बैलगाड़ी का सफर

बैलगाड़ी की पुरानी चरचराहट जंगल की सन्नाटे को चीर रही थी। बसंत सिंह गाड़ी के आगे वाले हिस्से में बैठा अपने बैलों को हाँक रहा था। उसकी उम्र साठ साल के आसपास थी, पर उसके हाथों में वही मजबूती थी जो तीस साल पहले हुआ करती थी जब वह पहली बार इसी रास्ते से गुजरा था।

बैलगाड़ी का सफर

“हट्ठे-हट्ठे रामा, चलो भैया!” बसंत सिंह ने बैलों को आवाज़ दी।

रामा और श्यामा नाम के दोनों बैलों ने अपनी गर्दन हिलाई और गाड़ी को धीरे-धीरे आगे खींचने लगे। गाड़ी में बसंत सिंह का सामान भरा था – कुछ अनाज के बोरे, कुछ बर्तन, और एक पुरानी तिजोरी जिसमें उसकी जिंदगी की सारी यादें सिमटी हुई थीं।

वह अपने गाँव छोड़कर जा रहा था। तीस साल बाद। उसका गाँव अब वैसा नहीं रहा था। नई पीढ़ी ने शहरों की ओर पलायन कर लिया था। खेत सूखे पड़े थे। कुएँ सूख चुके थे। और बसंत सिंह की पत्नी का देहांत पिछले महीने ही हुआ था।

“बाबूजी, कितनी दूर है अभी?” गाड़ी के पीछे से आवाज़ आई।

बसंत सिंह ने मुड़कर देखा। रोहित, उसका पोता, गाड़ी में लदे सामान पर बैठा था। वह बारह साल का था और शहर में पला-बढ़ा था। उसके दादा के साथ इस सफर पर आने के लिए उसने जिद की थी।

“अभी तो बहुत दूर है बेटा,” बसंत सिंह ने कहा। “यह बैलगाड़ी का सफर है, कार का नहीं। यह धीरे-धीरे चलती है, हर पेड़ को नमस्कार करते हुए, हर पक्षी से बात करते हुए।”

रोहित ने आसपास देखा। घना जंगल था, और रास्ता इतना संकरा कि कार तो क्या, साइकिल तक नहीं आ सकती थी। यह पुराना रास्ता था जो उसके दादा के समय में गाँवों को जोड़ता था। अब इसे सिर्फ बैलगाड़ियाँ ही इस्तेमाल करती थीं।

“पर दादाजी, आप शहर क्यों नहीं चले गए? पापा तो बार-बार बुलाते हैं,” रोहित ने पूछा।

बसंत सिंह ने गहरी सांस ली। “शहर… वह तो पिंजरा है बेटा। यह जंगल, यह आसमान, यह हवा… यही तो आज़ादी है।”

गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। रास्ते के दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे। कहीं-कहीं से सूरज की किरणें ज़मीन पर पहुँच रही थीं, जैसे स्वर्ग से उतरते सोने के तार। हवा में पक्षियों का कलरव था।

“देखो रोहित,” बसंत सिंह ने एक पेड़ की ओर इशारा किया, “यह बरगद का पेड़ मैंने तीस साल पहले लगाया था। देखो कितना बड़ा हो गया है!”

रोहित ने देखा तो सचमुच विशाल बरगद का पेड़ था, जिसकी शाखाएँ चारों ओर फैली हुई थीं। गाड़ी रुकी और दोनों उतरे।

“यहाँ एक कुआँ भी था,” बसंत सिंह ने कहा, पर अब वहाँ सिर्फ पत्थरों का ढेर था।

“दादाजी, आप इस रास्ते से पहले कब आए थे?” रोहित ने पूछा।

बसंत सिंह पेड़ के नीचे बैठ गया। “बहुत पहले, जब मैं तुम्हारे उम्र का था। उस समय मैं अपने पिता के साथ इसी रास्ते से गुजरा था। हम अनाज बेचने जा रहे थे।”

“क्या आपके पिताजी भी बैलगाड़ी चलाते थे?”

