पनघट की मुलाक़ात

गर्मी की सुबह। सूरज ने अभी-अभी अपनी पहली किरणें फेंकनी शुरू की थीं, लेकिन हवा में पहले से ही गर्मी का एहसास था। गाँव के पनघट पर पहला व्यक्ति मुन्नी देवी थीं, जिनके सिर पर पीतल का घड़ा चमक रहा था।

“कल रात से ही पानी कम आ रहा है,” वह बुदबुदाईं। हाथ से बने कुएँ से पानी खींचते हुए उनकी बाँहों की नसें तन गईं। रस्सी के सिरे पर बँधा हुआ बाल्टी का डोल कुएँ की गहराई में गुम हो गया और फिर भरी हुई वापस आई। ठंडे, स्वच्छ पानी की पहली बाल्टी।

पनघट की मुलाक़ात

मुन्नी देवी ने घड़े में पानी भरा और किनारे रख दिया। वह इंतज़ार करने लगीं। पनघट पर अकेले आने का यही फायदा था – शांति। वह एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गईं जिसकी छाया धीरे-धीरे पनघट की ओर बढ़ रही थी।

थोड़ी देर में गाँव की औरतें आनी शुरू हो गईं। हर एक के सिर पर घड़ा, हाथों में कलश, कंधे पर डोल। पनघट जीवंत हो उठा। कलकल बहते पानी की आवाज़ के साथ महिलाओं की बातचीत, हँसी और कभी-कभी झगड़े की आवाज़ें मिलने लगीं।

“सुना है नई बहू आ रही है शर्मा जी के घर?”

“हाँ, कल दूल्हा लेने दिल्ली गए हैं।”

“अरे, तुम्हारी लड़की का रिश्ता तय हुआ?”

पनघट सिर्फ पानी भरने की जगह नहीं था। यह गाँव का अनऑफिशियल न्यूज़ चैनल था, काउंसिलिंग सेंटर था, दोस्ती और ईर्ष्या दोनों का केंद्र था।

एक नया चेहरा

दोपहर के समय जब सूरज सिर पर आ गया था, पनघट पर भीड़ कम हो गई। तभी एक नई शख्सियत नज़र आई। एक युवती, अनुमानतः बीस-बाईस साल की, जिसके हाथ में प्लास्टिक की बाल्टी थी। उसने सलवार-कुर्ता पहन रखा था, लेकिन उस पर छपी प्रिंट गाँव की औरतों के सादे कपड़ों से अलग थी।

मुन्नी देवी ने उसे पहचान लिया। यह रम्या थी, गाँव के नए डॉक्टर की बेटी जो पढ़ाई के लिए शहर गई थी और अब छुट्टियाँ बिताने आई थी।

रम्या ने शर्माते हुए पनघट के पास आकर खड़ी हो गई। उसने कभी कुएँ से पानी नहीं खींचा था। रस्सी पकड़ने का तरीका भी नहीं जानती थी।

“बेटी, ऐसे नहीं,” एक दयालु आवाज़ सुनाई दी। मुन्नी देवी ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया। “आओ, मैं तुम्हें सिखाती हूँ।”

रम्या ने शर्मिंदा होकर कहा, “धन्यवाद दीदी। मैंने कभी…”

“कोई बात नहीं। पहली बार सबसे कुछ न कुछ सीखना पड़ता है।”

मुन्नी देवी ने रम्या को रस्सी पकड़ना सिखाया, डोल को सही तरीके से कुएँ में उतारना, संतुलन बनाना। पहले दो प्रयासों में रम्या का डोल कुएँ की दीवार से टकराया और आधा पानी गिर गया। लेकिन तीसरे प्रयास में वह सफल रही।

“वाह! तुमने तो जल्दी सीख लिया!” मुन्नी देवी ने प्रशंसा की।

“आपके सिखाने का तरीका अच्छा है,” रम्या ने मुस्कुराते हुए कहा।

दोनों ने पानी भरा और साथ-साथ चलने लगे। रास्ते में मुन्नी देवी ने पूछा, “तुम क्या पढ़ती हो बेटी?”

