शहर के एक कोने में बसा वह पुराना मकान नंबर 47, जिसकी खिड़कियाँ सालों से बंद पड़ी थीं। उस मकान में अकेले रहते थे रमेश शर्मा, सत्तर साल के वो बुजुर्ग जिनके चेहरे पर मुस्कान तब आती थी जब वो पुराने एल्बम के पन्ने पलटते।
रमेश जी का परिवार बड़ा था। पत्नी सरोज, दो बेटे और एक बेटी। घर में हमेशा हँसी-ठिठोली, बच्चों की किलकारियाँ गूँजतीं। दिवाली पर पटाखों की आवाज़, होली पर रंगों की छटा, बसंत पर घर की महकाई गुझिया।

पर समय ने धीरे-धीरे सब कुछ बदल दिया।
बेटे बड़े हुए, नौकरी के सिलसिले में विदेश चले गए। बेटी की शादी दूसरे शहर में हो गई। पाँच साल पहले सरोज का निधन हो गया दिल के दौरे से। और फिर शुरू हुआ रमेश जी का अकेलेपन का सफर।
एक दिन की कहानी
सुबह 5:30 – आँख खुलती है। घड़ी की टिक-टिक के अलावा कोई आवाज़ नहीं। पुरानी कुर्सी पर बैठकर चाय बनाने की सोचते हैं, फिर याद आता है – अब चाय पीने वाला कोई नहीं।
सुबह 7:00 – अखबार आता है। पूरा अखबार पढ़ डालते हैं, खबरें याद रह जाती हैं, पर बताने वाला कोई नहीं।
दोपहर 1:00 – खाना बनाते हैं सिर्फ अपने लिए। एक थाली, एक कटोरा। पहले चार थालियाँ लगती थीं।
शाम 4:00 – पार्क में टहलने जाते हैं। बच्चों को खेलते देखकर मन हुआ कि किसी से बात कर लें, पर सब अपनी दुनिया में मगन।
रात 8:00 – टीवी चालू करते हैं। सीरियल चल रहा है पर ध्यान नहीं। फोन की तरफ देखते रहते हैं, शायद कोई कॉल आ जाए।
रात 10:00 – बिस्तर पर लेटकर छत देखते रहते हैं। सोचते हैं – क्या ज़िंदगी सिर्फ यादों में जीने के लिए होती है?
यादों के सहारे
रविवार की सुबह, रमेश जी ने अटारी से पुराना सूटकेस निकाला। उसमें संजोकर रखी थीं यादें:
- शादी की तस्वीर – 1965, जब सरोज लाल साड़ी में चाँद सी खिली थी।
- बेटे का पहला साइकिल चलाने का वीडियो (VHS पर)।
- बेटी की पहली कविता जो उसने स्कूल में लिखी थी।
- पोते-पोतियों के हाथ के बनाए कार्ड।
एक पुराना रेडियो भी था जिसमें अभी भी बिना बैटरी के चलने की आदत थी। रमेश जी ने उसे ठोंक-ठोंककर चालू किया। 60s के गाने बजने लगे। “ऐ मेरे दिल, कहीं और चल…”
अचानक आँखों से आँसू बह निकले। गाना वही था जो सरोज को सबसे प्रिय था।
मोड़ की शुरुआत
एक दिन अखबार में एक छोटा सा विज्ञापन देखा: “वृद्धाश्रम नहीं, वरिष्ठ नागरिक मिलन केंद्र – आइए, मिलिए, बातें कीजिए।”
पहले तो मन नहीं माना। फिर सोचा – “क्या हुआ अगर एक बार चला जाऊँ?”
अगले दिन, झिझकते हुए, वह उस पते पर पहुँचे। एक छोटा सा हॉल था जहाँ दस-बारह बुजुर्ग बैठे थे। कुछ शतरंज खेल रहे थे, कुछ बातचीत में मगन।
एक सज्जन ने पूछा, “पहली बार आए हैं?”
“हाँ,” रमेश जी ने संकोच से कहा।
“कोई बात नहीं, हम सब यहाँ पहली बार में ऐसे ही आए थे। बैठिए, चाय आती है।”
नई शुरुआत
धीरे-धीरे रमेश जी वहाँ जाने लगे। उन्हें पता चला कि वहाँ हर कोई किसी न किसी अकेलेपन से जूझ रहा है:
- मिस्टर गुप्ता जिनके बच्चे कनाडा में हैं
- श्रीमती देशपांडे जो विधवा हैं
- मिस्टर खान जिनकी पत्नी अल्जाइमर से पीड़ित हैं
एक दिन केंद्र के इंचार्ज ने सुझाव दिया: “रमेश जी, आप तो अच्छी कहानियाँ सुनाते हैं, क्यों न आप बच्चों के लिए स्टोरी टेलिंग सेशन लें?”
पहले तो हँसी आई। फिर सोचा – “क्यों नहीं?”
