रात का सन्नाटा चादर की तरह गाँव पर बिछा हुआ था, पर दूर से आते हुए ढोल की आवाज़ उस सन्नाटे को चीरती हुई रामकिशोर के कानों तक पहुँच रही थी। वह अपनी झोपड़ी के बाहर बैठा चिलम खींच रहा था। आँखें बंद करके वह उस आवाज़ को सुन रहा था जो हर साल इसी समय उसकी ज़िंदगी में गूँजती थी – मेले का ढोल। पच्चीस साल हो गए थे उस रात को, पर वह रात आज भी उसके ज़हन में ताज़ा थी।

“बाबा, क्या सोच रहे हो?” रामकिशोर की पोती मुन्नी ने पूछा। वह सात साल की थी और उसकी आँखों में हमेशा सवालों की लहर दौड़ती रहती थी।
“कुछ नहीं बेटा, बस… मेले का ढोल सुन रहा हूँ।”
“कल मेला है ना? मुझे ले चलोगे?” मुन्नी की आँखें चमक उठीं।
रामकिशोर ने उसके सिर पर हाथ फेरा, “हाँ बेटा, ले चलेंगे। अब जाकर सो जा।”
मुन्नी भीतर चली गई, पर रामकिशोर वहीं बैठा रहा। उसकी यादें पच्चीस साल पीछे धुँधली सड़कों और रंगीन रोशनियों की ओर भाग रही थीं। वह रात बरसात की थी, और उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़…
पच्चीस साल पहले
रामकिशोर उस समय बीस साल का जवान था। उसके हाथ में हमेशा चित्रकारी का ब्रश रहता था। गाँव वाले कहते थे कि उसकी कूची में जादू है। वह मेले में आने वाले नटखट नाटक मंडली के साथ काम करता था, मंच के पीछे पर्दों पर चित्र बनाने का। मेले वाली रात उसका सबसे व्यस्त समय होता था।
“रामू, जल्दी कर! नाटक एक घंटे में शुरू होना है!” नटखट मंडली के मालिक हरिशंकर ने आवाज़ लगाई।
रामकिशोर पर्दे पर अंतिम रंग भर रहा था। यह दृश्य था राजा और रानी का महल, जहाँ नाटक का अंत होना था। उसकी कूची तेजी से चल रही थी, पर उसका ध्यान बार-बार मंच के दूसरी ओर जा रहा था जहाँ सीता नर्तकियों के साथ अभ्यास कर रही थी।
सीता। उस नाम को सोचते ही रामकिशोर के हाथ काँप उठे। वह नटखट मंडली की मुख्य नर्तकी थी, और रामकिशोर का दिल उस पर आ गया था। पर वह कभी उससे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था। वह एक गरीब चित्रकार था, और सीता… सीता तो सितारों जैसी थी।
“रामू, तुम्हारे चित्र तो जीवित हो उठते हैं!” एक मधुर आवाज़ ने उसे चौंकाया।
रामकिशोर ने मुड़कर देखा तो सीता वहीं खड़ी मुस्कुरा रही थी। उसने लाल-पीले रंग का घाघरा पहन रखा था और उसके हाथों में घुंघरू बज रहे थे।
“सीता… दीदी,” रामकिशोर ने झेंपते हुए कहा।
“दीदी क्यों बुला रहे हो? मैं तुमसे सिर्फ एक साल बड़ी हूँ,” सीता हँस पड़ी। “मैं देखना चाहती थी कि तुम कैसे इतने सुंदर चित्र बनाते हो।”
रामकिशोर का दिल धड़कने लगा। “यह तो कुछ भी नहीं है। तुम्हारा नृत्त… वही तो असली कला है।”
सीता ने पर्दे को निहारा, “तुम्हारे चित्रों के सामने नाचना सचमुच सम्मान की बात होगी। आज रात का नाटक ख़ास है। तुम आओगे ना देखने?”