“मैं कंप्यूटर साइंस में बी.टेक कर रही हूँ।”

“अच्छा! ये कंप्यूटर वगैरह… बड़ी बात है। हमारे ज़माने में तो लड़कियों को आठवीं के बाद पढ़ने नहीं दिया जाता था।”

रम्या ने मुन्नी देवी को देखा। उनके चेहरे पर एक कसक थी। “आप पढ़ना चाहती थीं?”

“हाँ। मैं स्कूल में बहुत अच्छी थी। मास्टर जी कहते थे कि मैं आगे पढ़ूँ। लेकिन पिता जी ने कहा – ‘लड़की है, ज्यादा पढ़-लिखकर क्या करेगी?’ सोलह साल की उम्र में शादी हो गई।”

रम्या चुप हो गई। उसे अपनी आज़ादी और अवसरों का एहसास हुआ जो मुन्नी देवी को नहीं मिल पाए थे।

अगले कुछ दिनों में रम्या और मुन्नी देवी की मुलाक़ात पनघट पर नियमित हो गई। रम्या जानबूझकर उस समय आती जब मुन्नी देवी आती थीं। दोनों पानी भरते, फिर बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर बातें करते।

एक दिन रम्या ने पूछा, “दीदी, आपको कभी अफसोस नहीं हुआ? पढ़ाई न कर पाने का?”

मुन्नी देवी ने गहरी साँस ली। “अफसोस तो होता है बेटा। लेकिन जीवन ने और रास्ते दिखाए। मैंने अपने बच्चों को पढ़ाया। मेरी बेटी एम.ए. कर रही है। बेटा इंजीनियर है। उनके जरिए मेरा सपना पूरा हो रहा है।”

“लेकिन आपका अपना सपना?”

“मेरा सपना था शिक्षिका बनने का। अब मैं गाँव के बच्चों को पढ़ाती हूँ। अनौपचारिक रूप से। जो बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, उन्हें मैं पढ़ाती हूँ। यह मेरी छोटी सी पाठशाला है।”

रम्या हैरान रह गई। “कितने बच्चे हैं?”

“लगभग दस। गरीब परिवारों के। मैं उन्हें हिंदी, गणित सिखाती हूँ। तुम भी कभी आना, तुम तो कंप्यूटर जानती हो। बच्चों को दिखाना।”

रम्या के मन में विचार आया। “दीदी, क्या आपके पास कभी कंप्यूटर देखने का मौका मिला?”

मुन्नी देवी हँस पड़ीं। “यहाँ तो बिजली ही ठीक से नहीं आती, कंप्यूटर कहाँ से लाएँ? लेकिन मैंने टीवी पर देखा है। जादू का डब्बा लगता है।”

“मैं अपना लैपटॉप ला सकती हूँ। सोलर चार्जर है मेरे पास। बच्चों को दिखा सकती हूँ।”

मुन्नी देवी की आँखें चमक उठीं। “सचमुच? बच्चे तो बहुत खुश होंगे!”

अगले दिन रम्या मुन्नी देवी के घर गई। वह एक छोटा सा मकान था, साफ-सुथरा। आँगन में पाँच-छह बच्चे बैठे थे। स्लेट और चॉक से लिख रहे थे।

“बच्चों, यह रम्या दीदी हैं। यह कंप्यूटर पढ़ती हैं,” मुन्नी देवी ने परिचय कराया।

बच्चों की आँखें चौंधिया गईं जब रम्या ने लैपटॉप निकाला। उनमें से किसी ने कभी कंप्यूटर नहीं देखा था।

रम्या ने लैपटॉप ऑन किया। “यह कंप्यूटर है। इसमें हम बहुत कुछ कर सकते हैं। लिख सकते हैं, गणना कर सकते हैं, चित्र बना सकते हैं।”