“हाँ, और मैं उनके साथ बैठा रहता था। वे मुझे पेड़ों के नाम सिखाते थे, पक्षियों की पहचान कराते थे। यह रास्ता तब जीवंत हुआ करता था। हर मील पर एक गाँव होता था, हर गाँव में कुआँ होता था, और हर कुएँ पर महिलाएँ पानी भरती मिलती थीं।”

रोहित ने कल्पना करने की कोशिश की, पर वह सब खो चुका था। अब तो सिर्फ जंगल था और खंडहर।

दोनों फिर से गाड़ी पर चढ़े और आगे बढ़े। दोपहर होने को आई थी। बसंत सिंह ने एक छायादार जगह देखी और गाड़ी रोक दी।

“यहीं दोपहर का भोजन करेंगे,” उसने कहा।

रोहित ने गाड़ी से टिफिन निकाला। बसंत सिंह ने बैलों को खुला किया और उन्हें पास के तालाब पर पानी पीने ले गया। तालाब भी सूखा हुआ था, पर कुछ पानी बचा था।

“यह तालाब भी मेरे पिता के समय में बना था,” बसंत सिंह ने कहा। “गाँव वालों ने मिलकर खोदा था ताकि यात्रियों को पानी की कमी न हो।”

“पर अब कोई यात्री नहीं आता,” रोहित ने कहा।

“हाँ… सब कुछ बदल गया है।”

दोपहर का भोजन करते समय बसंत सिंह ने रोहित को अपने बचपन की कहानियाँ सुनाईं। वह कैसे इसी रास्ते पर अपने पिता के साथ चलता था, कैसे रात में आग जलाकर सोते थे, कैसे जंगली जानवरों की आवाज़ें सुनकर डर जाते थे।

“एक बार तो हमें एक शेर मिल गया था,” बसंत सिंह ने कहा।

“सचमुच?” रोहित की आँखें बड़ी हो गईं।

“हाँ, पर शेर ने हमें कुछ नहीं किया। वह बस देखता रहा और चला गया। मेरे पिता ने कहा था कि अगर तुम डरोगे नहीं, तो जानवर भी नुकसान नहीं पहुँचाते।”

भोजन के बाद फिर से सफर शुरू हुआ। शाम ढलने लगी थी। बसंत सिंह ने एक सुरक्षित जगह देखी जहाँ रात बिता सकते थे। यह एक पुराने मंदिर का प्रांगण था, अब खंडहर हो चुका था।

“यहाँ रुकेंगे,” बसंत सिंह ने कहा। “रात में जंगल में चलना ठीक नहीं।”

उन्होंने गाड़ी खोली और बैलों को पेड़ से बाँध दिया। रोहित ने लकड़ियाँ इकट्ठी कीं और बसंत सिंह ने आग जलाई। आग की लपटों ने अंधेरे को दूर भगा दिया।

“दादाजी, आप कहाँ जा रहे हैं?” रोहित ने पूछा। “मतलब, इस सफर का अंत कहाँ है?”

बसंत सिंह ने आग में देखा। “मैं एक ऐसे गाँव जा रहा हूँ जहाँ मेरी बहन रहती है। वह मुझसे दस साल छोटी है। उससे तीस साल से मिला नहीं हूँ।”

“तीस साल? इतने लंबे समय तक आपने उनसे मुलाकात क्यों नहीं की?”

“जिंदगी बीत गई बेटा। पहले खेती, फिर बच्चों की परवरिश, फिर बूढ़ापा… समय कहाँ मिला?”

