों से वह रासायनिक खाद और कीटनाशकों के चक्रव्यूह में फंसा हुआ था। हर साल लागत बढ़ती जाती थी, लेकिन मुनाफ़ा नहीं बढ़ता था। शायद यही रास्ता था आगे बढ़ने का।

शाम की थकान और आशा

शाम ढलते-ढलते रामसिंह थककर चूर हो गया था। पूरे दिन हल चलाने से उसकी पीठ में दर्द था और हाथों में छाले पड़ गए थे। लेकिन जब वह खेत से लौटा और पीछे मुड़कर देखा, तो उसके चेहरे पर संतुष्टि की मुस्कान थी। दिनभर की मेहनत से एक एकड़ ज़मीन तैयार हो गई थी। कल वह बीज बोएगा, और कुछ महीनों बाद यही ज़मीन सोने जैसा अन्न देगी।

घर लौटकर उसने सरस्वती को सुखराम की बात बताई। सरस्वती, जो हमेशा से पारंपरिक तरीकों की हिमायती रही थी, ने पूछा: “लेकिन अगर शुरू में नुकसान हुआ तो? रितिक की फीस का क्या होगा?”

रामसिंह ने गहरी सांस ली। “सरस्वती, हम तीस साल से वही कर रहे हैं जो दूसरे करते आए हैं। नतीजा यह है कि हम कर्ज़ में डूबे हुए हैं और मिट्टी की सेहत खराब होती जा रही है। शायद अब कुछ नया करने का समय आ गया है।”

उस रात रामसिंह को नींद नहीं आई। वह बार-बार अपने पिता के शब्दों को याद कर रहा था: “हल केवल ज़मीन नहीं जोतता, यह तो किसान की आत्मा को भी जोतता है।”

क्या उसने अपनी आत्मा को जोता था? क्या वह परिवर्तन के लिए तैयार था?

निर्णय का दिन

अगले दिन सुबह, रामसिंह ने सुखराम को बुलाया। “मैं तुम्हारे साथ हूँ। लेकिन पहले मुझे इस जैविक खेती के बारे में और जानना होगा।”

सुखराम खुश हो गया। “बिल्कुल भाई! कल ही शहर जा रहा हूँ उस सहकारी समिति से मिलने। तुम भी चलो।”

दो दिन बाद, रामसिंह और सुखराम शहर की सहकारी समिति के कार्यालय में बैठे थे। वहाँ एक युवा कृषि वैज्ञानिक ने उन्हें जैविक खेती के बारे में विस्तार से समझाया।

“जैविक खेती सिर्फ खेती का तरीका नहीं है, यह जीवन का दर्शन है,” युवा वैज्ञानिक ने कहा। “इसमें प्रकृति के साथ सहयोग करना होता है, उस पर हावी होने की कोशिश नहीं करनी होती। शुरू में चुनौतियाँ आएंगी, लेकिन दीर्घकाल में यह टिकाऊ और लाभदायक है।”

उसने उन्हें सरकारी योजनाओं के बारे में भी बताया जिसमें जैविक खेती अपनाने वाले किसानों को वित्तीय सहायता दी जाती थी। साथ ही, समिति उनकी उपज बाजार तक पहुँचाने में मदद करेगी।

रामसिंह के मन में आशा की किरण जगी। शायद यही वह रास्ता था जिसकी उसे तलाश थी।

परिवर्तन की शुरुआत

गाँव लौटकर रामसिंह ने अपने दो एकड़ खेत को जैविक खेती के लिए चुना। पहला कदम था मिट्टी की सेहत सुधारना। उसने और मोहन ने गोबर की खाद तैयार की, वर्मीकम्पोस्ट बनाना सीखा, और फसल चक्र की योजना बनाई।

गाँव के कई लोगों ने उसका मजाक उड़ाया। “अरे रामसिंह, तुम्हें लगता है बिना कीटनाशक के फसल बच पाएगी?” एक पड़ोसी ने कहा।

“हम देखेंगे,” रामसिंह ने विनम्रता से जवाब दिया।

पहले सीज़न में चुनौतियाँ आईं। कीटों का प्रकोप हुआ और उपज पारंपरिक खेती की तुलना में कम हुई। लेकिन सहकारी समिति ने उनकी उपज को प्रीमियम दर पर खरीदा, जिससे नुकसान कम हुआ।