उसने एक साधारण पेंट प्रोग्राम खोला और अपना नाम लिखा। बच्चे हैरान रह गए।

“दीदी, यह कैसे होता है?” एक बच्चे ने पूछा।

“इसमें एक सी.पी.यू. होता है, जो दिमाग की तरह काम करता है…”

रम्या ने सरल भाषा में समझाने की कोशिश की। मुन्नी देवी भी बच्चों के साथ बैठकर देख रही थीं। उनकी आँखों में एक जिज्ञासा थी जो किसी बच्चे जैसी थी।

“दीदी, क्या इसमें पूरी दुनिया की जानकारी मिल सकती है?” मुन्नी देवी ने पूछा।

“हाँ, इंटरनेट के जरिए। लेकिन यहाँ नेटवर्क नहीं है।”

“अच्छा… तो यह जादू का डब्बा सचमुच सब कुछ जानता है?”

“लगभग।” रम्या मुस्कुराई।

कुछ दिन बीत गए। रम्या नियमित रूप से मुन्नी देवी की पाठशाला आने लगी। बच्चों को कंप्यूटर की बुनियादी बातें सिखाने लगी। मुन्नी देवी भी सीख रही थीं।

एक दिन पनघट पर बैठे-बैठे मुन्नी देवी ने कहा, “रम्या, तुम्हारे आने से बच्चों में एक नया उत्साह आया है। वे हर दिन पूछते हैं कि कब कंप्यूटर दीदी आएँगी।”

“मुझे भी अच्छा लग रहा है दीदी। लेकिन मैं तो एक महीने बाद वापस चली जाऊँगी।”

“हाँ, यही तो दुख है। तुम्हारे जाने के बाद फिर सब पुराने ढर्रे पर आ जाएगा।”

रम्या ने पानी में पैर डुबोए रखे थे। पनघट का ठंडा पानी उसकी थकान दूर कर रहा था। तभी उसके मन में एक विचार आया।

“दीदी, क्या हम गाँव में एक कंप्यूटर सेंटर खोल सकते हैं?”

मुन्नी देवी ने आश्चर्य से देखा। “कंप्यूटर सेंटर? यहाँ? लेकिन…”

“हाँ। छोटा सा। दो-तीन कंप्यूटर। सोलर पैनल लगाएँगे। बच्चों को पढ़ाएँगे। बड़ों को भी सिखा सकते हैं।”

“लेकिन पैसे कहाँ से आएँगे? कंप्यूटर तो महँगे होते हैं।”

रम्या ने सोचा। “मैं अपने कॉलेज से मदद ले सकती हूँ। वे सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रोजेक्ट्स के लिए फंड देते हैं। साथ ही, कुछ पुराने कंप्यूटर दान में मिल सकते हैं।”

मुन्नी देवी की आँखों में आशा की चिंगारी दिखी। “सचमुच? क्या ऐसा हो सकता है?”

“कोशिश करते हैं।”

षष्ठ अध्याय: योजना

अगले कुछ दिनों में रम्या और मुन्नी देवी ने एक योजना बनाई। रम्या ने अपने कॉलेज को ईमेल लिखा। मुन्नी देवी ने गाँव के सरपंच से बात की।

सरपंच प्रताप सिंह ने पहले तो संशय जताया। “कंप्यूटर? यहाँ? बिजली की समस्या है, रखरखाव की समस्या होगी।”

लेकिन मुन्नी देवी ने हार नहीं मानी। “सरपंच जी, आज का ज़माना कंप्यूटर का है। हमारे बच्चे पीछे न रह जाएँ।”

“और पैसे?”