रात गहराई। आसमान में तारे चमकने लगे। रोहित ने इतने सारे तारे कभी नहीं देखे थे। शहर की रोशनी में तो दो-चार ही दिखाई देते थे।

“देखो,” बसंत सिंह ने आसमान की ओर इशारा किया, “वह सप्तऋषि है, और वह ध्रुव तारा। उसकी दिशा में हमेशा उत्तर होता है। पुराने समय में यात्री इसी से रास्ता ढूँढते थे।”

“आपको सब कुछ आता है दादाजी,” रोहित ने कहा।

“यह सब मेरे पिता ने सिखाया था। वे कहते थे कि प्रकृति ही सबसे बड़ा शिक्षक है।”

थोड़ी देर बाद दोनों सोने चले गए। पर रात में रोहित की आँख खुल गई। उसे कुछ आवाज़ सुनाई दी। वह डर गया। फिर उसने देखा कि बसंत सिंह जाग रहा है और आग के पास बैठा है।

“दादाजी, आप सो क्यों नहीं रहे?”

“बूढ़े लोगों को कम नींद आती है बेटा,” बसंत सिंह ने कहा। “और फिर… इस रास्ते पर आखिरी बार चल रहा हूँ। हर पल को महसूस करना चाहता हूँ।”

“आखिरी बार? क्यों?”

“क्योंकि मैं वापस नहीं आऊँगा। मेरी बहन के गाँव में ही रह जाऊँगा। और फिर… मेरी उम्र हो गई है।”

रोहित चुप हो गया। उसे एहसास हुआ कि उसके दादा ने अपना घर छोड़ दिया था, अपना गाँव छोड़ दिया था, और अब यह आखिरी सफर था।

“पर दादाजी, आप अकेले क्यों जा रहे हैं? पापा आपको लेने आ सकते थे।”

“नहीं बेटा, यह सफर मुझे अकेले ही तय करना था। जिस तरह से शुरू किया था, उसी तरह खत्म करना चाहता हूँ।”

रोहित समझ नहीं पाया, पर उसने सवाल नहीं किया। वह फिर सो गया।

सुबह होते ही सफर फिर शुरू हुआ। आज का रास्ता और भी कठिन था। पहाड़ी इलाका शुरू हो गया था। बैलों को जोर लगाना पड़ रहा था।

“हट्ठे रामा, हट्ठे श्यामा, चलो भैया, थोड़ी और दूर,” बसंत सिंह ने बैलों को प्रोत्साहित किया।

दोपहर तक वे एक ऊँची पहाड़ी पर पहुँच गए। ऊपर से नीचे का नज़ारा अद्भुत था। हरियाली फैली हुई थी, और दूर एक नदी चमक रही थी।

“वह देखो, वही नदी है जिसके पार मेरी बहन का गाँव है,” बसंत सिंह ने कहा।

“पर नदी पर तो पुल नहीं दिख रहा,” रोहित ने कहा।

“पुराना पुल टूट गया होगा। नया शायद आगे बना हो।”

वे पहाड़ी से उतरने लगे। रास्ता खतरनाक था। एक तरफ गहरी खाई थी। बसंत सिंह ने बैलों को संभालकर चलाया। वह इस रास्ते से कई बार गुजर चुका था, इसलिए उसे हर मोड़ का पता था।

अचानक रामा बैल लंगड़ाने लगा। बसंत सिंह ने गाड़ी रोक दी और नीचे उतरा। रामा के पैर में काँटा चुभ गया था।

“अरे भैया, तुम्हें चोट लग गई,” बसंत सिंह ने प्यार से कहा। उसने काँटा निकाला और अपनी धोती का टुकड़ा फाड़कर पैर पर बाँध दिया।

“हम यहीं रुक जाएँगे,” बसंत सिंह ने कहा। “रामा को आराम चाहिए।”

“पर दादाजी, हम रात तक नदी तक पहुँचना चाहते थे ना?”

“बैलों का ख्याल रखना जरूरी है बेटा। ये हमारे साथी हैं। इनके बिना यह सफर अधूरा है।”

वे वहीं रुक गए। बसंत सिंह ने बैलों को चारा डाला और खुद पास के झरने से पानी ले आया। रोहित ने फिर से आग जलाई, हालाँकि दिन में आग की जरूरत नहीं थी, पर उसे आग जलाना अच्छा लगता था।

“दादाजी, क्या आपको डर नहीं लगता?” रोहित ने अचानक पूछा।

“डर? किस बात का?”