“ज़रूर…” रामकिशोर ने कहा, पर सीता तो वहाँ से चली गई थी, उसकी घुंघरूओं की आवाज़ धीरे-धीरे दूर हो रही थी।
शाम ढलते-ढलते मेला जीवंत हो उठा। हज़ारों दीयों की रोशनी में पूरा मैदान नहा गया। ठेलों पर चाट-पकौड़ी की महक हवा में तैर रही थी। बच्चे खिलौने लिए इधर-उधर भाग रहे थे। झूले ऊँचे-ऊँचे उड़ रहे थे, और हर तरफ हँसी-खुशी का माहौल था।
रामकिशोर ने अपना काम खत्म किया तो नाटक शुरू होने में अभी देर थी। वह मेले में घूमने निकल पड़ा। वह जानबूझकर उस झूले के पास गया जहाँ सीता को झूला झूलते देखा था। पर वहाँ वह नहीं थी।
“रामू काका! मिठाई खिलाओ!” एक छोटे लड़के ने उसका हाथ पकड़ लिया।
रामकिशोर ने उसे गुड़ की बर्फी खरीदकर दी। वह आगे बढ़ ही रहा था कि अचानक उसकी नज़र मेले के किनारे लगे एक ठेले पर पड़ी। सीता वहाँ खड़ी कुछ खरीद रही थी। उसके पिता मोहनलाल उसके साथ थे।
मोहनलाल गाँव के संपन्न व्यापारी थे, और उनकी इकलौती बेटी सीता को वह अपनी आँखों का तारा समझते थे। रामकिशोर दूर से ही देखता रहा। सीता ने एक चमकीली चूड़ी खरीदी और उसे पहनकर अपना हाथ उठाकर देखने लगी। उसकी मुस्कान में इतनी मासूमियत थी कि रामकिशोर का दिल भर आया।
पर तभी उसने देखा कि मेले के दूसरे छोर से तीन युवक सीता की ओर आ रहे थे। अग्रवाल साहब का बेटा विजय और उसके दोस्त। विजय की नज़रें सीता पर टिकी थीं, और उसके चेहरे पर एक अजीब सी गर्विली मुस्कान थी।
“अरे सीता जी! मेले में मिल गईं!” विजय ने ऊँची आवाज़ में कहा।
सीता ने उसकी ओर देखा, और उसके चेहरे पर एक क्षण के लिए असंतोष दिखाई दिया। “हाँ, आप भी तो हैं यहाँ।”
“आपके बिना मेला अधूरा है,” विजय ने चापलूसी की।
मोहनलाल ने विजय को देखा तो उनके चेहरे पर खुशी दिखी। “अरे विजय बेटा! तुम भी आ गए!”
“कैसे न आता मामा? सीता को मेले में देखने तो आना ही था,” विजय ने कहा।
रामकिशोर यह सब देख रहा था। उसे पता था कि मोहनलाल विजय से सीता की शादी करना चाहते थे। विजय के पिता गाँव के सबसे अमीर आदमी थे, और यह रिश्ता मोहनलाल के लिए फायदे का सौदा था।
रामकिशोर का दिल भारी हो गया। वह वहाँ से हट गया और नाटक मंडली की ओर चल पड़ा। नाटक शुरू होने वाला था।
मंच पर रोशनी जल उठी। ढोल की थाप पर नाटक शुरू हुआ। रामकिशोर पर्दे के पीछे खड़ा अपने बनाए चित्रों को देख रहा था, पर उसका ध्यान पूरी तरह से सीता पर था जो मंच पर नृत्य कर रही थी।
सीता का नृत्त देखकर पूरा तमाशा मंत्रमुग्ध हो गया। उसकी हर भाव-भंगिमा, हर मुद्रा में एक अद्भुत लय थी। रामकिशोर ने कभी इतना सुंदर नृत्त नहीं देखा था। वह समझ गया कि क्यों लोग उस पर मोहित थे।