“रम्या बेटी कॉलेज से मदद ले रही है। बस हमें एक कमरा चाहिए।”

प्रताप सिंह ने सोचा। “पंचायत भवन में एक कमरा खाली है। लेकिन उसकी मरम्मत करानी पड़ेगी।”

“मरम्मत हम करा लेंगे। गाँव वाले मिलकर करेंगे।”

प्रताप सिंह मान गए। “ठीक है। कोशिश करो।”

इधर रम्या को अपने कॉलेज से सकारात्मक जवाब मिला। कॉलेज ने दो पुराने लैपटॉप दान देने का वादा किया। साथ ही, एक सोलर पैनल किट के लिए फंड का आश्वासन दिया।

रम्या ने अपने पिता से भी बात की। डॉक्टर साहब ने पहले आपत्ति जताई, “तुम्हारी पढ़ाई का क्या? तुम्हें फोकस करना चाहिए।”

“पापा, यह भी तो शिक्षा का ही हिस्सा है। समाज के लिए कुछ करना। आप तो हमेशा कहते हैं कि डॉक्टर सिर्�़फ शरीर का इलाज नहीं, समाज का भी करता है।”

डॉक्टर साहब मुस्कुराए। “तुम जीत गई। मैं तुम्हारी मदद करूँगा।”

गाँव का सहयोग

योजना को कार्यान्वित करने के लिए गाँव वालों का सहयोग जरूरी था। मुन्नी देवी ने पनघट पर ही इसकी शुरुआत की।

“सुना है न, हमारे गाँव में कंप्यूटर सेंटर खुलने वाला है,” उन्होंने एक दिन पानी भरते हुए कहा।

“कंप्यूटर? वह क्या होता है?” एक बुजुर्ग महिला ने पूछा।

“वही जादू का डब्बा जिसमें सब कुछ होता है। हमारे बच्चे सीखेंगे।”

खबर जंगल की आग की तरह फैल गई। कुछ लोग उत्साहित थे, कुछ संशय में। कुछ का कहना था कि यह समय की बर्बादी है।

“लड़कियों को कंप्यूटर सीखने की क्या जरूरत? घर के काम सीखो,” एक महिला ने कहा।

मुन्नी देवी ने धैर्य से समझाया, “आज कल लड़के-लड़कियों में कोई फर्क नहीं। दोनों को आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए।”

रम्या ने भी गाँव के युवाओं से बात की। कुछ युवक जो शहर में काम कर चुके थे, उन्होंने समर्थन दिया।

“हमें कंप्यूटर आना चाहिए। बाहर नौकरी के लिए जरूरी है,” रामू, जो एक फैक्ट्री में काम करता था, ने कहा।

धीरे-धीरे समर्थन बढ़ने लगा। गाँव के युवाओं ने पंचायत भवन के कमरे की मरम्मत करनी शुरू की। औरतों ने सफाई की। बच्चे उत्साहित थे।

एक महीने की मेहनत के बाद दिन आ गया। पंचायत भवन का एक कमरा साफ-सुथरा हो गया था। दीवारों पर सफेदी की गई थी। एक तरफ सोलर पैनल लगाया गया था। अंदर दो टेबल पर दो लैपटॉप रखे थे।

उद्घाटन के दिन पूरा गाँव इकट्ठा हुआ। सरपंच प्रताप सिंह, डॉक्टर साहब, मुन्नी देवी और रम्या मंच पर थे।

सरपंच ने कहा, “आज हमारे गाँव के लिए गर्व का दिन है। हम डिजिटल इंडिया का हिस्सा बन रहे हैं। यह संभव हुआ है मुन्नी देवी और रम्या की मेहनत से।”

डॉक्टर साहब बोले, “मैं गाँव का डॉक्टर होने के नाते कह सकता हूँ कि स्वास्थ्य के साथ-साथ शिक्षा भी जरूरी है। इस सेंटर से हमारे बच्चों को नई दुनिया से जुड़ने का मौका मिलेगा।”

फिर मुन्नी देवी की बारी आई। वह थोड़ी घबराई हुई थीं। उन्होंने कभी इतने लोगों के सामने नहीं बोला था।