“अकेले इस जंगल में, इतनी दूर… कोई मदद भी नहीं…”

बसंत सिंह मुस्कुराया। “जब तुम प्रकृति के साथ रहते हो, तो तुम अकेले नहीं होते। ये पेड़, ये पक्षी, ये जानवर… सब तुम्हारे साथ होते हैं। और फिर… डर तो शहर में होता है, जहाँ लोग एक-दूसरे से डरते हैं।”

रोहित ने इस बारे में कभी नहीं सोचा था। उसके लिए तो शहर सुरक्षित था और जंगल खतरनाक।

शाम होने लगी। रामा बैल ठीक हो गया था। बसंत सिंह ने फैसला किया कि वे आगे बढ़ेंगे और नदी के किनारे रात बिताएँगे।

नदी तक पहुँचने में दो घंटे लगे। नदी विशाल थी, और पुराना पुल सचमुच टूटा हुआ था। नया पुल किलोमीटर भर दूर था।

“कल सुबह नए पुल से गुजरेंगे,” बसंत सिंह ने कहा। “आज यहीं रुकते हैं।”

उन्होंने नदी किनारे जगह बनाई। रात का खाना खाया और आग के पास बैठ गए। नदी का शोर सुनाई दे रहा था, और चाँदनी रात में नदी चाँदी की तरह चमक रही थी।

“दादाजी, एक कहानी सुनाओ,” रोहित ने कहा।

बसंत सिंह ने सोचा, फिर बोला, “एक बार की बात है, इसी नदी के किनारे एक साधु रहता था। वह बहुत बूढ़ा था। एक दिन एक युवक उसके पास आया और बोला, ‘बाबा, मैं जीवन का अर्थ ढूँढ़ रहा हूँ।’ साधु ने कहा, ‘इस नदी के पार जाओ, वहाँ एक पेड़ है, उसकी जड़ में तुम्हें जवाब मिलेगा।’ युवक नदी पार करने लगा, पर नदी में बह गया। साधु ने उसे बचाया और कहा, ‘जीवन का अर्थ सफर में है, मंज़िल में नहीं। तुम नदी पार करने में इतने व्यस्त हो गए कि नदी की सुंदरता देखना भूल गए।'”

रोहित ने कहानी को समझने की कोशिश की। “तो आपका मतलब है कि यह सफर ही महत्वपूर्ण है?”

“हाँ बेटा। मंज़िल तो मिल ही जाएगी, पर सफर के अनुभव ही जीवन हैं।”

अगली सुबह वे जल्दी उठे। बसंत सिंह ने नदी में स्नान किया। रोहित भी साथ गया। पानी ठंडा था, पर ताज़गी दे रहा था।

नए पुल तक पहुँचने में एक घंटा लगा। पुल नया था, पर संकरा। बैलगाड़ी के लिए जगह बमुश्किल थी। बसंत सिंह ने बैलों को संभाला और धीरे-धीरे पुल पार करने लगा।

पुल के बीच में पहुँचते ही अचानक रामा बैल ने हिचकिचाना शुरू कर दिया। नीचे नदी का तेज बहाव देखकर वह डर गया।

“शांत रहो रामा, शांत,” बसंत सिंह ने उसे थपथपाया।

पर रामा नहीं माना। वह पीछे हटने लगा। गाड़ी तिरछी हो गई। रोहित डर गया।

तभी बसंत सिंह ने एक अद्भुत काम किया। वह रामा के पास गया और उसके कान में कुछ कहने लगा। वह बैल को गाना गाने लगा – एक पुराना लोकगीत जो गाड़ीवान बैलों को सुनाया करते थे।