नाटक के अंत में सीता ने एक भावपूर्ण नृत्त किया जिसमें उसने एक प्रेमिका के विरह को दर्शाया। उसकी आँखों में आँसू थे, और पूरा मंच स्तब्ध था। जैसे ही नृत्त समाप्त हुआ, तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा मैदान गूँज उठा।
रामकिशोर पर्दे के पीछे से सीता को देख रहा था। वह सांस ले रही थी, उसके माथे पर पसीने की बूंदें थीं। उसने रामकिशोर की ओर देखा और मुस्कुरा दी। उस मुस्कान में रामकिशोर ने कुछ ऐसा देखा जो उसने पहले कभी नहीं देखा था – एक गहरा अर्थ, एक अनकही भाषा।
नाटक समाप्त हुआ तो कलाकारों ने एक-दूसरे को बधाई दी। रामकिशोर अपने सामान समेट ही रहा था कि सीता उसके पास आई।
“तुमने देखा मेरा नृत्त?” उसने पूछा।
“हाँ… वह अद्भुत था,” रामकिशोर ने कहा।
“तुम्हारे चित्रों के कारण। तुम्हारे बनाए महल के सामने नाचना… वही मेरा सबसे अच्छा नृत्त था।”
रामकिशोर ने देखा कि सीता की आँखों में एक चमक थी। “तुम… तुम्हें वाकई मेरे चित्र पसंद आए?”
“पसंद आए?” सीता हँसी, “रामू, तुम्हें पता नहीं तुम कितने प्रतिभाशाली हो। तुम एक दिन बड़े चित्रकार बनोगे।”
इतने में हरिशंकर आ गया। “सीता, तुम्हारे पिता तुम्हें ढूँढ रहे हैं। विजय भी तुमसे मिलना चाहता है।”
सीता के चेहरे पर असंतोष दिखा। “मैं आ रही हूँ।” फिर रामकिशोर की ओर मुड़कर बोली, “कल सुबह नदी किनारे आना। मैं तुमसे कुछ बात करना चाहती हूँ।”
रामकिशोर स्तब्ध रह गया। सीता उसे मिलने के लिए बुला रही थी? उसने बस सिर हिला दिया, और सीता चली गई।
उस रात रामकिशोर को नींद नहीं आई। वह बार-बार सीता के शब्दों और उसकी मुस्कान के बारे में सोचता रहा। क्या सीता भी उसके प्रति कुछ अनुभव करती थी? या वह सिर्फ उसकी कला की प्रशंसा करती थी?
अगली सुबह रामकिशोर नदी किनारे पहुँचा तो सीता वहाँ पहले से ही थी। वह सफेद साड़ी पहने हुए थी, और उसके बाल पीछे बँधे हुए थे।
“तुम आ गए,” सीता ने मुस्कुराते हुए कहा।
“हाँ… तुमने बुलाया था ना।”
दोनों कुछ पल चुप रहे। फिर सीता ने कहा, “रामू, मैं जानती हूँ कि तुम मुझसे प्यार करते हो।”
रामकिशोर चौंक गया। उसकी जुबान लड़खड़ा गई।
“डरो मत,” सीता ने कहा, “मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ।”
यह सुनकर रामकिशोर का सारा शरीर सिहर उठा। “पर… पर तुम्हारे पिता… विजय…”
“मुझे विजय से नफरत है,” सीता ने दृढ़ता से कहा। “वह घमंडी और स्वार्थी है। मेरे पिता उससे मेरी शादी करना चाहते हैं, पर मैं नहीं करूँगी।”
“तो तुम क्या चाहती हो सीता?”
“मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे लेकर भाग जाओ।”
रामकिशोर स्तब्ध रह गया। “भाग जाएँ? पर हम कहाँ जाएँगे? मेरे पास तो कुछ भी नहीं है।”
“तुम्हारे पास तुम्हारी प्रतिभा है। हम शहर चले जाएँगे। तुम चित्रकारी करोगे, मैं नृत्य सिखाऊँगी। हम अपनी जिंदगी खुद बनाएँगे।”
रामकिशोर ने सीता की आँखों में देखा। उनमें विश्वास था, प्रेम था, और एक दृढ़ संकल्प। उसने हाँ कह दी।
दोनों ने योजना बनाई कि अगली रात मेले के अंतिम दिन भाग जाएँगे। मेले की भीड़ में कोई उन्हें नहीं ढूँढ पाएगा।
पर विजय को शक हो गया। उसने रामकिशोर और सीता को नदी किनारे बात करते देख लिया था। वह जानता था कि रामकिशोर सीता से प्यार करता था, और उसे डर था कि कहीं सीता उसकी ओर आकर्षित न हो जाए।
मेले के अंतिम दिन, विजय ने अपने दोस्तों के साथ योजना बनाई। वे रामकिशोर को डरा-धमकाकर गाँव छोड़ने के लिए मजबूर करेंगे।
उस रात मेला अपने चरम पर था। आखिरी रात होने के कारण हर कोई खूब मस्ती कर रहा था। रामकिशोर ने अपना थोड़ा सा सामान बाँधा और मेले में सीता से मिलने की प्रतीक्षा करने लगा।
पर तभी विजय और उसके चार दोस्त उसके सामने आ गए।
“कहाँ जा रहे हो रामू चित्रकार?” विजय ने व्यंग्य से पूछा।
“मेले में घूमने,” रामकिशोर ने सावधानी से जवाब दिया।
“घूमने या भागने?” विजय ने उसकी छाती पर धक्का दिया। “मैंने तुम्हें सीता के साथ बात करते देखा है। तुम समझते क्या हो अपने आप को? एक गरीब चित्रकार, और सोचता है कि सीता जैसी लड़की तुम्हारे साथ भागेगी?”
रामकिशोर का दिल धड़कने लगा। “तुम क्या कहना चाहते हो?”
“मैं यह कहना चाहता हूँ कि तुम आज रात ही इस गाँव को छोड़कर चले जाओ। नहीं तो तुम्हें पछताना पड़ेगा।”
“मैं नहीं जाऊँगा,” रामकिशोर ने दृढ़ता से कहा।
विजय गुस्से से लाल हो गया। उसने इशारा किया और उसके दोस्तों ने रामकिशोर को पकड़ लिया। वे उसे मेले से दूर एक सुनसान जगह ले गए।
वहाँ विजय ने रामकिशोर की पिटाई शुरू कर दी। “तुझे सीता से दूर रहना है, समझा? अगर कल सुबह तक तू इस गाँव में दिखा, तो तेरी जान ले लूँगा।”
रामकिशोर जमीन पर पड़ा हुआ था, उसके शरीर से खून बह रहा था। वह बेबस होकर देखता रहा जब विजय और उसके दोस्त वहाँ से चले गए।
पर सीता इंतज़ार कर रही थी। जब रामकिशोर नहीं आया तो वह चिंतित हो उठी। उसे शक हुआ कि विजय ने कुछ किया होगा। वह रामकिशोर की झोपड़ी की ओर भागी।
रास्ते में उसकी मुलाकात हरिशंकर से हुई। “सीता बेटी, कहाँ भागी जा रही हो?”
“रामू को देखना है। वह नहीं आया।”
हरिशंकर के चेहरे पर चिंता दिखी। “मैंने विजय और उसके दोस्तों को उधर जाते देखा था। चलो, हम साथ चलते हैं।”
जब वे रामकिशोर की झोपड़ी पहुँचे तो वह वहाँ नहीं था। सीता की चिंता और बढ़ गई। तभी उन्हें एक लड़का मिला जिसने रामकिशोर को विजय के साथ जाते देखा था।
सीता समझ गई। वह सीधे मेले में गई जहाँ विजय अपने दोस्तों के साथ बैठा शराब पी रहा था।
“विजय! तुमने रामू को कहाँ किया?” सीता ने गुस्से से पूछा।
विजय हँसा, “वह गरीब चित्रकार? शायद गाँव छोड़कर भाग गया होगा।”
“तुम झूठ बोल रहे हो! तुमने उसे मारा है!”