दूसरे साल, मिट्टी की सेहत में सुधार दिखने लगा। जैविक तरीकों से उगाई गई सब्जियों की मांग बढ़ी। रामसिंह और सुखराम ने मिलकर अन्य किसानों को भी प्रेरित किया और एक छोटा समूह बनाया।

नई दिशा

तीन साल बीत गए। रामसिंह का वह दो एकड़ खेत अब जैविक खेती का मॉडल बन चुका था। उपज पहले से कम थी, लेकिन लागत कम होने और बेहतर मूल्य मिलने से मुनाफ़ा बढ़ गया था। कर्ज़ चुकता हो चुका था और रितिक की पढ़ाई भी पूरी हो गई थी।

एक दिन, रितिक शहर से गाँव लौटा। “बाबू, मुझे शहर में नौकरी मिल गई है, लेकिन मैं यहाँ रहकर आपकी मदद करना चाहता हूँ,” उसने कहा।

रामसिंह हैरान रह गया। “लेकिन तुमने तो इंजीनियरिंग की है। तुम गाँव में क्या करोगे?”

“बाबू, मैंने अपनी थीसिस ‘जैविक खेती में प्रौद्योगिकी का उपयोग’ पर लिखी है। मैं चाहता हूँ कि हम अपने जैविक उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री शुरू करें। मैं एक वेबसाइट बना सकता हूँ और सोशल मीडिया के जरिए हमारे उत्पादों को प्रमोट कर सकता हूँ।”

रामसिंह की आँखों में आँसू आ गए। उसे लगा जैसे उसकी मेहनत रंग लाई है। न सिर्फ आर्थिक स्थिति सुधरी थी, बल्कि अगली पीढ़ी भी खेती से जुड़ रही थी।

विरासत और भविष्य

आज रामसिंह अभी भी सुबह चार बजे उठता है। अब उसके पास ट्रैक्टर है, लेकिन वह अभी भी कभी-कभी बैलों के साथ हल चलाता है। उसके लिए, हल चलाना सिर्फ खेत जोतना नहीं है, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहना है।

उसने मोहन और रितिक को बुलाया। “देखो बेटों, यह हल तुम्हारे दादा ने मुझे दिया था। यह सिर्फ एक उपकरण नहीं है, यह हमारी विरासत है। मैं चाहता हूँ कि तुम दोनों इसे संभाल कर रखो।”

मोहन ने हल को हाथ में लिया। “बाबू, हम इसे संग्रहालय में नहीं रखेंगे। हम इससे खेती करेंगे, लेकिन नए तरीकों से।”

रितिक ने कहा, “हाँ बाबू, हम जैविक खेती को आधुनिक तकनीक से जोड़ेंगे। हम ड्रोन से खेतों की निगरानी करेंगे, सेंसर लगाएंगे, और ऑनलाइन मार्केटिंग करेंगे। लेकिन हमारी जड़ें इसी मिट्टी में रहेंगी।”

रामसिंह मुस्कुराया। उसे एहसास हुआ कि खेती का भविष्य सुरक्षित है। परिवर्तन आवश्यक है, लेकिन संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। पुराने और नए का सही मेल ही सफलता की कुंजी है।

निष्कर्ष

आज रामसिंह का गाँव जैविक खेती के लिए मॉडल बन गया है। दूर-दूर से लोग उनकी खेती देखने आते हैं। उसका संघर्ष, उसकी हिम्मत और उसकी सफलता ने साबित कर दिया कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का मेल ही टिकाऊ विकास का रास्ता है।

हल चलाता किसान अब सिर्फ ज़मीन नहीं जोतता, वह भविष्य की नींव रखता है। रामसिंह की कहानी हर उस किसान की कहानी है जो मिट्टी से प्यार करता है, जो चुनौतियों से नहीं घबराता, और जो बदलाव को गले लगाने का साहस रखता है।

जब वह हल चलाता है, तो न सिर्फ मिट्टी उलटती है, बल्कि एक नई शुरुआत, नई आशा और नई दिशा भी तय करता है। और शायद यही तो है हल चलाने का असली मतलब – निरंतर बदलाव, निरंतर विकास, और निरंतर आशा।

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