“रे लला, रे लला, चल मेरे साजना…
इस पुल पार है मेरा अपना गाँव…”

अजीब बात थी, रामा शांत हो गया। उसने फिर से आगे बढ़ना शुरू किया। धीरे-धीरे पूरी गाड़ी पुल पार कर गई।

“दादाजी, आपने क्या किया?” रोहित ने आश्चर्य से पूछा।

“बैल भी भावनाओं को समझते हैं बेटा। उन्हें प्यार और विश्वास चाहिए।”

पुल पार करने के बाद रास्ता आसान था। एक घंटे बाद वे एक गाँव में पहुँचे। यह गाँव बसंत सिंह के गाँव जैसा ही था – शांत, सादा, और प्रकृति की गोद में बसा हुआ।

गाँव के बाहर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी, जैसे किसी का इंतज़ार कर रही हो। बसंत सिंह ने गाड़ी रोक दी और नीचे उतरा।

“गीता…” उसकी आवाज़ काँप गई।

“भैया…” बूढ़ी औरत की आँखों में आँसू थे।

दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया। तीस साल का अलगाव एक पल में मिट गया।

“मैं जानती थी कि तुम आओगे,” गीता ने कहा। “पिछले हफ्ते से मन बेचैन था।”

“तुम्हारा खत मिला, तभी तो आया,” बसंत सिंह ने कहा।

रोहित ने देखा कि उसकी परदादी (गीता उसकी दादी की बहन थी) के चेहरे पर वही सादगी थी जो उसके दादा के चेहरे पर थी।

गीता का घर छोटा सा था, पर आंगन बड़ा था। बैलगाड़ी आंगन में ले आई गई। बैलों को खोल दिया गया। रोहित ने देखा कि गीता के पास भी दो बैल थे, वैसे ही रामा और श्यामा नाम के।

“तुमने भी अपने बैलों का नाम रामा-श्यामा रखा है?” बसंत सिंह ने पूछा।

“हाँ भैया, तुम्हारी याद में।”

शाम को तीनों आंगन में बैठे। गीता ने खाना बनाया था – साधारण पर स्वादिष्ट। रोहित को लगा जैसे वह किसी और दुनिया में आ गया हो।

“भैया, तुम यहीं रुक जाओ,” गीता ने कहा। “हम दोनों एक-दूसरे की देखभाल कर लेंगे।”

बसंत सिंह ने सिर हिलाया। “यही तो योजना है।”

रात में रोहित के पिता का फोन आया। वे चिंतित थे। रोहित ने उन्हें सारी बात बताई।

“पापा, दादाजी यहीं रहने वाले हैं,” रोहित ने कहा।

“समझ गया। तू दो दिन और रुक, फिर मैं तुझे लेने आऊँगा।”

अगले दिन बसंत सिंह ने रोहित को गाँव घुमाया। गाँव वाले सब मिलने आए। सबको पता था कि बसंत सिंह आ रहा है। गीता ने सबको बता दिया था।

“यह गाँव अभी भी वैसा ही है,” बसंत सिंह ने कहा। “जैसा तीस साल पहले था।”

“हमने प्रगति का नाम नहीं सुना भैया,” एक बुजुर्ग ने कहा। “हमें जो चाहिए, वही रखा।”

दोपहर में बसंत सिंह ने रोहित को एक जगह ले गया – गाँव के बाहर एक छोटी सी पहाड़ी पर। वहाँ से पूरा गाँव दिखाई दे रहा था।

“यहाँ से मेरा गाँव भी दिखता था,” बसंत सिंह ने कहा। “जब मैं छोटा था, तब इसी पहाड़ी पर आकर बैठता था और सोचता था कि उस पार क्या है।”

“और अब?” रोहित ने पूछा।

“अब पता चला कि इस पार भी वही है जो उस पार था। लोग, प्यार, सादगी।”

रोहित ने गाँव को देखा। धुआँ उठ रहा था चूल्हों से, बच्चे खेल रहे थे, बैलगाड़ियाँ चल रही थीं। यह दृश्य उसे किसी पुरानी फिल्म की याद दिला रहा था।