मेले में लोग इकट्ठा होने लगे। मोहनलाल भी वहाँ आ गए। “सीता, यह सब क्या है?”
“पिताजी, विजय ने रामू को मारा है! हमें उसे ढूँढना होगा!”
मोहनलाल ने विजय की ओर देखा। “क्या सचमुच तुमने कुछ किया है?”
विजय ने शराब के नशे में कहा, “हाँ, मैंने उसे मारा। उस गरीब को सीता पर नज़र रखने का क्या हक? सीता मेरी होगी, चाहे कुछ भी हो जाए!”
यह सुनकर सीता को गुस्सा आ गया। उसने विजय के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। “मैं कभी तुम्हारी नहीं बनूँगी! तुम एक जालिम हो!”
इतने में हरिशंकर दौड़ता हुआ आया। “मिल गया! रामू मिल गया! वह नदी किनारे पड़ा है, घायल है!”
सीता तुरंत नदी की ओर भागी। वहाँ रामकिशोर जमीन पर पड़ा हुआ था, उसका चेहरा खून से लथपथ था।
“रामू! ओ रामू!” सीता ने उसे गले लगा लिया।
रामकिशोर ने आँखें खोलीं। “सीता… तुम यहाँ कैसे?”
“चिंता मत करो। हम तुम्हें डॉक्टर के पास ले चलते हैं।”
पर तभी विजय और उसके दोस्त भी वहाँ आ गए। विजय ने सीता को रामकिशोर से दूर खींचा। “छोड़ो उसे! वह तुम्हारे लायक नहीं है!”
“तुम छोड़ो मुझे!” सीता ने विरोध किया।
तभी एक अप्रत्याशित घटना घटी। विजय के एक दोस्त ने रामकिशोर को फिर से मारने के लिए लाठी उठाई। सीता ने देखा तो वह रामकिशोर के ऊपर कूद गई। लाठी सीता के सिर पर लगी।
सब कुछ एक पल में थम गया। सीता जमीन पर गिर पड़ी, उसके सिर से खून बह रहा था।
“सीता!” रामकिशोर चिल्लाया।
“बेटी!” मोहनलाल दौड़े चले आए।
विजय और उसके दोस्त भाग गए। सीता को तुरंत डॉक्टर के पास ले जाया गया, पर बहुत देर हो चुकी थी। लाठी का वार इतना जोरदार था कि सीता की मृत्यु हो गई।
उस रात पूरे गाँव में मातम छा गया। मेले की रोशनी बुझ गई, और खुशियों का त्योहार शोक में बदल गया।
रामकिशोर को भी गहरी चोटें आई थीं, पर शारीरिक चोटों से ज्यादा गहरी थी सीता को खो देने की पीड़ा। वह हफ्तों बिस्तर पर पड़ा रहा।
सीता की मृत्यु के बाद विजय और उसके दोस्तों को गिरफ्तार कर लिया गया। मोहनलाल टूट चुके थे। उन्हें एहसास हुआ कि उनकी महत्वाकांक्षा ने ही उनकी बेटी की जान ले ली।
रामकिशोर एक महीने बाद उठ पाया। वह सीता की समाधि पर गया और घंटों वहाँ बैठा रहा। उसने प्रतिज्ञा की कि वह कभी चित्रकारी नहीं करेगा, क्योंकि उसकी कला ने ही सीता को आकर्षित किया था, और उसी आकर्षण ने उसकी जान ले ली थी।
वर्तमान
“बाबा, सुबह हो गई।” मुन्नी ने रामकिशोर का हाथ हिलाया।
रामकिशोर ने आँखें खोलीं तो पाया कि वह अभी भी अपनी झोपड़ी के बाहर बैठा था। रात बीत चुकी थी, और सूरज की किरणें आसमान में फैल रही थीं। उसके गालों पर आँसू की धारियाँ थीं।
“तुम रो क्यों रहे हो बाबा?” मुन्नी ने पूछा।
“कुछ नहीं बेटा, बस… यादें ताज़ा हो गईं।”
“वो कौन सी यादें?”