“मैं… मैं एक साधारण गृहिणी हूँ। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं कंप्यूटर सेंटर खोलने में भूमिका निभाऊँगी। लेकिन रम्या बेटी ने मुझे विश्वास दिलाया कि हम कुछ भी कर सकते हैं।”

“हमारे गाँव की लड़कियों को भी आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए। मैं चाहती हूँ कि कोई लड़की मेरी तरह अपने सपने छोड़ने को मजबूर न हो।”

लोग तालियाँ बजाने लगे। कई महिलाओं की आँखें नम हो गईं।

अंत में रम्या बोली। “यह सेंटर सिर्फ कंप्यूटर सिखाने के लिए नहीं है। यह सपने सिखाने के लिए है। हर बच्चे के अंदर एक सपना होता है। हम उन सपनों को पंख देंगे।”

पहली कक्षा

उद्घाटन के बाद पहली कक्षा शुरू हुई। दस बच्चे चुने गए थे – पाँच लड़के, पाँच लड़कियाँ। मुन्नी देवी और रम्या शिक्षिका थीं।

पहले दिन रम्या ने कंप्यूटर की बुनियादी जानकारी दी। मुन्नी देवी ने बच्चों को धैर्य से समझाया।

एक लड़की, सीमा, जो बहुत ही शर्मीली थी, ने पूछा, “दीदी, क्या मैं भी कंप्यूटर सीख सकती हूँ? मेरे पापा कहते हैं लड़कियों को इसकी जरूरत नहीं।”

मुन्नी देवी ने उसे गले लगा लिया। “बेटी, तुम कुछ भी सीख सकती हो। तुम्हारे अंदर अनंत संभावनाएँ हैं।”

रम्या ने कहा, “सीमा, तुम्हें पता है कंप्यूटर साइंस की पहली प्रोग्रामर एक महिला थी? एडा लवलेस। उन्होंने साबित किया कि महिलाएँ भी टेक्नोलॉजी में महान काम कर सकती हैं।”

सीमा की आँखों में एक नया आत्मविश्वास आया।

कक्षा के बाद मुन्नी देवी और रम्या पनघट पर बैठे। शाम का समय था। सूरज ढल रहा था, आसमान लाल-नारंगी हो गया था।

“दीदी, एक महीने में मुझे वापस जाना है,” रम्या ने कहा।

“हाँ, मुझे पता है।”

“लेकिन मैं चिंतित नहीं हूँ। आप यहाँ हैं। आप इस सेंटर को संभाल लेंगी।”

मुन्नी देवी मुस्कुराईं। “तुमने मुझे एक नया जीवन दिया है रम्या। मैं अब सिर्फ एक गृहिणी नहीं हूँ। मैं एक शिक्षिका हूँ। एक बदलाव लाने वाली हूँ।”

रम्या के जाने के बाद मुन्नी देवी अकेले सेंटर संभालने लगीं। उन्होंने खुद कंप्यूटर सीखना जारी रखा। रम्या ने उनके लिए वीडियो ट्यूटोरियल बनाकर भेजे थे।

धीरे-धीरे सेंटर का विस्तार हुआ। गाँव के कुछ युवाओं ने मदद करनी शुरू की। एक युवक, विजय, जो शहर से वापस आया था, उसने कंप्यूटर कक्षाएँ लेना शुरू किया।

एक दिन सीमा के पिता सेंटर आए। वह नाराज़ लग रहे थे।

“मेरी बेटी यहाँ आती है?” उन्होंने कड़कती आवाज़ में पूछा।

“हाँ। वह बहुत होशियार है। कंप्यूटर जल्दी सीख रही है,” मुन्नी देवी ने कहा।

“मुझे नहीं चाहिए यह सब। उसे घर के काम सीखने चाहिए।”

तभी सीमा आगे आई। “पापा, मैं घर के काम भी करती हूँ। लेकिन मैं पढ़ना भी चाहती हूँ। मैं टीचर बनना चाहती हूँ।”

“टीचर? तू?”

