लालटेन की रोशनी: एक भुला दी गई दुनिया

गाँव के उस छोर पर बूढ़े गुरुजी का कच्चा मकान था, जिसकी देहरी पर हमेशा एक पुरानी लालटेन टँगी रहती। उसकी मद्धम पीली रोशनी न सिर्फ रास्ता दिखाती, बल्कि समय के एक पूरे दौर की कहानी कहती।

लालटेन की रोशनी

वो दिन जब लालटेन राज करती थी

मेरे बचपन की शामें लालटेन की रोशनी में ही ढलती थीं। दादाजी कहते, “बेटा, जब हम बच्चे थे, तो लालटेन ही हमारा सूरज था।”

हर शाम की रस्म एक जैसी होती:

  1. शाम ढलते ही दादी लालटेन साफ करतीं
  2. मैं माचिस लाता
  3. दादाजी बाती ट्रिम करते
  4. फिर वो पल आता – “चटाक” और लालटेन जल उठती

उस नारंगी रोशनी में सब कुछ जादुई लगता:

  • किताब के पन्ने सुनहरे हो जाते
  • दीवार पर हमारी छायाएँ नाचतीं
  • बाहर अँधेरा घना, पर घर में उजाला

लालटेन के इर्द-गिर्द जुड़ी यादें

सर्दियों की रातें:
हम सब एक कम्बल में सिमटकर बैठते। दादाजी रामायण की कहानी सुनाते। लालटेन की लौ हवा में थिरकती, और कहानी के साथ हमारी कल्पना भी उड़ान भरती।

बारिश के दिन:
बिजली चली जाती, पर हमारी लालटेन जगमगाती रहती। टप-टप की आवाज के साथ लौ का नाच – मानो प्रकृति और मानव का मिलन।

दिवाली की तैयारी:
लालटेन को नहलाया जाता, काँच चमकाया जाता। नए कपड़े की बाती काटी जाती। और फिर दीयों के साथ लालटेन भी जलाई जाती।

तकनीक की चुभती रोशनी

फिर एक दिन बिजली पहुँची गाँव में। पहला बल्ब जला तो सब हैरान:
“अरे वाह! इतना तेज उजाला!”
“और झुकाना नहीं पड़ता!”
“हवा से बुझती भी नहीं!”

धीरे-धीरे लालटेन को कोने में धकेल दिया गया। वह अब केवल बिजली जाने पर याद आती।

एक दिन मैंने दादाजी से पूछा, “अब तो बिजली है, फिर भी आप लालटेन क्यों जलाते हैं?”

उन्होंने गहरी साँस लेकर कहा, “बेटा, बल्ब सिर्फ रोशनी देता है। लालटेन जीवन देती है। उसकी गर्मी, उसका नाच, उसकी आवाज़… ये सब मिलकर एक जीवित प्राणी जैसा अनुभव देते हैं।”

लुप्त होती एक दुनिया

समय बीता। दादाजी चले गए। उनकी लालटेन अब केवल कोने में धूल खा रही थी। एक दिन माँ ने कहा, “यह पुरानी चीज़ फेंक दो।”

मैंने लालटेन उठाई। उस पर समय के निशान थे:

  • काँच पर धुँधलापन
  • धातु पर जंग के निशान
  • हैंडल पर दादाजी के हाथों के छाप

मैंने उसे साफ किया, नई बाती डाली, तेल डाला और जलाई।

वही नारंगी रोशनी… वही नरम चमक… मानो दादाजी की यादों ने जीवन पा लिया हो।

नई पहचान, पुरानी विरासत

आज मेरे शहर के फ्लैट में वही लालटेन मेरी स्टडी टेबल पर है। जब भी मैं थक जाता हूँ, तब उसे जला लेता हूँ। उसकी रोशनी में:

  • लैपटॉप की चुभन नहीं होती
  • मोबाइल की नीली रोशनी नहीं चुभती
  • सिर्फ शांति होती है, स्मृतियाँ होती हैं

मेरे बच्चे पूछते हैं, “पापा, यह अजीब लाइट क्या है?”
मैं कहता हूँ, “यह कोई लाइट नहीं, यह तुम्हारे परदादा की कहानी है।”

और फिर शुरू होती है कहानी की शाम…

लालटेन से जुड़ी जीवन की सीखें

  1. धीमी रोशनी में देखो जीवन को:
    आज की तेज़ दुनिया में लालटेन हमें याद दिलाती है कि कभी धीमे चलना भी ज़रूरी है।
  2. नाजुकता में भी ताकत:
    काँच सा नाजुक, पर अँधेरे को चीरने की ताकत।
  3. संसाधनों का सम्मान:
    लालटेन हमें सिखाती है कि हर बूँद तेल कीमती है, हर लौ का सम्मान करो।
  4. एकता की गर्मी:
    लालटेन के इर्द-गिर्द जुड़ा परिवार आज भी याद आता है।

आधुनिक संदर्भ में लालटेन

आज लालटेन सिर्फ प्रकाश का साधन नहीं, बल्कि बहुत कुछ है:

  • विरासत का प्रतीक: पुरानी यादों की संवाहक
  • सस्टेनेबल लिविंग: ऊर्जा संरक्षण की मिसाल
  • मेडिटेशन टूल: शांति और ध्यान का साधन
  • आर्ट पीस: घर की सजावट का हिस्सा

विडंबना और आशा

आज बिजली के हज़ार बल्ब जलते हैं, पर घर उजाले से खाली लगते हैं। वहीं एक लालटेन की मद्धम रोशनी पूरे घर को भर देती है – शायद इसलिए कि वह दिल से जलती है।

हर साल दिवाली पर, जब हज़ारों लाइटें जलती हैं, मैं अपनी लालटेन भी जलाता हूँ। मेरे पड़ोसी पूछते हैं, “यह क्या पुराना फैशन?”

मैं मुस्कुराकर कहता हूँ, “नहीं, यह नया नज़रिया है पुरानी यादों को देखने का।”

समापन: रोशनी जो कभी नहीं बुझेगी

आज मैं अपने बच्चों को सिखाता हूँ:
“तुम्हारे फोन की रोशनी बिजली से आती है, पर लालटेन की रोशनी प्यार से आती है।”

वो लालटेन अब भी हर शाम जलती है। न सिर्फ तेल से, बल्कि:

  • दादाजी की यादों से
  • गाँव की स्मृतियों से
  • सादगी भरे जीवन से
  • और उस सच्चाई से कि कभी-कभी पीछे मुड़कर देखना भी आगे बढ़ने जितना ज़रूरी है।

लालटेन की वो रोशनी शायद कभी नहीं बुझेगी। क्योंकि जो रोशनी दिल से जले, उसे हवा भी नहीं बुझा सकती। वह तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी जलती रहेगी – एक विरासत की लौ की तरह, एक सभ्यता की याद की तरह, और एक सच्चाई की तरह कि असली उजाला वही है जो अँधेरे को डराए नहीं, बल्कि उसे अपने साथ नचाए।

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