रामकिशोर ने मुन्नी को गोद में बिठाया। “एक ऐसी याद जिसने मेरी जिंदगी बदल दी।”
“क्या तुम मुझे मेले ले चलोगे आज?”
रामकिशोर ने सोचा। पच्चीस साल से वह मेले में नहीं गया था। हर साल मेले के दिनों में वह अपनी झोपड़ी में बंद रहता था। पर आज मुन्नी के सामने वह ना नहीं कह पाया।
“हाँ, चलेंगे।”
दिन ढलने लगा तो रामकिशोर मुन्नी का हाथ पकड़कर मेले की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसे सीता की याद आ रही थी। वह उसी रास्ते से जा रहा था जहाँ से पच्चीस साल पहले सीता के साथ भागने की योजना बनाई थी।
मेला पहुँचते ही मुन्नी की आँखें चमक उठीं। “वाह बाबा! देखो कितनी रोशनी है! कितने लोग हैं!”
रामकिशोर ने मेले को देखा। कुछ बदला नहीं था। वही ढोल की आवाज़, वही झूले, वही खिलौनों के ठेले। पर सब कुछ इतना अलग लग रहा था।
“बाबा, मुझे वो खिलौना चाहिए!” मुन्नी ने एक रंगीन घोड़ा दिखाया।
रामकिशोर ने उसे खिलौना खरीद दिया। वह आगे बढ़ ही रहा था कि उसकी नज़र एक ठेले पर पड़ी जहाँ चित्रकार चित्र बना रहा था। एक युवक बैठा ताज़ महल का चित्र बना रहा था।
रामकिशोर वहाँ रुक गया। उसने देखा कि युवक की कूची में वही निपुणता थी जो कभी उसमें हुआ करती थी।
“बहुत सुंदर चित्र है,” रामकिशोर ने कहा।
युवक ने मुस्कुराकर धन्यवाद दिया। “आपको चित्रकला का शौक है?”
“कभी था… बहुत पहले।”
“बाबा, तुम भी चित्र बनाते थे?” मुन्नी ने आश्चर्य से पूछा।
रामकिशोर ने सिर हिलाया। “हाँ बेटा, बहुत पहले।”
युवक ने कहा, “अगर आप चाहें तो एक चित्र बना सकते हैं। मैं आपको कागज और रंग दिए देता हूँ।”
रामकिशोर ने इनकार करना चाहा, पर मुन्नी ने कहा, “करो ना बाबा! मैं देखना चाहती हूँ!”
रामकिशोर ने कूची उठाई। पच्चीस साल बाद वह फिर से चित्र बनाने जा रहा था। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उसने आँखें बंद कीं और सोचा कि वह क्या बनाए।
तभी उसकी आँखों के सामने सीता का चेहरा आ गया। वही मुस्कान, वही आँखें। उसने कूची उठाई और कागज पर रंग भरने लगा।
धीरे-धीरे एक चेहरा उभरने लगा। बड़ी-बड़ी आँखें, लंबी चोटी, और होठों पर एक मासूम मुस्कान। सीता का चेहरा।
मुन्नी ने देखा तो पूछा, “बाबा, यह कौन है?”
“यह… यह एक देवी हैं,” रामकिशोर ने कहा, उसकी आवाज़ भर्रा गई थी।
चित्र पूरा हो गया। आसपास लोग इकट्ठे हो गए थे। सब उस चित्र की प्रशंसा कर रहे थे।
“अद्भुत है! इतना सजीव चित्र!” एक बुजुर्ग ने कहा।
युवक चित्रकार ने कहा, “आप तो मास्टर हैं! मैंने ऐसी कला कभी नहीं देखी!”
रामकिशोर ने चित्र को देखा। सीता जीवित हो उठी थी कागज पर। उसकी आँखों में वही चमक थी, वही जीवन था।
तभी एक और आवाज़ सुनाई दी, “रामू… क्या सचमुच तुम हो?”