बदलाव की बयार
स्थानीय स्कूल के साथ मिलकर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। हर शुक्रवार को, बुजुर्ग स्कूल जाते और बच्चों को कहानियाँ सुनाते।
पहले दिन जब रमेश जी कक्षा में गए, तो बीस बच्चों की चमकती आँखें उनकी तरफ देख रही थीं।
“बच्चों, आज मैं तुम्हें राजा-रानी की नहीं, अपने बचपन की कहानी सुनाऊँगा। जब हम लोग पेड़ों पर चढ़कर आम तोड़ते थे…”
बच्चों ने उन्हें ध्यान से सुना। कहानी खत्म होने पर तालियों की गड़गड़ाहट।
एक बच्चे ने पूछा, “दादाजी, आप कल फिर आएँगे?”
उस “दादाजी” शब्द ने रमेश जी के अकेलेपन के किले में पहला दरवाजा खोल दिया।
पुनर्मिलन
एक दिन रमेश जी के बेटे का फोन आया। “पापा, हम अगले महीने भारत आ रहे हैं।”
“कितने दिन रुकोगे?” रमेश जी ने पूछा।
“दो हफ्ते। और पापा… हम सोच रहे हैं कि आप भी कुछ महीने हमारे साथ अमेरिका चलें।”
पहले तो रमेश जी ने मना किया। फिर सोचा – “शायद यही सही समय है।”
पर जब वह अमेरिका पहुँचे, तो पाया कि वहाँ भी अकेलापन ही इंतजार कर रहा था। बेटा-बहू दिनभर ऑफिस, पोते-पोतियाँ स्कूल। बड़े शहर का अपनापन नहीं।
एक दिन स्काइप पर उन्होंने अपने मित्रों से बात की जो मिलन केंद्र जाते थे।
“रमेश जी, जल्दी लौट आइए। बच्चे आपकी कहानियों का इंतजार कर रहे हैं।”
वापसी और नई पहचान
तीन महीने बाद रमेश जी भारत लौट आए। उन्हें एहसास हुआ कि अकेलापन सिर्फ शारीरिक नहीं, मानसिक भी होता है। और उसका इलाज दूसरों के साथ जुड़कर ही संभव है।
अब रमेश जी की दिनचर्या बदल गई:
सुबह 7:00 – पार्क में योगा क्लास (दूसरे बुजुर्गों के साथ)
सुबह 10:00 – मिलन केंद्र में गपशप
दोपहर 2:00 – स्कूल में स्टोरी टेलिंग
शाम 5:00 – लाइब्रेरी में पढ़ना
रात 8:00 – फोन पर बच्चों से बात
गहरी सीख
एक शाम, मिलन केंद्र में चर्चा हो रही थी अकेलेपन पर। रमेश जी ने कहा:
“मैंने सीखा है कि अकेलापन कोई श्राप नहीं है। यह तो एक चुनौती है जो हमें नए रिश्ते बनाने के लिए प्रेरित करती है।”
“परिवार दूर चला गया तो क्या हुआ, नए परिवार तो हम खुद बना सकते हैं।”
एक और बुजुर्ग महिला ने कहा, “सही कहा रमेश जी। हमारे पास इतने सालों का अनुभव है, इतनी कहानियाँ हैं। इन्हें साझा करने से ही तो हमारा अस्तित्व बचा रहेगा।”
आज के दिन
आज रमेश जी अकेले नहीं हैं। उनके पास एक विस्तृत परिवार है:
- मिलन केंद्र के 15 दोस्त
- स्कूल के 50 बच्चे जो उन्हें “स्टोरी वाले दादा” कहते हैं
- पड़ोस के युवा जो उनसे सलाह लेते हैं
- ऑनलाइन ग्रुप जहाँ वह रोज़ाना बातचीत करते हैं
हाँ, अभी भी कभी-कभी वह पुराने एल्बम देखकर भावुक हो जाते हैं। पर अब उन आँसुओं में केवल दर्द नहीं, कृतज्ञता भी होती है – उन यादों के लिए जो उनके पास हैं।
अकेलेपन पर विचार
इस कहानी से हमें कई सबक मिलते हैं:
- अकेलापन अपरिहार्य है, पर अस्थाई नहीं – हर उम्र में रिश्ते बनाए जा सकते हैं।
- देना ही सबसे बड़ा लेना है – रमेश जी ने जब बच्चों को देना शुरू किया, तो उन्हें खुद भी मिल गया।
- तकनीक का सदुपयोग – वीडियो कॉल, सोशल मीडिया ने दूरियाँ कम कीं।
- समाज की जिम्मेदारी – वृद्धाश्रम नहीं, बुजुर्गों को समाज में सम्मानजनक स्थान चाहिए।
रमेश जी की कहानी हमें याद दिलाती है कि अकेलापन तब तक नहीं टिकता जब तक हम दूसरों से जुड़ने का प्रयास करते रहें। हर उम्र में, हर हाल में, मानवीय संबंध ही वह धागा है जो हमें जीवन से बाँधे रखता है।
आज भी जब रमेश जी शाम को अपने कमरे में लौटते हैं, तो वहाँ सन्नाटा होता है, पर अब वह सन्नाटा डरावना नहीं लगता। क्योंकि अगली सुबह फिर नए दिन, नई मुलाकातों और नई कहानियों का इंतजार होता है।
क्योंकि जीवन अकेले जीने के लिए नहीं, बल्कि अपने अकेलेपन को दूसरों के साथ बाँटने के लिए होता है।