“दादाजी, मैं एक बात समझना चाहता हूँ,” रोहित ने कहा। “आपने इतना लंबा सफर क्यों किया? आप सीधे कार से आ सकते थे।”

बसंत सिंह ने गहरी सांस ली। “बेटा, जीवन एक बैलगाड़ी के सफर की तरह है। धीरे चलना होता है, हर पल को जीना होता है। कार से आता तो बस पहुँच जाता, पर अनुभव नहीं मिलता। इस सफर में मैंने अपने पिता को याद किया, अपनी जवानी को याद किया, अपनी पत्नी को याद किया… यह सफर मेरे जीवन का पुनर्पाठ था।”

रोहित को समझ आने लगा। यह सिर्फ एक गाँव से दूसरे गाँव जाने का सफर नहीं था, यह अतीत से वर्तमान तक का सफर था।

दो दिन बाद रोहित के पिता आए। वे बसंत सिंह से मिले और उनके रहने की व्यवस्था देखी।

“पापा, दादाजी बहुत खुश हैं यहाँ,” रोहित ने कहा।

“मैं देख रहा हूँ बेटा।”

विदा लेते समय रोहित की आँखें भर आईं। “दादाजी, मैं आपसे मिलने आता रहूँगा।”

“ज़रूर आना बेटा। और एक बात याद रखना – जीवन की रफ्तार धीमी रखना। बैलगाड़ी की तरह।”

रोहित ने सिर हिलाया। कार चल दी। रोहित ने पीछे मुड़कर देखा। बसंत सिंह और गीता आंगन में बैठे थे, और उनके पास रामा-श्यामा बैल खड़े थे।

शहर लौटते हुए रोहित ने सोचा। उसके दादा ने उसे एक सबक सिखाया था – धीरे चलने का, प्रकृति के साथ रहने का, सादगी से जीने का।

कुछ महीने बाद रोहित के पिता ने एक बैलगाड़ी मॉडल खरीदा और उसे रोहित को दिया। “तुम्हारे दादाजी की यादगार।”

रोहित ने उसे अपने कमरे में रख दिया। जब भी वह उसे देखता, उसे वह सफर याद आता – जंगल, नदी, पुल, और उसके दादा का गीत…

“रे लला, रे लला, चल मेरे साजना…”

बसंत सिंह अपनी बहन के गाँव में खुश थे। उन्होंने फिर से खेती शुरू की। गाँव वालों ने उनका स्वागत किया। और हर शाम वे उसी पहाड़ी पर बैठते और सूरज डूबते देखते।

एक दिन गीता ने पूछा, “भैया, क्या तुम्हें अफसोस है? अपना गाँव छोड़ने का?”

बसंत सिंह ने मुस्कुराकर कहा, “नहीं बहन। घर तो वहाँ है जहाँ दिल हो। और मेरा दिल अब यहीं है।”

बैलगाड़ी का सफर खत्म हुआ, पर एक नया सफर शुरू हुआ – शांति और संतोष का सफर। और बसंत सिंह जान गए कि जीवन का असली सुख धीमी गति में है, सादगी में है, और प्रकृति के साथ तालमेल में है।

रोहित ने भी सीखा। अब वह शहर की भागदौड़ में कम, और प्रकृति के साथ ज्यादा समय बिताता। उसने अपने दोस्तों को भी बैलगाड़ी के सफर की कहानी सुनाई। शायद एक दिन वे भी समझेंगे कि जीवन सिर्फ मंज़िल नहीं, सफर भी है।

और बैलगाड़ी की चरचराहट अब भी जंगल में गूँजती है, जब भी कोई यात्री उस पुराने रास्ते से गुजरता है। वह आवाज़ याद दिलाती है कि धीमी गति में भी एक संगीत है, और साधारण जीवन में भी एक असाधारण सुंदरता।

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