रामकिशोर ने मुड़कर देखा। वहाँ एक वृद्ध महिला खड़ी थी, उसके बाल सफेद हो चुके थे, पर उसके चेहरे पर एक अद्भुत तेज था।
“मैं… मैं कलावती हूँ। सीता की सहेली।”
रामकिशोर को याद आया। कलावती सीता की सबसे अच्छी दोस्त थी।
“कलावती… तुम?”
“हाँ रामू। मैं यहीं रहती हूँ। तुम्हारे बारे में सुनती थी, पर कभी मिल नहीं पाई।” कलावती की आँखें भर आईं। “यह चित्र… सीता का है ना?”
रामकिशोर ने सिर हिलाया।
“वह हमेशा कहती थी कि तुम महान चित्रकार बनोगे। उसकी एक बात सच हुई।”
“पर कीमत…” रामकिशोर की आवाज़ काँप गई, “बहुत ज्यादा चुकानी पड़ी।”
कलावती ने उसका हाथ थाम लिया। “रामू, सीता ने अपनी जान तुम्हारे लिए दी। तुम उसकी याद को इस तरह दबाकर नहीं रख सकते। तुम्हें आगे बढ़ना होगा। तुम्हारी कला जिंदा रखो, क्योंकि वही तो सीता को तुमसे जोड़ती है।”
रामकिशोर की आँखों से आँसू बह निकले। पच्चीस साल के दबे हुए दुख उमड़ पड़े।
“बाबा, रो मत,” मुन्नी ने उसके आँसू पोंछे।
कलावती ने कहा, “मेरे घर चलो। मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहती हूँ।”
रामकिशोर मुन्नी का हाथ पकड़कर कलावती के साथ चल पड़ा। वह एक छोटे से मकान में रहती थी। भीतर जाकर कलावती ने एक पुराना संदूक खोला। उसमें से उसने एक पुरानी डायरी निकाली।
“यह सीता की डायरी है। उसने मुझे दी थी उस रात से पहले।”
रामकिशोर ने डायरी खोली। पहले पन्ने पर सीता की लिखावट थी: “मेरी जिंदगी की कहानी…”
उसने पन्ने पलटने शुरू किए। सीता ने अपने सारे विचार, सपने और इच्छाएँ उसमें लिखी थीं। फिर वह पन्ना आया जहाँ सीता ने रामकिशोर के बारे में लिखा था:
“आज रामू से मिली। वह इतना शर्मीला है, पर उसकी आँखों में एक अलग दुनिया बसती है। उसके चित्रों में जो जीवन है, वह मेरे नृत्त में भी नहीं है। मैं उससे प्यार करती हूँ। मैं जानती हूँ कि पिताजी इस रिश्ते के खिलाफ होंगे, पर मैं उसके साथ जीवन बिताना चाहती हूँ। कल रात हम भाग रहे हैं। मैं डर रही हूँ, पर रामू के साथ मुझे कोई डर नहीं। अगर कुछ हो जाए, तो कलावती, यह डायरी रामू तक पहुँचाना। उसे बताना कि मैं उससे प्यार करती थी, और उससे कहना कि वह कभी चित्रकारी न छोड़े। उसकी कला ही मुझे अमर रखेगी।”
रामकिशोर की आँखों से आँसू की धारा बह निकली। उसने डायरी को छाती से लगा लिया।
“सीता चाहती थी कि तुम चित्रकारी करते रहो,” कलावती ने कहा। “पर मैं तुम्हें ढूँढ नहीं पाई। तुम गाँव छोड़कर चले गए थे।”
“हाँ… मैं दस साल बाद लौटा,” रामकिशोर ने कहा। “पर तब तक तुम शादी करके दूसरे गाँव चली गई थीं।”
कलावती ने सिर हिलाया। “आज मिले हैं, और यही मौका है कि तुम सीता की इच्छा पूरी करो।”
रामकिशोर ने मुन्नी की ओर देखा। “तुम चित्र बनाना चाहोगी बेटा?”