“हाँ पापा। मुन्नी दीदी ने बताया कि मैं कुछ भी बन सकती हूँ।”

सीमा के पिता का चेहरा बदला। उन्होंने मुन्नी देवी की ओर देखा। “आपने उसे यह सब सिखाया?”

“मैंने केवल उसे विश्वास दिलाया कि वह सक्षम है।”

सीमा के पिता कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, “ठीक है। पढ़ाई जारी रखो। लेकिन घर के काम भी न भूलना।”

सीमा की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने अपने पिता के पैर छुए।

पनघट की नई कहानी

छह महीने बीत गए। रम्या फिर से गाँव आई। इस बार वह कॉलेज प्रोजेक्ट के सिलसिले में आई थी।

पनघट पर मुलाक़ात हुई। मुन्नी देवी अब अकेले नहीं थीं। उनके साथ सीमा और दो अन्य लड़कियाँ थीं।

“रम्या!” मुन्नी देवी ने उसे गले लगा लिया।

“दीदी, आप तो बदल गईं!” रम्या ने कहा। मुन्नी देवी ने साड़ी के साथ सलवार-कुर्ता पहन रखा था, जो उनके लिए असामान्य था।

“यह सीमा की सलाह है। कहती है कि कंप्यूटर क्लास के लिए सुविधाजनक है।”

सभी हँस पड़े।

रम्या ने सेंटर देखा। अब वहाँ चार कंप्यूटर थे। बीस बच्चे पढ़ रहे थे। कुछ बड़े भी आते थे।

“दीदी, आपने तो कमाल कर दिया!”

“यह सब तुम्हारी वजह से संभव हुआ। तुमने न केवल कंप्यूटर सेंटर दिया, बल्कि हमें विश्वास दिया कि हम बदलाव ला सकते हैं।”

शाम को दोनों पनघट पर बैठे। पानी की कलकल आवाज़ के साथ उनकी बातचीत चल रही थी।

“रम्या, तुम्हारे जाने के बाद मैंने सोचा कि पनघट सिर्फ पानी भरने की जगह नहीं है। यह विचारों का स्रोत है। यहाँ मुलाक़ातें होती हैं, बातें होती हैं, और कभी-कभी यहीं से बदलाव की शुरुआत होती है।”

रम्या ने पानी में हाथ डाला। “दीदी, आपने कहा था कि आपका सपना शिक्षिका बनने का था। आपने वह सपना पूरा किया है।”

“हाँ, और अब मेरा नया सपना है कि इस गाँव की हर लड़की शिक्षित हो। हर बच्चा कंप्यूटर सीखे।”

सूरज डूब गया था। आसमान में तारे निकल आए थे। पनघट का पानी चाँदनी में चमक रहा था।

रम्या ने सोचा कि यह पनघट अब वही नहीं रहा। यहाँ से एक क्रांति की शुरुआत हुई थी। एक ऐसी क्रांति जिसने न सिर्फ बच्चों को कंप्यूटर सिखाया, बल्कि एक महिला को उसके सपने पूरे करने का हौसला दिया। और सबसे बड़ी बात – इसने साबित किया कि मुलाक़ातें चाहे पनघट पर हों या कहीं और, अगर इरादे नेक हों तो वे बदलाव ला सकती हैं।

मुन्नी देवी ने पानी का एक घड़ा उठाया। “चलो, अब घर चलते हैं। कल फिर नई कक्षा है।”

रम्या ने भी अपना घड़ा उठाया। दोनों चल पड़े। पीछे पनघट से पानी की कलकल की आवाज़ आ रही थी, मानो वह भी उनकी सफलता की कहानी सुना रहा हो।

पनघट की वह मुलाक़ात अब एक आंदोलन बन चुकी थी। और यह आंदोलन था शिक्षा का, सशक्तिकरण का, और सपनों का।

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