मुन्नी की आँखें चमक उठीं। “हाँ बाबा! मैं चित्र बनाना सीखूँगी!”
उस रात रामकिशोर ने फैसला किया। वह फिर से चित्रकारी शुरू करेगा। न सिर्फ अपने लिए, बल्कि सीता की याद में, और मुन्नी के भविष्य के लिए।
अगले दिन से उसने अपनी झोपड़ी में एक छोटी सी पाठशाला शुरू की। गाँव के बच्चे आते और वह उन्हें चित्रकला सिखाता। धीरे-धीरे उसकी ख्याति फैलने लगी।
एक साल बाद, जब फिर से मेले का समय आया, तो रामकिशोर ने एक प्रदर्शनी लगाई। उसने पच्चीस चित्र बनाए थे, सभी सीता के विभिन्न रूपों में। नृत्त करती हुई सीता, मुस्कुराती हुई सीता, गंभीर सीता।
पूरा गाँव उस प्रदर्शनी को देखने आया। मोहनलाल भी आए, अब वह बूढ़े और टूटे हुए थे।
“रामू,” मोहनलाल ने कहा, उनकी आवाज़ में पश्चाताप था, “मैं… मैं माफी चाहता हूँ। मेरी महत्वाकांक्षा ने मेरी बेटी को खो दिया।”
रामकिशोर ने उन्हें गले लगा लिया। “हम सब गलतियाँ करते हैं। सीता ने हमें माफ कर दिया होगी।”
उस प्रदर्शनी में एक विशेष चित्र था – “मेले वाली रात”। उसमें सीता मंच पर नृत्त कर रही थी, और पर्दे पर रामकिशोर का बनाया महल चमक रहा था। चित्र इतना सजीव था कि लगता था सीता किसी भी पल नृत्त शुरू कर देगी।
मुन्नी ने कहा, “बाबा, यह चित्र सबसे सुंदर है।”
“क्यों बेटा?”
“क्योंकि इसमें प्यार है।”
रामकिशोर ने मुन्नी को गले लगा लिया। उसे एहसास हुआ कि सीता सचमुच अमर हो गई थी – उसकी कला में, उसकी याद में, और उस प्यार में जो आज भी जीवित था।
मेले वाली रात फिर से आई थी, पर इस बार यह दुख की नहीं, बल्कि स्मृतियों के पुनर्जीवन की रात थी। रामकिशोर ने देखा कि दूर मंच पर एक युवती नृत्त कर रही थी, उसकी शैली सीता जैसी थी।
कलावती उसके पास आई। “वह मेरी पोती है। उसका नाम भी सीता है। मैंने उसे नृत्त सिखाया है, सीता की तरह।”
रामकिशोर ने देखा तो युवती के नृत्त में सचमुच सीता की छाप थी। आँखें बंद करके उसने सोचा कि शायद सीता कहीं न कहीं अभी भी जीवित है, एक नई पीढ़ी में, नए सपनों के साथ।
उस रात, पच्चीस साल बाद, रामकिशोर ने फिर से चित्र बनाना शुरू किया। इस बार वह चित्र था मुन्नी और नई सीता का, एक साथ नृत्त करते हुए। दोनों की आँखों में वही चमक थी जो कभी सीता की आँखों में हुआ करती थी।
जैसे ही चित्र पूरा हुआ, मेले का ढोल बज उठा। रामकिशोर ने देखा कि मुन्नी और सीता हाथ में हाथ डाले झूम रही थीं। उसने मुस्कुराया। सीता की आत्मा शांत हो गई थी, और उसकी अपनी आत्मा भी।
मेले वाली रात अब उसके लिए दुख की याद नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की रात बन गई थी। और वह जान गया था कि प्यार कभी नहीं मरता, वह सिर्फ रूप बदलता है, और कला के माध्यम से अमर हो जाता है।